Hindi Stories: “अजी सुनते हो,” निधि ने अपने पति राहुल को उत्साहभरे ऊंचे स्वर में आवाज लगाई. उस का पति टीवी पर इंडिया और आस्ट्रेलिया का मैच देखने में व्यस्त था. खेल की कमैंट्री में उसे ठीक से सुनाई नहीं दिया. वैसे भी, पतियों की आदत होती है छुट्टी, विशेषकर मैच, वाले दिन बीवी की बात को ज्यादा सुनना, जाने कौन सा काम पकड़ा दें कि जिस से सारा मजा मारा जाए.
निधि चाय के 2 कप और पापड़ ट्रे में रख कर कमरे में आई. उस ने पति को हड़का दिया- “इतनी तेज आवाज लगा रही हूं, सुनते ही नहीं हो.” चाय का कप उस ने पति के हाथ में दिया और खुद भी बिस्तर पर जगह बना कर बैठ गई. चाय के 2 कप, पापड़, बिस्तर पर तसल्ली से बैठना, पति ने अंदाजा लगाया जरूर ही कोई विशेष काम बताने जा रही है.
राहुल की छठी इंद्रिय सतर्क हो गई थी. अब तो उस का फर्ज बनता है कि कान पर आ कर बोलने वाली पत्नी की बात सुनी जाए. फिर भी उस ने लापरवाही से पतियों की स्टाइल में पूछा- “हां, बोलो, क्या हुआ?”
“जानते हो, वो श्रुति न आजकल सुबहसुबह 8 परांठे बना कर अपने टिफिन में ले जा रही है,” निधि ने थोड़ा पास आ कर फुसफुसाते हुए रहस्योद्घाटन करने वाले अंदाज़ में कहा.
“तो, इस में क्या खास बात है? तुम भी न, बस.” राहुल ने सुनाअनसुना कर दिया और वापस मैच देखने में व्यस्त हो गए.
निधि ने उस के हाथ से रिमोट छीन लिया और टीवी बंद कर दिया. ”अरे, समझने की कोशिश तो करो,” निधि थोड़ा और पास आ कर बैठ गई और धीमी आवाज़ में बोली.
श्रुति निधि की ननद थी. वह एक अच्छे इंस्टिट्यूट से एमबीए कर रही थी. रोज़ सुबह 8 बजे निकल जाना होता था. अपना नाश्ता वह खुद ही बना कर ले जाती थी. आज सुबहसुबह निधि जल्दी उठ कर रसोई में पहुंच गई तो उस ने देखा कि श्रुति अपने लिए परांठे बना रही है. रोज़ ही बनाती थी तो इस में कोई नई बात नहीं थी. पर जब उस की नजर परात की ओर गई तो उस ने देखा कि वहां 8 लोइयां रखी थीं.
“अब तुम्हीं बताओ इस में मैं क्या समझूं?” राहुल ने खीझते हुए कहा.
निधि ने बताया, “अरे, आज सुबह जब मैं रसोई में गई तो देखा, श्रुति सन्नाटे में आठआठ लोई लिए परांठे बना रही है. मुझे लगा यह तुम्हारे लिए परांठे बना रही है नाश्ते में, तो मुझे बड़ी ग्लानि हुई. मैं ने पूछा, “अरे, इतने परांठे किस के लिए बना रही हो? मैं तुम्हारे भैया के लिये नाश्ता बना दूंगी. तो जानते हो क्या बोली?”
“क्या बोली?” राहुल ने रुचि न रहते हुए भी पूछा.
“यही कि ‘अरे, मैं ले जा रही हूं टिफिन में. मैं खाऊंगी,’” निधि के स्वर में चटकारे थे.
“हां, दिनभर बाहर रहती है. भूख लगती होगी?” राहुल ने झुंझलाते हुए कहा.
