Cockroach Janata Party Movement: कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) अब अपने आंदोलन को नए चरण में ले जा रही है. सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने छत्रपति संभाजीनगर में दो दिवसीय कोर कमेटी की बैठक के बाद संगठन के भविष्य के रोडमैप का खुलासा किया है. अभिजीत दीपके ने कहा है किसी सीजेपी कोई चुनावी राजनीतिक पार्टी नहीं बनेगी, बल्कि देश के लोकतांत्रिक संस्थानों और शासन में जवाबदेही तय करने के लिए एक मजबूत ‘Public Pressure Group’ के रूप में काम करेगी. संगठन जमीनी स्तर पर काम करेगा.

सीजेपी की कोर टीम में वकील से लेकर सीए, इंजीनियर, पत्रकार जैसे 12 लोग कॉकरोच जनता पार्टी के मिशन को पूरे देश में फैलाने वाले हैं. सीजेपी की तरफ से 800 शहरों में सितंबर माह से आंदोलन का ऐलान कर दिया गया है. अगले छह महीनों में पूरे भारत में सीजीए की राज्य समन्वय समितियों का गठन हो जाएगा. साथ ही साथ लोकसभा और शहर स्तर की समन्वय इकाइयां स्थापित की जाएंगी. इसमें दोराय नहीं कि सीजेपी की कोर टीम भाजपा के लिए बड़ी टेंशन का सबब बनने वाली है जो आने वाले समय में भाजपा की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ाएगी.

अभिजीत दीपके का साफ़ कहना है कि हम धरातल से काम करेंगे क्योंकि जागरूकता वहीं से आती है. सीजेपी का उद्देश्य सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और सरकारों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना है. संगठन स्वयं को एक “पब्लिक प्रेशर ग्रुप” के रूप में विकसित करेगा और गांव, कस्बों, विश्वविद्यालयों, फैक्ट्रियों तथा शहरों के मोहल्लों तक में अपनी सक्रिय मौजूदगी बनाएगा.

अभिजीत दीपक ने जिन 12 लोगों की कोर टीम का ऐलान किया है उनमें सभी उच्च शिक्षा प्राप्त लोग शामिल हैं, जिनकी उम्र 35 साल से कम है. भाजपा के कम पढ़े लिखे, अंधभक्त और उम्रदराज नेताओं पर यह 12 लोग हावी होंगे, इसमें कोई शक नहीं है.

अलगे महीने से सीजेपी की कोर टीम पूरे देश में घूम कर सदस्यता अभियान चलाएगी और इसके साथ ही ‘क्या बोलती पब्लिक’ के नाम से एक कैंपेन चलाकर उससे आम पब्लिक को जोड़ा जाएगा.

सीजेपी कोर टीम के 12 नौजवान सदस्य कौन हैं इस बारे में भी जानकारी देते चलें.

टीम में पहले नंबर पर पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके ही हैं. 30 साल के अभिजीत दीपके महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के एक दलित परिवार से आते हैं. वे डॉ. भीमराव आंबेडकर को अपना आदर्श मानते हैं. दीपके दिल्ली सरकार के एजुकेशन डिपार्टमेंट में कम्युनिकेटिव एडवाइजर की तरह काम कर चुके हैं. वर्ष 2023 में उन्होंने अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी में पब्लिक रिलेशन्स में मास्टर्स के लिए एडमिशन लिया. फिर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत द्वारा बेरोजगार युवाओं को कॉकरोच कहने पर अभिजीत दीपके ने भारत के युवाओं का आह्वान करते हुए कॉकरोच जनता पार्टी बनायी और भारत आ गए उसके बाद जो कुछ भी हुआ वो सब जानते हैं.

कोर टीम में दूसरे नंबर पर हैं आशुतोष रांका, उम्र 30 साल, पार्टी के कोऑर्डिनेटर हैं. जयपुर राजस्थान में जन्मे आशुतोष रांका ने आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग की है. उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स किया है और पढ़ाई पूरी होने के बाद मुंबई और लंदन में नौकरी की. उन्होंने कुछ समय आम आदमी पार्टी के साथ दिल्ली चुनाव में काम भी किया है. आशुतोष ने राजस्थान में शिक्षा, शासन और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली ‘परिवर्तन संगठन’ नामक संस्था भी बनायी. सीजेपी ने जब ग्राउंड मूवमेंट की शुरुआत की तो आशुतोष रांका को राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया गया. सीजेपी का पॉलिसी-मैन इन्हें ही माना जाता है.

