हरेक संतान की स्वभाविक इच्छा होती है कि जिन पेरेंट्स ने दुनिया भर के त्याग और समझौते कर अपनी इच्छाओं और जरूरतों को दरकिनार कर हमारी बेहतर से बेहतर परवरिश की वे अपने जीवन की शाम यानी वृद्धावस्था हमारे साथ गुजारें जिससे हम उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर सकें. उनकी अशक्तता के दिनों में उन्हें तमाम सहूलियतें मुहैया करा सकें . इस ख़ूबसूरत जज्बे को बहुत छोटी लेकिन अहम एहतियात बरतते कैसे पूरा किया जा सकता है यहाँ पढ़िये –
वह दौर सिर्फ अधेड़ या उनसे भी पहले की पीढ़ी की यादों में ही बचा है जब परिवार संयुक्त होते थे. जिनमे बुजुर्ग पेरेंट्स की सेवा शुमार और देखभाल के लिए अलग से कुछ खास नहीं करना पड़ता था. हर काम की तरह यह जिम्मेदारी भी शेयर हो जाती थी. एक माँ बाप की तीन चार या उससे भी ज्यादा संताने होती थीं और अधिकतर घरों एक सदस्य जो आमतौर पर अविवाहित होता था और करने के नाम पर कुछ नहीं करता था लेकिन जो करता था उसकी कीमत और अहमियत घोषिततौर पर कुछ करने बालों से कमतर नहीं होती थी
दुनिया भर की नाते रिश्तेदारी निभाना, धरम करम के काम करना, शादी ब्याह रसोई जैसे फंक्शनो में हलवाई के पास भट्टी पर बैठकर पकवान बनबाना ,मवेशियों की देखभाल करना , खेती किसानी और व्यापार और कारोबार अगर कोई हो तो उसकी निगरानी करने के अलावा बूढ़े माँ बाप की सेवा की महती जिम्मेदारी भी इसी सदस्य के हिस्से में आती थी. इन कामों के लिए उसे इज्जत भी मिलती थी और कीमत भी मिलती थी. एक तरह से वह घर का सेकंड बॉस या सीईओ होता था.
अब ऐसे लोग और परिवार ढूंढे से नहीं मिलते क्योंकि दौर न्यूक्लियर फेमिलीज का है जिनमे पेरेंट्स की एक या दो संताने ही होती हैं और वे भी ज्यादातर घर से दूर किसी शहर में जॉब कर खासा कमा रही होती हैं. इन संतानों के सर एक बड़ी जिम्मेदारी टेंशन की शक्ल में पेरेंट्स की सेवा है. पेरेंट्स दूर रहें या साथ रहें इस पीढ़ी के पास इतना वक्त ही नहीं कि खुद 24 X 7 उनकी सेवा कर पाए. जबकि उसमे पेरेंट्स के लिए कुछ करने का जज्बा कम नहीं है.
अब हो यह रहा है कि जब तक पेरेंट्स बीमार और अशक्त नहीं हो जाते तब तक संतानों के पास स्थाई रूप से रहने नहीं जाते वजह उन्हें किसी सहारे या सेवा की जरूरत नहीं पडती. और उन्हें वहीँ अच्छा लगता है जहाँ वे सालों से रह रहे होते हैं.
बच्चे भी अपने काम धाम में लगे और घर गृहस्थी व नौकरी में डूबे यह सोचते रहते हैं कि आखिर, आखिर में मम्मी पापा को आना और रहना तो हमारे पास ही है इसलिए जैसी उनकी मर्जी. लेकिन जब आ जायेंगे तो हम उनका बहुत ख्याल रखेंगे , सारी दुनिया की खुशियाँ और सुख सुविधाएँ उनके कदमो में डाल देंगे. उन्होंने कितनी परेशानियाँ उठाकर और त्याग कर हमारी परवरिश की है, पढ़ाया लिखाया और इस काबिल बनाया है यह हम कैसे भूल जाएँ .
पहले से ही ध्यान रखें
आजकल के बुजुर्ग पेरेंट्स आमतौर पर संतानों से बहुत ज्यादा अपेक्षाएं नहीं रखते क्योंकि वे जानते समझते हैं कि पैसा कमाना अब पहले सा आसान नहीं रहा. दूसरे महंगाई बहुत बढ़ गई है, टाइम का भी उन्हें एहसास है कि इस पूरी पीढ़ी को जरूरत से ज्यादा मेहनत करना पड़ रही है. इसलिए वे अपने पेरेंट्स की तरह बहुत ज्यादा डिमांडिंग, उपद्रवी या जिद्दी नहीं होते. ऐसे में दिक्कत तब खड़ी होती है जब वे बीमार और अशक्त हो जाते हैं.
