Indian Cinema: इतिहास गवाह है कि जबजब व्यवस्था ने छात्रों के सपनों का सौदा किया है तबतब देश में बड़े बदलावों की नींव रखी गई है. भारतीय सिनेमा, विशेषकर हिंदी और मराठी सिनेमा, ने समयसमय पर इस छात्र आक्रोश, कैंपस की दूषित राजनीति, कोचिंग संस्थानों के माफिया तंत्र और शिक्षा के व्यावसायिक चक्रव्यूह को बेहद संजीदगी व आक्रामकता के साथ परदे पर उतारा है. उन चुनिंदा फिल्मों का एक गहरा विश्लेषण प्रस्तुत है जिन्होंने न केवल छात्र आंदोलनों को अपनी कहानी का केंद्रबिंदु बनाया बल्कि समाज और हुक्मरानों को तीखे संवादों व दृश्यों के माध्यम से चेतावनी भी दी.
जब देश का सब से मेधावी छात्र, जो कल का डाक्टर या इंजीनियर बनने का सपना देख रहा है, परीक्षा की तैयारी छोड़ कर सड़कों पर पुलिस की लाठियां और वाटर कैनन झेलने को मजबूर हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि देश की बुनियाद में गहरी दरारें आ चुकी हैं. दिलचस्प और डरावनी बात यह है कि आज जो कुछ हम सड़कों पर देख रहे हैं चाहे वह कोचिंग माफिया का रसूख हो, परीक्षा से ठीक एक रात पहले लाखों रुपए में बिकते प्रश्नपत्र हों या व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का सामूहिक आक्रोश हो भारतीय सिनेमा ने कई साल पहले इस की चेतावनी दे दी थी. कला हमेशा समाज का दर्पण होती है लेकिन जब समाज उस दर्पण में दिख रहे दागों को नजरअंदाज कर देता है तो वे दाग नासूर बन जाते हैं.
हाल ही में दिल्ली के जंतरमंतर पर जिस तरह से छात्रों का आक्रोश मुखर हो कर सामने आया उस से गुलजार की फिल्म ‘मेरे अपने’ से ले कर ‘युवा’, ‘रंग दे बसंती’, ‘आरक्षण’, ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’, ‘गुलाल’, ‘रेगे’, ‘शाला’, ‘नायक’, ‘थ्री इडियट्स’ और ‘12वीं फेल’ सहित कुछ हिंदी व मराठी भाषा की फिल्मों की याद ताजा हो गई. इन फिल्मों में भी छात्रों व युवावर्ग का आक्रोश ठीक उसी तरह से उकेरा गया है जैसा जंतरमंतर व देश के कई हिस्सों में नजर आया.
इन फिल्मों ने व्यवस्था के खिलाफ छात्रों की आवाज को बुलंद किया तो वहीं हाल ही में देश की राजधानी के ऐतिहासिक जंतरमंतर सहित देश के कई हिस्सों में नीट पेपर लीक और लचर शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का गुस्सा सड़कों पर फूटा. यह आंदोलन इस बात का गवाह है कि जब युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ होता है तो देश का छात्र चुप नहीं बैठता. भारतीय सिनेमा ने भी समयसमय पर कैंपस के इस आक्रोश और छात्र आंदोलनों की शक्ति को बेहद संजीदगी से परदे पर उतारा है.
फिल्मकार राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने अपनी फिल्म ‘रंग दे बसंती’ में तो छात्र आंदोलन का चित्रण करने के साथ ही छात्रों द्वारा रक्षा मंत्री की हत्या भी करवाई है और हाल ही में लगभग उसी तर्ज पर हमारे देश की छात्र व युवा शक्ति ने जंतरमंतर पर आंदोलन कर आखिरकार देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा करवा ही लिया. कुछ फिल्मों की बात करें जिन में छात्र आंदोलन सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं बल्कि उस की थीम बन कर उभरे. उन फिल्मों की बात करें जिन के माध्यम से ‘सिनेमा किस तरह परदे पर युवा आक्रोश को दिखाता है से ले कर कैंपस की राजनीति, शिक्षा के बाजारीकरण और छात्र संघर्ष को भी रेखांकित करता है तो वहीं सवाल भी उठाएंगे कि इस तरह की फिल्मों के सर्जक व कलाकार भी ऐसे आंदोलनों से निजी जिंदगी में दूर क्यों रहे.
फिल्म ‘रंग दे बसंती’ के माध्यम से युवाओं की सामूहिक चेतना और व्यवस्थाविरोधी आंदोलन को दिखाया गया जिस में भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष और छात्रों पर पुलिस बर्बरता के दृश्य शामिल हैं. साथ ही, ‘गुलाल’, ‘युवा’, ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’, ‘आरक्षण’, ‘नायक’, ‘थ्री इडियट्स’, ‘12वीं फेल’ जैसी हिंदी फिल्मों के अलावा ‘रेगे’, ‘शाला’ और ‘मुक्काम पोस्ट धपाटे’ जैसी मराठी फिल्मों में फिल्मकारों ने छात्र राजनीति, शिक्षा के बाजारीकरण और अवसाद, संघर्ष व व्यवस्था के खिलाफ मूक विद्रोह का चित्रण किया, इन में छात्रों के अधिकारों के लिए संघर्ष और समाज के लिए चेतावनी दी गई है. उन फिल्मों में कैंपस की राजनीति, शिक्षा के बाजारीकरण और छात्रों के संघर्ष को प्रमुख दृश्यों और उनके तीखे संवादों ने समाज के लिए एक चेतावनी के रूप में काम किया. इन फिल्मों में छात्रों के संघर्ष का चित्रण करते हुए छात्रों के अधिकारों के लिए संघर्ष और समाज को चेताया भी गया.
वर्तमान समय में फिल्मकार राकेश ओम प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘रंग दे बसंती’ बहुत ही ज्यादा प्रासंगिक हो गई है. युवा आक्रोश और आंदोलन का यह नया रूप इसी फिल्म की तर्ज पर हमें दिल्ली व देश के अन्य हिस्सों में सड़क पर देखने को मिला.
सच में देखा जाए तो हकीकत यही है कि मेनस्ट्रीम या यों कहें कि व्यावसायिक सिनेमा में छात्र या युवा आक्रोश को ले कर गंभीर काम किया ही नहीं गया. मगर राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म ‘रंग दे बसंती’ में उस वक्त देश के युवा के बीच जो आक्रोश था उसे बहुत प्रभावी तरीके से पेश किया गया. मजेदार बात यह है कि जंतरमंतर पर छात्रों के आंदोलन के बाद फिल्म ‘रंग दे बसंती’ के लेखक कमलेश पांडे ने स्वीकार किया कि इस फिल्म का कथानक उन का व्यक्तिगत आक्रोश ही था.
नायक- द रियल हीरो : मुख्यमंत्री बनाम छात्र नेता और कालेज हिंसा
कटु सत्य यह है कि बौलीवुड की बनिस्बत दक्षिण का सिनेमा समाज व राजनीति व छात्रों से ज्यादा जुड़ाव रखता रहा है. तभी तो सब से पहले 2001 में बौलीवुड कलाकार अनिल कपूर को मुख्य भूमिका और विलेन के रूप में अमरीश पुरी को ले कर फिल्म निर्देशक एस शंकर राजनीतिक थ्रिलर फिल्म ‘नायक- द रियल हीरो’ ले कर आए, जिस की कहानी कालेज कैंपस से शुरू होती है. यह फिल्म राज्य के नेता द्वारा अपने फायदे के लिए 2 अलगअलग समुदायों के छात्रों को आपस में लड़वाने और दंगों की आग भड़काने की बात करती है.
