Brain Naxal: प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लालकिले से दिए गये अपने भाषण में कहा कि हथियार वाले नक्सल से हम निपट चुके अब दिमाग़ वाले नकसल से निपटना है. प्रधानमंत्री का यह बयान असल में आरएसएस के पुराने नेरेटिव का हिस्सा है. दिमाग़ वाले लोग आरएसएस की विचारधारा और उस विचारधारा के पीछे की मानसिकता को बखूबी समझते हैं. सवाल यह है कि आरएसएस को इंटेक्चुअल्स से इतनी नफ़रत क्यों हैं?

प्रधानमंत्री मोदी के दिमागी नक्सल वाले बयान का मतलब ये है कि अब सरकार उन तमाम लोगों को भी नक्सली मानेगी जो सवाल पूछते हैं. जो टीचर क्लास में सच पढ़ाता है, जो छात्र फीस बढ़ने पर आवाज उठाता है, जो पत्रकार आंकड़े दिखाकर गलती बताता है, जो वकील कोर्ट में सत्ता की गलत नीतियों के खिलाफ लड़ता है. इन सबको अब दिमागी नक्सल के नाम से बुलाया जाएगा यानी अब बंदूक जरूरी नहीं है, दिमाग होना ही गुनाह बन जाएगा.

जब देश का बुद्धिजीवी वर्ग आरएसएस के साथ नहीं आया तो उसे बदनाम करने की रणनीति अपनाई गई. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो NCRB के आंकड़े बताते हैं कि 2014 से 2023 के बीच UAPA के तहत दर्ज मामलों में 300 फीसदी से ज्यादा इजाफा हुआ है. इनमें से ज्यादातर मामले छात्र, पत्रकार और एक्टिविस्ट पर हैं. 2018 में भीमा कोरेगांव केस में 16 बुद्धिजीवियों को अर्बन नक्सल कहकर जेल में डाला गया. उनमें 83 साल के फादर स्टेन स्वामी भी थे जिनकी जेल में मौत हो गई. अब दिमागी नक्सल शब्द उसी मानसिकता की अगली कड़ी है.

किसी भी देश की तरक्की उसके दिमाग से होती है. डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर, वैज्ञानिक और पत्रकार यही लोग सरकार की गलती पकड़ते हैं और देश को सही रास्ता दिखाते हैं. अगर इन्हीं लोगों को गाली देकर चुप करा दिया जाएगा तो फिर सरकार को टोकने वाला कोई नहीं बचेगा फिर नोटबंदी जैसी गलती होगी, बेरोजगारी बढ़ेगी, पेपर लीक होंगे और जनता सिर्फ ताली बजाती रह जाएगी. कोई भी देश बंदूक से नहीं, दिमाग से तरक्की करता है. जो दिमाग़ वाले होते हैं वही सवाल पूछते हैं और जो सवाल पूछते हैं वही देश के सच्चे पहरेदार होते हैं. अगर दिमाग वाले लोगों को गाली देकर बैकफुट पर डाल दिया जाएगा तो फिर देश किसके भरोसे आगे बढ़ेगा?

आरएसएस को इंटेक्चुअल से चिढ़ क्यों है?

प्रधानमंत्री के दिमागी नक्सल वाले बयान को समझने के लिए आरएसएस और भारत के बुद्धिजीवी वर्ग के 100 साल के रिश्ते को देखना जरूरी है. 1925 में जब आरएसएस की स्थापना हुई तब देश में गांधी, नेहरू और अम्बेडकर के रूप में तीन बड़े इंटेक्चुअल इंस्टिट्यूशन मौजूद थे. तीनों इतिहास की समझ रखते थे, देश की मूल समस्यायों पर बात करते थे, सवाल पूछते थे, बहस करते थे और नई सोच के साथ देश को आगे बढ़ाने की बात करते थे. गांधी के पास नैतिक राजनीति की दिशा थी और इस दिशा में उनके साथ जनता के मुद्दे थे, नेहरू के पास विज्ञान, उद्योग और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद का मॉडल था और अंबेडकर के पास सामाजिक न्याय और संवैधानिक लोकतंत्र का रोडमैप था.

गांधी नेहरू और अम्बेडकर ने मिलकर आधुनिक भारत की नींव रखी और तीनों की बौद्धिकता से देश का संविधान बना, IIT बने, बड़े-बड़े अस्पताल और कारखाने बने. आजादी के बाद शुरुआती 20 साल में ही भारत में 12 बड़े वैज्ञानिक संस्थान और 16 IIT-NIT बने लेकिन इन सभी संस्थाओं के निर्माण में आरएसएस का कोई बौद्धिक योगदान नहीं रहा बल्कि आरएसएस ने तो इनमें से कई संस्थानों का विरोध ही किया.