धनबाद झारखंड के 36 वर्षीय शेखर रंजन पुणे की एक साफ्टवेयर कम्पनी में 48 लाख रु सालाना के पैकेज पर नौकरी करते हैं. पत्नी रीना का पैकेज भी 30 लाख रु सालाना का है. अब से कुछ महीने पहले ही सरकारी नौकरी से रिटायर हुए पापा को दिल का हल्का सा दौरा पड़ा तो शेखर घबरा उठा और भागा भागा धनबाद पहुंचा. एक हफ्ता बाद पापा को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. लेकिन डाक्टर्स की हिदायतें सुन उसे महसूस हुआ कि अब पापा मम्मी का यहाँ रहना महफूज नहीं क्योंकि उनकी देखभाल करने बाला कोई नहीं. और जो हैं उनके होने न होने के कोई माने नहीं.
लिहाजा वह जिद कर पेरेंट्स को पुणे ले गया. पिछले साल ही उसने एक करोड़ का बेंक लोन लेकर चौथे माले पर दो बेडरूम और एक हाल बाला एमआईजी फ्लेट लिया था जिसके दूसरे कमरे में उसने मम्मी पापा को शिफ्ट कर दिया. अभी तीन महीने ही हुए थे कि पापा बाथरूम में फिसल गए. वह तो अच्छा था कि कोई बड़ी गंभीर चोट उन्हें नहीं आई नहीं तो लेने के देने पड़ जाते. जब सीटी स्केन रिपोर्ट में कुछ नहीं निकला तब ही शेखर और रीना की जान में जान आई
लेकिन इस हादसे से उन्हें कई सबक एक साथ मिले और उन्हें महसूस यह भी हुआ कि बुजुर्ग पेरेंट्स का कमरा कुछ खास अटेंशन और गजट्स सहित और भी बहुत कुछ चाहता है जिससे पेरेंट्स सुरक्षित रहें. शेखर और रीना की तरह हरेक कपल को यह मालूम होना बहुत जरुरी है कि बुजुर्ग पेरेंट्स का कमरा कैसा हो उसमे क्या क्या हो और क्या क्या न हो.
आजकल रियल एस्टेट डेवलपर कंपनियां जैसे डीएलएफ़ बगैरह इस जरूरत को समझते मकान कुछ इस तरह प्लान और डिजायन कर रही हैं जिनमे सीनियर सिटीजंस का कमरा कुछ अलग खास तरीके से बनाया जाता है. जिनके पास इस तरह का कमरा नहीं है वे संताने भी बहुत कम खर्च में पेरेंट्स का कमरा मोडिफाई कर सकती हैं. आइये देखें कि बुजुर्ग पेरेंट्स का कमरा कैसा हो जिसमे उनके गिरने पड़ने का जोखिम न के बराबर हो और उनकी उम्र व जरूरतों के मुताबिक सहूलियतें ज्यादा से ज्यादा हों.
बुजुर्ग पेरेंट्स का ज्यादातर समय उस कमरे में गुजरता है जो उन्हें मिलता है.इस कमरे पर खास ध्यान संतानों को देना चाहिए –
पलंग और मेट्रेस
– पलंग बहुत ज्यादा ऊँचा या बहुत ज्यादा नीचा नहीं होना चाहिए इससे पेरेंट्स को चढ़ने उतरने में असुविधा होती है आमतौर पर पलंग की ऊंचाई लगभग दो से ढाई फीट होना चाहिए या फिर पेरेंट्स की हाईट के हिसाब से उनकी कमर तक होना चाहिए.
पलंग की ऊंचाई इतनी हो कि जब बुजुर्ग उस पर बैठें तो उनके दोनों पैर पूरी तरह जमीन पर टिकें और घुटने 90 डिग्री का कोण बनाएं.
पलंग की लम्बाई उनकी हाईट के मुताबिक 5 से 6 फीट ठीक रहती है .
– पलंग के किनारे या कोने गोल होने चाहिए जिससे बुजुर्गों के गिरने या चोट लगने का खतरा कम हो
अगर पेरेंट्स को नींद में गिरने जैसी समस्या हो तो पलंग के किनारों पर ग्रिल या रेलिंग लगाना चाहिए.
