Relatives Interference: मैं 31 वर्ष की हूं, चंडीगढ़ में रहती हूं. मेरी शादी को 4 साल हो चुके हैं. मेरे कुछ रिश्तेदार हर मुलाकात में मेरी नौकरी, पति की कमाई और बच्चों को ले कर सवाल करते हैं. मैं जवाब देना नहीं चाहती लेकिन चुप रहने पर वे और सवाल पूछते हैं. परिवार में संबंध भी खराब नहीं करना चाहती.
ANS. रिश्तेदारों के सवाल अकसर जिज्ञासा, सामाजिक आदत या तुलना की मानसिकता से आते हैं. इस का मतलब यह नहीं कि आप को अपनी नौकरी, पति की आय या परिवार नियोजन जैसी निजी बातों का हिसाब देना पड़े. चुप रहने के बजाय एक विनम्र लेकिन स्पष्ट जवाब आप की मदद कर सकता है, जैसे ‘सब अच्छा चल रहा है लेकिन इन बातों को हम निजी रखना पसंद करते हैं.’ अगर वे फिर पूछें, तो हर बार नया स्पष्टीकरण देने के बजाय उसी बात को शांत भाव से दोहराएं. इसे बहस न बनाएं और न ही रक्षात्मक हों. मुसकराकर विषय बदल दें, ‘आप बताइए, आप के यहां सब कैसे चल रहा है?’
सब से जरूरी बात यह समझना है कि सीमा तय करना रिश्ते तोड़ना नहीं होता. परिवार में शांति बनाए रखने के लिए आप को अपनी असहजता लगातार सहने की जरूरत नहीं है. यदि कोई बारबार बच्चों को ले कर दबाव बनाए, तो आप थोड़ा अधिक दृढ़ हो कर कह सकती हैं, ‘जब कोई खुशखबरी होगी, आप को खुद बता देंगे, अभी इस विषय पर बात नहीं करना चाहती.’ शुरुआत में कुछ लोग इसे असामान्य मान सकते हैं लेकिन जब उन्हें समझ आएगा कि आप सम्मानपूर्वक अपनी सीमा पर कायम हैं, तो सवाल धीरेधीरे कम हो सकते हैं.
पैतृक संपत्ति के विवाद में टूटने लगा भाईबहन का रिश्ता.
मैं 52 वर्ष का हूं, भोपाल में व्यवसाय करता हूं. मेरी छोटी बहन 48 वर्ष की है. मातापिता के निधन के बाद पैतृक संपत्ति को ले कर हमारे बीच विवाद हो गया है. पहले हम रोज बात करते थे, अब कई महीनों से बातचीत बंद है. मुझे संपत्ति से ज्यादा अपने रिश्ते के टूटने का दुख है. क्या मुझे पहल करनी चाहिए?
ANS. हां, पहल करना उचित हो सकता है लेकिन संपत्ति का विवाद सुलझाने के लिए नहीं बल्कि रिश्ता बचाने के लिए. मातापिता के जाने के बाद पैतृक संपत्ति अकसर सिर्फ जमीनजायदाद का मामला नहीं रहती, उस में पुरानी यादें, अधिकार की भावना और वर्षों के भाईबहन के समीकरण भी जुड़ जाते हैं. ऐसे में आप का पहला कदम यह नहीं होना चाहिए कि कौन सही है और किस का कितना हिस्सा है, बल्कि यह कि आप की बहन आप के लिए आज भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है. कई महीनों की चुप्पी के बाद एक सरल संदेश, बिना आरोप और बिना संपत्ति की चर्चा के, शुरुआत बन सकता है- ‘जो हुआ उस से मुझे बहुत दुख है. संपत्ति का मामला अपनी जगह है लेकिन मैं नहीं चाहता कि उस की वजह से हमारा रिश्ता खत्म हो जाए. जब तुम्हें ठीक लगे, मैं तुम से बात करना चाहता हूं.’