आरएसएस की सबसे बड़ी दिक्कत यही रही है कि वहाँ हमेशा से इंटलेक्ट शून्य रहे हैं. शुरुआत से ही दिमाग़ वाले लोगों की आरएसएस से दूरी रही हैं इसलिए देश के बौद्धिक वर्ग को आरएसएस ने हमेशा दुश्मन ही माना है. आरएसएस और बुद्धिजीवी लोगों के बीच की दूरी आजादी से पहले से चली आ रही है. शुरुआत से संघ का काम था शाखा लगाना, एक जैसी वर्दी पहनना और एक ही तरह की बात कहना. वहां क्यों पूछने की जगह नहीं थी इसलिए देश के बड़े लेखक, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री और इतिहासकार कभी भी आरएसएस के पाले में नहीं गये. आरएसएस ने खुद को किताबों और रिसर्च से दूर रखा और सिर्फ रीति-रिवाज और हिंदुत्व के नारे तक सीमित रह गया. नतीजा यह हुआ कि देश का दिमाग वाला तबका धीरे-धीरे संघ से कटता चला गया.

संघ ने खुद को सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन कहा लेकिन उसने शोध, विश्वविद्यालय और नीति-निर्माण से दूरी बनाकर रखी. नतीजा ये हुआ कि देश के बड़े इतिहासकार, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक और लेखक स्वाभाविक रूप से संघ की विचारधारा से दूर हो गये. भारत के जितने भी नोबेल पुरस्कार विजेता हुए सीवी रमन, हरगोविंद खुराना और अमर्त्य सेन इनमें कोई भी आरएस की पृष्ठभूमि से नहीं आया.

लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा आरएसएस बन गई

संविधान के अनुच्छेद 19 में हर नागरिक को बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी दी गई है. सुप्रीम कोर्ट ने भी कई फैसलों में कहा है कि असहमति देशद्रोह नहीं है. विश्व बैंक की 2025 की रिपोर्ट कहती है कि जिन देशों में अभिव्यक्ति की आजादी कम होती है वहां इनोवेशन और रिसर्च में भी गिरावट आती है. भारत में राइट टू स्पीच के लिए बढ़ते खतरों के कारण ही पिछले 5 साल में रिसर्च और इनोवेशन में कोई खासा तरक्की नहीं हुई. आजाद सोच ही नये रास्ते तलाश सकती है और यह स्वतंत्र चिंतन यूनिवर्सिटीज से ही निकलती है लेकिन भारत की हकीकत यह है की पिछले एक पांच सालों से उच्च शिक्षा के लिए पलायन 68 फीसदी बढ़ा है.

सवाल यही है कि एक देश अपने दिमाग से कैसे डर सकता है? 15 अगस्त को हम आजादी के साथ उस संविधान का जश्न मनाते हैं जिसकी प्रस्तावना में ही विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और धर्म की स्वतंत्रता लिखी है. अगर इसी आजादी के दिन विचार करने वालों को गाली दी जाएगी तो यह संविधान का अपमान ही है. यह बुद्धिजीवियों से चिढ़ की घटिया मानसिकता है. आजादी के 80 साल बाद आज भी आरएसएस की असली चुनौती ये है कि 100 साल में भी देश का बौद्धिक वर्ग उनकी सोच से क्यों नहीं जुड़ पाया?

नक्सली आंदोलन के फायदे और नुकसान

हिंसा को किसी भी रूप में जस्टिफाई नहीं किया जा सकता. नक्सल आंदोलन के नाम पर पिछले चार पांच दशकों में सेना, पुलिस और आम लोगों का जमकर खून बहा. भारत के कई राज्यों में नक्सली हिंसा के कारण दशकों तक गांव और जंगल लहूलुहान हुए. विकास थमा, शिक्षा और हेल्थ पर काम नहीं हुआ और डर की वजह से पलायन जारी रहा. पिछले 50-55 साल में नक्सल आंदोलन के नाम पर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार और बंगाल में सेना के जवान, पुलिस और सैकड़ों बेगुनाह आदिवासी-किसानों का खून बहा है. गृह मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 2005 से 2024 के बीच नक्सल हिंसा में 3300 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी और 10000 से ज्यादा आम नागरिक मारे गए.