मेट्रेस
– पलंग पर ग़द्दा बहुत ज्यादा नर्म या बहुत ज्यादा सख्त भी नहीं होना चाहिए. आजकल मेट्रेस बनाने बाली बड़ी और नामी कम्पनियां ओर्थोपेडिक गद्दे बनाने लगी हैं. इन गद्दो को कुछ इस तरह डिजायन किया जाता है जिससे बुजुर्गों की रीढ़ की हड्डी सीधी रहे व जोड़ों में दर्द न हो. मेट्रेस की दुनिया की जानी मानी कम्पनी द स्लीप जापानी स्मार्टग्रिड तकनीक से ऐसे गद्दे बनाने के लिए मशहूर है जिनमे ओर्थो रिलीफ फोम का इस्तेमाल किया जाता है. इस कंपनी के ब्रांड एम्बेसडर अभिनेता अनिल कपूर हैं इन गद्दों की कीमत पलंग के साइज़ के मुताबिक 20 हजार से लेकर 30 हजार रु तक होती है.
.आजकल नेचुरल लेटेक्स गददे भी चलन में हैं जिनकी खूबी यह होती है कि उनमे प्राकृतिक लचीलापन और उछाल होता है क्योंकि ये रबर के पेड़ के प्राकृतिक दूध से बने होते हैं. इसलिए इन पर लेटना, करवट बदलना और बिस्तर से खड़े होना आसान होता है. वेकफिट, स्लीपकेट और फ्लो मेट्रेस कंपनियां नेचुरल लेटेक्स गददे बनाने के लिए खासतौर से जानी जाती हैं.
स्लीपकेट तो दस साल की वारंटी सहित सौ रात की फ्री ट्रायल की भी सहूलियत देती है. यानी पेरेंट्स इसमें कम्फर्ट फील न करें तो आप ग़द्दा वापस कर सकते हैं. इन गद्दों की कीमत साइज़ व मोटाई के हिसाब से 10 से 35 हजार रु तक होती है
जो पेरेंट्स कंधों , पीठ दर्द या कूल्हों के दर्द से गुजर रहे हों उनके लिए मेमोरी फोम गददे बेहतर होते हैं. वेकफिट कंपनी का मेमोरी फोम ग़द्दा 7 से 15 हजार रु में मिल जाता है ड्यूरोफ्लेक्स कंपनी का इसी तरह का गद्दा 10 हजार से लेकर 26 हजार रु तक में मिल जाता है. इस कंपनी का दावा है कि उनका 5 ज़ोन सर्टिफाइड ओर्थोपेडिक ग़द्दा नेशनल हेल्थ अकादमी से प्रमाणित है जो शारीर के 5 हिस्सों को अलग अलग सपोर्ट देता है.
कमरे में फर्नीचर
बुजुर्ग पेरेंट्स के कमरे में फर्नीचर कम से कम रखा जाना चाहिए जिससे उन्हें चलने फिरने में आसानी रहे. उनके लिए आमतौर पर एक आरामदेह कुर्सी ही पर्याप्त होती है जिस पर हत्थे जरुर हों. इससे उनके गिरने का खतरा कम होता है. कुर्सी लकड़ी की हो तो ज्यादा अच्छा रहता है कुर्सी की गहराई इतनी न हो कि बूढ़े उसमे धंसे. इससे कमर दर्द की समस्या हो सकती है और उठने में भी परेशानी होती है
. बेड साइड टेबिल भी जरुरी है लेकिन इसकी ऊंचाई बिस्तर के गद्दे के बराबर होना चाहिए ताकि बुजुर्ग बैठे बैठे ही अपनी जरूरत का छोटा मोटा सामान खुद हाथ बढ़ाकर उठा और रख सकें. इस टेबल में सामान रखने एक दराज भी बनबाया जा सकता है .
बुजुर्ग पेरेंट्स के कमरे में गैरजरुरी और शो बाजी बाला फर्नीचर खासतौर से कांच का नहीं रखना चाहिए . स्टूल तो कतई नहीं रखना चाहिए जिससे गिरने का खतरा हमेशा बना रहता है. उनका सामान रखने के लिए वार्डरॉब या अलमारी बहुत ज्यादा ऊँची या नीची नहीं होना चाहिए ताकि उन्हें झुकने और उठने में परेशानी न हो. कमर तक की ऊंचाई बाले दराज ठीक रहते हैं जिनका .दरवाजा स्लाइडिंग बाला हो तो बुजुर्गों को खोलने बंद करने में सहूलियत रहती है.
आजकल एलईडी स्ट्रिप्स लाइट बाली अलमारियां बेहद आम हो चली हैं जिनका दरवाजा खोलते ही लाइट जल उठती है. इनसे बुजुर्गों को अपना सामान रखने और निकालने में सहूलियत रहती है. अगर मौजूदा अलमारी में यह सहूलियत न हो तो महज दो हजार रु में अलमारी में इसे लगवाया जा सकता है.