फिल्म के एक दृश्य में कालेज के बाहर खड़ी एक सरकारी बस पर जब कुछ बाहरी गुंडे हमला करते हैं और कालेज के बेकुसूर छात्रों को पुलिस के सामने बेरहमी से पीटा जाता है, उस समय वहां मौजूद टीवी पत्रकार शिवाजी राव (अनिल कपूर) इसे अपने कैमरे मे कैद करवाता है. जबकि मुख्यमंत्री बलराज चौहान (अमरीश पुरी) जब पुलिस को मूकदर्शक बने रहने का आदेश देते हैं, तो छात्र खुद कानून अपने हाथ में लेने को मजबूर हो जाते हैं. इस दृश्य के माध्यम से फिल्मकार एस शंकर ने यह बताया है कि जब राज्य प्रशासन छात्रों को सुरक्षा देने में विफल रहता है, तो छात्र आंदोलन हिंसक रूप ले लेता है.
फिल्म में एक अन्य दृश्य में शिवाजी राव के लाइव इंटरव्यू में जब मुख्यमंत्री बलराज चौहान कहते हैं कि, ‘छात्रों का काम सिर्फ पढ़ना है, राजनीति करना नहीं’ तो टीवी पत्रकार शिवाजी राव पलट कर कहता है, ‘सर, जब कालेज की बसों में आग लगाई जा रही हो, जब परीक्षाओं के पेपर मंत्रियों के घरों से लीक हो रहे हों और जब छात्र न्याय मांगने जाएं तो उन्हें लाठियां मिल रही हों तो छात्र पढ़ाई कैसे करें? आप लोग अपनी राजनीति चमकाने के लिए किताबें छुड़ा कर हमारे हाथ में पत्थर थमा देते हैं, फिर कहते हैं कि युवा बिगड़ गया है.’ आज हमारे युवाओं को कांवड़ दिए जा रहे हैं, वंदेमातरम न गाने पर उन से झगड़ा करने को कहा जा रहा है, उन्हें मंदिरमसजिद राजनीति में घुसने को उकसाया जा रहा है तो क्या यह राजनीति नहीं है, साजिश नहीं है?
युवाः छात्र राजनीति का उदय और अपराधीकरण
दक्षिण के फिल्मकारों व दक्षिण के सिनेमा का छात्रों से भी जुड़ाव रहा है. तभी तो छात्र राजनीति पर पहली सकारात्मक दिशा देने वाली फिल्म ‘युवा’ 2004 में दक्षिण के फिल्मकार मणिरत्नम ले कर आए थे. फिल्म ‘युवा’ में फिल्मकार मणिरत्नम ने इस बात को रेखांकित किया कि किस तरह सत्ता के ठेकेदार यूनिवर्सिटी के छात्रों को लाठी, डंडा और कट्टा थमा कर उन्हें अपनी गंदी राजनीति का मोहरा बनाते रहते हैं लेकिन जब इन्हीं जागरूक हो चुके छात्रों के अंदर सीधे सत्ता को चुनौती देने की कूवत आ जाती है तब नेता क्या करते हैं. मणिरत्नम ने इस फिल्म में छात्रों, युवाओं की सामूहिक ताकत पर ज्यादा जोर दिया है.
फिल्म का एक दृश्य है: कोलकाता के मशहूर हुगली ब्रिज पर जब गुंडे छात्र नेता माइकल फर्नांडीस (अजय देवगन) और उस के साथियों पर जानलेवा हमला करते हैं, तो छात्र पीछे हटने के बजाय और एकजुट हो जाते हैं. इसी तरह फिल्म का एक दूसरा दृश्य वह है जहां माइकल कालेज के भीतर भाषण देने के बजाय छात्रों से सीधे व्यवस्था का हिस्सा बनने और विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए कहता है. फिल्म का यह दृश्य आज 22 साल बाद कुछ ज्यादा ही प्रासंगिक हो गया है. अब छात्र खुद को ‘वोटबैंक’ तक सीमित रखने के बजाय नीतिनिर्माता बनना चाहता है.
मणिरत्नम ने इस फिल्म में बहुत तीखा संवाद रखा है. विधानसभा के भीतर भ्रष्ट नेता प्रसनजीत भट्टाचार्य के सामने खड़े हो कर माइकल कहता है- ‘आप हमें कल का भविष्य कहते हैं न, तो हमारे वर्तमान को अपने पैरोंतले क्यों कुचल रहे हैं? हम राजनीति में इसलिए नहीं आ रहे कि हमें कुरसी चाहिए बल्कि हम इसलिए आ रहे हैं क्योंकि आप के गंदी कीचड़ को साफ करने के लिए हमें खुद नाले में उतरना पड़ेगा. अब युवा सिर्फ सवाल नहीं पूछेगा, जवाब भी खुद तय करेगा.’ अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास के साथ राहुल गांधी भी यही कहते नजर आ रहे हैं.
हजारों ख्वाहिशें ऐसी: वैचारिक आंदोलन और वामपंथी छात्र राजनीति
2004 में मणिरत्नम की फिल्म ‘युवा’ ने बौलीवुड के फिल्मकारों में एक नया जोश भर दिया, तभी तो एक साल बाद ही 2005 में मशहूर फिल्मकार सुधीर मिश्रा, जिन के सगे नाना मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, एक कलात्मक फिल्म ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ ले कर आ गए. वामपंथी विचारधारा वाले फिल्मकार माने जाने वाले सुधीर मिश्रा ने अपनी इस फिल्म में 1970 के दशक के उस दौर को रेखांकित किया जब देश नक्सलवाड़ी आंदोलन और आपातकाल की आग में झुलस रहा था. निर्देशक सुधीर मिश्रा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफंस कालेज के 3 छात्रों (सिद्धार्थ, गीता और विक्रम) के जरिए इस बात पर रोशनी डाली है कि किस तरह किताबी ज्ञान जब सामाजिक असमानता से टकराता है, तो छात्र अपनी सुखसुविधाएं छोड़ कर जंगलों में क्रांति करने को निकल जाते हैं. नरेंद्र मोदी ऐसे युवाओं को दिमागी नक्सल कह कर गाली देते हैं, वह भी 15 अगस्त के सरकारी भाषण में.
फिल्म का एक अहम दृश्य वह है जिस में कालेज के अंदर छात्रों की गुप्त बैठकें, दीवारों पर लिखे जा रहे राजनीतिक नारे और पुलिस का कैंपस के भीतर घुस कर छात्रों को ‘राष्ट्रद्रोही’ कह कर उठा ले जाना शामिल है. याद कीजिए फिल्म का वह दृश्य जहां सिद्धार्थ (के के मेनन) मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित हो कर कालेज छोड़ देता है और गांव के गरीब किसानों को उन के हक के लिए जागरूक करने का आंदोलन शुरू करता है. सिद्धार्थ अन्य छात्रों से कहता है कि छात्रों का आंदोलन सिर्फ फीसमाफी या परीक्षा तक सीमित नहीं होता, वह देश की आर्थिक संरचना को बदलने की चाह रखता है.
फिल्म में फिल्मकार सुधीर मिश्रा ने कई चुटीले संवाद रखे हैं, मसलन सिद्धार्थ जब अपने कालेज के अमीर और संभ्रांत दोस्तों के बीच खड़ा होता है तो वह उन से कहता है, ‘तुम्हारी किताबें तुम्हें सिर्फ यह सिखाती हैं कि दुनिया कैसी है. लेकिन मेरी ख्वाहिश यह है कि मैं देखूं कि यह दुनिया कैसी हो सकती है? जब तक इस देश का गरीब भूख से मरेगा, तब तक हमारी इस डिग्री की कीमत सिर्फ एक रद्दी कागज के टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं है.’