तीसरे नंबर पर हैं 27 साल के सौरव दास, जिनकी लड़कियां बड़ी फैन हैं. सौरव भी सीजेपी के कोऑर्डिनेटर हैं. वे नई दिल्ली में जन्मे, एमीटी यूनिवर्सिटी से पत्रकारीता का पढ़ाई की और 18 वर्ष की कमउम्र से ही आरटीआई लगाने लगे. सौरव ने एक खोजी पत्रकार के रूप में करियर की शुरुआत करते हुए हिंदू, अल-जजीरा, द वायर, द कारवां जैसे मीडिया संस्थानों के लिए रिपोर्ट कीं. पूर्व सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ पर सौरभ की एक इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट काफी चर्चित रही थी. सीजेपी ने जब ग्राउंड मूवमेंट की शुरुआत की तो सौरव को मुख्य प्रवक्ता के तौर पर जगह दी गई.

चौथे नंबर पर आते हैं अजयंके शिंदे, ये 35 साल के हैं और सीजेपी के नेशनल ऑर्गनाइजेशन इंचार्ज हैं. अजयंके शिंदे के बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत कम जानकारियां हैं मगर वे काफी समय तक आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं.

इसके बाद आते हैं दीपक बालियान. राजस्थान के किसान परिवार से आने वाले दीपक बालियान 26 साल के हैं और पार्टी के ऑर्गनाइजेशन-इंचार्ज हैं. ग्रासरूट मोबिलाइजेशन यानी की जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने और संख्या बल जुटाने का उन्हें खासा अनुभव है इसलिए जयपुर में सीजेपी के प्रोटेस्ट की जिम्मेदारी उन्हें दी गई थी.

छठे नंबर पर हैं आफरीन नवाज़. 34 साल की आफरीन ने एमबीए किया है. कुछ साल कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी करने के बाद वे छात्रों से जुड़े मुद्दों पर एक्टिव हो गयी थीं. आफरीन जंतर मंतर प्रोटेस्ट में सीजेपी की महिला कोर टीम का हिस्सा थीं.

सातवें नंबर पर हैं विजय रेड्डी मलंगी. मलंगी ने हैदराबाद से सिविल इंजीनियरिंग की है और अमेरिका के कोलंबिया यूनिवर्सिटी से कंस्ट्रक्शन इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट में मास्टर्स किया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ वो तेलांगना में आम आदमी पार्टी के लिए काम कर चुके हैं और चुनाव प्रचार में भी शामिल रहे हैं.

इसके बाद नाम आता है 31 वर्षीय रत्ना सिंह का, जो पेशे से वकील हैं. इन्हें जंतर मंतर के कई वीडियोज में सौरव दास के साथ देखा जाता रहा है. दिल्ली से लॉ की पढ़ाई पूरी करने के बाद कानूनी पत्रकरीता में करियर की शुरुआत करने वाली रत्ना सिंह सीजेपी के कानूनी मुद्दों, पार्टी की मांगों से जुड़े कानूनी पहलू और छात्रों पर हुई एफआईआर के मामले देख रही हैं.

कोर टीम की 29 वर्षीय वैष्णवी गौर को पब्लिक पालिसी और रिसर्च का अनुभव है. वे केंद्र सरकार से जुड़े कई थिंक टैंक और संस्थानों में काम कर चुकी हैं. सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान वैष्णवी मीडिया से बातचीत में काफी एक्टिव रही हैं.

10वां नाम रोहन देशपांडे का है, जिनके बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है और 11वें नंबर पर हैं अंकित भारद्वाज. दिल्ली में जन्में अंकित पेशे से सीए हैं. सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरों के मुताविक वो भी आम आदिमी पार्टी से जुड़े रहे हैं.

कोर टीम के 12वें सदस्य हैं अमूल्य धवन, जो अशोका विश्वविद्यालय के छात्र हैं. अमूल्य मीडिया, नीति और शासन से जुड़े काम में रुचि रखते हैं और जंतर मंतर आंदोलन की युवा तथा वैचारिक आवाज के रूप में सक्रिय रहे हैं.

अपनी कोर टीम के गठन के बाद पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने साफ़ कर दिया है कि वे कोई पोलिटिकल पार्टी बनाने नहीं जा रहे हैं. बल्कि बतौर प्रेशर ग्रुप काम करेंगे. गौरतलब है कि प्रेशर ग्रुप ऐसे संगठन होते हैं जो खुद कोई चुनाव नहीं लड़ते, लेकिन सरकार और नेताओं पर बाहरी दबाव डाल कर अपनी मांगें मनवाते हैं. मिसाल के लिए भारतीय किसान यूनियन, मजदूर संघ, बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड वगैरा. जिस प्रकार यह तमाम अलग अलग संस्थाएं समय समय पर अपनी नीतियों और उद्देश्यों के तहत सरकार के ऊपर प्रेशर ग्रुप की तरह काम करती हैं, वैसा ही कुछ कॉकरोच जनता पार्टी भी करेगी.

