Mount Everest Pollution: भारत में पर्यावरण से बड़ा धर्म होता है इसलिए धर्म के नाम पर एनवायरनमेंट को बर्बाद करने में कोई नहीं हिचकता. केदारनाथ, अमरनाथ, कुम्भ या गंगोत्री हर जगह यही पैटर्न नजर आता है. गंगा और यमुना जैसी नदियाँ धर्म के कचरे से दम तोड़ रही हैं तो वहीं पहाड़ों की हालत भी खस्ता हो रही है. पहाड़ों पर लाखों टन मानव गंदगी पहुंच रही है जिससे ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. नेपाल की सरकार ने इस बीमारी को पहचान लिया है और एवरेस्ट के लिए नियम तय कर दिए हैं लेकिन भारत की सरकार कब जागेगी?

एवरेस्ट पर हर साल लगभग 800 से 1000 लोग समिट करते हैं और 1500 से ज्यादा शेरपा, गाइड, पोर्टर और स्टाफ बेस कैंप से लेकर मेन कैंप तक में 4 तक महीनों रहते हैं. एक इंसान औसतन 1.5 से 2 लीटर पेशाब रोज करता है. बेस कैंप में 1000 लोग 60 दिन रहें तो सिर्फ वहीं 1,20,000 लीटर पेशाब एनवायरनमेंट में घुलता है. हर सीजन में कैंप 1,2,3,4 और साउथ कोल में मिलाकर करीब 4 से 5 लाख लीटर मानव मल-मूत्र पहाड़ पर ही छोड़ दिया जाता है. नेपाल के Sagarmatha Pollution Control Committee के मुताबिक पीक सीजन के एक दिन में 6000 लीटर से ज्यादा पेशाब खुले में या बर्फ के गड्ढों में घुलता है.

पेशाब में 95 प्रतिशत पानी होता है लेकिन बाकी 5 प्रतिशत में यूरिया, सोडियम, अमोनिया, नाइट्रोजन और दूसरे एनवायरनमेंट के लिए जहरीले लवण होते हैं. ताजा पेशाब का तापमान 37 डिग्री होता है, जो माईनस 20 डिग्री की बर्फ पर सीधा थर्मल शॉक देता है. पेशाब में घुला नमक बर्फ के पिघलने के बिंदु को कम कर देता है, वही तरीका जिससे सड़कों पर बर्फ पिघलाने के लिए नमक डाला जाता है. यूरिया बर्फ के क्रिस्टल स्ट्रक्चर को तोड़ता है जिससे बर्फ तेजी से पानी बन जाता है.

साफ बर्फ सूरज की 80-90 फीसदी रोशनी वापस कर देती है इसलिए ठंडी रहती है. पेशाब पीला-भूरा होता है, वह बर्फ को गंदा कर देता है. गंदी बर्फ काली बर्फ बन जाती है और 40 फीसदी तक ज्यादा सौर ऊर्जा सोखने लगती है. नासा की स्टडी कहती है कि हिमालय में ब्लैक कार्बन और बायो गंदगी से एल्बिडो 15 फीसदी तक घटा है और इसी से खुंबू ग्लेशियर हर साल 1 मीटर पतला हो रहा है.

पेशाब बाँझ नहीं होता, उसमें लाखों बैक्टीरिया होते हैं. जब यह बैक्टीरिया बर्फ में जाते हैं तो वह बायोफिल्म बनाते हैं, जो बर्फ को अंदर से सड़ाते हैं. साथ ही मानव मल के साथ 8000 मीटर पर भी E. coli और नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया पाए गए हैं जो मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैस छोड़ते हैं. यह गैस माइक्रो क्लाइमेट गर्म करती है.

खुंबू आइसफॉल और साउथ कोल ग्लेशियर पिछले 25 साल में अपनी 2000 साल पुरानी बर्फ खो चुके हैं. 2022 में University of Maine की टीम ने साउथ कोल ग्लेशियर पर ड्रिल किया तो पाया कि 1990 के बाद से बर्फ बनने की बजाय पिघलने की रफ्तार 80 गुना बढ़ गई है. इस पिघली बर्फ में मानव यूरिन से नाइट्रेट की मात्रा WHO लिमिट से 5 गुना ज्यादा मिली. यही पानी नीचे उतर कर इमजा झील और दूधकोसी नदी में जाता है जिससे नेपाल के गांवों का पीने का पानी भी दूषित हो रहा है. नेपाल सरकार ने अब नियम बनाया है कि हर पर्वतारोही को अपना मल-मूत्र बेस कैंप से वापस लाना होगा, इसके लिए सरकार ने लोगों को WAG Bag देना शुरू किया है.