रंग दे बसंती: सामूहिक चेतना और व्यवस्थाविरोधी आंदोलन
आज देश में शिक्षा जगत अरबों डौलर की ‘इंडस्ट्री’ में तबदील किया जा चुका है जहां सिर्फ अमीर ऊंची जातियों के छात्र पैसा दे कर सीटें खरीद सकते हैं और गरीब छात्र योग्य होने के बावजूद सिस्टम की चौखट पर दम तोड़ देता है. सिनेमा ने इस बाजारीकरण पर करारी चोट की है. तभी तो 2004 में छात्र आंदोलन की बात करने वाली फिल्म ‘युवा’ के सफल होते ही निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा 2006 में फिल्म ‘रंग दे बसंती’ ले कर आए थे. इस का लेखन कमलेश पांडे ने किया था. हम यहां याद दिला दें कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा और कमलेश पांडे 90 के दशक से ही इस कहानी पर फिल्म बनाना चाह रहे थे, यह बात खुद कमलेश पांडे ने स्वीकार की है. मगर उन्हें कोई निर्माता नहीं मिल रहा था. पर ‘युवा’ की सफलता ने कुछ लोगों को उकसाया और फिल्म ‘रंग दे बसंती’ बन सकी.
राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने अपनी फिल्म ‘रंग दे बसंती’ में इस बात को दिखाया कि किस तरह पश्चिमी संस्कृति में डूबे, लापरवाह और कालेज कैंपस में मौजमस्ती करने वाले छात्र भी जब देश के भ्रष्टाचार की आंच को महसूस करने लगते हैं, फिर वे पल भर में ‘भगत सिंह’, ‘चंद्रशेखर आजाद’ और ‘बिस्मिला खां’ बन जाते हैं.
निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा और लेखक कमलेश पांडे ने अपनी इस फिल्म में एक ऐतिहासिक और रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य रखा है, वह है ‘इंडिया गेट का कैंडल लाइट मार्च’. मिग-21 विमान हादसे में अपने पायलट दोस्त अजय राठौड़ (आर माधवन) की मौत के बाद जब सरकार और रक्षा मंत्री भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए पायलट पर ही लापरवाही का इल्जाम लगाते हैं, तो यूनिवर्सिटी के छात्र दिल्ली की सड़कों पर उतर आते हैं. शांतिपूर्ण तरीके से मोमबत्ती ले कर बैठे छात्रों पर जब पुलिस बर्बरता से लाठीचार्ज करती है, हवाई फायर करती है और लड़कियों को घसीटती है.
जिन लोगों ने इस फिल्म को देखा है उन्हें यह दृश्य देख कर 20 जुलाई, 2026 को जंतरमंतर पर छात्रों पर हुए लाठीचार्ज की तसवीर साफ नजर आ जाती है. अफसोस की बात यह है कि फिल्म की कहानी व इस दृश्य को लिखने वाले लेखक कमलेश पांडे अब 20 साल बाद वर्तमान पीढ़ी के छात्रों को गलत ठहराने पर उतारू हैं.
फिल्म ‘रंग दे बसंती’ का सब से लोकप्रिय संवाद की बात कर लेते हैं, जो वर्तमान में आंदोलनकारी छात्रों के स्टेटस पर सटीक बैठता है. फिल्म में डीजे (आमिर खान) कहता है- ‘कोई भी देश परफैक्ट नहीं होता, उसे परफैक्ट बनाना पड़ता है. कालेज के गेट के इस तरफ हम अपनी जिंदगी को कोसते रहते हैं जबकि उस तरफ देश बदल रहा होता है. अगर हम आज इस गंदी नाली को साफ करने के लिए आगे नहीं आए, तो कल हमारे बच्चे भी इसी बदबू में जिएंगे. क्रांति की शुरुआत कालेज के कमरों से ही होती है.’
गुलाल: कैंपस राजनीति की डार्क और हिंसक हकीकत
‘रंग दे बसंती’ के बाद छात्र राजनीति के उस खौफनाक और स्याह चेहरे की कलई खोलने वाली फिल्म ‘गुलाल’ ले कर अनुराग कश्यप आ गए. अनुराग कश्यप ने उन सीधेसादे छात्रों की बात की जो केवल चुनावी मोहरे बन कर रह जाते हैं.
राजस्थान के छात्रसंघ चुनावों की पृष्ठभूमि पर आधारित इस फिल्म में अनुराग कश्यप ने इस बात का रेखांकन किया है कि किस तरह इतिहास के अधूरे बदले, राजपूताना गौरव और अलगाववाद की भावना को हवा दे कर छात्रों का इस्तेमाल किया जाता है. इस फिल्म का एक दृश्य सब से भयानक और आंखें खोलने वाला है, जिस दृश्य में दिलीप सिंह (राज सिंह चौधरी) की रैगिंग की जाती है, उसे नंगा कर के उस का मुंह काला किया जाता है और एक अंधेरे कमरे में बंद कर दिया जाता है. इस के बाद यूनिवर्सिटी के चुनावों में पैसे, शराब और अवैध हथियारों का जो तांडव दिखाया गया है, वह कालेज परिसरों के भीतर लोकतंत्र के मर्डर की गवाही देता है. जादू (अभिमन्यु सिंह) की मौत और उस के बाद भड़कने वाला छात्र आंदोलन यह साबित करता है कि कैंपस अब शिक्षा के मंदिर नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रयोगशालाएं बन चुके हैं.
फिल्म ‘गुलाल’ में अनुराग कश्यप ने हर छात्र व युवा को सोचने पर मजबूर कर देने वाला तथा पूरे भारत के खोते जा रहे वजूद और भटके हुए युवाओं पर तंज कसते हुए गीत रखा है. इस गीत को फिल्म में पृथ्वी का किरदार निभाने वाले अभिनेता पीयूष मिश्रा गाते हुए नजर आते हैं. गीत के बोल हैं- ‘ओ री दुनिया, ओ री दुनिया, सुई की नोंक जैसी चुभती है बातें तुम्हारी. यहां छात्र पढ़ाई करने नहीं आते, यहां वे अपनी जवानी को किसी नेता के पैरों में गिरवी रखने को आते हैं. इस गुलाल की लाली में छात्रों का खून मिला हुआ है और तुम इसे उत्सव कह रहे हो?’
थ्री इडियट्स: शिक्षा प्रणाली का मानसिक दबाव और मूक विद्रोह
जंतरमंतर पर हुए छात्र आंदोलन के वक्त राज कुमार हिरानी की फिल्म ‘थ्री इडिएट्स’ भी काफी चर्चा में रही. जब यह फिल्म रिलीज हुई थी तब कहा गया था कि इस फिल्म में आमिर खान का किरदार वांगचुक से प्रेरित है. पर अब जंतरमंतर आंदोलन में जब वांगचुक भी अनशन पर बैठे तो आमिर खान ने बयान दिया कि उन के किरदार का वांगचुक से कोई संबंध नहीं था और वे कभी उन से नहीं मिले थे.
बहरहाल, 2009 में ही अनुराग कश्यप की कला प्रधान फिल्म ‘गुलाल’ के ही साथ लेखक व निर्देशक राज कुमार हिरानी तथा निर्माता विधु विनोद चोपड़ा की पूरी तरह से मुंबईया मसाला फिल्म ‘थ्री इडिएट्स’ भी रिलीज हुई थी. इस फिल्म की सफलता का एहसास इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस दौर में महज 55 करोड़ रुपए की लागत में बनी फिल्म ‘3 इडियट्स’ ने 400 करोड़ रुपए से अधिक की कमाई की थी.
राजकुमार हिरानी ने अपनी फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में देश की तकनीकी और उच्च शिक्षा प्रणाली की सब से बड़ी खामी ‘रट्टा मारो और रैंक लाओ’ की संस्कृति पर गहरा प्रहार किया. यह फिल्म दिखाती है कि कैसे हमारी शिक्षा व्यवस्था छात्रों को ज्ञान देने के बजाय उन्हें एक अंधीदौड़ का हिस्सा बना देती है, जिस से तंग आ कर कई छात्र सुसाइड जैसा आत्मघाती कदम उठा लेते हैं.
