Anand Math: आनंद मठ उतना ज्यादा विवादित उपन्यास है नहीं जितना कि उसे जानबूझकर प्रचारित किया जाता है ताकि इसकी आड़ में राष्ट्रवाद को थोपने की गरज से कुछ भी कहने की आजादी हासिल की जा सके. एतिहासिक तथ्यों के आईने में देखें तो अक्स साफ़ नजर आता है कि बंकिमचंद्र चटर्जी ने तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत के आगे घुटने टेकते राष्ट्रवाद का सौदा या समझौता कुछ भी कह लें कर डाला था. इसके एवज में उन्हें मुकम्मल इनाम भी मिले थे.
सत्यानंद युद्धक्षेत्र से चुपचाप आनंदमठ लौट आते हैं . रात के समय विष्णु मंदिर के आँगन में ध्यानस्थ बैठे होते हैं . तभी उनके गुरु (महात्मा/चिकित्सक) प्रकट होते हैं. सत्यानंद उठकर उन्हें प्रणाम करते हैं.
गुरु: सत्यानंद, आज माघ की पूर्णिमा है.
सत्यानंद: चलिए, मैं तैयार हूँ. पर महात्मन्, मेरा एक संदेह दूर कीजिए. जिस समय मैंने युद्ध करके सनातन धर्म को निष्कंटक कर दिया, उसी समय आप मुझे वापस क्यों बुला रहे हैं.
गुरु: तुम्हारा कार्य सिद्ध हो गया. मुसलमानों का राज्य नष्ट हो गया. अब यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं रहा.
सत्यानंद: मुसलमानों का राज्य तो समाप्त हो गया, पर हिंदू राज्य अभी स्थापित नहीं हुआ.
गुरु: अभी हिंदू राज्य की स्थापना होना नियत नहीं है. तुम्हारे यहाँ रहने से व्यर्थ ही नरहत्या होगी. इसलिए मेरे साथ चलो.
सत्यानंद आँखों में आँसू भरकर कहते हैं—
सत्यानंद: प्रभो , यदि हिंदू राज्य स्थापित नहीं होगा, तो फिर यहाँ कौन राज करेगा.. क्या फिर मुसलमानों का राज्य होगा.
गुरु: नहीं, अब अंग्रेजों का राज्य होगा.
सत्यानंद मातृभूमि की प्रतिमा की ओर मुड़कर हाथ जोड़कर रुँधे गले से कहते हैं—
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