Hindi Stories: कभी ध्यान दिया है आप ने कि हमारे भारतीय समाज में विविधवर्णी लोग रहते हैं. यहां का मौसम गरम है, तो स्वाभाविक ही रंग काला होना ही है. मगर थोड़ा ठहरिए, कहींकहीं पर्वतीय इलाकों में ठंढ भी पड़ती है, इसलिए वहां के लोग उजले भी होते हैं. समुद्री इलाके समशीतोष्ण होते हैं, तो वहां भी रंगत बदल जाती है. आमतौर पर ध्यान से देखें तो भारतीय रंग पीलेपन की आभा लिए होता है.
काले और गोरे के बीच सांवला रंग होता है, जो ज्यादा लावण्यमयी माना जाता है. हमारे देश में इतनी प्रजातियां हैं कि विविध रंगों का होना कोई असामान्य बात नहीं. भाषाशास्त्रियों के अनुसार विभिन्न लोगों की प्रजातियों में विलगाव इसी रंग के कारण भी है. लेकिन भारत में लोग इसे सहजता से लेते भी हैं क्योंकि एक ही घरपरिवार में अनेक रंगों के लोग मिल जाते हैं. इस के बावजूद गोरे रंग को हमारे यहां अहमियत दी जाती है. सौंदर्य के प्रतीक के रूप में इसे देखा जाता है. इस के पीछे राममनोहर लोहिया का तर्क था कि ‘हमारे ऊपर पश्चिम एशिया और यूरोप के गौरांगों ने हुकूमत की थी, इसलिए हमारा सौंदर्यबोध सफेद की ओर है. यदि हमारे ऊपर अफ्रीका के काले हब्शियों ने राज किया होता, तो निसंदेह हमारे सौंदर्य का मानक काला रंग होता.’
जब रंग की बात की जाए तो पुरानों में उल्लिखित कई देवीदेवता सांवले हैं. राम तो सांवले हैं ही, जिन के सौंदर्य का बखान तुलसी ने मुक्तकंठ से किया है. कृष्ण की सांवली मनोहारी सूरत के क्या ही कहने. दक्षिण भारत में पार्वती काले रंग की मानी जाती हैं. जब उन के इस काले रंग पर हलदी-चंदन का उबटन लगाया जाता है तो वे हरी हो जाती हैं. वैसे, देवी पार्वती स्वयं में सौंदर्य की एक मानक हैं. कार्तिकेय को भी सांवले रंग का बताया गया है. पुराणों के अनुसार सौंदर्य के प्रतीक कृष्ण से भी अधिक सुंदर हैं कार्तिकेय.
दमयंती सांवली थी. लेकिन जब उस का स्वयंवर हुआ, जैसा कि ग्रंथों में लिखा है, तो धरती के राजाओं का क्या कहना, स्वर्ग (यदि कहीं हो तो) के देवता भी नल का रूप धर कर स्वयंवर में शामिल हो लिए थे. महाभारत की पांचाली द्रौपदी सांवली थी, इसलिए उन का एक नाम ‘श्यामा’ भी है. संपूर्ण भारत के राजा इस सौंदर्यमयी याज्ञसेनी द्रौपदी के स्वयंवर में शामिल होने के लिए पहुंच गए थे जैसा कि हिंदू धर्म के ग्रंथ कहते हैं.
यही कारण है कि हमारे कवियों ने इस सौंदर्यबोध की अलगअलग व्याख्या की है. जायसी अपने ‘पद्मावत’ में लिखते हैं कि उन की नायिका अपनी सहेलियों संग 2 दलों- गोरे और सांवले- में बंट कर जलक्रीड़ा करती हैं.
रीतिकाल के कवि बिहारी अपने दोहों का आरंभ ही इस प्रकार करते हैं-
मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरी सोय, जा तन की झांई पड़ै, स्याम हरित दुति होय.
कहने का तात्पर्य यह कि गोरी राधा के रंग की परछाईं मात्र से श्यामल कृष्ण हरे हो जाते हैं. यह जीवन बस और कुछ नहीं, रंग परिवर्तन ही तो है. जीवन जीने की रंगत में जब रंग बदलते हैं, तो उस में जीवंतता आती है. फिर ऐसे में किसी रंग विशेष के प्रति मोह क्या रखना. इन्हीं कुछ उदाहरणों से पता चलता है कि भारत में सौंदर्य का प्रतीक सांवला होना ही था. मगर बाद में जब गोरे लोगों ने आक्रमण कर भारतीय उपमहाद्वीप को हस्तगत किया, तो हमारे सौंदर्य के मानक बदल गए. यह मानक इतना जबरदस्त था कि कवि को कहना पड़ा-
गोरे रंग पे न इतना गुमान कर, गोरा रंग दो दिन में ढल जाएगा.