फिल्म ‘थ्री इडिएट्स’ का जौय लोबो (अली फजल) नामक छात्र का सुसाइड दृश्य भारतीय सिनेमा के सब से दुखद दृश्यों में से एक माना जाता है. जौय ने एक बेहतरीन ड्रोन बनाया था, लेकिन डायरैक्टर वीरू सहस्रबुद्धे उर्फ वायरस (बोमन ईरानी) ने उसे प्रोजैक्ट सबमिट करने के लिए समय नहीं दिया और उस के पिता से फोन कर कह दिया कि आप का बेटा इस साल ग्रेजुएट नहीं हो पाएगा. जब रैंचो (आमिर खान) जौय के कमरे की खिड़की पर उस का उड़ता हुआ ड्रोन पहुंचाता है, तो अंदर जौय की लटकती हुई लाश मिलती है. इस के बाद पूरी यूनिवर्सिटी के छात्रों का मौन विरोध और डायरैक्टर डा. वीरू के खिलाफ एक मूक आंदोलन शुरू होता है.
जौय लोबो की मौत के बाद रैंचो जब कालेज के डायरैक्टर डा. वीरू के सामने खड़े हो कर शिक्षा प्रणाली की पोस्टमार्टम करते हुए कहता है, ‘सर, यह सुसाइड नहीं था, यह मर्डर था. इस कालेज का प्रैशरकुकर जैसा माहौल जहां सिर्फ ग्रेड्स, मार्क्स और नौकरियों की बात होती है, वह छात्रों के दिमाग को मार देता है. यहां 4 साल तक यह नहीं सिखाया जाता कि इंजीनियरिंग कैसे की जाए, बल्कि यह सिखाया जाता है कि रेस में फर्स्ट कैसे आया जाए. यह यूनिवर्सिटी नहीं, एक फैक्ट्री है जहां रोबोट बनाए जाते हैं.’
जब फिल्म ‘थ्री इडिएट्स’ रिलीज हुई थी तब आमिर खान के किरदार रैंचो के इस संवाद ने समाज के हर तबके को सोचने पर मजबूर कर दिया था.
आरक्षण : शिक्षा का बाजारीकरण और कोचिंग माफिया का उदय
इस बीच, बौलीवुड में तेजी से फिल्मकार प्रकाष झा उभर रहे थे. उन्हें ‘गंगाजल’ जैसी फिल्म से अच्छी ख्याति मिल चुकी थी. तो ‘थ्री इडिएट्स’ की रिलीज से ठीक 2 साल बाद 2011 में वे शिक्षा के बजारीकरण, परीक्षा के पेपर लीक व कोचिंग सैंटरों की मनमानी पर एक शुद्ध व्यवसायिक फिल्म ‘आरक्षण’ ले कर आ गए, जिसे उन्होंने भोपाल में अमिताभ बच्चन, सैफ अली खान, मनोज बाजपेयी, दीपिका पादुकोण व प्रतीक बब्बर जैसे कलाकारों के साथ फिल्माया था. लेकिन प्रकाश झा की इस फिल्म का असर आम लोगों में उस कदर नहीं हुआ जिस कदर ‘थ्री इडिएट्स’ का हुआ था. फिल्म ने अपनी लागत से कुछ ज्यादा जरूर कमा लिया था.
लेकिन आज के दौर में जब नीट के पेपर लीक के मसले ने छात्रों के अंदर आक्रोष भर दिया है, तब प्रकाश झा की फिल्म ‘आरक्षण’ काफी प्रासंगिक हो चुकी है क्योंकि प्रकाश झा ने ‘आरक्षण’ में परीक्षाओं के पेपर लीक और कोचिंग सैंटरों की तानाशाही पर सब से सटीक बात की है. यह फिल्म देश की शिक्षा प्रणाली के उस कैंसर को उजागर करती है जिसे इन दिनों ‘कोचिंग माफिया’ या ‘शिक्षा का व्यवसायीकरण’ की संज्ञा दी जा रही है. फिल्म ‘आरक्षण’ में एक आदर्शवादी और ईमानदार चांसलर डा. प्रभाकर आनंद (अमिताभ बच्चन) को उन की नीतियों के कारण हटा दिया जाता है और उन की जगह शिक्षा को महज व्यवसाय मानने वाले मिथिलेश सिंह (मनोज बाजपेयी) को बैठाया जाता है.
फिल्म ‘आरक्षण’ में एक दृश्य है जिस में डा. आनंद एक तबेले में गरीब और वंचित तबके के छात्रों को मुफ्त में पढ़ाना शुरू करते हैं. इस के विरोध में जब कमर्शियल कोचिंग इंस्टिट्यूट के गुंडे और पुलिस मिल कर उस ‘फ्री पाठशाला’ को ढहाने आते हैं, तो शहर के हजारों छात्र मानव श्रृंखला बना कर डा. आनंद के सामने खड़े हो जाते हैं और बुलेट का सामना करने को तैयार हो जाते हैं. इस दृश्य को देख चुके लोगों को कुछ दिन पहले एक मशहूर टीवी चैनल की एंकर का कुछ शिक्षकों पर की गई टिप्पणी को सुन कर अचंभा नहीं होना चाहिए.
इस फिल्म में डा. प्रभाकर आनंद का अदालत और समाज के सामने शिक्षा के गिरते स्तर पर जो संवाद है, वह बहुत तीखा सवाल छोड़ जाता है. डा. आनंद कहते हैं- ‘शिक्षा 2 प्रकार की होती है. एक जो हमें कमाना सिखाती है और दूसरी जो हमें जीना सिखाती है. लेकिन आज इस देश में शिक्षा सिर्फ एक कमोडिटी (बिकने वाली वस्तु) बन गई है. जिस के पास पैसा है वह रैंक खरीदेगा, वह पेपर खरीदेगा, वह भविष्य खरीदेगा. और जो गरीब है, वह टैलेंट होने के बावजूद बाहर खड़ा तमाशा देखेगा. यह शिक्षा व्यवस्था नहीं, यह देश की मेधा का कत्लेआम है.’
अफसोस कि 15 साल पहले रिलीज हुई इस फिल्म का यह संवाद आज भी प्रासंगिक है. कहीं कोई बदलाव नहीं आया है.
12वीं फेलः प्रतियोगी परीक्षाओं का दलदल और व्यक्तिगत संघर्षविंदु
2011 में प्रकाश झा की फिल्म ‘आरक्षण’ जो कि आज काफी प्रासंगिक है मगर उस वक्त व्यावसायिक होते हुए भी उतनी कमाई नहीं कर पाई थी जितनी कमाई करनी चाहिए थी, जिस का असर यह हुआ कि धनलोलुप फिल्म मेकरों ने छात्र आक्रोष, छात्र आंदोलन व शिक्षा जगत जैसे विषयों पर फिल्म बनाने से तोबा कर लिया. पूरे 12 साल बाद एक बार यह साहस विधु विनोद चोपड़ा में दिखा, जिन्होंने 2009 में छात्र व शिक्षा पर कल्ट फिल्म ‘थ्री इडिएट्स’ बनाई थी. 2023 में वे 2023 में दिल्ली के मुखर्जी नगर और करोल बाग की गलियों में चल रहे देश के सब से बड़े छात्र संघर्ष का सजीव चित्रण करने वाली फिल्म ‘12 वीं फेल’ ले कर आए. यह एक अलग बात है कि इसे उन्होंने आईपीएस बनने की निजी कहानी के तौर पर प्रचारित किया.
विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘12 वीं फेल’ आज के नीट और यूपीएससी की तैयारी कर रहे उन करोड़ों छात्रों की आवाज है जो बिना किसी गौडफादर के देश की सब से कठिन परीक्षाओं को पास करने के लिए अपनी जवानी खपा रहे हैं.