भारत के पहाड़ों पर धर्म का कब्जा

भारत में स्थिति अलग है. अमरनाथ और गंगोत्री में वही एवरेस्ट वाला फॉर्मूला 100 गुना बड़ा हो जाता है क्योंकि एवरेस्ट पर 1000 लोग जाते हैं, यहां लाखों जाते हैं और साथ में धर्म का लाइसेंस लेकर जाते हैं. अमरनाथ यात्रा 45 दिन चलती है, रोज 15 से 20 हजार लोग यहां पहुंचते हैं. सरकारी आंकड़ा कहता है 2024 में 5.12 लाख यात्री गए. एक आदमी दिन में 1.5 लीटर पेशाब और 200 ग्राम मल छोड़ता है इस हिसाब से 5 लाख लोग अगर औसत 3 दिन भी ट्रैक पर रहे तो 22.5 लाख लीटर पेशाब और 300 टन मल सीधा लिद्दर नदी के कैचमेंट में गिरता है. बेस कैंप बालटाल और पहलगाम में कोई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं है, गहरे गड्ढे खोदे जाते हैं जिन्हें पिट टॉयलेट कहते हैं जो पहली बारिश में ओवरफ्लो होकर सीधा नदी में मिल जाते हैं.

गंगोत्री में हालात इससे भी बदतर हैं. गंगोत्री नेशनल पार्क में रोज 3000 से 5000 श्रद्धालु पहुंचते हैं और मई-जून में तो यही तादात एक लाख से ज्यादा हो जाती है. वहां भागीरथी 2 मीटर चौड़ी होती है. वहीं किनारे पर लोग नहाते हैं, वहीं साबुन लगाते हैं और पंडा वहीं फूल, नारियल, चुनरी, अगरबत्ती की राख और पॉलिथीन फेंक देता है. गंगोत्री से गोमुख तक हर किलोमीटर पर प्लास्टिक की बोतल, चिप्स के रैपर और पूजा सामान का वेस्ट बिखरा पड़ा होता है.

CPCB की रिपोर्ट कहती है अमरनाथ यात्रा के दौरान लिद्दर नदी में फीकल कोलीफॉर्म 500 से बढ़ कर 8000 MPN/100ml हो जाता है, जबकि पीने लायक पानी में यह 50 से भी कम होना चाहिए. मतलब यहां धर्म के अंधे भक्त अपनी शुद्धि के लिए नदी को गंदा कर रहे होते हैं. पहाड़ों पर शिवलिंग पर जो दूध चढ़ाया जाता है नीचे आते-आते वही दूध सड़ कर नदी में अमोनिया बन जाता है.

प्रसाद और पूजा सामग्री बायोडिग्रेडेबल नहीं होती. पूजा सामग्री में 90 फीसदी प्लास्टिक होता है. चुनरी पॉलिएस्टर की, माला प्लास्टिक के मोती की, त्रिशूल लोहे का नहीं प्लास्टिक का, नारियल के साथ लपेटा हुआ लाल पॉलिथीन. गंगोत्री में फूल माला के साथ सिंथेटिक धागा आता है जो 200 साल तक नहीं सड़ता. अगरबत्ती में बांस नहीं, चारकोल और केमिकल गोंद है जो जल कर PAH छोड़ता है और वही ग्लेशियर पर काला कार्बन बन कर जम जाता है. गंगा को मां कहने वाले लोग इसी गंगा मां के मुंह में रोज प्लास्टिक ठूंसते हैं. कोई बेटा अपनी मां के साथ ऐसा करता है क्या?

सरकार और श्राइन बोर्ड इस समस्या का समाधान नहीं कर पाते क्योंकि दोनों के लिए पर्यावरण से ऊपर धर्म होता है. अमरनाथ श्राइन बोर्ड हर साल यात्रा के बाद 200 टन कचरा नीचे लाने का दावा जरूर करता है, लेकिन CAG ऑडिट इस दावे को गलत साबित कर देता है. रिपोर्ट के अनुसार 60 फीसदी कचरा वहीं दबा दिया जाता है. WAG Bag जैसा सिस्टम यहां मजाक लगता है क्योंकि श्रद्धालुओं की नजर में पहाड़ पर हगना पाप नहीं है, खुले में शौच तो परम्परा रही है. एवरेस्ट पर कम से कम शेरपा शर्मिंदा तो हैं लेकिन यहां तो शर्म भी नहीं है और इसी बेशर्मी के कारण गंगोत्री ग्लेशियर जो गंगा का स्रोत है, वह 1935 से अब तक 3.5 किलोमीटर पीछे हट चुका है यानि हर साल तकरीबन 22 मीटर की दर से घट रहा रहा है. ISRO की स्टडी कहती है कि ग्लेशियर के पिघलने में सबसे बड़ा योगदान ब्लैक कार्बन का है जो भक्तों के द्वारा फेंके गये बायो कचरे से पैदा होता है.