बात शुरू हो जाए तो पुराने हिसाबकिताब तुरंत खोलने से बचें. पहले एकदूसरे की नाराजगी सुनें और यह स्वीकार करें कि आप दोनों को चोट लगी है. संपत्ति का समाधान बाद में किसी निष्पक्ष पारिवारिक मध्यस्थ या कानूनी सलाहकार की मदद से भी निकाला जा सकता है लेकिन भाईबहन का भावनात्मक रिश्ता किसी दस्तावेज से वापस नहीं आता. पहल करने का अर्थ हार मानना या अपना अधिकार छोड़ना नहीं है, इस का अर्थ केवल इतना है कि आप विवाद और रिश्ते के बीच एक सीमा खींच रहे हैं. संभव है आप की बहन भी भीतर से इसी दूरी से दुखी हो, लेकिन पहला कदम उठाने में झिझक रही हो. इसलिए अगर आप के मन में सचमुच संपत्ति से अधिक रिश्ते को बचाने की इच्छा है, तो अहंकार से पहले अपनापन चुनना शायद इस समय आप का सब से मूल्यवान फैसला होगा.
दूर शहर में नौकरी के कारण अकेले रह गए बुजुर्ग मातापिता.
मैं 42 वर्ष का हूं, मुंबई में नौकरी करता हूं. मेरे मातापिता दोनों 70 वर्ष से अधिक उम्र के हैं, नागपुर में रहते हैं. मैं हर महीने उन से मिलने नहीं जा पाता. आर्थिक रूप से उन की जरूरतें तो पूरी हो जाती हैं लेकिन मां अकसर कहती हैं कि उन्हें पैसों से ज्यादा हमारे साथ की जरूरत है. मुझे अपराधबोध होता है कि मैं उन के लिए पर्याप्त नहीं कर पा रहा.
ANS. आप के मातापिता की आर्थिक जरूरतें तो पूरी हो रही हैं लेकिन आप की मां शायद यह कह रही हैं कि उन्हें आप के पैसे से अधिक आप की आवाज, बातचीत और अपनापन चाहिए. हर महीने नागपुर जाना संभव न हो तो इस का मतलब यह नहीं कि आप अच्छे बेटे नहीं हैं. समाधान यह हो सकता है कि मुलाकातों की संख्या के बजाय नियमित और भरोसेमंद जुड़ाव बनाया जाए, जैसे हर रात 10–15 मिनट का वीडियोकौल, सप्ताह में किसी एक दिन लंबी बातचीत और पहले से तय अंतराल पर नागपुर जाने की योजना. कभीकभी बिना किसी खास कारण के सिर्फ यह पूछना कि ‘आज दिन कैसा रहा’ भी बुजुर्ग मातापिता के लिए बहुत मायने रखता है.
साथ ही, अपनी मां से सीधे पूछिए कि उन्हें किस तरह का साथ सब से ज्यादा चाहिए– रोज फोन, महीने में एक मुलाकात, साथ खाना, डाक्टर के पास जाना या बस कुछ देर बैठ कर बातें करना. इस से आप का अपराधबोध एक व्यावहारिक योजना में बदल सकता है. यदि संभव हो तो नागपुर में किसी भरोसेमंद रिश्तेदार, पड़ोसी या मित्र से भी नियमित संपर्क बनाए रखें, ताकि आप को उन की रोजमर्रा की स्थिति का भरोसा रहे. और जब आप मिलने जाएं, तो उस समय को केवल काम निबटाने में न लगाएं, उन के साथ बैठें, पुरानी बातें सुनें, चाय पिएं, टहलें. आखिरकार, मातापिता को हमेशा बड़ी चीजों की जरूरत नहीं होती. कई बार उन्हें बस यह महसूस होना चाहिए कि उन का बेटा दूर जरूर है लेकिन भावनात्मक रूप से उन के पास ही है. Relatives Interference





