Anand Math: आनंद मठ उतना ज्यादा विवादित उपन्यास है नहीं जितना कि उसे जानबूझकर प्रचारित किया जाता है ताकि इसकी आड़ में राष्ट्रवाद को थोपने की गरज से कुछ भी कहने की आजादी हासिल की जा सके. एतिहासिक तथ्यों के आईने में देखें तो अक्स साफ़ नजर आता है कि बंकिमचंद्र चटर्जी ने तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत के आगे घुटने टेकते राष्ट्रवाद का सौदा या समझौता कुछ भी कह लें कर डाला था. इसके एवज में उन्हें मुकम्मल इनाम भी मिले थे.

 सत्यानंद युद्धक्षेत्र से चुपचाप आनंदमठ लौट आते हैं . रात के समय विष्णु मंदिर के आँगन में ध्यानस्थ बैठे होते हैं . तभी उनके गुरु (महात्मा/चिकित्सक) प्रकट होते हैं. सत्यानंद उठकर उन्हें प्रणाम करते हैं.

गुरु: सत्यानंद,  आज माघ की पूर्णिमा है.

सत्यानंद: चलिए, मैं तैयार हूँ. पर महात्मन्, मेरा एक संदेह दूर कीजिए. जिस समय मैंने युद्ध करके सनातन धर्म को निष्कंटक कर दिया, उसी समय आप मुझे वापस क्यों बुला रहे हैं.

गुरु: तुम्हारा कार्य सिद्ध हो गया. मुसलमानों का राज्य नष्ट हो गया. अब यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं रहा.

सत्यानंद: मुसलमानों का राज्य तो समाप्त हो गया, पर हिंदू राज्य अभी स्थापित नहीं हुआ.

गुरु: अभी हिंदू राज्य की स्थापना होना नियत नहीं है. तुम्हारे यहाँ रहने से व्यर्थ ही नरहत्या होगी. इसलिए मेरे साथ चलो.

सत्यानंद आँखों में आँसू भरकर कहते हैं—

सत्यानंद: प्रभो , यदि हिंदू राज्य स्थापित नहीं होगा, तो फिर यहाँ कौन राज करेगा.. क्या फिर मुसलमानों का राज्य होगा.

गुरु: नहीं, अब अंग्रेजों का राज्य होगा.

सत्यानंद मातृभूमि की प्रतिमा की ओर मुड़कर हाथ जोड़कर रुँधे गले से कहते हैं—

सत्यानंद: हाय माता, मैं तुम्हारा उद्धार नहीं कर सका. तुम फिर म्लेच्छों के हाथ में चली जाओगी. माता, आज रणक्षेत्र में ही मेरी मृत्यु क्यों न हो गई.

गुरु: सत्यानंद, कातर मत हो. जो कुछ होने वाला है, वह देश के लिए अच्छा ही है. जब तक अंग्रेजों का राज इस भूमि पर नहीं होगा, तब तक सनातन धर्म का पुनरुद्धार संभव नहीं. सुनो, मैं तुम्हें प्राचीन ऋषियों द्वारा देखे और समझे गए सत्य की व्याख्या करता हूँ.

( गुरु आगे समझाते हैं कि सच्चा हिंदू धर्म ज्ञान पर आधारित है, केवल कर्म या देवी-देवताओं की पूजा पर नहीं. बाहरी ज्ञान (विज्ञान आदि) अंग्रेजों से मिलेगा, तब आंतरिक आध्यात्मिक ज्ञान का विकास होगा.)

सत्यानंद: यदि अंग्रेजों को ही यहाँ राजा बनाना था, यदि अंग्रेजी राजा ही देश के हित में था, तो फिर आपने मुझे इस हिंसापूर्ण युद्ध में क्यों लगाया.

गुरु: अंग्रेज इस समय व्यापारी हैं. वे केवल धन कमाने में लगे हैं, राज्य-शासन का भार नहीं लेना चाहते. इस संतान-विद्रोह के कारण वे राज्य-शासन अपने हाथ में लेने को विवश होंगे, क्योंकि बिना शासन के धन-संग्रह संभव नहीं. यह संतान-विद्रोह अंग्रेजों को सिंहासन पर बैठाने के लिए ही हुआ है. अब मेरे साथ चलो, ज्ञान प्राप्त करने पर तुम स्वयं सब समझ जाओगे.

