Mother Son Relationship: ‘उफ्फ, ये लोग भी न, जरा भी ध्यान नहीं रखते. यह तो अच्छा हुआ कि वीणा बाथरूम में है वरना कितना खराब लगता उसे. वह इतने दुख में डूबी हुई है और यहां ये लोग ठहाके लगा रहे हैं. इतना समझाती रहती हूं इन लोगों को तब भी ध्यान नहीं रखते.’
मन ही मन भुनभुनाते हुए वह कमरे में पहुंची. अरुण के साथ विशु और आदी पलंग पर पसरे किसी बात पर हंसहंस कर लोटपोट हो रहे थे.
“यह क्या तरीका है तुम लोगों का? थोड़ा धीरे नहीं हंस सकते. अच्छा हुआ वीणा मौसी बाथरूम में हैं नहीं तो कितना बुरा लगता उन्हें वे सुनतीं तो. ध्यान रखा करो थोड़ा,” मीरा गुस्से से बोली.
आदी कोई जवाब देने जा ही रहा था कि अरुण ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया.
“ठीक है. आदी बेटा, कमरे का दरवाजा बंद कर दो ताकि आवाज बाहर न जाए,” अरुण ने कहा.
आदी उठ कर दरवाजा बंद करता, उस से पहले ही मीरा ने दरवाजा बंद कर दिया और फिर से ड्राइंगरूम में आ कर बैठ गई. अच्छा था कि वीणा अभी बाथरूम से निकली नहीं थी. उस ने फिर पत्रिका उठा ली.
विशु एकदम से गुमसुम हो गई मां का गुस्सा देख कर लेकिन आदी चिढ़ गया “यह क्या पिताजी, कब तक ऐसे मुंह दबा कर रहना होगा. बात मत करो, हंसो मत वरना मौसी को क्या लगेगा. ऐसा लग रहा है जैसे हम अपने घर में नहीं, जेल में रह रहे हैं.”
“बेटा, ऐसा नहीं कहते. वीणा मौसी इतने बड़े दुख में हैं, इसलिए मां टोकती हैं. और फिर कुछ ही दिनों की तो बात है. वे मेहमान हैं, थोड़े दिनों में ही चली जाएंगी,” अरुण ने उसे समझाया.
“पता नहीं कब जाएंगी. पंद्रह दिन तो हो गए यही सुनतेसुनते. न अच्छा खाना बन रहा है घर में, न कहीं बाहर जा पा रहे हैं और न टीवी देख सकते हैं. कमरे में देखो भी तो बिलकुल कम वौल्यूम में. सारी छुट्टियां तो इस साल की लगता है ऐसे ही निकल जाएंगी कमरे में बंद रह कर,” आदी गुस्से से बोला.
“हां पिताजी, परसों जब आप औफिस गए थे न, तब भैया ने म्यूजिक सिस्टम पर गाने लगाए थे. तभी मां ने आ कर बंद करवा दिया कि गाने भी मत सुनो,” विशु ने बताया.
“मैं समझाऊंगा मां को, तुम दोनों चिंता मत करो. अब तो सच में बहुत दिन हो गए हैं. अब इस समस्या का कोई समाधान निकालना ही होगा,” अरुण ने विशु का सिर थपथपा कर उसे प्यार से सांत्वना दी और दोबारा मजेदार चुटकुले सुना कर बच्चों को बहलाने लगे.
मीरा बाहर सोफे पर बैठ कर वीणा का इंतजार करने लगी. वह और वीणा बचपन की सहेलियां थीं. एक ही स्कूल और फिर एक ही कालेज में दोनों साथ पढ़ीं. दोनों आसपास के ही महल्लों में रहती थीं. स्कूल के बाद भी शाम को एकदूसरे के घर पर आ जातीं. कभी साथ में होमवर्क करतीं तो कभी छत पर जा कर दुनियाभर की बातें करती रहतीं. कालेज में भी यही सिलसिला चलता रहा था. फर्क, इतना सा था कि कालेज में होमवर्क की टैंशन नहीं रहती थी. सारी शाम बातों में गुजर जाती थी. दोनों की दोस्ती बहुत गहरी थी. एकएक सांस की खबर एकदूसरे को रहती थी. जो बातें दुनिया में किसी को भी पता नहीं हैं वे बातें भी वे दोनों आपस में शेयर किया करतीं.