“अरे, रहने दो. मुझे न बनाओ, इतनी डाइट किसी लड़की की नहीं होती. यह तो किसी और की ही खुराक का इंतजाम किया जा रहा है, 2 अपने लिए और 6 किसी दूसरे के लिए,” निधि के मुंह से मुद्दे की बात निकल ही आई.
इस बार राहुल की रुचि जाग ही गई, “तुम कहना क्या चाहती हो?”
“वही जो तुम ने सुना और तुम ने ध्यान दिया कि हमारे घर में शिमला मिर्च में आलू भर कर सब्जी कभी नहीं बनती थी. फिर भी आजकल सासुमां और ननद शाम को ही बना कर रख लेती हैं, उस के टिफिन के लिए,” निधि ने कहा.
“अब ज़्यादा गोलगोल मत घुमाओ. साफसाफ कहो, क्या कहना चाहती हो?” राहुल ने कहा.
“यही कि श्रुति ने लगता है कोई लड़का पसंद कर लिया है. और मम्मीजी की भी रज़ामंदी है. बस, तुम इतने स्ट्रिक्ट हो, और पिता है नहीं, इसलिए बताने से डर रही है,” निधि ने मुसकराते हुए कहा.
“ओह, यह बात,” राहुल ने सिर खुजाते हुए कहा, “क्या पता कोई और बात हो. तुम बेकार में ज़्यादा दिमाग लगा रही हो,” यह कह उन्होंने ने रिमोट वापस लिया और टीवी देखने में फिर व्यस्त हो गए.
निधि बुरा मान कर पलंग के छोर पर मुंह फेर कर लेट गई और बोली, “मानो चाहे न मानो, बात यही है. तुम्हारी मौसी के देवर के बेटे से उस की शादी की बात तुम चला रहे हो न, इसीलिए वह डर रही है, बता नहीं रही है. मुझे तो लगता है कुछ इंटरकास्ट वाला चक्कर है. देख लेना कहीं तुम्हें सदमा न मिले अंत में.”
श्रुति का परांठा और भरवा शिमला मिर्च ले जाना जारी रहा. इस के अलावा घर में कुछ अच्छी चीज बनती तो श्रुति कुछ हिस्सा निकाल कर रख लेती थी. चूंकि आजकल निधि भाभी-कम-डिटैक्टिव ज्यादा हो गई थी इसलिए वह चुपचाप श्रुति की हर हरकत पर नज़र रखती थी, मन ही मन सब समझती रही. एक दिन उस ने मौका निकाल कर अकेले में श्रुति को छेड़ते हुए पूछ ही लिया, “क्या बात है, श्रुति? कोई पसंद आ गया है क्या ?”
श्रुति भाभी के इस प्रश्न पर अचकचा गई, बोली, “आ आ नहीं तो, भाभी.”
“अरे भाभी हूं, पराई नहीं, सहेली मानो तो अपने दिल की बात बता सकती हो. वरना 8 परांठे तुम्हें हजम हो जाते होंगे, 8 परांठे ले जाने वाली बात मुझे हजम नहीं हो रही है,” निधि ने मुसकरा हुए उसे छेड़ा.
“नहीं भाभी, ऐसी कोई भी बात नहीं है. अगर होगी तो मैं सब से पहले आप को बता दूंगी,” इतना कह कर श्रुति जल्दी से नजरें बचा कर वहां से चली गई.
निधि के मन में खिचड़ी पकती रही. उसे पता लगाना ही था कि माजरा क्या है. मन में एक बार हलचल पड़ जाए तो उसे शांत करना बहुत मुश्किल होता है. फिर निधि श्रुति की भाभी थी. उसे यह भी फिक्र थी कि निधि जो कुछ भी छिपा रही है, उस से कहीं अपना कोई नुकसान न कर ले. सांप निकल जाने पर लाठी पीटने से फिर क्या ही फायदा होगा. अब यदि वह नहीं बता रही है तो इसे ही पता लगाने के लिए कुछ करना होगा.