सत्यानंद: महात्मन्, मुझे ज्ञान की इच्छा नहीं. मैंने जो व्रत लिया है, उसे पूरा करूँगा. आशीर्वाद दीजिए कि मेरी मातृ-भक्ति अटल रहे.

गुरु: तुम्हारा व्रत पूरा हो चुका है. तुमने माता का कल्याण कर दिया है, तुमने अंग्रेजी राज्य स्थापित करने में सहायता की है. लड़ाई छोड़ो. लोग खेती करें, धरती फलवती हो, देश समृद्ध हो.

सार और उपसंहार

 आनंद मठ उपन्यास का यह उपसंहार ही उसका सार है. यह संवाद उपन्यास के अंत में नायक  सत्यानंद और उसके गुरु के बीच का बंगला से हिंदी में सार अनुवाद है जो बताता है कि बंकिमचंद्र चटर्जी की मशा आखिर थी क्या. वे चाहते थे कि भले ही भारत में ब्रिटिश राज स्थापित हो जाए लेकिन मुगलों का शासन खत्म हो और ऐसा हुआ भी. .तब की दिक्कत यह कि वह तथाकथित हिन्दू राज स्थापित नहीं हो सका. आज की बड़ी दिक्कत यह कि संवैधानिक राज स्थापित हो गया. जिसकी कल्पना भी बंकिमचंद्र सरीखे सनातनियों ने नहीं की थी.

यहाँ सत्यानंद से ज्यादा उसका गुरु अहम है जो वाकई ज्ञान की बात कह रहा है कि आधुनिकता और विज्ञानं तो अंग्रेजों से ही मिलेंगे. हिन्दू धर्म तो पिछड़ा , अवैज्ञानिक , पाखंडों  और भेदभाव की बिना पर घिसट रहा है. जिसके चलते ही पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों ने इस धरती पर राज किया.

मुमकिन है मौजूदा दौर के दक्षिणपंथियों को इस सार उपसंहार से इत्तफाक न हो क्योंकि वे अभी तक सत्यानंद की मानसिकता में जीते अभी तक मुसलमानों से एक अज्ञात , काल्पनिक और मानसिक लड़ाई लड़ रहे हैं. क्योंकि मुगल शासक तो खत्म हुए लेकिन मुसलमान यहीं हैं और बतौर संवैधानिक नागरिक हैं  पहले अंग्रेजों और बाद में पहले प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने किसी तरह की परवाह न करते हुए विज्ञानं और टेक्नालाजी के जरिए जो विकास देश का किया उसका फायदा किसी सबूत का मोहताज नहीं.

नेहरु ने मंदिर नहीं बनवाये और न ही हिन्दू मुस्लिम , पूजा पाठ और घंटे घड़ियालों में वक्त जाया किया. उनका पूरा फोकस कारखानों, बांधों, एम्स और भेल जैसे सार्वजनिक उपक्रमों सहित बिजली, सडक और रेल बगैरह के जरिए देश को आधुनिक बनाने का रहा.

बिलाशक नेहरु के प्रयासों और विजन सहित अम्बेडकर के दिए संविधान से देश आधुनिक हो पाया है. लेकिन वंदे मातरम जैसे बेमतलब के मुद्दों पर विवाद इसे वापस आनंद मठ बाले दौर में ले जाने की साजिश हो सकते हैं. जिसके जिम्मेदार वे कट्टरवादी हिंदू ही ज्यादा ठहराए जाएंगे जो आनंद मठ की हकीकत जानते हुए भी उससे आँखे मूंदे हुए हैं. इससे भी बड़ा गुनाह वे इसे अपनी सहूलियत और खुदगर्जी के मुताबिक तोड़मरोड़ कर पेश करने का करते हैं.

 प्रचिलित आनंद मठ

 यह उपन्यास क्या है और क्यों लिखा गया और कब कैसे बंकिमचंद्र ने इस पर पलटी मारते  इसमें बदलाव और फेरबदल किये, इसे सिलसिलेवार समझने से पहले यह जान लेना अहम होगा कि अकाल के वक्त बंगाल प्रांत का गवर्नर वारेन हेंस्टिग्स था.