मगर अहंकार इतना जल्दी ढलता, तो क्या बात थी. बल्कि वह तो सिर चढ़ कर बोलने लगा. ऐसे में कवियों के भाव बदल गए और वे ऐसे गीत रचने लगे-
चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल, एक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल.
जाहिर सी बात है, जब सौंदर्यबोध का मानक इस प्रकार का हो, तो अहं आना स्वाभाविक है. इस अहं को हम विविध रूपों में पूर्व में भी देख सकते हैं. गोरी गोपियां काले कृष्ण से इस कारण रुष्ट रहीं कि वे एक तो बिन बताए वृंदावन से मथुरा चले गए, यानी, ग्रामीण से शहरी हो गए, दूसरे, उन की कभी सुध भी नहीं ली. सुध लेने तथा समझाने को उन्होंने उद्धव जैसे परम ज्ञानी को भेज दिया. गोपी-उद्धव संवाद ‘भ्रमरगीत’ के रूप में हैं. उद्धव उन्हें ब्रम्हज्ञान का उपदेश देते हैं. इस पर गोपियां कहती हैं-
निरंजन बावरी वे अंखियां जरि जाए,
जे सांवरी छांड़ि निहारत गोरी.
उद्धव एकदम से हतप्रभ रह जाते हैं कि वे यह क्या सुन रहे हैं. वे कृष्ण की माया का उल्लेख करते हैं, तो गोपियां जैसे सब जानती हों, इस रूप में उपालंभ देती हैं-
ऊधो कारेकारे सबहिं बुरे,
कारेन की परतीत न कीजै, कारे बिस से भरे.
उन का गुस्सा कुछ इस कदर है कि वे कहती हैं-
सखी री स्याम सबै इकसार, भंवर, कुरंग, काक अरू कोकिल कपटिन की चटसार.
यह तय है कि यह शिकायत, उपालंभ इन के प्रेम को ही प्रदर्शित करता है. तभी तो गोपियों की कृष्णभक्ति देख कर उद्धव उन्हीं के रंग में रंग जाते हैं. वर्तमान में भी रंगों को ले कर नोंकझोंक चलती ही रहती है. अब इस उपभोक्ता युग में काले रंग को गोरा बनाने वाली फेयर क्रीम जेनजी वाले युवक भी लगाने लगें, तो बात समझ में आती है कि लोगों का सौंदर्यबोध मुखर होने लगा है. काश, वे समझ पाते कि पश्चिम एशिया के गल्फ कंट्रीज अपने ही युद्ध के आग में जले जा रहे हैं और अमेरिका व यूरोप ने प्रवासियों के लिए जोर से दरवाजा बंद कर रखा है. वे तो बस यही चाहते हैं कि उन के यहां की बनी हुई गोरा बनाने वाली क्रीम जैसी चीजें ये युवा अपने यहां ही खरीदते रहें, क्योंकि उन के लिए तो वे, बस, बाजार के उपभोक्ता हैं. काश, वे समझ पाते कि कि कौआ कितना भी साबुन रगड़ ले, वह बगुला नहीं बन सकता. सो, वे अपने प्राकृतिक रंगों में ही रंगे रहें, तो बेहतर.
सच तो यही है कि मानवीय सद्गुण सभी रंगों पर अपनी आभा बिखेरता है. इसलिए उसे अपने सद्गुणों, जैसे ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, सत्यनिष्ठा आदि के प्रति दृढ़ रहना चाहिए. रंग चाहे जो भी हों, सद्गुण सभी को खुद में समेट लेता है. ठीक है कि इस में तकलीफ तो होती ही है और दुख भी उठाना पड़ता है लेकिन मनवांछित रंगों को पाने के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं. बस, हिम्मत होनी चाहिए. इस हिम्मत की कमी जेनजी के पास नहीं है. बस, इस के लिए बड़ा हौसला होना चाहिए. फिर तो वे व्यवस्था क्या, समाज और देश तक को भी हिला सकते हैं. हाल ही के वर्षों में हम ने देख भी लिया है, जो उन्होंने ढाका, कोलंबो और काठमांडू में कर दिखाया है. इसलिए जिस पर सद्गुणों का रंग चढ़ गया, वह अपनेपन को पाएगा ही. और इसी की तो हमें तलाश है. Hindi Stories