मीरा की शादी घरवालों की मरजी से हुई लेकिन वीणा ने अपनी पसंद के लड़के से शादी की थी. शादी के बाद भी दोनों उसी शहर में रहीं तो आनाजाना, मुलाकातें चलती रहीं दोनों की. बीच में वीणा के पति जयेश का ट्रांसफर दूसरे शहर हो गया. तब भी दोनों की दोस्ती फोन पर बनी रही. जयेश बहुत ही ज्यादा अंतर्मुखी व्यक्ति थे. किसी से मिलनाजुलना अधिक पसंद नहीं था उन्हें. इसलिए मीरा वीणा के घर कम ही जाती थी लेकिन वीणा बराबर उस के घर आती रहती.
कभी जयेश बाहर टूर पर जाते तो वीणा मीरा के घर दो दिन रहने आ जाती. अरुण और फिर बच्चों से भी वीणा की अच्छी पटने लगी. वह इतनी मस्तमौला और हंसनेहंसाने वाली थी कि सब का दिल जीत लेती. मीरा के बच्चे भी अपनी इस मौसी को बहुत प्यार करते. जयेश और वीणा का आपस में बहुत गहरा रिश्ता और अंडरस्टैंडिंग थी. दोनों को कोई संतान नहीं हुई लेकिन उन्होंने कभी इस बात का गम नहीं मनाया. दोनों एकदूसरे के साथ को बहुत एंजौए करते और खुश रहते. अपने सर्कल में दोनों हैप्पी कपल के नाम से मशहूर थे.
कुछ ही सालों बाद जयेश का ट्रांसफर दोबारा इसी शहर में हो गया और फिर मीरा और वीणा की दोस्ती यों ही चलती रही. वीणा के लव मैरिज करने के बाद उस के मातापिता मुंबई जा कर बस गए थे. बड़ा भाई भी वहीं था लेकिन मस्तमौला वीणा को कोई फर्क नहीं पड़ा. उस के लिए दोस्ती और जयेश का प्यार ही बहुत था. सबकुछ ठीक चल रहा था कि 6 महीने पहले अचानक ही हार्ट अटैक से जयेश की मृत्यु हो गई. वीणा तो स्तब्ध सी हो गई. वह इस दुख से उबर ही नहीं पा रही थी. उस के मातापिता और भाई महीनेभर तक उस के पास रहे. फिर उसे अपने साथ मुंबई ले गए.
मीरा भी वीणा के दुख में आहत थी. बेचारी एकदम ही अकेली रह गई जयेश के न रहने से. वह रोज वीणा को फोन करती. वीणा गहरे अवसाद में चली गई. घर, शहर सब छूट गया था उस का. पंद्रह दिन पहले मीरा ने उस को यहां बुलवा लिया था. वह हर पल ध्यान रखती कि घर में कोई ऐसी स्थिति न बने जिस से वीणा के टूटे मन को और ठेस लगे. तभी से घर में न कोई खुल कर बात कर पा रहा था और न हंसबोल पा रहा था. सब सहमे हुए से रहते. न टीवी चलता न गाने सुने जाते.
कुछ दिन तो बच्चों को वीणा मौसी के लिए सचमुच दुख लगा और वे कुछ नहीं बोले लेकिन अब 15 वर्षीय आदित्य चिढ़ने लग गया है कि कब तक घर में ऐसी मनहूसियत और सन्नाटा पसरा रहेगा. अब मीरा भी क्या करे. बच्चों का मन वह समझती थी लेकिन वीणा को भी दुखी नहीं करना चाहती थी. तभी वीणा नहा कर बाहर आई. उस की आंखों से साफ पता चल रहा था कि वह बाथरूम में भी रोती रही है. मीरा ने उस की हथेली हाथ में ले कर थपथपाई और नाश्ता टेबल पर लगाने चली गई.
दोपहर में दोनों गेस्टरूम में लेटी हुई थीं. आंखें तो बंद थीं लेकिन नींद नहीं आ रही थी. दोनों बच्चे अरुण के साथ थे. मीरा वीणा के बारे में ही सोच रही थी. वह मुंबई से वापस आ गई थी कि अब जयेश की यादों के साथ अपने ही घर में रहेगी. दो दिन रही भी लेकिन अकेलेपन से एकदम घबरा गई. हर कोने में बिखरी जयेश की यादें रुलाती रहीं, बीते सालों का साथ, प्यार इस एकाकीपन में मन को हताश कर रहा था. मीरा उसे यहां ले आई.