अब उपर बताए गए गुरु के बारे में जान लें जो महात्मा हो या चिकत्सक हो पूरे उपन्यास में प्रत्यक्ष कहीं नहीं है. वह आखिरी अध्याय में ही प्रकट हुआ है. उसे सूत्रधार कहा जा सकता है और लेखक भी करार दिया जा सकता है जो एक खास मकसद और खुदगर्जी के चलते अंग्रेजी राज से न केवल सहमति जता रहा है बल्कि उन्हें मित्र भी बता रहा है और कथानक को यहीं यानी मुगलों के खात्मे के साथ ही समाप्त करने का एलान भी कर रहा है.

आनंद मठ की शुरुआत बंगाल के 1770 के लगभग के भीषण अकाल से होती है जिसमे पदचिन्ह नाम के एक गाँव का बेहद सजीव और सटीक चित्रण है. गाँव में सन्नाटा पसरा है, रास्ते और बाजार सुनसान पड़े हैं, भुखमरी और महामारी के चलते आम लोग हलकान हैं. अनाज की कमी के चलते रोजमर्राई जिंदगी तितर बितर हो चुकी है. ऐसे में एक गृहस्थ महेंद्र जो उपन्यास का मुख्य पात्र भी है अपनी पत्नी कल्याणी और छोटी बच्ची के साथ अपना घर द्वार और गाँव छोड़ने मजबूर हो जाता है. ऐसे हालातों में जैसा होता है वह महेंद्र के साथ भी हुआ कि उसे सर छिपाने सुरक्षित जगह भी नहीं मिली. इस भटकाव के दौरान ही उपन्यास की थीम पाठकों के सामने आ जाती है जब जंगल में महेंद्र और कल्याणी को डाकू घेर लेते हैं.

ठीक इसी वक्त में हिंदी फिल्मो के हीरो की तर्ज पर संतान संगठन के सन्यासी सत्यानंद और भवानंद आकर उन्हें बचा लेते हैं. इसके तुरंत बाद सन्यासी अपने मुख्यालय `आनंद मठ`में आ जाते हैं और अपने इन नए सैनिकों को दीक्षा देते हैं. यहीं पर यह बात संवादों के जरिए स्पष्ट हो जाती है कि उनकी लड़ाई और प्रमुख धार्मिक असंतोष तत्कालीन मुग़ल शासक यानी नबाब से है.

उपन्यास के आगे बढ़ने के साथ साथ बात शीशे की तरह साफ़ होती जाती है कि इस संतान  सन्यासी संगठन की दुश्मनी बैर या खिलाफत तत्कालीन नबाब से है. यही पर भवानंद महेंद्र को दीक्षा देते हुए मुसलमानों के खिलाफ वैचारिक मोर्चा खोलते हुए यह मंत्र देता है, `शाही नबाब के शासन में हमारा धर्म भ्रष्ट हो गया है, जाति भ्रष्ट हो गई है और माताएं बहनें असुरक्षित हैं.`

जैसे जैसे उपन्यास आगे बढ़ता जाता है वैसे वैसे सन्यासियों और नबाब के मुस्लिम सैनिकों के बीच मुठभेड़ें शुरू हो जाती हैं .सत्यानंद की संतान सेना को नबाब का खजाना लूटते हुए भी दिखाया जाता है. इस लूट के दौरान यह सेना हरि बोल हरि बोल के नारे लगाती है. यह सेना मुस्लिम सैनिकों पर गुरिल्ला हमला भी करती है. इसके बाद का कथानक अहम है जिसमे गुरिल्ला हमलों के बाद संतान सेना नबाब और ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा इकट्ठा किए लगान के पैसों से लदी गाड़ियों को लूट लेती है. इस पैसे को राबिन हुड स्टाइल में अकाल पीड़ित जनता में बाँट दिया जाता है. कुछ हिस्सा संतान सेना अपने पास रख आधुनिक हथियार और गोला बारूद बगैरह खरीदती है. इस लूट से बोखलाए दो  ब्रिटिश अधिकारी केप्टन थामस और कमांडर मेजर एडवर्ड्स इन विद्रोहियों को कुचलने भारी सेना भेजते हैं.

यहाँ से उपन्यास का संभावित अंत यानी क्लाइमेक्स समझ आने लगता है. संतान सैनिकों के हर्डक्वार्टर आनंद मठ को नेस्तनाबूद करने के मकसद से ब्रिटश सेना और नबाब की सेना संयुक्त हमला कर देती  हैं. अब युद्ध आमने सामने का होता है जिसमे संतान सेना बहादुरी दिखाते इस संयुक्त सेना को खदेड़ देती है. इस दौरान वंदे मातरम का नारा भी सेना लगाती जाती है जो उसमें जोश भरने बाला बताया गया है. इस महायुद्ध में केप्टन एडवर्ड मारा जाता है. संतान सेना की जीत होती है और हर जगह उसका कब्जा भी हो जाता है.