निधि की रिश्तेदारी में एक पंद्रहसोलह साल का लड़का था विजय. निधि को दीदी कहता था और बहुत सम्मान देता था. निधि ने एक दिन उसे बुला कर मामले की गंभीरता समझा कर उसे श्रुति के पीछे लगा दिया. साथ में, हिदायत भी दे दी कि परिवर की इज्जत का सवाल है, जरा भी यह बात बाहर नहीं जानी चाहिए.
विजय ने अपना काम पूरी मुस्तैदी से किया. कुछ दिनों तक लगातार श्रुति का पीछा करने के बाद सारी जानकारी इकट्ठी कर के एक दिन शाम को विजय ने जो कुछ बताया उस से निधि अपनेआप पर शर्मिंदा हुए बगैर नहीं रह सकी. क्या समझा था और क्या ही मसला निकला.
विजय ने बताया कि श्रुति दीदी कालेज के लिए निकलती हैं, फिर सड़क के मोड़ से मुड़ जाती हैं. फिर थोड़ी दूर पर एक घर है, वहां जाती हैं. दसपंद्रह मिनट बाद वहां से निकलती हैं. विजय ने खिड़की से झांका तो पाया कि एक बुजुर्ग कुरसी पर बैठे हैं. श्रुति दीदी ने अपने बैग से टिफिन निकाला और उन को एक थाली में 2 परांठे व सब्जी परोस कर दिया. और बाकी ढक कर उन की मेज पर रख दिए और कहा कि बाकी डिनर में खा लेना.
रात में जब राहुल घर आया तो सारे कामकाज निबटाने के बाद निधि उसे आज की ताजा खबर सुनाने के लिए इतमीनान से बैठी. उस ने कहा, “तुम ने मुझे कभी बताया ही नहीं कि अपने घर से थोड़ी ही दूरी पर तुम्हारे एक बुजुर्ग रिश्तेदार रहते हैं?”
राहुल चौंक गया, ‘रिश्तेदार? मेरे? घर से थोड़ी दूर क्या, पूरे शहर में मेरा कोई रिश्तेदार नहीं रहता. अरे, हम नौकरी वाले लोग अपना देस छोड़ कर आए हैं, यहां हमारा कौन रिश्तेदार बैठा है.”
अब चौंकने की बारी निधि की थी, “क्या बात कर रहे हो? फिर श्रुति किसे खाना देने जाती है?”
“श्रुति खाना देने जाती है? किसे?” राहुल ने प्रश्न किया.
“अरे वो,” निधि सोच में पड़ गई कि राहुल को कैसे बताए कि उस ने अपने रिश्ते के एक भाई से श्रुति की जासूसी कराई है. फिर भी न बताने से काम तो चलने वाला नहीं था. इस कहानी में एक नया पेंच आ गया था. अब तो गुत्थी सुलझानी ही थी. भले ही इस में राहुल की मदद लेनी पड़े.
“देखो, नाराज़ मत होना. पर ध्यान से सुनो. मामला कुछ विचित्र है. तुम्हें बताया था न कि श्रुति 8 परांठे ले कर जाती है.”
“तुम अभी तक वहीं अटकी हो?” राहुल ने थोड़ा नाराजगीभरे स्वर में कहा.
“देखो, मैं ने पहले ही कह दिया था कि नाराज मत होना. यह बात मुझे हजम नहीं हो रही थी. तो मैं ने विजय को श्रुति का पीछा करने को लगा दिया. उसी ने मुझे यह खबर ला कर दी है कि अपने घर से पैदल 15 मिनट की दूरी पर एक बुजुर्ग अंकल रहते हैं, श्रुति उन्हें ही खाना देने जाती है. अब वे तुम्हारे रिश्तेदार नहीं हैं तो कौन हैं?” निधि के स्वर में फिक्र के रंग उतर आए थे.
“हम्म, बात में कुछ तो पेंच है. शायद श्रुति जिस लड़के से प्रेम करती है, उस के पिता हों. ऐसा करते हैं, सीधेसीधे श्रुति से ही पूछ लेते हैं.”
