Manusmriti: देश बहुत अहम दौर से गुजर रहा है लगभग वैसे ही जैसे संविधान लागू होते वक्त गुजरा था. तब चंद हिंदूवादी मनु स्मृति आधारित राज चाहते थे. यह कोशिश आज भी जारी है लेकिन आड़े शिक्षित और जागरूक हो गई युवा पीढ़ी आ रही है ठीक वैसे ही जैसे `तब` भीमराव आंबेडकर आए थे. लड़ाई वैचारिक है एक तरफ मनुवादी हैं जो शुद्धिकरण जैसा पौराणिक कर्म कर अपना धर्म निभा रहे हैं तो दूसरी तरफ वे युवा हैं जो संविधान के सामने किसी किताब को नहीं मानते.

संमार्जनौपाञ्जनेन सेकेनौल्लेखनेन च.
गवां च परिवासेन भूमिः शुध्यति पञ्चभिः ..
( मनु स्मृति अध्याय 5 श्लोक 124 )

अर्थात – झाड़ू लगाने, गोबर से लीपने, गंगाजल छिडकने, खुरचने या जोतने और गायों को वहां ठहराने – इन पांच उपायों से जमीन या स्थान की शुद्धि होती है. .

हल्द्वानी के रामलीला मैदान के शुद्धिकरण के लिए भाजपा और आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने पानी छिडकने बाला यानि कम मेहनत बाला रास्ता चुना. इन मनु पुत्रों ने पहले गंगाजल से मैदान धोया और फिर वहां हवन किया जिससे जो अशुद्धि या अपवित्रता मल्लिकार्जुन खडगे के वहां आने से आई थी वह दूर हो गई. इसका विधान मनु स्मृति सहित कई धर्म ग्रंथों में वर्णित है.

पहले 22 अगस्त को पुणे में छात्राओं के एक कार्यक्रम में और फिर दिल्ली की प्रेस कांफ्रेंस में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने इसी मनु स्मृति को पितृसत्तात्मंक, महिला और दलित विरोधी बताया तो भगवा गैंग की तिलमिलाहट देख 40-50 के दशक की याद आ गई. क्योंकि 80-90 साल बाद भी इस गैंग के पास मनु स्मृति को लेकर कोई तर्क या स्पष्टीकरण नहीं है.
यह गैंग संविधान की दुहाई तो अक्सर देती है लेकिन मनु स्मृति में लिखे को नकारने या उससे असहमत होने की हिम्मत नहीं जुटा पाती.. रूढ़िवादी होने का मतलब ही यह है कि पुराने विचारों और थ्योरियों में खुद को बांधे रखना. जबकि संविधान और मनु स्मृति दो ऐसी समानातर रेखाएं हैं जो कहीं जाकर नहीं मिलतीं.

मनु स्मृति कैसे दलित और स्त्री विरोधी है इस पर सरिता में कईयों लेख समय समय पर प्रकाशित किए गए हैं. जिनमे से अध्याय 9 के श्लोक 3 का हवाला देते हुए संक्षिप्त लेकिन सार रूप में राहुल गाँधी ने कहा कि मनु स्मृति के मुताबिक महिला को कभी स्वतन्त्र नहीं रहना चाहिए. लेकिन मेरा मानना है कि महिलाओं को पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए. उन्होंने छात्राओं से पितृसत्ता को खत्म करने का आग्रह या आव्हान कुछ भी कह लें किया.

इसमें कोई शक नहीं कि भगवा गैंग मनु स्मृति और संविधान की तुलना को लेकर विचलित और असहज हो जाती है. पहली दफा किसी कांग्रेसी नेता ने खुलकर सार्वजनिक तौर पर बिना किसी लिहाज के मनु स्मृति की आलोचना करते उसकी तुलना संविधान से की तो इसके राजनीति के साथ साथ एतिहासिक और सामाजिक माने भी हैं. गौरतलब है कि सीजेपी के जंतर मंतर के प्रोटेस्ट की बुनियाद ही मनु स्मृति का विरोध था.

इस कामयाब प्रोटेस्ट के बाद तो सोशलमीडिया पर मनुस्मृति विरोधी पोस्टों का सैलाब सा आ गया जो अभी भी जारी है. हद और हैरत तब हुए जब आयुषी पांडे, स्वाति तिवारी और प्रिया मिश्रा सरीखी कई सवर्ण और ब्राह्मण युवतियों ने भी बेहद तल्ख़ लहजे में यह कहा कि हम ब्राह्मण होकर भी अम्बेडकरवादी हैं. क्योंकि बाबा साहब के दिए संविधान के कारण ही हम पढ़ लिखकर काबिल बन पाए वर्ना तो हम भी पहले की औरतों की तरह चूल्हा चौका करते दबी कुचली ही रहतीं.