जीत के बाद सत्यानंद और उसके साथी जब जश्न मनाने की तयारी कर रहे होते हैं तभी अचानक वह रहस्मयी महापुरुष चिकित्सक गुरु प्रगट होता है जिसकी सत्यानंद से बातचीत का सार उपसंहार सबसे उपर दिया गया है . कुछ नाटकीयता के बीच गुरु सत्यानंद को समाधि दिलाने के लिए हिमालय चलने राजी कर लेता है. महेंद्र और कल्याणी घर लौटने लगते हैं और संतान सेना तितर बितर हो जाती है. इस तरह मुस्लिम कुशासन का खात्मा होता है और हुकुमत गोरों के हाथ आ जाती है. हाथ क्या आ जाती है उन्हें गिफ्ट कर दी जाती है जिससे तरक्की हो, देश में विज्ञानं जड़ें जमाए और किसान खेती किसानी कर खुशहाल जिंदगी जिएं. बकौल गुरु जी जब देश ज्ञान से भर जाएगा तब सनातन धर्म का असली पुनरुत्थान होगा.

यहाँ गौर करने लायक यह बात अहम है कि सत्यानंद जो भी कर रहा था उसके आदेश निर्देश उसे गुरु से मिल रहे थे. लगभग वैसे ही जैसे आजकल के बागेश्वर जैसे बाबाओं को उनके काल्पनिक गुरु से मिलते हैं . लेकिन उपन्यास के लिहाज से यह कोई चमत्कारिक बात न समझते लेखकीय कथन यानी बंकिमचंद्र के `मन की बात` ही समझना ज्यादा प्रासंगिक और बेहतर है.

वास्तविक या मूल आनद मठ

 लेकिन यह असली आनंद मठ नहीं है. उपन्यास की शक्ल लेने से पहले आनंद मठ बंकिमचंद्र की ही साहित्यिक पत्रिका `बंगदर्शन` में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ था. पहली बार उपन्यास के तौर पर यह 1882 में पश्चिम बंगाल के ही चुचुडा नाम की जगह से छपा था. यह जगह कोलकाता से तकरीबन 35 किलोमीटर दूर है, जिसे पहले `डच चिंसुरा` के नाम से जाना जाता था क्योंकि यह डच लोगो के प्रमुख व्यापारिक केन्द्रों में एक था

आनंद मठ में बंकिमचंद्र ने कई बदलाव किए थे यह बात किसी सबूत की मोहताज कभी नहीं रही. कई इतिहासकारों, आलोचकों और शोधकर्ताओं ने वक्त वक्त पर अपनी राय और कमेंट्स इस पर दिए हैं. इनमे से सबसे ज्यादा प्रमाणिक आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर जूलियस जे लिपनर जिनकी परवरिश और शिक्षा पश्चिम बंगाल में ही हुई थी का है.

जब `बंग दर्शन` में धारावाहिक रूप में यह उपन्यास प्रकशित हो रहा था तब बंकिमचंद्र ब्रिटिश हुकुमत के अधीन डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत थे. आनंद मठ में ब्रिटिश सैनिकों के खिलाफ कुछ बेहद आपत्तिजनक कमेंट्स बेहद ही कड़े शब्दों में किए गए थे. लिपनर ने साल 2005 में आनंद मठ का अनुवाद अंग्रेजी में `द आनंद मठ आर सेक्रेड ब्रदरहुड` शीर्षक से किया था. हिंदी में इसे `आनद मठ या पवित्र भ्रातृसंघ` कह सकते हैं.

आज के दौर में बेहद मौजू हो गई इस किताब की भूमिका और क्रिटिकल नोट्स में लिपनर ने उन सभी मूल दस्तावेजों, सरकारी रिकार्ड्स और बंगदर्शन से लेकर 1882 तक के उपन्यास तक किए गए सभी बदलाबों को शब्द दर शब्द लिखते यह भी साबित किया है कि कैसे राजद्रोह से बचने के लिए बंकिमचंद्र ने मूल प्रतियों में बदलाब किए थे.