बूबी ट्रैप, IED और कत्लेआम के इस लाल रास्ते को लोकतंत्र में कोई जगह नहीं दी जा सकती लेकिन इस आंदोलन के कुछ सकारात्मक पहलुओं को नकारा भी नहीं जा सकता. लगभग छह दशक पहले 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के एक छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से जो चिंगारी उठी थी, उसने पूरे भारत की राजनीति और सामाजिक सोच को झकझोर कर रख दिया. इतिहास में इसे नक्सलबाड़ी आंदोलन के नाम से जाना जाता है. यह कोई अचानक हुआ दंगा नहीं था बल्कि यह दशकों के जातिवादी शोषण, भूख और अन्याय के खिलाफ फूटा आम जनता का गुस्सा था. उस समय भारत को आजाद हुए 20 साल हो चुके थे लेकिन गांवों की तस्वीर नहीं बदली थी.

अंग्रेजों के जमाने की जमींदारी प्रथा अब भी जिंदा थी. उपजाऊ जमीन के बड़े-बड़े टुकड़ों पर चंद जमींदारों का कब्जा था और जो लोग सुबह से शाम तक उस जमीन पर खून-पसीना बहाते थे वो खुद भूमिहीन थे. आदिवासी और गरीब किसान बटाईदार बनकर काम करते थे और फसल का बड़ा हिस्सा जमींदार को देना पड़ता था. इसके ऊपर महाजनों का कर्ज था जो ब्याज पर ब्याज लगाकर गरीब को पीढ़ी दर पीढ़ी गुलाम बनाये रखता था. आजादी के बाद भूमि सुधार के कानून कागज पर तो बन गए थे लेकिन प्रशासन और अदालतों में भी जमींदारों का ही बोलबाला था इसलिए गरीब को न थाने में इंसाफ मिलता था और न ही कोर्ट में. इसी घुटन में नक्सलबाड़ी का जन्म हुआ.

इस विद्रोह को आवाज देने वाले कोई बड़े नेता या शहर के लोग नहीं थे. इसे शुरू किया उन लोकल गरीब किसानों, भूमिहीन मजदूरों, चाय बागान में काम करने वाले मजदूरों और संथाल आदिवासियों ने जिनकी रोजी-रोटी और इज्जत दोनों खतरे में थी और जनता के इस गुस्से को तीन लोगों ने दिशा दी. चारु मजूमदार, कानू सान्याल और कन्हाई चटर्जी. ये तीनों उस समय की कम्युनिस्ट पार्टी से नाराज थे. उनका मानना था कि पार्टी संसद और चुनाव की राजनीति में फंसकर अपने क्रांतिकारी तेवर भूल चुकी है इसलिए उन्होंने तय किया कि अब बातचीत से कुछ नहीं होगा. निशाने पर सीधे जमींदार, महाजन और वो सरकारी सिस्टम था जो इस शोषणवादी व्यवस्था को मजबूत कर रहा था.

नक्सलबाड़ी आंदोलनकारियों का सबसे बड़ा नारा यही था कि जो जमीन जोते, उस पर हक उसका हो, जमीन का मालिकाना हक खेती करने वाले को होना चाहिए. वो चाहते थे कि बड़े जमींदारों की बेनामी और जरूरत से ज्यादा जमीन छीनकर उसे भूमिहीनों में बराबर बांट दिया जाए. शुरुआत में ये आंदोलन सिर्फ जमीन और इज्जत की लड़ाई थी लेकिन 3 महीने के अंदर ही पुलिस की गोलीबारी में 11 लोग मारे गए जिनमें 6 महिलाएं और 2 बच्चे शामिल थे इसके बाद राज्य ने इसे कुचलने के लिए पूरी ताकत लगा दी. आंदोलन दब गया लेकिन विचार नहीं मरा. नक्सलबाड़ी से निकली ये सोच अगले 50 साल में देश के 10 राज्यों तक पहुंच गई. इसने सरकार को मजबूर किया कि वो भूमि सुधार, SC-ST एक्ट और वन अधिकार कानून जैसे कदम उठाए.

आज जब लालकिले से दिमागी नक्सल से लड़ने की की गई तो हमें नक्सलबाड़ी को याद रखना होगा. उस आंदोलन की हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता लेकिन उस आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि को भी झुठलाया भी नहीं जा सकता. नक्सलबाड़ी इस बात का सबूत है कि जब लोकतंत्र और कानून गरीब की चौखट तक नहीं पहुंचते तो गुस्सा गाँवो, देहातों और जंगलों की तरफ मुड़ जाता है.