फिल्म ‘12 वीं फेल’ के एक दृश्य में मनोज कुमार शर्मा (विक्रांत मैसी) बड़ी कोचिंग क्लास में पढ़ने का सपना ले कर दिल्ली आता है और उस के सारे पैसे चोरी हो जाते हैं. इस के बाद मुखर्जी नगर के ‘सिंघम कोचिंग सैंटर’ के बड़ेबड़े होर्डिंग्स और अंदर हजारों छात्रों की भेड़बकरियों जैसी भीड़ को दिखाया गया है. इसी फिल्म का वह दृश्य सब से मार्मिक है जब मनोज आटा चक्की में रातभर काम करता है, उस की आंखें सोई नहीं हैं, लेकिन वह लालटेन की रोशनी में देश की सब से बड़ी परीक्षा के लिए पढ़ रहा है. यह दृश्य इस बात की ओर इशारा करता है कि देश की गरीब आबादी के लिए एक अदद नौकरी पाना किसी बड़े आंदोलन से कम नहीं है.
फिल्मकार विधु विनोद चोपड़ा ने अपनी फिल्म में तीखे संवाद भी रखे हैं. मसलन, इंटरव्यू बोर्ड के सामने जब मनोज से उस की पृष्ठभूमि पर सवाल पूछा जाता है, तो वह पूरे देश के गरीब छात्रों की तरफ से जवाब देता है- ‘सर, अगर मैं आईपीएस नहीं भी बन पाया न, तो भी मुझे इस बात का गम नहीं होगा क्योंकि मैं जहां से आता हूं वहां स्कूल में टीचर सिर्फ नकल कराने आते थे. अगर इस देश की शिक्षा व्यवस्था हमें नकल करना सिखाएगी, तो हम जैसे लोग कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे. मेरा पास होना या फेल होना सिर्फ मेरा नहीं, मेरे जैसे करोड़ों उन लड़कों का हौसला है जो भूखे पेट दिल्ली की गलियों में रह कर देश बदलने का सपना देखते हैं. हम ‘रीस्टार्ट’ करना जानते हैं.’
हमारे विशाल देश की यह बिडंबना ही है कि सौ साल से अधिक पुराने बौलीवुड में फिल्मकारों ने रोधो कर महज 8-9 फिल्में ही छात्र व युवा आक्रोष पर बनाईं. हिंदी के मेन स्ट्रीम सिनेमा में कभी भी युवा आक्रोष को ले कर गंभीर काम नहीं हुआ. गुलजार की फिल्म ‘मेरे अपने’ हो या सुधीर मिश्रा की ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ हो, ये फिल्में भी बहुत स्पष्ट नहीं थीं. ये दोनों फिल्मकार बहुत कन्फ्यूज्ड रहे हैं.
मराठी सिनेमा की 2 बेहतरीन फिल्में
मराठी भाषा के फिल्मकारों ने हिंदी के मुकाबले कहीं ज्यादा पुरजोर तरीके से छात्र व युवा आक्रोष को अपनी फिल्मों में व्यक्त किया. मराठी सिनेमा ने हमेशा से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को बहुत बेबाकी से छुआ है. इन में से एक है ‘शाला’ और दूसरी है ‘रेगे’.
शालाः आपातकाल, वैचारिक चेतना और किशोर उम्र का विद्रोह
जब प्रकाश झा ‘आरक्षण’ ले कर आए, तभी मराठी फिल्मकार सुजय दहाके ने मिलिंद बोकील के उपन्यास पर 1970 के दशक के भारत की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म ‘शाला’ का निर्माण 2011 में किया था, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया था. मिलिंद बोकील के उपन्यास पर बनी इस फिल्म में इस बात का चित्रण है कि राजनीति और समाज के आंदोलन किस तरह सिर्फ यूनिवर्सिटी तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे स्कूल की चारदीवारी के भीतर पढ़ रहे 14-15 साल के बच्चों के दिमाग को भी झकझोर कर रख देते हैं.
फिल्मकार सुजय दहाके ने फिल्म में एक अति संजीदा और राजनीतिक रूप से परिपक्व दृश्य रखा है. इस दृश्य में स्कूल के बच्चे (जोशी और उस के दोस्त) अपनी क्लास छोड़ कर स्कूल के पीछे मैदान में बैठते हैं. देश में आपातकाल लग चुका है. उन के मनपसंद शिक्षक को सरकारविरोधी विचारों के कारण स्कूल से निकाला जा चुका है. बच्चे आपस में चर्चा करते हैं कि ‘लोकतंत्र क्या होता है?’ और ‘क्या हमें अपनी बात कहने की आजादी नहीं है?’ एक स्कूल के बच्चे का देश की तानाशाही व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़ा होना इस बात का संकेत है कि चेतना उम्र देख कर नहीं आती.
फिल्म के एक दृश्य में मुकुंद जोशी (अंशुमन जोशी) का दोस्त अपनी स्लेट पर चाक से कुछ लिख रहा होता है, तो वह कहता है- ‘अगर हमारे गुरुजी को इसलिए सजा मिली क्योंकि उन्होंने सच बोला, तो फिर हमें इस स्कूल में झूठ बोलना क्यों सिखाया जा रहा है? अगर देश में बड़े लोग डर कर चुप बैठे हैं, तो इस का मतलब यह नहीं कि हम बच्चे भी आंखें बंद कर लें? स्कूल की घंटी सिर्फ क्लास बदलने के लिए नहीं, हमें जगाने के लिए भी बजनी चाहिए.’ फिल्म का यह संवाद बहुतकुछ कह जाता है.
रेगेः छात्र राजनीति में युवाओं का भटकाव और अंडरवर्ल्ड
मराठी फिल्म ‘शाला’’ के 3 साल बाद 2014 में फिल्मकार अभिजीत पानसे फिल्म ‘रेगे’ ले कर आए और अपनी फिल्म ‘रेगे’ में इस बात को रेखांकित किया कि किस तरह कालेज के मासूम और होनहार छात्र अनजाने में छात्र राजनीति के उस भंवर में फंस जाते हैं जहां से उन का सीधा संबंध अंडरवर्ल्ड और पुलिस एनकाउंटर माफिया से हो जाता है.
फिल्म में संभ्रांत परिवार से आने वाला अनिकेत रेगे (आरोह वेलणकर) एमबीबीएस का छात्र है. कालेज कैंपस के भीतर छात्रसंघ के नेताओं का रुतबा, बड़ी गाड़ियां और उन का रसूख देख कर वह उन की तरफ आकर्षित होता है. फिल्म का वह दृश्य सब से खतरनाक है जहां कालेज के चुनाव के दौरान 2 गुटों के बीच हिंसक झड़प होती है और अनिकेत सिर्फ एक नेता के साथ खड़े होने के चक्कर में पुलिस की क्राइम ब्रांच की नजरों में आ जाता है. फिल्म का यह दृश्य आज के उन युवाओं के लिए बड़ी चेतावनी है जो सोशल मीडिया और रील के चक्कर में आपराधिक प्रवृत्ति के छात्र नेताओं के पीछे अपनी जिंदगी बरबाद कर लेते हैं. हाल ही में जंतरमंतर और पटना में छात्र आंदोलन के दौरान भी इस तरह की वारदातें सामने आई हैं.
पुलिस कस्टडी में जब अनिकेत का सामना सीनियर पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा (महेश मांजरेकर) से होता है, तो प्रदीप उसे समझाते हुए कहता है-‘अनिकेत, तू डाक्टर बनने आया था न, या जो कालेज के नेता तेरे कंधे पर हाथ रख कर घूमते हैं, ये सिर्फ अपनी राजनीति की दुकान चमकाने के लिए तुम्हारा इस्तेमाल करते हैं. जिस दिन तुम पर पुलिस की लाठी पड़ेगी या कोर्ट का केस दर्ज होगा, ये नेता अपने आलीशान बंगलों में सो रहे होंगे और तुम्हारा पूरा कैरियर मिट्टी में मिल चुका होगा. छात्र आंदोलन के नाम पर ये लोग तुम्हें सिर्फ लाश बनाना जानते हैं.’
फिल्म का यह संवाद वर्तमान समय में राजनेताओें द्वारा छात्रों का किस तरह शोषण किया जाता है, उस की कलई खोलता है.