गौरतलब है कि इस अनुवाद और तथ्यात्मक विश्लेष्ण के लिए लिपनर को साल 2008 में अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय संस्थान `एसोसिएशन फार एशियन स्टडीज` ने प्रतिष्ठित एके रामानुजम बुक प्राइज फार ट्रांसलेशन से सम्मानित किया गया था. .इसके अलावा लिपनर ने कई किताबें हिन्दू धर्म और दर्शन पर लिखी हैं जिनमे 1989 में प्रकाशित किताब  `हिंदू नैतिकता पवित्रता गर्भपात और इच्छा मृत्यु` काफी लोकप्रिय हुई थी.

पहली बार कहानी जब `बंगदर्शन` में छपी थी तब उनके निशाने पर मुसलमान और अंग्रेज दोनों थे. जिनके लिए क्रमश `नेरे` और `आशरे` संबोधन इस्तेमाल किए गए थे. लेकिन जैसे ही यह उपन्यास की शक्ल में आया तो बंकिमचंद्र ने ब्रिटिश विरोधी कई अंश हटा दिए थे या फिर उन्हें यानी ब्रिटिश सैनिकों को मुग़ल नबाब के सैनिकों में तब्दील कर दिया था. आजकल के कई भगवा नेताओं का एक प्रिय शब्द क्रोनोलाजी है. उन्हें एक बार आनंद मठ और बंकिमचंद्र चटर्जी की क्रोनोलाजी पर भी नजर डालकर अपनी गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए. .

बंकिमचंद्र 1858 से लेकर 1891 तक बतौर डिप्टी मजिस्ट्रेट ब्रिटिश हुकूमत के वफादार अधिकारी रहे जिसके एवज में उन्हें सितम्बर 1881 में प्रमोशन देते असिस्टेंट सेकेट्री बना दिया गया था जो किसी भी भारतीय अधिकारी के लिए किसी असाधारण उपलब्धि से कमतर बात नहीं मानी जाती थी. लेकिन अचानक ही जनबरी 1882 में उन्हें असिस्टेंट सेक्रेटरी के पद से हटाते वापस डिप्टी मजिस्ट्रेट पद पर धकेल दिया गया था. प्रशासनिक भाषा में इसे रिवर्ट करना कहा जाता है .तब उन पर सस्पेंशन का खतरा भी मंडरा रहा था.

ऐसा कुछ होता इसके पहले ही उन्होंने आनंद मठ के 1882 के संस्करण में ब्रिटिश विरोधी सामग्री व प्रसंग हटा दिए. इतना ही नही उन्होंने सरकार की खुशामद और शान में तारीफों के कसीदे भी गढ़ दिए. जिनकी झलक सत्यानन्द और उसके रहस्मय गुरु की पहली और आखिरी बातचीत में साफ़ साफ़ नजर आती है. उन्होंने बंगाल प्रांत के पहले गवर्नर वारेन हेंस्टिग्स की तुलना उगते हुए सूरज से कर डाली थी. और तो और मुस्लिम विरोधी प्रसंग और सामग्री आनंद मठ में जोड़ दी थी. इससे ब्रिटिश हुकुमत ने खुश होकर उन्हें उनके रिटायर्मेंट के साल 1891 में राय बहादुर के ख़िताब से भी नवाजा था.

मेहरबानियो के इस सिलसिले की दूसरी किश्त 1894 में उन्हें सीआईई ( कम्पेनियन आफ द मोस्ट एमिनेंट आर्डर आफ द इंडियन एम्प्लायर ) सम्मान भी दिया गया था. यह सम्मान अभिजात्य भाषा में कहें तो उन ब्रिटिश और भारतीय अधिकारीयों को दिया जाता था जिन्होंने भारत में रहते ब्रिटिश हुकुमत के लिए असाधारण वफादार और लम्बी सैन्य या प्रशासनिक सेवाए दी हों. कोई वजह यह न सोचने की नहीं कि जिस अधिकारी को एक वक्त में लगभग गद्दार करार देते बर्खास्त करने की सुगबुगाहट थी उसी पर इतनी मेहरबानियों की असल वजह क्या रही होगी. .