सीजेपी संस्थापक का कहना है कि अभी वो राजनीति में इसलिए नहीं आना चाहते हैं क्योंकि देश में विपक्षी दलों के लिए माहौल ठीक नहीं है. उन पर ईडी, सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों का गलत इस्तेमाल किया जाता है. चुने गए नेताओं की खरीद-फरोख्त होती है और सिस्टेमेटिक तरीके से राजनीतिक पार्टियों को तोड़ा जाता है. ऐसे समय में यदि हम भी राजनीति में आएंगे तो खुद को बचाते ही रहेंगे, जमीन पर कोई काम नहीं कर पाएंगे. अभिजीत शायद आम आदमी पार्टी का हश्र देख कर ऐसा कह रहे हैं, जो जनता के बहुत सारे मुद्दों पर काफी गंभीरता से काम करने की इच्छुक थी, मगर भाजपा नेतृत्व ने तमाम केंद्रीय जांच एजेंसियों को आप नेताओं के पीछे लगा कर पूरी पार्टी को मटियामेट कर डाला.

सीजेपी ने जिस प्रकार जंतर मंतर पर पेपर लीक और ध्वस्त एजुकेशन सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाकर सरकार को घुटनों पर झुकाया है, उससे यह तो साफ़ है कि आने वाले वक्त में यह प्रेशर ग्रुप के तौर पर एनडीए को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है. स्पेशलिस्ट कहते हैं कि सीजेपी के प्रेशर से सरकार पर दबाव बढ़ेगा और इससे विपक्ष का काम आसान हो जाएगा. वह भाजपा को चुनावी नुकसान पहुंचा पाएगी. सीजेपी के साथ भी विपक्षी दलों का सपोर्ट है ही, क्योंकि बिना राजनीतिक सपोर्ट के कोई आंदोलन चलाना बहुत मुश्किल होता है.

सीजेपी सितंबर से अपना एक कैंपेन चलाने वाली है जिसका नाम रखा गया है ‘क्या बोलती पब्लिक’. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मन की बात’ के ठीक उलट अब पब्लिक के मन की बात जब सोशल मीडिया पर खुल कर आएगी तो निश्चित ही केंद्र की सत्ता हिलती दिखाई देगी.

‘क्या बोलती पब्लिक’ कैंपेन के तहत जगह जगह पर लोगों को इकट्ठा किया जाएगा. मेम्बरशिप प्रोग्राम भी चलाया जाएगा और सड़कों पर लोगों के मुद्दों को उठाया जाएगा. शुरू में कोई 800 शहरों में कॉकरोच जनता पार्टी इस कैंपेन के साथ जमीन पर काम करेगी, जो भाजपा के लिए काफी चिंता का विषय है.

गौरतलब है कि आने वाले कुछ ही समय में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चुनाव होने वाला है. अगले साल गुजरात का भी चुनाव होना है, जिसका मतलब यह है की भाजपा के लिए जो सीटें, जो जगहें और जो राज्य बहुत जरूरी हैं वहां पर चुनाव होने वाले हैं और चुनाव से पहले अगर जमीन पर कॉकरोच जनता पार्टी प्रदर्शन करती है, लोगों के मुद्दों को उठाती है, तो भाजपा के लिए यह बड़ी परेशानी का सबब बनेगा.

सीजेपी लोगों को जागृत करेगी, मुद्दों को उठाएगी, सरकार के सामने रखेगी और सरकार पर प्रेशर बनाएगी. अगर ये सारी चीजें शुरू हुईं तो भाजपा के लिए प्लान बनाने और उन्हें एक्जिक्यूट करना बहुत मुश्किल हो जाएगा क्योंकि भाजपा जिस तरीके से अब तक चुनाव लड़ती आयी है – लोगों को मुद्दों से भटका कर, हिन्दू-मुस्लिम करके या उन्हें दूसरी चीजों में उलझाकर, कॉकरोच जनता पार्टी वो होने नहीं देगी. कॉकरोच जनता पार्टी लोगों को एक मुद्दे पर बांध कर रखेगी और भाजपा के जितने प्रोपेगेंडा होंगे वो निश्चित ही उसके आगे फेल होते नजर आएंगे, जैसा कि जंतर मंतर पर देखने को मिला है.

दूसरी बात यह कि अगर कॉकरोच जनता पार्टी यदि कल को चुनाव में उतरती है और अगर वह विपक्ष के साथ खड़ी हो जाती है तो भी भाजपा के लिए समय कठिन होगा. भाजपा बड़ा नुकसान झेलेगी.