लाइट
अधिकतर बुजुर्गों में कम दिखने की परेशानी आम है ऐसे में उनके कमरे की लाइट ऐसी राखी जानी चाहिए जो आखों को साफतौर पर रौशनी दे. लेकिन लाइट आखों में चुभने बाली भी नहीं होनी चाहिए इसलिए वार्म व्हाईट लाइट ठीक रहती है. अक्सर बुजुर्गों को बार बार बाथरूम भी जाना पड़ता है वे अँधेरे में गिरें या टकराएँ नहीं इसके लिए जरुरी है कि उनके बेड के ठीक नीचे से बाथरूम के दरवाजे तक फुट लाइट्स या गाइड लाइट्स लगवाई जाएँ . ये लाइट्स रात भर भी जलती रहें तो भी उनकी नींद में खलल नहीं पड़ता और इनका खर्च भी बहुत ज्यादा नहीं आता. मोशन सेंसर लाइट्स भी कारगर रहती हैं.
लाइट्स से ज्यादा अहम होते हैं उनके स्विच क्योंकि बुजुर्गों को रात में बार बार इन्हें जलाने और बंद करने की जरूरत पड़ सकती है. सुरक्षा और सहूलियत के लिहाज से टू वे स्विच ठीक रहते हैं. इनमे से एक ठीक उनके बिस्तर के पास और दूसरा कमरे के दरवाजे के पास होना चाहिए.. इन दिनों इंडीकेटर बाले स्विच भी चलन में हैं जिनमे लाल या हरे रंग का नियान रहता है. चमकते रहने के कारण स्विच ढूंढने में दिक्कत नहीं होती.
यदि बुजुर्ग पेरेंट्स थोड़े से एडवांस और टेक्नालाजी फ्रेंडली हों तो उनके कमरे में स्मार्ट बल्ब भी लगवाया जा सकता है जिसे वे अपनी आवाज या रिमोट से भी ओपरेट कर सकते हैं..यह उनके लिए टाइम पास खेल भी साबित होता है. बुजुर्गों के कमरे में लाइट व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि रौशनी सीधे उनकी आखों पर न पड़े.
इन सबसे अहम फर्श और बाथरूम
बुजुर्गों को सबसे बड़ा खतरा बाथरूम में होता है जिसे लेकर हर किसी का व्यक्तिगत अनुभव भी हो सकता है. लेकिन देश और दुनिया के आंकड़े बेहद चौंका देने बाले होने के साथ साथ सबक देने बाले भी हैं. एक स्टडी के मुताबिक देश भर में हर साल औसतन लगभग 30 लाख बुजुर्ग बाथरूम में फिसलकर गिरते हैं. एम्स दिल्ली की एक रिसर्च में खुलासा किया गया है कि अगर बाथरूम के बुनियादी ढाँचे में थोड़े से बदलाब किए जाएँ तो बाथरूम में बुजुर्गो के गिरने का जोखिम 75 फीसदी तक कम किया जा सकता है .
एक स्वास्थ पत्रिका की मानें तो हर साल कोई 20 लाख बुजुर्ग बाथरूम में गिरकर गंभीर रूप से चोटिल होते हैं.. इनमे से अधिकतर को बाथरूम फ्रेक्चर जिसे हिप फ्रेक्चर भी कहा जाता है होता है. एक बार हिप फ्रेक्चर हो जाए तो उसके पूरे ठीक होने की संभावना बहुत कम होती है क्योंकि अधिकतर बुजुर्ग सर्जरी के लिए फिट नहीं होते. ऐसे में उन्हें बाकी जिंदगी बिस्तर पर ही गुजारना पड़ती है. यह बेहद तकलीफदेह अवस्था होती है. अहमदाबाद में हुई एक रिसर्च जिसमे शहरी बुजुर्गों के बाथरूमों का जायजा लिया गया था में बताया गया है कि 91 फीसदी से भी ज्यादा बाथरूम्स का फर्श ज्यादा फिसलन भरा था और 100 फीसदी बाथरूमो में बुजुर्गों के अनुकूल दरवाजों या ग्रेब बार की कमी थी. \
भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के बूढ़ों के साथ यह समस्या है. अमेरिकी स्वास्थ संगठन सीडीसी के मुताबिक बाथरूम में होने बाली दुर्घटनाओ में से 81 फीसदी फिसलने और गिरने की होती हैं. इस तरह के तमाम सर्वे यह इशारा भी करते हैं कि बाथरूम में गिरने की सबसे अधिक दुर्घटनाएं कमोड यानी टॉयलेट सीट पर उठते व बैठते वक्त और बाथरूम के अंदर जाते या वहां से बाहर आते वक्त होती हैं.