नक्सलबाड़ी को सिर्फ आतंकवाद कहकर उसकी वो जड़ काट दी जा रही है जिसने देश को मजबूर किया कि वो भूमि सुधार कानून बनाए. 1972 में इंदिरा गांधी सरकार ने सीलिंग कानून लाया. SC-ST अत्याचार निवारण कानून 1989 में बना. ये सब नक्सल के दबाव की वजह से हुआ. अगर हम कहें कि आंदोलन में सब गलत था तो हम उन लाखों गरीबों के सवाल को भी गलत कह रहे हैं जो आज भी जमीन और इज्जत से वंचित हैं.

आज दिमागी नक्सल कहकर उन प्रोफेसरों, वकीलों और पत्रकारों को भी निशाने पर लिया जा रहा है जो जल, जंगल, जमीन के मुद्दों पर बात करते हैं ऐसे में आदिवासी की जमीन छिनने पर रिपोर्ट लिखने वाला नक्सल समर्थक हो जाता है, छात्र फीस बढ़ोतरी पर सवाल पूछने वाले अर्बन नक्सल हो जाते हैं, जो सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर सरकार को आईना दिखाते है वो कॉकरोच कहे जाते हैं और जो वकील फर्जी एनकाउंटर पर PIL लगाता है वो देशद्रोही साबित कर दिया जाता है. 1967 का नक्सली जमीन की लड़ाई लड़ रहा था और 2026 का दिमागी नक्सल कलम और कैमरा उठाकर सिस्टम की गलती दिखा रहा है.

हिन्दू राष्ट्रवाद की आड़ में संवैधानिक अधिकारों पर हमला

आरएसएस हिन्दू राष्ट्रवाद की आड़ में सिर्फ ओबीसी, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और औरतों को मिले संवैधानिक अधिकारों को हड़पने की साजिश रचता है. यह विशुद्ध जातिवादी संगठन है जिसका राष्ट्र से कोई लेना देना नहीं. आरएसएस खुद को सांस्कृतिक राष्ट्रवादी संगठन कहता है लेकिन 100 साल के इतिहास को देखें तो उसका सबसे बड़ा फोकस हमेशा सत्ता और संसाधन पर उंची जातियों का कब्जा बना रहे इसी पर रहा है. हिन्दू राष्ट्रवाद का नारा एक खोल है और उस खोल के अंदर असली खेल ओबीसी, दलित, आदिवासी और महिलाओं से उनके संवैधानिक अधिकार छीनने का है इसीलिए यह एक विशुद्ध जातिवादी संगठन ही साबित होता है जिसका राष्ट्र की समता और बंधुत्व से कोई लेना-देना नहीं है.

1949 में जब संविधान सभा में आरक्षण, समान नागरिक संहिता और हिंदू कोड बिल पर बहस चल रही थी तब आरएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर ने 30 नवंबर 1949 के अंक में सीधे लिखा था कि हमारे संविधान में भारतीय कुछ नहीं है, यह मनुस्मृति के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए. मनुस्मृति वही ग्रंथ है जिसमें शूद्र को शिक्षा और संपत्ति से वंचित रखा गया है और औरत को परतंत्र कहा गया है. आजादी के बाद जब अंबेडकर ने हिंदू कोड बिल लाकर महिलाओं को तलाक, संपत्ति और गोद लेने का अधिकार दिया तो आरएसएस ने सड़कों पर उतरकर उसका विरोध किया. नागपुर में 11 दिसंबर 1949 को 10 हजार कार्यकर्ताओं का जुलूस निकला था. जिस दिन दलित-ओबीसी और औरतों को कानून से बराबरी मिली उसी दिन से आरएसएस को दिक्कत शुरू हो गई.

मंडल कमीशन 1990 में लागू हुआ और ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण मिला. उसके बाद से लगातार आरएसएस से जुड़े नेता आरक्षण की समीक्षा और जातिगत आरक्षण खत्म करने वाले बयान देते रहे हैं. 2015 में बिहार चुनाव के समय आरएसएस प्रमुख ने आरक्षण नीति की समीक्षा की बात कही थी. वहीं दूसरी तरफ द्विजों के लिए 2019 में 10 फीसदी वाला EWS आरक्षण लाया गया, जिसे आरएसएस ने सामाजिक न्याय बताया. यानी एक तरफ संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) से मिले ऐतिहासिक बैकलॉग और प्रमोशन में आरक्षण को कमजोर कर दिया और दूसरी तरफ द्विजों के आरक्षण को राष्ट्रहित बता दिया. ये दोगलापन ही साबित करता है कि आरएसएस के लिए हिंदुत्व असल में जातीय वर्चस्व को क़ायम रखने का जरिया है.