अगर दर्शन ही करना है तो अपना मल-मूत्र, अपनी बोतल, अपनी चुनरी की खुद जिम्मेदारी लेनी चाहिए और उन्हें पहाड़ों से वापस अपने घर ले जाना चाहिए. जैसे नेपाल सरकार ने एवरेस्ट पर WAG Bag वाला नियम लागू किया है, वैसे ही अमरनाथ और गंगोत्री में कंपलसरी टॉयलेट किट और 5 किलो कचरा वापस लाने पर ही डिपॉजिट वापस वाला नियम बनना चाहिए और पूजा सामग्री को 100 प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल बनाना चाहिए, प्लास्टिक की माला और पॉलिएस्टर की चुनरी पर पूरी तरह बैन लगे. लंगर में स्टील के बर्तन का इस्तेमाल हो और सबसे जरूरी बात कि यह मानना बंद कीजिये कि हिमालय कोई टॉयलेट है जहां पेशाब और मल सब जायज है. रिपोर्ट यह साबित करती है कि एवरेस्ट सिर्फ प्लास्टिक से ही नहीं, पेशाब से भी मर रहा है. भक्तों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हिमालय कोई टॉयलेट नहीं बल्कि यह देश की छत पर रखा वाटर टैंक है. इसी टैंक से आधा भारत पानी पीता है.

स्विट्ज़रलैंड से सीखने की जरूरत क्यों?

स्विट्जरलैंड के पहाड़ इतने साफ और स्वच्छ क्यों हैं इसका जवाब पर्यावरण को लेकर स्विट्ज़रलैंड की साइंटिफिक पॉलिसी में छिपा है. स्विट्ज़रलैंड में ARA Zermatt नाम का एक अंडरग्राउंड वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बना है जो पूरी दुनिया के लिए मिसाल है. यह प्लांट बाहर से दिखता ही नहीं है क्योंकि इसे चट्टानों और गुफाओं के अंदर बनाया गया है ताकि पहाड़ की सुंदरता खराब न हो.

इस प्लांट को बनाना कोई सस्ता काम नहीं था. इसे बनाने में ही 40 से 50 मिलियन स्विस फ्रैंक लगे थे यानी भारतीय रुपये में 380 से 480 करोड़ रुपये. फिर 2009 और 2010 में इसमें नई बायोलॉजिकल और मेंब्रेन फिल्टर तकनीक जोड़ी गई जिसके लिए 27 मिलियन स्विस फ्रैंक यानी करीब 250 करोड़ रुपये और खर्च किए गए. कुल मिलाकर इस एक सीवेज सिस्टम पर 70 मिलियन स्विस फ्रैंक यानी 650 करोड़ रुपये से ज्यादा लग चुके हैं. इसे चलाना भी महंगा है. हर साल पंपिंग, बिजली, फिल्टर की सफाई और इंजीनियरों की सैलरी पर 2.5 से 3.5 मिलियन स्विस फ्रैंक यानी 23 से 32 करोड़ रुपये खर्च होते हैं.

सबसे बड़ी बात यह है कि यह पैसा सरकार अपनी जेब से नहीं देती, यह पैसा सीधा पर्यटकों से वसूला जाता है. जेरमैट में हर पर्यटक को एक रात रुकने पर करीब 4 स्विस फ्रैंक यानी 380 रुपये टूरिस्ट टैक्स देना पड़ता है. यह टैक्स होटल के बिल में ही जुड़ा होता है. इसके अलावा हर होटल, रेस्टोरेंट और कैफे को जितना पानी वह इस्तेमाल करता है और जितना गंदा पानी वह छोड़ता है उसके हिसाब से वेस्ट वाटर फीस देनी पड़ती है. होटल मालिक यह फीस अपने खाने और कमरे के दाम में जोड़ देता है और आखिर में यह कीमत टूरिस्टों की जेब से वसूली जाती है.

यही फर्क है भारत और स्विस के सिस्टम में और यह फर्क सिर्फ सिस्टम का नहीं बल्कि सोच का है. उनके पहाड़ों पर भगवान नहीं रहता बल्कि वहाँ के पहाड़ों पर गलेशियर हैं जो तापमान में जरा से बदलाव से पिघल सकते हैं इसलिए स्विट्जरलैंड ने अपने पहाड़ों को साफ रखा है. स्विस ने पहाड़ को भगवान नहीं माना, पहाड़ को पहाड़ ही माना. यही सबसे बड़ा फर्क है. हमारे यहां पहाड़ पर बर्फ जमते ही वह शिवलिंग बन जाता है, वहां भी गुफाओं में बर्फ जमता है लेकिन वह सिर्फ बर्फ ही रहता है.

