Indian Cinema: इतिहास गवाह है कि जबजब व्यवस्था ने छात्रों के सपनों का सौदा किया है तबतब देश में बड़े बदलावों की नींव रखी गई है. भारतीय सिनेमा, विशेषकर हिंदी और मराठी सिनेमा, ने समयसमय पर इस छात्र आक्रोश, कैंपस की दूषित राजनीति, कोचिंग संस्थानों के माफिया तंत्र और शिक्षा के व्यावसायिक चक्रव्यूह को बेहद संजीदगी व आक्रामकता के साथ परदे पर उतारा है. उन चुनिंदा फिल्मों का एक गहरा विश्लेषण प्रस्तुत है जिन्होंने न केवल छात्र आंदोलनों को अपनी कहानी का केंद्रबिंदु बनाया बल्कि समाज और हुक्मरानों को तीखे संवादों व दृश्यों के माध्यम से चेतावनी भी दी.

जब देश का सब से मेधावी छात्र, जो कल का डाक्टर या इंजीनियर बनने का सपना देख रहा है, परीक्षा की तैयारी छोड़ कर सड़कों पर पुलिस की लाठियां और वाटर कैनन झेलने को मजबूर हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि देश की बुनियाद में गहरी दरारें आ चुकी हैं. दिलचस्प और डरावनी बात यह है कि आज जो कुछ हम सड़कों पर देख रहे हैं चाहे वह कोचिंग माफिया का रसूख हो, परीक्षा से ठीक एक रात पहले लाखों रुपए में बिकते प्रश्नपत्र हों या व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का सामूहिक आक्रोश हो भारतीय सिनेमा ने कई साल पहले इस की चेतावनी दे दी थी. कला हमेशा समाज का दर्पण होती है लेकिन जब समाज उस दर्पण में दिख रहे दागों को नजरअंदाज कर देता है तो वे दाग नासूर बन जाते हैं.

हाल ही में दिल्ली के जंतरमंतर पर जिस तरह से छात्रों का आक्रोश मुखर हो कर सामने आया उस से गुलजार की फिल्म ‘मेरे अपने’ से ले कर ‘युवा’, ‘रंग दे बसंती’, ‘आरक्षण’, ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’, ‘गुलाल’, ‘रेगे’, ‘शाला’, ‘नायक’, ‘थ्री इडियट्स’ और ‘12वीं फेल’ सहित कुछ हिंदी व मराठी भाषा की फिल्मों की याद ताजा हो गई. इन फिल्मों में भी छात्रों व युवावर्ग का आक्रोश ठीक उसी तरह से उकेरा गया है जैसा जंतरमंतर व देश के कई हिस्सों में नजर आया.

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