कुल मिला कर इन सभी फिल्मों, फिर चाहे वह ‘युवा’ की छात्र राजनीति हो, ‘रंग दे बसंती’ का व्यवस्थाविरोधी छात्र आक्रोश हो, ‘आरक्षण’ का कोचिंग माफिया पर प्रहार हो, ‘थ्री इडियट्स’ का छात्रों पर मानसिक दबाव हो, ‘12वीं फेल’ का मुखर्जी नगर का संघर्ष हो या फिर मराठी सिनेमा की ‘रेगे’ व ‘शाला’ की वैचारिक चेतना हो, ये सभी फिल्में समयसमय पर समाज व राजनेताओं को आगाह करने के साथसाथ चेतावनी भी देती रही हैं.
मनोरंजन के नाम पर बनाई गईं इन फिल्मों ने काल्पनिक बात नहीं की, बल्कि भारत की कड़वी हकीकत समाज के सामने पेश करती रही हैं. क्या जब हम सभी जंतरमंतर पर ‘पेपर लीक बंद करो’, ‘शिक्षा का बाजारीकरण बंद करो’, ‘एनटीए हायहाय’ या ‘शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो’ के नारे सुन रहे थे, तो हमें एहसास नहीं हो रहा था कि मणिरत्नम का माइकल या प्रकाश झा का डा. प्रभाकर आनंद आज साक्षात सड़कों पर उतर आया है.
जब रील लाइफ की डरावनी कहानियां रियल लाइफ का सच बनने लगें, तो समाज को समझ जाना चाहिए कि खतरे की घंटी बज चुकी है. कोचिंग माफियाओं का अरबों का टर्नओवर, परीक्षा कराने वाली राष्ट्रीय एजेंसियों की रीढ़हीनता और पेपर लीक करने वाले सौल्वर गैंग्स का बढ़ता हौसला इस बात का प्रमाण है कि हमारी सरकार सिनेमा की इन चेतावनियों को समझने से परहेज करती आ रही है.
यदि अब भी देश के युवाओं की इस सामूहिक चीख को अनसुना किया गया, यदि अब भी शिक्षा को व्यापार और छात्रों को सिर्फ ‘कस्टमर’ समझा जाता रहा, तो देश का युवा पूरी तरह व्यवस्था से विमुख हो जाएगा. अब समय आ गया है कि रील लाइफ के इस आक्रोश, इन संवादों और इन आंदोलनों से सीख ले कर रियल लाइफ में देश के भविष्य यानी हमारे छात्रों को न्याय दिया जाए, क्योंकि देश के छात्र की हार पूरे देश की हार है.
सब से अहम बात यह है कि जब तक देश की शिक्षा प्रणाली पारदर्शी नहीं होगी और जब तक चंद रुपयों के लिए मेधावी छात्रों के भविष्य को दांव पर लगाया जाता रहेगा, तब तक देश का कैंपस सुलगता रहेगा. भारतीय सिनेमा ने कमतर ही सही मगर अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई है. कुछ फिल्मकारों ने देश के शासकों को अपने सिनेमा के माध्यम से चेतावनी भी दी. अब देखना यह है कि देश की चुनी हुई सरकारें और हमारी न्याय प्रणाली इन सुलगते हुए कैंपसों की आवाज सुनती हैं या नहीं वरना इतिहास खुद को किसी नए और बड़े आंदोलन के रूप में दोहराने के लिए तो तैयार खड़ा है ही.
“फिल्म ‘रंग दे बसंती’ मेरा निजी आक्रोश था’’
-फिल्म लेखक कमलेश पांडे
फिल्म ‘रंग दे बसंती’ के लेखक कमलेश पांडे ने एक चैनल पर कहा- ‘‘उन दिनों ‘कुछ कुछ होता है’, ‘कभी खुशी कभी गम’ का दौर था. इन फिल्मों से एकदम अलग तरह की फिल्म ‘रंग दे बसंती’ बनी थी. इस फिल्म में मेरा अपना आक्रोष था. मेरा व्याक्तिगत आक्रोष था. यह आक्रोष 50 साल पुराना था. इसे मैं ने 1998 में लिखना शुरू किया था. पर कहानी शुरू होती है 1956 में जब मैं जबलपुर में स्कूल में 6ठी या 7वीं कक्षा में था.
जवाहरलाल नेहरू जबलपुर आए थे और उन्होंने ऐलान किया था कि भ्रष्ट इंसान को नजदीकी टैलीफोन के खंभे से लटका दिया जाएगा. उन दिनों हमारे लिए नेहरू खुदा थे. आज के बच्चों को तो एहसास ही नहीं होगा कि देश का प्रधानमंत्री क्या हो सकता है किसी के लिए. अगले दिन जब अखबार में नेहरू का वक्तव्य छप गया तो हम स्कूली बच्चे आपस में शर्त लगा रहे थे कि किस खंभे से कौन लटकने वाला है क्योंकि हम बच्चों को पता था कि हमारे जबलपुर शहर में कौन भ्रष्ट हैं. अफसोस वे खंभे आज तक खाली हैं और अब तो टैलीफोन के खंभे भी खत्म हो गए. लेकिन आज तक कोई भी भ्रष्ट किसी खंभे से नहीं लटका.
1997 में जब मिग21 दुर्घटनाग्रस्त हुआ था तब सरकार ने इस विमान के बजाय इस के पायलट पर आरोप लगाया था. शायद रक्षामंत्री जौर्ज फर्नाडिस थे. तब मेरे अंदर गुस्सा उबला कि गलती मशीन की है क्योंकि रक्षा सौदे में दलाली खाई गई. विन चड्ढा सहित कौनकौन दलाली कर पैसा खा रहा था, यह बात सभी को पता थी. सरकारें तो इस तरह के सौदों में पैसा खाया करती थीं. तो यह बात मेरे जेहन में थी. वहीं से इस फिल्म की कहानी निकली थी, जिसे लेने के लिए कोई निर्माता तैयार न था. 6 साल तक मैं और राकेश ओमप्रकाश मेहरा भटकते रहे. सभी एक ही सवाल कर रहे थे कि बसंती का किरदार कौन कर रहा है?
हमारे यहां की त्रासदी यही है कि कोई भी निर्माता या कलाकार कभी कहानी या स्क्रिप्ट नहीं पढ़ता. मैं मजाक में जवाब देता था कि बसंती का किरदार ईशा देओल कर रही हैं. यह फिल्म ‘शोले’ का रीमेक है बसंती के नजरिए से. लोग हमारी तारीफ करते थे. जब ‘रंग दे बसंती’ बनी और रिलीज हुई तो वही लोग कहने लगे कि, ‘अरे, आप ने बताया नहीं था कि यह कहानी है.’ मैं ने कहा कि आप को स्क्रिप्ट दी थी, तब आप ने पढ़ा नहीं था.
मुझे अपनी फिल्म इंडस्ट्री से कोई उम्मीद नहीं है, खासकर अपने सुपरस्टार्स से. ये सारे स्टार्स, जो छात्रों के पक्ष में बयान दे रहे हैं, इन्होंने स्कूल की पढ़ाई भी पूरी नहीं की है. इन का शिक्षा से दूरदूर तक लेनादेना नहीं है. इन्हें शिक्षा को ले कर बयान देने का कोई हक ही नहीं है. यह मेरा व्यक्तिगत गुस्सा था जो ‘रंग दे बसंती’ में निकला.