मुंबई में रहना वीणा को रास नहीं आ रहा और यहां वह रह नहीं पा रही है. अजीब मनोस्थिति हो गई है उस की. वह अपना घर छोड़ भी नहीं सकती और वहां रह भी नहीं सकती.
“बोल न मीरा, जिंदगीभर भाईभाभी पर बोझ बन कर कैसे रहूं? उन का अपना जीवन है. मम्मीपापा कब तक रहेंगे, कल को वो भी चले जाएंगे, तब? मेरी तो जिंदगी भंवर में छोड़ कर चले गए जयेश,” वीणा कहती.
बात भी सही थी. लेकिन इस का कोई हल भी नहीं सूझ रहा था. सिवा दुखी होने के वह कर भी क्या सकती थी. बस, जितना हो सकता है उतना साथ दे रही थी. और कुछ उस के बस में था भी नहीं. लेकिन अब अरुण कुछ दिनों से तनेतने से रहने लगे थे. बच्चे अलग चिड़चिड़ाने लगे हैं. उन की भी कोई गलती नहीं है. मीरा पहले अरुण को पूरा समय देती थी. दोनों दिनभर की सभी बातें एकदूसरे से साझा करते थे. अब मीरा का समय वीणा के साथ निकल जाता है तो अरुण अलगथलग पड़ गए. अरुण भी वीणा से हंसतेबोलते थे लेकिन अब वे भी क्या बोलें.
बच्चों की गरमी की छुट्टियां हैं. हर छुट्टी में सब खूब एंजौय करते थे. रोज घर में बढ़ियाबढ़िया ट्रीट्स बनते, फिल्में देखते, रोज शाम को अरुण के औफिस से वापस आने के बाद बाहर घूमने जाते. लेकिन अब बच्चे न फिल्में देख पाते थे, न घर में कुछ विशेष खाना बनता, न सब मिलजुल कर बाहर घूमने जा पाते. दोनों पक्षों के बीच मीरा पिस जाती. वह बच्चों के उतरे, उदास मुंह भी नहीं देख पाती और वीणा को भी दुखी नहीं कर सकती. बच्चों से कहती कि पिताजी के साथ घूम आओ तो वो सब मीरा के बिना जाने को तैयार न होते.
अरुण जब छुट्टी ले कर घर पर रहते तब बच्चों को पिता का साथ मिल जाता लेकिन अरुण जब औफिस चले जाते तो दोनों भाईबहन अपने कमरे में अकेले पड़ जाते. नन्हीं विशु तो मां की याद आने पर कभीकभी बाहर आ कर मीरा से चिपक कर बैठ जाती लेकिन आदी गुस्से में कमरे में ही बैठा रहता. वह बस खाना खाने के लिए ही साथ बैठता था. पूरे समय घर में एक अवसादग्रस्त उदासी छाई रहती. आखिर एक दिन अरुण से रहा नहीं गया. रात में जब बच्चे और वीणा सो गए तब अरुण ने मीरा के कमरे में आने के बाद उस से कहा-
“आखिर ऐसा कब तक चलता रहेगा, मीरा? बच्चे बेचारे कब तक ऐसे घुटते रहेंगे?”
“मैं भी क्या कर सकती हूं, वीणा के दुख में हम साथ नहीं देंगे तो कौन देगा?” मीरा बोली.
“वो मैं सब समझता हूं लेकिन हर बात की एक सीमा होती है. वीणा का दुख मैं भी समझता हूं लेकिन दुख में उम्र नहीं गुजारी जा सकती. वीणा को थोड़ी तो कोशिश करनी चाहिए अपने दुख से बाहर आ कर सामान्य होने की. मैं जानता हूं उस का दर्द उम्रभर का है. जयेश के चले जाने का खालीपन उस के जीवन में सदैव रहेगा लेकिन अब उसे दुख से उबरने का प्रयत्न करना होगा वरना उस से जुड़े लोग भी अवसादग्रस्त होने लगेंगे. अब काफी समय हो गया है. सभी को जीवन में कभी न कभी किसी के बिछोह का दर्द सहना ही पड़ता है लेकिन जीवन में वापस लौटना भी पड़ता है,” अरुण ने कहा.
“लौट आएगी वह भी. उसे थोड़ा समय तो दीजिए,” मीरा धीमी आवाज में बोली.