कांग्रेस की यूपीए सरकार ने 2006 में वन अधिकार कानून के जरिये आदिवासियों को जंगल पर पहला हक दिया लेकिन आरएसएस ने इस कानून को विकास विरोधी कहा और 2014 में सत्ता में आते ही कॉरपोरेट को जंगल सौंपने के लिए इस कानून को कमजोर करने की कोशिश की. आरएसएस के लिए हिन्दू राष्ट्रवाद राष्ट्र बनाने के लिए नहीं है. ये एक सामाजिक इंजन है जिससे 85 फीसदी आबादी को उनके संवैधानिक हकों से भटकाया जा सके. आरएस का राष्ट्रवाद समस्त भारतीयों का राष्ट्रवाद नहीं है बल्कि यह वर्ण व्यवस्था को दुबारा लागू करने का राष्ट्रवाद है जहां ब्राह्मण-क्षत्रिय-बनिया ऊपर और बाकी सब नीचे रहें, जहां संविधान से मिले वोट, शिक्षा, नौकरी और जमीन के अधिकार धीरे-धीरे खत्म कर दिए जाएं और उसकी जगह सेवा और संस्कार के नाम पर पुरानी गुलामी लौटा दी जाए.

दो भारत आमने-सामने खड़े हो गए हैं

अगर देश का बुद्धिजीवी वर्ग दिमागी नक्सल है जो देश के इतिहास, संविधान, न्याय, बराबरी, समाज और राजनीति की समझ रखता है और इसे स्वस्थ और न्यायपूर्ण बनाने की बात करता है तो फिर आरएसएस क्या है? जिसने सिर्फ देश के इतिहास, संविधान, बराबरी, न्याय, समाज और राजनीति को तोड़ने का ही काम किया है. असल में आज के समय दो भारत आमने-सामने खड़े हो गए हैं. एक भारत वो है जिसमें लोग संघर्ष कर रहे हैं, किताबें पढ़ रहे हैं, इतिहास समझ रहे हैं और देश को संविधान, न्याय, समानता और आजादी की राह पर ले जाना चाहते हैं तो दूसरा भारत वो है जो 100 साल से इसी संविधान, इतिहास और बराबरी के विचार को कमजोर करने में लगा है. अगर पहले वाले भारत को दिमागी नक्सल कहा जाए तो दूसरे वाले को क्या कहा जाएगा?

देश का बुद्धिजीवी वर्ग कहता है कि भारत का इतिहास 5000 साल की बहुलता का इतिहास है. यहां बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, फुले, अंबेडकर, पेरियार सबने समानता और न्याय की बात की है. NCERT की किताबें, ASI के आंकड़े और विश्वविद्यालयों के रिसर्च यही बताते है लेकिन आरएसएस का इतिहास पुराणों की लाइन पर चलता है. हम हिंदू थे, हम गुलाम हुए, अब बदला लेंगे. 1925 में बनी आरएसएस ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया. आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक माधवराव गोलवलकर ने अपनी किताब बंच ऑफ थॉट्स में साफ लिखा है- “भारत में गैर-हिंदू लोगों को या तो हिंदू संस्कृति माननी होगी या देश में दोयम दर्जे के नागरिक बनकर रहना होगा”

फर्क बहुत साफ है. देश का बुद्धिजीवी वर्ग दिमागी नक्सल कतई नहीं है. वो देश का दिमाग है. वो चोट दिखाता है ताकि इलाज हो. वो संविधान बचाता है ताकि लोकतंत्र बचे. वो इतिहास पढ़ाता है ताकि हम गलतियां न दोहराएं. आरएसएस ने 100 साल में एक भी यूनिवर्सिटी, एक भी वैज्ञानिक संस्थान, एक भी सामाजिक आंदोलन खड़ा नहीं किया जो समता पर आधारित हो. आरएसएस ने सिर्फ एक काम किया जो भी संविधान, बराबरी और न्याय की बात करे उसे गद्दार साबित कर दो. अगर सवाल पूछना बीमारी है तो फिर इस देश का इलाज कभी नहीं हो सकता और अगर इतिहास तोड़ना, संविधान को गाली देना और समाज को बांटना राष्ट्रवाद है तो फिर इस देश को ऐसे राष्ट्रवाद से बचाना ही सबसे बड़ा देशभक्ति का काम है.

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...