“और श्रुति को पता चला कि मैं ने उस की जासूसी करवाई है तो मेरी क्या इज्जत रह जाएगी उस की नज़रों में?” निधि ने उदास हो कर बोला.
“उस की टैंशन न लो, प्रिये. मैं कह दूंगा एक दिन मैं उधर से गुजर रहा था तो उसे उस घर में जाते देखा था. या फिर ऐसा करते हैं श्रुति को बीच में न ला कर उन बुजुर्ग अंकल से ही मिल लेते हैं,” राहुल ने दिमाग लगाया.
निधि को यह विचार पसंद आया. एक दिन राहुल की छुट्टी वाले दिन शाम को दोनों उन अंकल से मिलने गए. छोटा सा घर था, बाउंड्री के अंदर छोटा सा लौन, 2 कमरे बस. गेट खोल कर दोनों अंदर आ गए तो देखा कि अंकल लौन में ही बैठे अखबार पढ़ रहे हैं. राहुल और निधि को देख कर वे थोड़ा सा चौंके. स्पष्ट पता चल रहा था कि उन को अपने घर पर किसी अतिथि के आगमन की आदत नहीं है. उन्होंने बड़े प्यार से पूछा, “जी कहिए, मैं आप लोगों की क्या सेवा कर सकता हूं.”
राहुल और निधि असमंजस में थे कि किस प्रकार बात शुरू की जाए. बात भी तो सीधीसरल नहीं थी. फिर भी उलझन को सुलझाने के लिए कोई एक सिरा तो थामना ही था. राहुल ने गला खंखारते हुए कहा, “अंकल, मैं श्रुति का भाई हूं.”
अंकल के चेहरे पर अभी तक जो मधुरता थी, वह कहीं लोप हो गई. उन्होंने कहा, “ओह, श्रुति ने भेजा है आप को?”
“नहीं अंकल, श्रुति को इस बारे में कुछ नहीं पता. मैं ने श्रुति को यहां आते देखा था एक दिन तो सोचा जैसे आप श्रुति के अंकल है तो मेरे भी हुए. सो, आप से मिल लिया जाए,” राहुल ने बात को हलका बनाते हुए कहा.
“अच्छा किया बेटा, मैं अकेले रहता हूं तो.” इतना कह कर वे गहरी खामोशी में चले गए.
दम घोंटने वाली चुप्पी दोनों के बीच पसरी हुई थी. राहुल ने निधि की ओर देखा. दोनों ने आंखों ही आंखों में कहा, तुम बोलो. अब निधि ने बात शुरू की, “अंकल, यह पूछना आप को थोड़ा अजीब तो लग सकता है. पर आप श्रुति को कैसे जानते हैं?”
अंकल के चेहरे पर जाने कितने रंग आए और चले गए. उन्होंने शौल को कस कर लपेट लिया जैसे कहीं सुरक्षा का एहसास ढूंढ रहे हों. सिर नीचा कर के कुछ सोचने लगे. लग रहा था कि सोच रहे हैं कि बात कहां से शुरू की जाए.
फिर उन्होंने अपना सिर उठाया और कहा, “आओ बेटा, अंदर चलो, मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं.” उत्सुकता राहुल और निधि के गले तक भर चुकी थी. वे उन के पीछेपीछे कमरे तक गए. बेहद मामूली साजसज्जा वाला कमरा था. एक तरफ तख्त पर बिस्तर लगा था, 2 कुरसियां पड़ी थीं, एक कैलेंडर, पढ़ने की मेज, कुछ फोटो. एक फोटो के पास जा कर वे रुक गए और बोले, “इस फोटो को ध्यान से देखो, इस में किसी को पहचानते हो?”