कई और एतिहासिक दस्तावेजी प्रमाण भी बताते हैं कि संतान या सन्यासी विद्रोह ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ हिन्दू नागा सन्यासियों और मुस्लिम मदरिया फकीरों का संयुक्त आंदोलन था. जिसमे मजनू शाह और मूसा शाह जैसे फ़कीर भी शामिल थे. ब्रिटिश हुकुमत की काररवाई से बचने की गरज से बंकिमचंद्र ने इस विद्रोह को पूरी तरह हिन्दू सन्यासी बनाम मुस्लिम शासक कर दिया.

मीडिया में बंकिम और मठ

तब मीडिया का मतलब कुछ इनेगिने अंग्रेजी और बंगला अख़बार ही हुआ करते थे. जिनमे से कई तो वाकई में निष्पक्ष और निर्भीक थे. यह बात बंकिमचंद्र और आनंद मठ के विवाद पर  उनकी राय से साबित भी होती है..तत्कालीन अंग्रेजी अख़बार `द स्टेट्समेन` ने बंकिमचंद्र के डिमोशन को नस्लीय करार देते सख्त भाषा में विरोध दर्ज कराया था. हैरत की बात यह कि इस अख़बार के संस्थापक, संपादक और प्रकाशक राबर्ट नाईट नाम के एक अंग्रेज ही थे जो ब्रिटिश हुकूमत की गलत नीतियों और भेदभाव पर बेबाकी से कमेंट्स किया करते थे . द स्टेट्समेन कोलकता सहित देश के कुछ प्रमुख शहरों से आज भी प्रकाशित होता है.

यह हिंदी पत्रकारिता का बचपन था. लेकिन तब के राष्ट्रवादी तेवरों के लिए जाने पहचाने जाने बाले प्रमुख बंगला अख़बार अमृत बाजार पत्रिका ( आनंद बाजार पत्रिका नहीं ) ने भी ब्रिटिश सरकार की इस बाबत छिलाई की थी कि बंकिमचंद्र के साथ सौतेला प्रशासनिक बर्ताव किया जा रहा है. और उन्हें तंग करने की गरज से बार बार उनका तबादला एक से दूसरे जिले में कर दिया जाता है. तब के ही एक और राष्ट्रवादी बंगाली साप्ताहिक `सोमप्रकाश` ने भी बंकिमचंद्र के समर्थन में लेख लिखे थे. इसके मुताबिक एक काबिल और होनहार भारतीय अधिकारी को इसलिए दबाया जा रहा है कि अंग्रेज उसकी साहित्यिक लोकप्रियता और बौद्धिक क्षमताओं से डरते हैं.

लेकिन मीडिया का एक और वर्ग भी था जिसने बंकिमचंद्र के पाला बदलने और मुस्लिमों के खिलाफ लगभग आपत्तिजनक शब्द और संवाद इस्तेमाल करने पर तीखी आलोचना की थी..ऐसा ही एक संवाद देखें. भवानंद दीक्षा के वक्त महेंद्र से यह भी कहता है कि जब तक हम इन व्यसन में डूबे लंबी दाढ़ी बालों को बाहर नहीं खदेड़ देते तब तक हिन्दू धर्म का बचना नामुमकिन है.

बंगला से ही प्रकाशित होने बाले प्रतिष्ठित और लोकप्रिय अख़बार `संवादप्रभाकर` ने लिखा था कि इतिहास के सन्यासी विद्रोह में जब हिन्दू मुस्लिम दोनों शामिल थे तब बंकिम बाबू ने आनंद मठ में केवल एक वर्ग को ही खलनायक क्यों बनाया. द स्टेट्समेन और आनंद बाजार पत्रिका भले ही बंकिमचंद्र के ब्रिटिश सरकार के सामने झुकने से या समझौता कर लेने पर कन्नी काट गए हों क्योंकि बंकिमचन्द्र का नाम भी तब के लोकप्रिय लेखकों में शुमार होने लगा था. लेकिन `संवाद प्रभाकर` जैसे पुराने और प्रतिष्टित अख़बारों ने लगातार काफी हल्ला मचाया था जिसके चलते भद्र और उदारवादी बंगाली समुदाय बंकिमचंद्र को कटघरे में खड़ा करने लगा था

कोलकाता से ही उर्दू और अंग्रेजी में प्रकशित होने बाले अख़बार `मुसलमान` ने भी आनंद मठ पर एतराज जताते हुए लिखा था कि उपन्यास में बंगाल के मुस्लिम शासकों और नबाब के सिपाहियों को जिस तरह विदेशी और अत्याचारी दिखाया गया है, वह एतिहासिक रूप से गलत है और दोनों समुदायों के बीच दूरी बढ़ाता है.