मगर मौजूदा वक्त में स्थिति यह है की कॉकरोच जनता पार्टी पूरी प्लानिंग से अलग अलग जगहों पर प्रदर्शन की तैयारी कर रही है. कोर कमेटी की बैठक के बाद अभिजीत दीपके ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऑनलाइन मेंबरशिप ड्राइव भी शुरू करने का ऐलान किया है और युवाओं, छात्रों, श्रमिकों व नागरिकों से जुड़ने की अपील की है. सीजेपी संस्थापक ने यह भी साफ़ किया कि ये संगठन किसी भी प्रकार का फंड या क्राउडफंडिंग स्वीकार नहीं कर रहा है.

सीजेपी द्वारा देश भर में गांवों-कस्बों तक अपनी इकाइयां स्थापित करने की घोषणा ने सबसे अधिक राजनीतिक जिज्ञासा पैदा की है. देखा जाए तो यह तरीका बिलकुल वैसा ही नजर आता है जैसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) ने खुद को विस्तार देने के लिए अपनाया था.

भारत के राजनीतिक इतिहास में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मॉडल इसी रूप में देखा जाता है कि उसने स्वयं चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन दशकों तक समाज में शाखाओं, स्वयंसेवकों और वैचारिक नेटवर्क के माध्यम से ऐसा संगठन खड़ा कर लिया, जिसने आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी को व्यापक सामाजिक आधार उपलब्ध कराया. यह किसी से छुपा नहीं है कि आरएसएस और भाजपा के बीच गहरे वैचारिक और संगठनात्मक संबंध हैं. भाजपा के नब्बे फ़ीसदी नेता आरएसएस की जमीन से उपजे हैं. आज देश की सत्ता जो भातीय जनता पार्टी के हाथ में है, दरअसल उसे संघ अपनी छड़ी से हांक रहा है.

गौरतलब है यदि सीजेपी वास्तव में देशभर में स्थानीय स्तर पर अपनी सक्रिय इकाइयां खड़ी करने में सफल होती है, तो उसका प्रभाव जनमत पर निश्चित रूप में पड़ेगा. लोकतंत्र में अक्सर संगठित जन-दबाव सरकारों को अपने फैसले बदलने पर मजबूर करता है. ऐसे संगठनों की ताकत विधानसभा या संसद में नहीं, बल्कि सड़क, अदालत, मीडिया और जनमत के बीच बनती है.

किसी भी स्थापित राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती कोई नया चुनावी दल नहीं होता, बल्कि ऐसा सामाजिक संगठन होता है जो लगातार जनता के बीच मौजूद रहे, स्थानीय मुद्दों को उठाए, सरकारों से सवाल पूछे और नागरिकों को संगठित करे. यदि कोई संगठन यह क्षमता विकसित कर लेता है कि वह बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार, पर्यावरण, स्थानीय प्रशासन या नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों पर बड़ी संख्या में लोगों को एकजुट कर सके, तो उसका प्रभाव चुनावी राजनीति से कहीं आगे जा सकता है.

यही कारण है कि ऐसे संगठनों को लेकर राजनीतिक दल अक्सर सतर्क रहते हैं. यदि सीजेपी का संगठनात्मक विस्तार उसकी घोषित योजना के अनुरूप होता है, तो वह केवल भाजपा ही नहीं बल्कि अन्य दलों के लिए भी एक नई राजनीतिक और सामाजिक चुनौती बन सकता है.

भारतीय लोकतंत्र में इतिहास गवाह है कि जिन संगठनों ने लंबे समय तक समाज के बीच काम किया, उन्होंने अंततः राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित किया है. चाहे वह किसान आंदोलन हों, छात्र संगठन हों, श्रमिक संगठन हों या वैचारिक संस्थाएं, उनकी शक्ति चुनावी परिणामों से पहले जनमत निर्माण में दिखाई देती है.

ऐसे में यदि सीजेपी की सदस्यता, स्थानीय समितियां और जनसंपर्क अभियान तेजी से आगे बढ़ते हैं, तो राजनीतिक दलों को जनता के बीच अपनी सक्रियता और जवाबदेही दोनों बढ़ानी पड़ सकती है. भारतीय जनता पार्टी और उससे भी ज्यादा संघ सरचालक मोहन भागवत सीजेपी के बढ़ते प्रभाव से चिंतित हैं और इसी चिंता ने उन्हें भी जेन-जी से वार्तालाप करने के लिए मजबूर किया है. Cockroach Janata Party Movement

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