यह सवर्णों की वह पीढ़ी है जो छुआछुत को अमानवीय मानती है और खुले मन से यह भी स्वीकारती है कि अतीत में दलितों के साथ ज्यादतियां तो हुई हैं, भेदभाव भी हुआ है और उन्हें शिक्षा से वंचित रखा गया है. इसलिए वे पिछड़ गए लेकिन अब यह सब खत्म होना चाहिए. कोई और करे न करे लेकिन हम इसके खात्मे की पहल करेंगे. दलितों के साथ साथ सवर्ण और ब्राह्मण युवक भी इस मुहिम में पीछे नहीं हैं.

देश के आने बाले कल के लिहाज से यह बेहद शुभ संकेत है कि हर वर्ग, धर्म और जाति के युवा मनु स्मृति की हकीकत समझते उसे जला देने की बात भी निडर होकर करने लगे हैं. सवर्ण युवतियां सरासर मनुस्मृति का पौराणिक बोझ और धार्मिक आयोजनों में कलश ढोने जैसी बेहूदगियों से इंकार कर रहीं हैं तो यह सुखद जागरूकता आजादी के 80 साल बाद देखने में आ रही है. धार्मिक जकड़नों से आजाद होने की छटपटाहट पहले कभी सार्वजनिक तौर पर सवर्ण युवतियों में नहीं देखी गई.

31 अगस्त को तो युवा कांग्रेसियों ने समारोहपूर्वक मनु स्मृति का दहन किया वह भी उसके गढ़ नागपुर में आरएसएस स्मृति मंदिर के सामने. यहाँ नारे लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया गया. इनमे प्रमुख थे भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष उदयभानु चिब और राष्ट्रीय महासचिव हरि कृष्ण. लगभग इसी दौरान वामपंथी छात्र संगठन एआइएसए की मुखिया नेहा बौरा भी नागपुर के ही वसंतराव देशपांडे सभागृह में जेन जी को बेहद आक्रामक तरीके से आरएसएस की वास्तविकता से अवगत करा रहीं थीं.

मनु स्मृति का खडगे कनेक्शन

युवक कांग्रेस ने 30 अगस्त को भी उदयभानु चिब की ही अगुवाई में दिल्ली के झंडेवालान में आरएसएस के कार्यालय केशवकुंज के बाहर मनु स्मृति की प्रतियाँ जलाई थीं. इस दौरान युवा कांग्रेसियों के हाथों में बड़े बड़े पोस्टर थे जिन पर अंग्रेजी में लिखा था `रिजेक्ट मनुस्मृति` युवा नारे भी लगा रहे थे कि मनु स्मृति नहीं संविधान चाहिए और दलितों का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान. दूसरे कई शहरों में भी इस तरह का विरोध हुआ जिसकी घोषित वजह हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकर्जुन खडगे की जनसभा के बाद आरएसएस कार्यकर्ताओं और भाजपाइयों द्वारा 11 अगस्त को किया गया शुद्धिकरण और हवन थे

कांग्रेसियों का विरोध इस बात को लेकर भी था कि राहुल गाँधी मांग कर रहे थे कि जिन लोगों ने हल्द्वानी में शुद्धिकरण और हवन कर खडगे को उनकी दलित जाति की बिना पर अपमानित किया उनके खिलाफ एससीएसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया जाए.

लेकिन हुआ उल्टा, रिपोर्ट इसी एक्ट की धाराओं के तहत राहुल गाँधी के ही खिलाफ दर्ज कर ली गई. यह एफआईआर हल्द्वानी कोतवाली में एससीएसटी की धारा 3 ( 1 ) ( घ ) और बीएनएस की धाराओं 196 और 299 के तहत दर्ज की गई. एससीएसटी एक्ट की इन धाराओं के बारे में सरिता के अगस्त ( द्वितीय ) अंक में विस्तार से विवरण दिया गया है लेख का शीर्षक है- `एससीएसटी एक्ट 37 सालों बाद भी देश वहीँ का वहीँ और भेद जारी`.

शिकायतकर्ता वाल्मीकि समाज का एक युवक अमित कुमार है जो उसी श्रीराम सेना से जुड़ा है जिसने 8 अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में मल्लिकार्जुन खडगे की पब्लिक मीटिंग के बाद 11 अगस्त को रामलीला मैदान का शुद्धिकरण किया था. फरियादी को ही मुलजिम बना देना कोई नई बात नहीं है. ऐसा अगर दलित हितों की बात कर रहे राहुल गाँधी के साथ हुआ तो तमाम छोटे बड़े कांग्रेसी नेताओं ने इसका स्वभाविक विरोध किया

यह विरोध नया नहीं है बल्कि आरएसएस के जन्म से ही है. जब उदयभानु चिब को गिरफ्तार कर पुलिस दिल्ली के पहाड़गंज थाने ले जा रही थी तब उन्होंने यह कहते इस पुरातन सनातन विवाद के इतिहास का खुलासा कर दिया था कि आरएसएस मनुस्मृति का अनुसरण करता है जो देश को बांटने और कमजोर करने का काम करती है.