`सुधाकर` और `मिहिर ओ सुधाकर` 1880 और 1890 के लोकप्रिय बंगाली मुस्लिम अख़बार थे जिन्होंने बंकिमचंद्र के नए नेरेटिव की बहुत स्पष्ट निंदा की थी. इनके मुताबिक बंकिम बाबू ने इतिहास के सन्यासी – फ़कीर विद्रोह में मजनू शाह जैसे फकीरों की कुर्बानी को पूरी तरह गायब ही कर दिया है. रवींद्रनाथ टेगोर की बहन स्वर्णाकुमारी देवी द्वारा संपादित मासिक साहित्यिक पत्रिका` भारती` में भी बंकिमचंद्र की कुछ रचनाओ के उप – हिन्दू राष्ट्रवाद की परिभाषा की अप्रत्यक्ष रूप से आलोचना करते टिप्पणी की गई थी कि इसे समावेशी होनी चाहिए न कि एक समुदाय पर केंद्रित होनी चाहिए.

प्रसंगवश यह जानना भी उपयोगी है कि आनंद मठ और वंदे मातरम सहित और भी कई मुद्दों  को लेकर भी रवींद्रनाथ टेगोर और बंकिमचंद्र में विकट के मतभेद थे. वावजूद इसके कि टेगोर उन्हें अपना साहित्यिक गुरु मानते थे. एक बड़ा फसाद उनके बीच यह था कि बंकिमचंद्र अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में घोषित रूप से पारम्परिक सनातनी हिन्दू हो गए थे. लेकिन टेगोर परिवार ब्रह्म समाज को मानत्ता था जो मूर्ति पूजा और कर्मकांडों के खिलाफ था.

एक सबक वर्तमान के लिए

यह आज ही की तरह सत्ता के सामने नतमस्तक लेखकीय और प्रकाशकीय स्वार्थ , चापलूसी और डर की इंतिहा थी जिसके चलते मूल आनंद मठ लुप्त सा हो गया और उसकी जगह धार्मिक नफरत ने ले ली जो आज तक बरक़रार है. मोदी राज में तो यह इफरात से फलफूल रही है. हालिया वंदे मातरम विवाद के मद्देनजर देखें तो लिपनर ने उस पर भी रौशनी डाली है. बकौल लिपनर वंदे मातरम के जरिए बंकिमचंद्र ने देश या राष्ट्र का हिंदू मूर्तिपरक रूप गढ़ा था. इस गीत में संतान यानी सन्यासी योद्धा केवल अपनी मातृभूमि की वंदना नहीं कर रहे हैं बल्कि वे मातृभूमि को ही साक्षात देवी मानकर उसकी पूजा कर रहे हैं.

आगे लिपनर वही कहते हैं जो कांग्रेस के कोलकाता में ही आयोजित 1937 के अधिवेशन में तत्कालीन नेताओं ने रवीन्द्रनाथ टेगोर की सलाह पर तय किया था कि इस पूरे गीत को दो भागो में बांटकर देखा जाना चाहिए .अब इस पर भी आज के नेताओं, संगठनों और दीगर लोगों को एतराज हो तो उन्हें आनंद मठ पढ़ना ही नहीं चाहिए.

लेकिन लिपनर का ही यह मेसेज एक हद तक सभी के लिए एक बेहतर सबक हो सकता है कि वंदे मातरम एक अत्यंत शक्तिशाली लेकिन विरोधाभासों से भरी कलाकृति है. इससे होने बाले राजनितिक विवादों को तभी सुलझाया जा सकता है जब हम इसके एतिहासिक महत्व को समझें और इसके केवल उन्हीं शुरूआती हिस्सों पर ध्यान केंद्रित करें जो किसी धर्म विशेष के बजाय सिर्फ देश की मिटटी को नमन करते हैं.

यहाँ गौरतलब यही है कि प्रोफेसर जूलियस जे लिपनर भले ही इसाई थे पर वे वामपंथी, दिमागी नक्सली, कांग्रेसी, नास्तिक या तथाकथित टुकड़े टुकड़े गैंग के मेम्बर नहीं थे . हिंदू धर्म का जितना अध्ययन उन्होंने किया और जितनी रिसर्च की थी उतनी हिन्दू धर्म के ही कम लोग करते हैं. Anand Math

 

 

 

 

     

  

 

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