राहुल और निधि ने ध्यान से देखा, किसी कालेज के छात्रछात्राओं की ग्रुप फोटो थी ब्लैक एंड व्हाइट. आठदस लोग थे. सब के चेहरे पर खिलखिलाहट थी, युवा, देश के कर्णधार, पुराने फैशन के कपड़ों में पुराने जमाने की फिल्मों के हीरोहीरोइन जैसे. बहुत ध्यान से देखने पर भी वे किसी को पहचान न सके. पहचानने में दिक्कत इसलिए भी क्योंकि फोटो बहुत पुरानी थी, उस का रंग उतर रहा था, कागज उधड़ रहा था, पुराने जमाने के कैमरों से वैसे भी स्पष्ट फोटो नहीं आती थी.
“नहीं अंकल, मैं तो किसी को पहचान नहीं पा रहा. इस में पापा जैसा तो कोई नहीं लग रहा,” राहुल ने कहा.
अंकल हंसने लगे. हंसते समय उन के चेहरे पर एकदम शिशु जैसी उज्ज्वल निष्पाप मुसकान थी. धीमे स्वर में बोले, “बेटा, पापा को नहीं, अपनी मां को ढूंढो इस में.”
राहुल ने समूह की 4 लड़कियों को ध्यान से देखा तो पाया एक लड़की के नैननक्श मां से मेल खा रहे हैं. सांवली सी, नैनों में सुघड़ काजल लगाए, बड़े फूलों की प्रिंट वाली साड़ी पहने, हाथ में कुछ किताबें थामे, थोड़ी सी सकुचाई सी, थोड़ी सी मुसकाती हुई, एक तरफ कांधे पर झूलती हुई लंबी सी चोटी, उस में लगा गुलाब का फूल, हाथों में थोड़ी चूड़ियां.
राहुल और निधि का मुंह खुला का खुला रह गया. बड़े वजन वाली, सफेद साड़ी धारण करने वाली, घुटनों में दिक्कत के कारण थोड़ा लंगड़ा कर चलने वाली, श्वेत केशों वाली, हाथों में 2 सोने की चूड़ी पहने वाली मां इस छरहरी, सुंदर और ऊर्जावान स्त्री से जरा भी मेल नहीं खा रही थी. राहुल ने उंगली रखते हुए कहा, “ये, ये मां हैं?”
अंकल एक गहरी सांस ले कर कुरसी पर बैठ गए और उन्होंने दोनों को सामने तख्त पर बैठने का इशारा किया. फिर उन्होंने बोलना शुरू किया, “हां, यही तुम्हारी मां है. कभी देखा नहीं न तुम ने उन्हें इस रूप में? यह हमारे कालेज के आखिरी दिन की फोटो थी. एक मित्र के पास कैमरा था, उस ने खींची थी. और उन से 2 लड़कियां छोड़ कर जो लड़का खड़ा है, वह मैं हूं.”
राहुल और निधि दोनों की आंखें फिर से तसवीर की ओर मुड़ गईं, पर जिस आदमी को आज उन्होंने पहली बार देखा था उस के जवानी का चित्र वे बिलकुल पहचान नहीं पा रहे थे. अंकल ने आगे बोलना शुरू किया, “श्रुति तो इस बात को जानती है, तुम्हें भी बता देना ठीक होगा. बेटा, तुम तो आज के जमाने के लड़के हो, अच्छे से समझ सकते हो कि प्रेम जाति देख कर तो नहीं होता.”
“अंकल?” राहुल की आंखें फैल गईं. “क्या आप वही कह रहे हैं जो मैं कुछकुछ समझ रहा हूं?”
“हां बेटा. तुम्हारी मम्मी ऊंची जाति से थीं और मैं एक नीची जाति का गरीब घर का लड़का. प्रेम ऊंचीनीची सीढ़ियों पर खड़े रह कर किया जा सकता है, परंतु हमारे समाज की संरचना कुछ ऐसी है कि नीची की सीढ़ियों से ऊपर की सीढ़ी तक जा कर विवाह का जयमाल पहनाया नहीं जा सकता. तुम्हारे नाना बहुत सख्त इंसान थे, उन्होंने साफ मना कर दिया था.”