“कब लौटेगी, तुम ने बच्चों के चेहरे देखे हैं? कितने मुरझाए से हो गए हैं. अपने ही घर में सिमटे हुए, सहमे हुए से रहते हैं वे. उन के बारे में सोचो, मीरा. पूरे 17 दिन हो गए हैं अब तो. दरअसल, वीणा खुद ही अपने दुख से उबरना नहीं चाहती. वह कोशिश ही नहीं कर रही. यह स्वभाव खुद उस के लिए और उस से जुड़े रिश्तों, दोनों के लिए ठीक नहीं है. ऐसे तो धीरेधीरे सभी उस से दूर होते जाएंगे. कोई कब तक किसी के साथ रोते रह सकता है,” अरुण के स्वर में थोड़ी चिढ़ का भाव था. वे उकताए से हो रहे थे.
“धीरे बोलिए. कहीं उस ने सुन लिया तो उसे कितना बुरा लगेगा कि हम उस के बारे में ऐसा सोच रहे हैं,” मीरा ने कहा.
“मैं कुछ गलत नहीं सोच रहा. वह जितनी जल्दी अवसाद से निकलेगी उतना उस के खुद के लिए भी अच्छा होगा. लंबे समय तक दुखी रहना शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा नहीं है. अब वीणा को सामान्य जीवन में लौट कर अपने बारे में सोचना चाहिए,” अरुण ने कहा और करवट बदल ली.
मीरा एक गहरी सांस ले कर चुप हो गई. अरुण गलत तो नहीं कह रहे हैं. वह खुद भी यही चाहती है कि वीणा जल्दी सामान्य हो जाए और घर का वातावरण भी सहज हो जाए. कितने दिन से पूरे समय ऐसा लगता रहता है कि एक अव्यक्त तनाव के साए में जिंदगी कट रही है. न वह खुद खुल कर जी पाई है पिछले दिनों से, न अरुण और बच्चों को समय ही दे पा रही है.
ऐसा लग रहा है एक युग बीत गया अरुण के साथ सुबह की चाय बाहर झूले पर बैठ कर पीने को. देररात तक मीरा इन्हीं विचारों में खोई रही और उसे नींद नहीं आई. जाने कितनी रात गए उस की आंख झपकी. सुबह जब उस की नींद खुली तो रोज की अपेक्षा देर हो गई थी. अरुण अब भी सो रहे थे. आज रविवार होने से उन की छुट्टी थी. मीरा उठ कर मुंहहाथ धो कर किचन में चली आई.
वीणा किचन में चाय बना रही थी. प्लेटफौर्म पर ट्रे में चाय की केतली और नए वाले कप रखे थे. वीणा कुछ गुनगुना रही थी. मीरा को आश्चर्य हुआ. वह कोई गाना गुनगुना रही थी. आहट पा कर वीणा ने पीछे मुड़ कर देखा.
“गुड़ मौर्निंग. नींद हो गई जनाब की,” वीणा एकदम पहले वाले टोन में चहक कर बोली मीरा से.
मीरा आश्चर्य से उसे देखती रह गई. वीणा नहाधो कर तरोताजा थी. उस ने हलकी सी लिपस्टिक लगा रखी थी. आज सूट भी फूलों वाला ब्राइट कलर का पहना हुआ था. वह एकदम पहले वाली हंसतीखिलखिलाती मस्ती करने वाली वीणा लग रही थी.
“वीणा…” मीरा असमंजस में कुछ कह नहीं पा रही थी.
“यार, तूने बिस्कुट के डब्बे कहां छिपा दिए, पहले वाली जगह पर तो नहीं हैं?” वीणा बोली.
“हां, इधर वाली अलमारी में रख दिए हैं. अभी निकालती हूं,” मीरा ने एक प्लेट में बिस्कुट निकाले और ट्रे में रख दिए.
“चल, बाहर झूले पर बैठते हैं,” वीणा ट्रे उठा कर बाहर आ गई. मीरा भी उस के पीछे आ कर झूले पर बैठ गई.
वीणा ने ट्रे सामने रखे टेबल पर रख कर 2 कप में चाय छान कर एक मीरा को दे दिया.
“वीणा, तू…” मीरा ने बात आधी छोड़ दी.
“मैं जानती हूं तू क्या सोच रही है. हां, मैं बिलकुल ठीक हूं. असल में कल रात मैं पानी ले जाना भूल गई थी तो रात में उठ कर किचन में पानी लेने आई. तभी तेरी और अरुण भैया की बातें सुन कर ठिठक गई. बातें मेरे से ही संबंधित थीं तो सुनने से खुद को रोक नहीं पाई. सच कहूं तो अरुण भैया की बातें सुन कर पहले तो बहुत दुख हुआ. गुस्सा भी आया. कमरे में जा कर मैं खूब रोई.