हमने अमरनाथ और गंगोत्री में कोई ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगाया. हमने यात्रियों से पैसा लिया लेकिन उस पैसे से पिट टॉयलेट खोद कर छोड़ दिया जो पहली बारिश में नदी में घुल जाता है. स्विट्जरलैंड ने टूरिस्ट से पैसा लिया और उसी पैसे से जमीन के नीचे ऐसी फैक्ट्री बना दी जो मल मूत्र को पीने लायक पानी बना कर ही नदी में छोड़ती है. वहां का नियम साफ है कि अगर पहाड़ पर आना है तो पहाड़ गंदा करने का मुआवजा भी देना पड़ेगा. हमारे यहां नियम है कि पहाड़ पर आओ और गंदगी फैलाओ जिसे सरकार कभी साफ करती नहीं और पहाड़ मरते चले जाते है. यही हाल भारत में नदियों का भी है.

स्विट्जरलैंड में भी वैसी ही गुफाएं हैं जैसी अमरनाथ में हैं. आल्प्स में ऐसी सैकड़ों आइस केव हैं जहां सर्दियों में पानी रिस कर नीचे गिरता है और ठंड से जम कर गोल पिरामिड बन जाता है. साइंस में इसे आइस स्टैलेग्माइट कहते हैं. वहां के लोग उसे देखने जाते हैं, फोटो खींचते हैं, गाइड बताता है कि यह तापमान, नमी और हवा के कारण बना है. कोई उसे चमत्कार नहीं कहता, कोई उसके ऊपर दूध नहीं डालता, कोई वहां त्रिशूल गाड़ कर अगरबत्ती नहीं जलाता क्योंकि उनका स्कूल उन्हें सिखाता है कि बर्फ बर्फ है, चमत्कार नहीं. हमारा स्कूल, हमारा घर, हमारा टीवी, हमारा पंडा और हमारी सरकार यह सब मिलकर साधारण से नेचुरल फेनोमीना को चमत्कार बना देते हैं. स्विट्जरलैंड ने चमत्कार को धंधा नहीं बनने दिया और हमने चमत्कार को ही धंधा बना लिया.

स्विट्जरलैंड ने नियम को धर्म से बड़ा रखा. वहां पहाड़ पर जाने के लिए अपना कचरा वापस लाना पड़ेगा. हर ट्रैक पर डस्टबिन नहीं है बल्कि कचरा घर ले जाने का कानून है. अगर किसी व्यक्ति ने एक रैपर भी फेंका तो 200 फ्रैंक का जुर्माना है यानी करीब बीस हजार रुपये. पहाड़ पर प्लास्टिक की बोतल बेचना ही मना है. वहां दुकानों पर स्टील की बोतल में पानी मिलता है. पूजा सामग्री, फूल, नारियल, चुनरी, धागा, प्रसाद जैसी कोई चीज पहाड़ पर ले जाने की तो कोई सोच भी नहीं सकता क्योंकि वे मानते हैं कि पहाड़ की इकोलॉजी नाजुक है, वहां एक फूल भी बाहर से लाओगे तो वहां के कीड़े मर जाएंगे. स्विस का नारा है “लीव नो ट्रेस” यानी कोई निशान मत छोड़ो. हमारे यहां नारा है निशान छोड़ो, पत्थर पर नाम लिखो, चुनरी बांधो, सिक्का फेंको ताकि भगवान देखे कि हम आए थे.

स्विट्जरलैंड ने पहाड़ को कमाने की मशीन नहीं बनाया. वहां साल में कितने लोग पहाड़ पर जाएंगे यह तय है. मैटरहॉर्न या जुंगफ्राउ पर एक दिन में दो हजार से ज्यादा लोग नहीं जा सकते. टिकट पहले से बुक होगा, गाइड जरूरी होगा, कचरा बैग जरूरी होगा. अमरनाथ में एक दिन में बीस हजार लोग पहुंच जाते हैं, गंगोत्री में गाड़ी जहां तक जा सकती है वहां तक जाम लगा देते हैं. फिर कहते हैं कि पहाड़ गंदा हो रहा है. स्विट्जरलैंड ने पहाड़ को बैंक नहीं समझा, उसने पहाड़ को वाटर टैंक समझा. पूरा यूरोप आल्प्स के पानी पर जिंदा है इसलिए वे पानी को गंदा नहीं करते. हम हिमालय के पानी पर जिंदा हैं लेकिन हम उसी में पेशाब, राख, फूल और प्लास्टिक डालते हैं और फिर कहते हैं कि गंगा मैली हो गई.

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