“ओह, अंकल. आज मैं जान पाया अपनी मां की सूनी आंखों का रहस्य. पिताजी भी बहुत रूखे थे, और मैं भी कहीं न कहीं उन्हीं की परंपरा का पालन कर रहा हूं. तभी यह बात मेरी मां मुझे बता नहीं पाई.” राहुल पितृसत्तात्मक समाज की परंपरा का वाहक बने होने के कारण ग्लानि अनुभव कर रहा था.
उसे अनुभव होने लगा कि श्रुति और निधि पर उस ने कितने नियम लाद रखे हैं. शाम 6 बजे के बाद दोनों को कहीं जाने की अनुमति नहीं. श्रुति के दोस्त घर नहीं आ सकते. निधि पराए पुरुषों से बात नहीं कर सकती. ऐसे में मां के मन में कितना भय, कितना संकोच होगा कि वे अपने बेटे को अपने पुराने प्रेम के विषय में किस प्रकार बताए विशेषकर तब जब वे इस समय एक विधवा का जीवन काट रही हैं.
ये अंकल जो कभी उस की मां को बहुत पसंद करते थे और आज मां के जीवन में वापस आ गए हैं पर मां लोकलाज के कारण उन के घर नहीं जा सकती थीं. इसलिए शायद उन्होंने श्रुति को अपना राजदार बनाया और श्रुति ने अनकहे ही अपने पितासमान बुजुर्ग की सेवा अपने सिर ले ली थी.
राहुल और निधि ने अंकल के पैर छू कर प्रणाम किया और घर वापस आ गए. दोनों ही विचारों में खोए हुए थे. यह जो एक नया अध्याय खुल गया था इस की परीक्षा किस प्रकार दी जाए, यह सोच रहे थे. सारे कामकाज निबटा कर रात में जब राहुल और निधि कमरे में गए तो राहुल ने थोड़ा हास्य मिश्रित करते हुए कहा, “वैसे, मानना पड़ेगा बेगम, तुम्हें तो सीआईडी में होना चाहिए था. परांठा सूंघ कर बता देती हो, कोई तो खिचड़ी पक रही है.”
निधि खिलखिला कर हंस पड़ी. उस के चेहरे पर एक निर्णय की दमक थी. उस ने कहा, “अरे, वह सब छोड़ो, अब इस खिचड़ी में तड़का हमें लगाना है.”
“क्या मतलब?” राहुल ने पूछा.
“अरे यही कि अंकल अब भी हमारे घर का खाना खाएंगे मगर हमारे साथ हमारे घर में. समझे?”
“हां, ठीक है, बुला लिया करना उन्हें. यह कोई बड़ी बात नहीं, किया जा सकता है.”
“अरे बुद्धू, मेरा मतलब है हम मम्मीजी और अंकल को घर में ही परमानैंट रहने दें तो कैसा रहेगा?” निधि ने मुसकराते हुए कहा.
“इस उम्र में? दोनों मानेंगे? वैसे खयाल तो बुरा नहीं है तुम्हारा. चलो, मम्मी से बात करते हैं. उन से कहेंगे हम ने अपने लिए एक नए अंकल ढूंढ़ लिया है. उन्हें साथी की जरूरत हो न हो, हमें है पापा जैसे अंकल की जरूरत. यह जरूरी नहीं कि इस उम्र में शादी जैसी झंझट पाली जाए. बस, उन्हें एक अलग कमरा दे देंगे. हमारे घर में वैसे ही 3-4 कमरे खाली पड़े हैं. ठीक है न निधि?”
निधि ने सहमति में सिर हिलाया. और, राहुल और निधि के कदम मां के कमरे की ओर बढ़ गए. Hindi Stories
लेखक – ट्विंकल तोमर सिंह