‘रंग दे बसंती’ और जंतरमंतर के छात्र आंदोलन का अंतर
‘रंग दे बसंती’ के लेखक कमलेश पांडे के विचार 20 साल बाद बदल चुके हैं. अब यह सत्ता परिर्वतन का असर है या कुछ और, पता नहीं लेकिन वे जंतरमंतर पर आंदोलन करने वाले छात्रों की खिंचाई करते हुए कहते हैं- ‘‘मेरी फिल्म ‘रंग दे बसंती’ और जंतरमंतर पर हुए छात्र आंदोलन में जो सब से बड़ा फर्क मुझे नजर आया वह यह कि हम ने फिल्म में भाषा की मर्यादा रखी. फिल्म में हम ने भले ही रक्षा मंत्री को गोली मार दी पर हम ने उसे गाली नहीं दी. उस के बारे में अश्लील वीडियो नहीं बनाया.
“पिछले 20 साल में भारत ने तरक्की भी की है. हमारे युवा भारत की तरक्की यह है कि अब हमारी भाषा अभद्रता व अश्लीलता की सारी सीमाएं लांघ चुकी है. फिर चाहे वह देश का प्रधानमंत्री हो या कोई अंतर्राष्ट्रीय व्यक्ति हो, कोई भी अछूता नहीं रहा. मुझे आश्चर्य लगा कि इस आंदोलन में प्रधानमंत्री मोदी का श्राद्ध हो रहा है और लोग श्राद्ध का खाना खा रहे हैं. एक इंसान जो देश का प्रधानमंत्री है, वह जैसा भी है, लेकिन उसे इस देश की जनता, आप ने चुना है. उस के लिए ऐसी अभद्र भाषा. कम से कम हमारी फिल्म में अभद्र भाषा नहीं थी.
“आंदोलन का राजनीतिकरण, पंजाब के शिक्षा मंत्री पर भी वही आरोप, वहां भी पेपर लीक हुए थे. मगर आप पार्टी ने अपने नेता के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया कि उसे त्यागपत्र देना चाहिए. कर्नाटक में बंगारप्पा, जो शिक्षा मंत्री रहे, उन पर भी वही इल्जाम था पर उन से इस्तीफा नहीं मांगा गया. इस्तीफा केवल धर्मेंद्र प्रधान का मांगा गया. कुल मिला कर बीजेपी या मोदी पर हमला करने का इरादा था. इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल का बेटा या अखिलेश यादव का बेटा शामिल नहीं हुआ. ये भी तो युवा हैं. लेकिन अपना बच्चा प्यारा है, दूसरों के बच्चे जलेंमरें.
“राहुल गांधी बयान दे रहे थे कि जान की बाजी लगा दो. मुझे इस तरह की राजनीति से परहेज है. हकीकत यह है कि शिक्षा हो या युवा हो, ये कभी भी हमारे देश की प्राथमिकता रहे नहीं. फिर चाहे जिस की सरकार रहे. पर युवा पीढ़ी का इस्तेमाल राजनेता से ले कर अभिनेता तक सभी ने किया.
“विडंबना यह है कि जब भगतसिंह फांसी पर झूल रहे थे तब महात्मा गांधी वायसराय से समझौता करने गए थे कि अहिंसावादी को माफी मिलेगी लेकिन हिंसावादी को फांसी नहीं दी जाएगी. इसलिए भगतसिंह को फांसी हो गई. ओशो ने कहा था- ‘जिस दिन भगतसिंह को फांसी मिली उस दिन इस देश की जवानी मर गई.’ और गांधी के समझौते के साथ ही देश का बुढ़ापा जीत गया.
“मुझे इस बात की खुशी है कि सोशल मीडिया ने एक ऐसा हथियार दे दिया कि अब जवानी के सामने कोई मजबूरी नहीं रही. अब जवानी खड़ी हो सकती है. युवा खड़े हो कर अपने अधिकारों की मांग कर सकता है. मगर इस संघर्ष की सीमा कहां तक पहुंचेगी, पता नहीं.
“जो लोग मोदी को गालियां दे रहे थे, अश्लील भाषा का प्रयोग कर रहे थे, यदि कोई उन के घर पर जा कर उन के पिता या दादा को वही गालियां दे, तो क्या उन को बरदाश्त होगा. मोदी को जो लड़के या लड़कियां गाली दे रहे थे, मोदी और मेलानी को मिला कर मीम्स बना रहे थे, कोई उन के घर जा कर उन के दादादादी को ले कर ऐसे मीम्स बनाए तो उन्हें बरदाश्त होगा. छात्रों को यह भी सोचना चाहिए कि वे जो कुछ नेताओं के साथ कर रहे हैं, अगर उन के मातापिता के साथ कोई वैसा ही करे तो क्या उन्हें बरदाश्त होगा.
फिल्मकार और कलाकारों की खामोशी
मणिरत्नम, प्रकाश झा, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, विधु विनोद चोपड़ा, सुधीर मिश्रा या राज कुमार हिरानी जैसे फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों में तीखे सवाल किए, मगर छात्र आक्रोष व छात्र आंदोलन के समय अपनेअपने घरों में दुबके रहे. अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने जरूर इंसान या विचारक के तौर पर अपनी बात रखी. ऐसे में अहम सवाल उठता है कि ऐसी क्या मजबूरी होती है कि अमूमन हर विवादित मुद्दे पर हमारे सैलिब्रिटी हमेशा खामोश हो जाते हैं या किनारा कर लेते हैं. वे कोई ठोस स्टैंड लेते नजर नहीं आते.
इस पर कुछ लोगों से बात की तो एक बात यह भी उभर कर आई कि मीडिया भी ठोस स्टैंड लेने वाले व स्टैंड ले कर फंस जाने वाले फिल्मकारों या कलाकारों के साथ खड़ी नजर नहीं आती है. नसीरुद्दीन शाह ने जो कुछ कहा, उस से किसी की असहमति हो सकती है लेकिन उन की जिस तरह से छीछालेदर की गई, उसे भी सही नहीं कहा सकता. यहां तक कि नसीरुद्दीन शाह के अपने फालोअर्स भी उन के बचाव में नजर नहीं आए. यही वजह है कि सैलिब्रिटी चुप रहने लगे हैं.
शाहरुख, आमिर ने एक बार बोला था लेकिन उस के बाद से चुप हैं. इन का बहुतकुछ दांव पर लगा हुआ है. राज कुमार राव ने जब छात्रों के पक्ष में बयान दिया तो लोगों ने उन का पुराना वीडियो वायरल कर दिया कि मोदी हैं तो मुमकिन है. राज कुमार ने इस पर सही तरीके से जवाब भी दिया कि जो दबाव होते हैं, उन्हें समझना आसान नहीं है. तो, ऐसे दबाव को भी समझने की जरूरत है.
कई बार फिल्मस्टार्स को दबाव में आ कर सत्ता का समर्थन करना पड़ता है, कई बार दबाव में आ कर सत्ता के समर्थन में चुप भी रहना पड़ता है. कई बार दबाव में ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जोकि उन्हें दिल से मंजूर नहीं होते हैं. हम सभी जानते हैं कि वर्तमान सरकार किस तरह से व्यवहार करती है. ईडी है, सीबीआई है, इनकम टैक्स विभाग है. सत्ता हमेशा निरंकुश व्यवहार करती है.
युवाओं के आक्रोश को सिनेमा के परदे पर आवाज देतेदेते तमिलनाड़ु के मुख्यमंत्री बने थलापति विजय
तमिलनाडु में राजनीति और सिनेमा के बीच गहरा और अटूट रिश्ता रहा है. फिर चाहे वह एम जी रामचंद्रन (एमजीआर) हों या जयललिता या करुणानिधि. इन सभी ने सिनेमा का हिस्सा बन कर युवा पीढ़ी को अपना प्रशंसक बनाया और फिर राज्य की सत्ता हासिल की. इसी कड़ी में साल 2026 में एक नया और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया जब तमिल सिनेमा के महानायक सी जोसेफ विजय यानी ‘थलापति विजय’ ने पारंपरिक द्रविड़ियन पार्टियों के 6 दशकों के एकाधिकार को ध्वस्त करते हुए तमिलनाडु के 9वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. विजय थलापति के मुख्यमंत्री बनने में उन के 3 दशकों के फिल्मी सफर, सोचेसमझे किरदारों और विशेष रूप से छात्र व युवा पीढ़ी के आक्रोश को अपनी फिल्मों के माध्यम से दी गई आवाज का सीधा योगदान रहा.