बुजुर्ग पेरेंट्स को इस अप्रिय स्थिति से बचाने का सबसे कारगर तरीका है कि बाथरूम ड्राई रखा जाए जो हर वक्त मुमकिन नहीं होता. लेकिन कुछ एहतियात बरती जाएँ और कुछ गजेट्स का इस्तेमाल किया जाए तो संताने बाथरूम्स की तरफ से एक हद तक बेफिक्र हो सकती हैं. ये रहे वे तरीके –
– न केवल रूम्स बल्कि बाथरूम्स में भी एंटी स्किड टाइल्स या मेट का इस्तेमाल करें जिससे फिसलन न के बराबर हो. अगर आपके घर में इस तरह की व्यवस्था नहीं है यानी साधारण टाइल्स हैं तो उन पर एंटी स्किड रबर मेट बिछाएं.
– फर्श को सूखा रखने के लिए एक वाईपर जरुर रखें. अगर बजट में हो तो गीले और सूखे हिस्से को अलग रखने ग्लास पार्टीशन करवाएं या फिर शावर कर्टेन लगवाएं.
– साधारण कमोड सीट के उपर 4 से 6 इंच की एक्स्ट्रा सीट लगवाएं ताकि उठने बैठने में घुटनों पर ज्यादा जोर न पड़े. यह रेज्ड टॉयलेट सीट 2 से 5 हजार रु की आती है.
– टॉयलेट सीट के दोनों तरफ टॉयलेट ग्रेब बार लगवाएं. सीट के दोनों तरफ अंग्रेजी के एल अक्षर के आकार के या फिर सीधे मजबूत स्टील के हेंडल लगवाने से गिरने का खतरा कम होता है क्योंकि बुजुर्गों को उठने बैठने के लिए सहारा मिल जाता है
– बुजुर्गो में खड़े होकर नहाने से उनके गिरने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए बाथरूम में रबर के पैरों बाली प्लास्टिक की कुर्सी रखें जिस पर बैठकर वे इत्मीनान से नहा सकें. शावर के नीचे कमर की ऊंचाई से थोडा उपर एंटी स्लिप ग्रेब बार लगाने से गिरने और फिसलने का जोखिम कम होता है
– बाथरूम के अंदर और दरवाजे के पास मोशन सेंसर लाइट लगवाने से भी गिरने की रिस्क कम होती है
– बाथरूम के दरवाजे पर खास ध्यान देना चाहिए कि यह बाहर खुलने बाला हो ताकि बुजुर्ग कभी अंदर गिर भी जाएँ तो दरवाजे को आसानी से धक्का देकर खोला जा सके. बेहतर तो यह भी होता है कि बुजुर्गों के बाथरूम में कुंडी की जगह लीवर लोक या फिर मेग्नेटिक केचर लगवाया जाए. जिससे उनके गिरने जैसी इमरजेंसी में दरवाजा बाहर से आसानी से खोला जा सके.
– ध्यान यह भी रखना चाहिए कि बुजुर्गों के बाथरूम के गीजर का स्विच बाहर हो क्योंकि स्विच अंदर होने से करंट का खतरा बना रहता है क्योंकि बुजुर्ग अक्सर गीजर का स्विच गीले हाथों से बंद करते हैं.
ये बहुत महंगे काम नहीं हैं कम से कम गिरने के बाद के हालातों के मुकाबले बेहद सस्ते हैं क्योंकि फिर बुजुर्गो को फुल टाइम अटेंडेंट की जरूरत होती है जो आप किसी एजेंसी से हायर की गई नर्स या मैड से पूरी कर भी सकते हैं लेकिन उसकी अलग दिक्कतें हैं. मसलन उसका लम्बी छुट्टी पर चले जाना, बिना किसी पूर्व सूचना के गोल मार देना और उसकी अपनी आदतें जिनमे मोबाइल में डूबे रहने की लत प्रमुखता से शामिल है.
अलावा इसके पेरेंट्स को जरूरत के मुताबिक टाइम न दें पाने का गिल्ट भी आपको कचोट सकता है जो कि फिजूल इन मानों में ई कि अब सेवा में खुद की मौजूदगी से ज्यादा सहूलियत बाला रोल गजेट्स और टेक्नालाजी का हो चला है. इसके बाद भी पेरेंट्स के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त गुजारने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि जब वे नहीं रहते तो कुछ सालों तक उनकी याद बहुत कचोटती है. तब ऐसा लगता है कि काश मम्मी पापा के साथ और ज्यादा वक्त गुजार लेते. Elderly Parents. .
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