संविधान बनाम मनुस्मृति

आजादी के पहले देश कमोबेश पंडे पुजारियों के कहे मुताबिक चल रहा था जिनके दिलोदिमाग में मनुस्मृति के कायदे कानून और नियम ठुंसे पड़े थे. क्योंकि इससे न केवल उनकी मुफ्त की रोजी रोटी चलती थी बल्कि समाज पर दबदबा और रुतबा भी कायम रहता था. 1945 के लगभग जब पूरी तरह यह तय हो गया कि साल दो साल में अंग्रेज देश छोड़कर चले जाएंगे तो इन पंडे पुजारियों की बांछे खिल गईं. उन्हें लग रहा था कि अब देश में शासन सवर्णों का रहेगा जो उनके इशारों पर कठपुतलियों की तरह नाचते हैं.

यह बात पंडे पुजारियों सहित तमाम सवर्णों के लिहाज से कम दिलचस्प नहीं कि संविधान बनाने का आईडिया सबसे पहले कट्टर हिंदूवादी लेकिन कांग्रेसी नेता बालगंगाधर तिलक ने दिया था. यह नेक ख्याल उन्होंने साल 1895 में स्वराज विधेयक के जरिए व्यक्त किया था. यह विधेयक चूँकि खामियों से भरा था और इसमें महिलाओं और दलितों के अधिकारों का जिक्र नहीं था इसलिए वक्त वक्त पर इसमें बदलाब होते रहे.

यह और बात है कि तिलक इन्हें देखने जिंदा नहीं रहे क्योंकि 1920 में ही उनकी मौत हो गई थी. प्रसंगवश यह जान लेना जरुरी है कि तिलक का पूरा फोकस राजनातिक स्वतंत्रता पर था. उनकी दलील यह थी कि समाज सुधार तो हम आजादी मिलने के बाद भी कर सकते हैं

लेकिन भीमराव आंबेडकर सहित गाँधी और नेहरु इससे सहमत नहीं थे क्योंकि वे बेहतर जानते थे कि इधर अंग्रेज गए और उधर विप्रों ने फिर दलितों और औरतों को गुलाम बनाया. इसके लिए उनके पहलू में उनका संविधान मनुस्मृति था ही.

खुद तिलक मनुस्मृति के घनघोर मुरीद थे. वे अक्सर महिला अधिकारों की चर्चा होने पर मनु स्मृति के उन श्लोकों का हवाला देते थे जिनकी मामूली झलक राहुल गाँधी ने दिल्ली की प्रेस कांफ्रेंस में दिखाई. तिलक की मनुवादी सोच का हाल तो इतना बेहाल था कि जब ब्रिटिश सरकार महिलाओं की हालत सुधारने कुछ कानून लाई मसलन 1891 का `एज आफ कंसेंट बिल` जिसमें लड़कियों की शादी की उम्र 10 से बढ़ाकर 12 साल कर देने का प्रस्ताव था तो उसके विरोध में तिलक ने मनुस्मृति के उसी श्लोक का हवाला दिया था जिस पर राहुल गाँधी युवतियों से कह रहे थे कि आपको किसी के अधीन नहीं रहना है. अपनेआप में स्वतंत्र रहना आपका अधिकार है.

अगर तिलक जिंदा रहते और उनके विधेयक के मुताबिक संविधान बनता तो तय है वह मनुस्मृति की फर्स्ट कापी ही होता. क्योंकि तिलक वर्ण व्यवस्था को सामाजिक संतुलन के लिए जरुरी मानते थे. इंटरकास्ट मेरिजेज के तो वे धुर और घोषित विरोधी थे ही. इसका जीता जागता सबूत हिंदू मेरिज ( वेलिडिटी ) एक्ट 1918 का उनके द्वारा किया गया विरोध था. यह विधेयक विट्ठलभाई पटेल ( गीतकार बाले नहीं बल्कि बल्लभभाई पटेल के बड़े भाई जो नामी बेरिस्टर और समाज सुधारक थे ) ने इम्पीरियल काउंसिल में अंतरजातीय विवाहों की मान्यता के लिए पेश किया था जिसका समर्थन रवीन्द्रनाथ टेगोर सहित लाला लाजपत राय सरीखे कई नेताओं ने किया था.