फिर रोने के बाद जब मन हलका हो गया तब शांति से मैं ने सोचा तो लगा कि वे गलत नहीं कह रहे थे. आखिर, कब तक मैं खुद को भी दुख देती रहूंगी और दूसरों को भी अपने दुख से दुखी करती रहूंगी. अब जो परिस्थिति सामने आ गई है उस का सामना तो करना ही पड़ेगा,” वीणा की मुसकराहट में एक सहजता थी. वीणा ने आगे कहा, “असल में मैं भी पंडितों वाली उस पुरानी सोच की शिकार हो गई कि पति की मृत्यु के लिए पत्नी जिम्मेदार होती है और प्रायश्चित्त के लिए उसे जीवनभर जानवरों जैसी जीनी होती है. जयेश की मृत्यु में मेरी तो कोई गलती नहीं, तो फिर मैं पाखंडों को मान कर क्यों खुद को जलाऊं. मैं जयेश के साथ सुख के पलों को याद कर के जीना चाहती हूं.”
मीरा के मन को बहुत सुकून मिला यह सुन कर, बोली, “सच, मेरे मन का बोझ हलका हो गया तुझे संभलते देख कर.”
“हां, दुख तभी तक रहता है जब तक आप खुद उसे ओढ़े रहते हैं. जब मैं नहाने गई तो आज बहते पानी के नीचे मैं ने अपने दुख को भी बहा दिया. और मैं आज खुद को बहुत शांत महसूस कर रही हूं. अकेली तो रह गई हूं लेकिन जयेश के साथ गुजारे अच्छे पलों की यादें तो सदा मेरे साथ रहेंगी,” वीणा बोली.
“अकेली क्यों, हम भी तो हैं तुम्हारे साथ,” अरुण बगीचे में आते हुए बोले.
“हां अरुण, थैंक यू सो मच. आप ने ही मुझे दुख से बाहर निकलने की राह दिखाई,” वीणा बोली.
“मैं ने तो सिर्फ राह दिखाई, पर मुझे खुशी है कि तुम ने उस पर चलने की समझदारी दिखाई और खुशियों की ओर बढ़ने का फैसला किया,” अरुण बोले.
“चलो, आज कुछ अच्छा, चटपटा बनाते हैं नाश्ते में. बहुत दिनों से कुछ मजेदार नहीं खाया है. मृत्युभोज पर पंडित चटपटा खाना खाते हैं पर मरने वाले की पत्नी को सूखा-बासी खाना खाना पड़ता है. आखिर क्यों?” वीणा उठते हुए बोली.
जब विशु और आदी सो कर उठे तो घर में कचौरी, आलू परांठों की सुगंध फैली हुई थी. दोनों खुशीखुशी टेबल पर आ बैठे. वीणा मौसी मां के साथ मिल कर बढ़िया सा ब्रेकफास्ट तैयार कर रही थीं.
“देखो भई, यह ब्रंच है. इस के बाद कुछ नहीं बनेगा क्योंकि अपन तो एक बढ़िया सी कौमेडी फिल्म देखेंगे दोपहर में. सो, किचन की छुट्टी. और रात में भैया हम तो डिनर किसी अच्छे से होटल में करेंगे,” वीणा अपने चिरपरिचित पुराने वाली मस्तीभरे अंदाज में बोली.
विशु और आदी क्षणभर के लिए देखते रहे, फिर अपनी पुरानी वाली वीणा मौसी को पा कर खुशी से चिल्लाए “हुर्रे.”
“मैं नाश्ता कर के फटाफट कोल्डड्रिंक ले आऊंगा, फिल्म देखते हुए पिएंगे” आदी बोला.
“और पौपकौर्न भी. तुम्हें तो पता है न, फिल्म देखते हुए मुझे सारा समय कुछ चरने को चाहिए,” वीणा बोली.
“ओके. फिल्म, कोल्डड्रिंक और पौपकौर्न, कितना मजा आएगा,” विशु ताली बजा कर बोली.
सब हंसने लगे. वीणा और मीरा समेत सभी एकसाथ डाइनिंग टेबल पर बैठे और गपें मारते हुए ब्रेकफास्ट किया. बहुत दिनों बाद अवसाद के बादल छंट गए थे और चमकीली धूप जैसा दिन था. वीणा ने भी जिंदगी से कहा कि अकेले हैं तो क्या गम है.