छात्र और युवा आक्रोश की आवाज बनना
थलापति विजय के स्टारडम की नींव में हमेशा युवा और छात्र वर्ग रहा है. उन्होंने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत जरूर रोमांटिक और पारिवारिक फिल्मों के साथ की लेकिन जब ‘मास हीरो’ की छवि अपनाई, तो उन्होंने अपनी फिल्मों में हमेशा उन किरदारों को तरजीह दी जो सीधे तौर पर समाज, व्यवस्था और भ्रष्टाचार से जूझ रहे युवाओं की चिंताओं को छूते हों. विजय ने अपनी फिल्मों या अपने अभिनय से लोगों का महज मनोरंजन नहीं किया, बल्कि उन्होंने बड़े परदे पर उस असंतोष को जीवंतता प्रदान की जिसे तमिलनाडु का आम युवा अपनी असल जिंदगी में महसूस कर रहा था. फिर चाहे वह बेरोजगारी हो, शिक्षा का व्यवसायीकरण हो. जी हां, विजय ने अपने किरदारों के माध्यम से भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र के खिलाफ हमेशा बगावत कर युवाओं का ‘मसीहा’ बनने का प्रयास किया.
फिल्मों की कहानी और किरदारों के माध्यम से आक्रोश को आवाज
विजय की एक नहीं, कई ब्लौकबस्टर फिल्में हैं, जिन की कहानियां सीधे तौर पर छात्र राजनीति, सामाजिक असमानता और व्यवस्था के खिलाफ युवाओं के संघर्ष पर आधारित रहीं. 2004 में रिलीज तमिल फिल्म ‘मदुरे’ (डंकनतमल) और 2005 में रिलीज तमिल ‘तिरुपाची’ (जीपतनचंबीप) में विजय ने एक ऐसे आम युवक और छात्र नेता की भूमिका निभाई जो कानून को अपने हाथ में लेने के लिए मजबूर होता है क्योंकि सरकारी तंत्र पूरी तरह सड़ चुका है. इन किरदारों ने कालेज जाने वाले युवाओं को यह संदेश दिया कि अन्याय के खिलाफ चुप रहना भी एक अपराध है. 2014 में रिलीज फिल्म ‘कत्थी’ (ज्ञंजीजीप) में विजय ने दोहरी भूमिका निभाई, जिस में एक किरदार कौर्पोरेट जगत द्वारा किसानों के शोषण और पानी के संकट के खिलाफ छात्रों को एकजुट करता है. फिल्म में एक दृश्य है, जिस में कालेज के छात्र शहर की पानी की पाइपलाइन ब्लौक कर के अपना विरोध दर्ज कराते हैं. इस दृश्य ने युवा पीढ़ी के भीतर सामाजिक आंदोलनों के प्रति एक नई चेतना जगाई.
2017 में विजय के अभिनय से सजी फिल्म ‘भैरवा’ सीधे तौर पर निजी शैक्षणिक संस्थानों और मैडिकल कालेजों के घोटालों और वहां छात्रों के शोषण पर प्रहार करती है. विजय ने इस में एक आम बैंक कर्मचारी के रूप में शिक्षा माफिया के खिलाफ लड़ाई लड़ी, जिस ने उन लाखों छात्रों और अभिभावकों के दर्द को आवाज दी जो महंगी शिक्षा के जाल में फंसे हुए हैं.
दक्षिण भारत में 2018 में रिलीज, निर्देशक ए आर मुरुगादास की विजय के अभिनय से सजी फिल्म ‘सरकार’ को विजय के राजनीतिक जीवन का ‘ब्लूप्रिंट’ माना जाता है. इस फिल्म में विजय ने एक एनआरआई कौर्पोरेट दिग्गज की भूमिका निभाई, जो अपना वोट डालने भारत आता है लेकिन पाता है कि उस का वोट पहले ही फर्जी तरीके से डाला जा चुका है. इस के बाद वह भ्रष्ट राजनेताओं और चुनाव प्रणाली के खिलाफ जंग छेड़ देता है. यह वह फिल्म है जिस ने पहली बार सीधे तौर पर राज्य के राजनीतिक तंत्र को चुनौती दी और युवाओं को मतदान के अधिकार तथा राजनीतिक भागीदारी के प्रति जागरूक किया. फिर 2021 में रिलीज तमिल फिल्म ‘मास्टर’ में विजय ने जेडी नामक एक ऐसे प्रोफैसर का किरदार निभाया जो कालेजछात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय है. शराब की लत से जूझने के बावजूद जब बात जुवेनाइल होम (बाल सुधार गृह) के बच्चों को एक खूंखार अपराधी के चंगुल से बचाने की आती है, तो वह व्यवस्था से भिड़ जाता है. इस किरदार ने दिखाया कि एक शिक्षक या मार्गदर्शक कैसे युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा में मोड़ सकता है.
परदे के किरदारों का वास्तविक जीवन में विस्तार
विजय ने केवल स्क्रीन पर ही युवाओं के अधिकारों की बात नहीं की, बल्कि उन्होंने अपने प्रशंसक संगठन ‘विजय मक्कल अय्यक्कम’ के माध्यम से अपने फिल्मी किरदारों को जमीनी हकीकत प्रदान की. फिल्मों में उन के द्वारा निभाए गए छात्रहितैषी किरदारों की छवि को मजबूत करने के लिए वास्तविक जीवन में उन्होंने मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति देना, मुफ्त शिक्षा सामग्री बांटना और ट्यूशन सैंटर्स खोलना शुरू किया. 2021 के स्थानीय निकाय चुनावों में जब उन के इस संगठन ने 115 सीटें जीतीं, तभी यह साफ हो गया था कि युवाओं का यह जुड़ाव सिर्फ सिनेमा हौल की सीटियों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक गहरे राजनीतिक भरोसे में बदल चुका है.
‘तमिलगा वेत्रि कझगम’ और 2026 का ऐतिहासिक मोड़
फरवरी 2024 में जब विजय ने अपनी राजनीतिक पार्टी ‘तमिलगा वेत्रि कझगम’ की घोषणा की, तो उन का मुख्य नारा ही भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शी शासन था. उन्होंने सीधे तौर पर बेरोजगारी, शिक्षा नीति और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों को अपने घोषणापत्र का केंद्र बनाया. 2026 के विधानसभा चुनावों में तमिलनाडु के युवाओं, पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं और महिलाओं ने पारंपरिक द्रविड़ियन राजनीति से परे जा कर विजय के ‘बदलाव के वादे’ पर मुहर लगाई. विजय के राजनीतिक दल ने अकेले 108 सीटें जीत कर राज्य की राजनीति में इतिहास रच दिया और अन्य सहयोगी दलों के समर्थन से बहुमत हासिल कर विजय मुख्यमंत्री की कुरसी पर आसीन हुए.
थलापति विजय का तमिलनाडु राज्य का मुख्यमंत्री बनना इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब सिनेमा का कोई बड़ा नायक अपनी कला को केवल मनोरंजन के साधन तक सीमित रखने के बजाय उसे समाज के सब से ऊर्जावान वर्ग यानी युवाओं के आक्रोश, उन की उम्मीदों और उन की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति बनाने का साधन मान लेता है तब वह केवल अभिनेता नहीं रह जाता. थलापति विजय ने सिनेमाई परदे पर अपनी फिल्मों की कहानियों और उन में निभाए गए किरदारों के माध्यम से लगातार युवाओं के दिलों में उतरना ही अपना मुख्य ध्येय रखा. जिस छात्र व युवा के आक्रोश को दूसरे राजनेताओं ने तवज्जुह नहीं दी, उसे ही थलापति विजय ने अपनी ताकत बनाई. Indian Cinema