तिलक का हिंदुत्व प्रेम आज के हिंदूवादी नेताओं से कमतर नहीं था वह तो इनके लिए प्रात स्मरणीय है. तिलक का बस चलता तो वे ब्राह्मण राज थोप ही देते लेकिन उनके आड़े डाक्टर भीमराव अम्बेडकर आ गए जिन्होंने पूरी सख्ती और आत्मविश्वास से तिलक का विरोध किया. अच्छी बात तो यह रही कि इस मामले में गाँधी और खासतौर से नेहरु ने पूरी तरह उनका साथ दिया. अम्बेडकर ने तिलक के बारे में 18 जनबरी 1943 को पुणे के गोखले इंस्टीटयूट में दिए अपने भाषण में कहा था कि वे समाज सुधारक नहीं थे बल्कि वे एक रिवाइवलिस्ट यानी पुनरुत्थानवादी थे जो पारम्पारिक रूढ़िवादिता के साथ खड़े थे. उन्होंने हिन्दू समाज को सुधारने की हर कोशिश का विरोध किया.

जैसे तैसे मौजूदा संविधान जिसकी दुहाई आज पूरी युवा पीढ़ी दे रही है वजूद में आया. लेकिन ऐसा नहीं है कि तिलक के बाद इसका विरोध न हुआ हो. तत्कालीन हिंदूवादियों की एक पूरी जमात संविधान का पुरजोर विरोध कर रही थी जिसकी अगुवाई हिंदूमहासभा और आरएसएस जैसे संगठन व दल कर रहे थे. लेकिन उनकी दाल अम्बेडकर और नेहरु ने गलने नहीं दी और महिलाओं और दलितों को उनके हक मिले.

तब भी लड़ाई मनुस्मृति बनाम संविधान ही थी और आज भी है. तब संविधान और हिंदू कोड बिल का विरोध करने बाले प्रमुख नेताओ में दिग्गज हिंदूमहासभाई विनायक सावरकर, जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी, आरएसएस के माधव सदाशिव गोलवलकर, रामराज्य परिषद के संस्थापक करपात्री महाराज, सहित धाकड़ बेरिस्टर और कट्टरवादी हिंदू नेता एनसी चटर्जी और वीजी देशपांडे प्रमुख थे.

अब न ये नेता हैं और न ही इनकी पार्टियाँ हैं लेकिन आरएसएस पूरी शिद्दत से मौजूद है और नरेन्द्र मोदी को कंधे पर बिठाए सरकार और देश चला रही है. आरएसएस ने कैसे संविधान और हिन्दू कोड बिल का विरोध किया था इस बारे में पाठक श्रृंखलाबद्ध लेखमाला सरिता में पढ़ चुके हैं . इस सीरिज को सरिता के डिजिटल संस्करण पर भी पढ़ा जा सकता है.

आज इस जमात में कौन कौन शामिल है बताने की जरूरत नहीं कि मोहन भागवत और मोदी- योगी- शाह सहित उनके ही हल्द्वानी बाले चेले चपाटे हैं. ये टिड्डो की तरह पूरे देश में फैले हैं जिनका काम ही सुंदर कांड और हनुमान चालीसा का समारोहपूर्वक आयोजन करना, गणेश और देवी की झांकियां लगाना फिर उनमे ही चंदे के पैसों में से अपना कमीशन काटकर भंडारे करवाना कांवड़ यात्रा के मजे लूटना, धार्मिक कथाओं की कलश यात्राओं के लिए औरतें अरेंज करना और वेलेंटाइन डे बगैरह पर भगवा गमछे गले में डाल कपल्स को तंग करना है.

यही वे युवा हैं जिनकी टक्कर अम्बेडकरवादी युवाओं से है. शिक्षा, विज्ञानं और जागरूकता में तो ये काकरोचों के सामने कहीं नहीं ठहरते इसलिए शुद्धिकरण जैसे मनुवादी कर्मकांडों के जरिए अपनी ताकत और वजूद प्रदर्शित करते रहते हैं.

जरूरत पड़ने पर यही दंगे फसाद और लिंचिंग बगैरह में भी अग्रणी रहते हैं. अब यह जेन जी को सोचना समझना है कि इन्हें कैसे सही रास्ते पर लाए. तादाद में ये जेन जी से कहीं ज्यादा हैं और इन्हें सत्ता का संरक्षण भी मिला हुआ है. अब हिंदूवादी इनके सहारे विश्वगुरु बनने का सपना देख रहे हों तो उन पर तरस ही खाया जा सकता है. ये मनुपुत्र दरअसल में देश और समाज पर भार हैं. इनकी सारी उर्जा शुद्धिकरण जैसे बेतुके कामों में इनके बॉस लोग लगवाकर इन्हें बर्बाद ही कर रहे हैं तो कोई क्या कर लेगा. Manusmriti

 

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...