Ethanol Policy: अंतर्राष्ट्रीय मार्किट में पेट्रोल के भाव गिर रहे हैं वहीं भारत में पेट्रोल के नाम पर जनता की जेब पर डाका डाला जा रहा है. पेट्रोल पंप पर जो पेट्रोल 100 रुपये है, असल में वो 150 रुपये से ऊपर का पड़ रहा है. यही आज आम आदमी की सच्चाई है. सरकार कह रही है इससे देश का पैसा बचेगा, किसान खुश होगा, हवा साफ होगी. यह सुनने में तो अच्छी बात लगती है लेकिन जमीनी हकीकत बिलकुल अलग है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने पूरा सच सामने रख दिया है. सरकार का दावा था कि इथेनॉल गन्ने से बनेगा लेकिन 2023 से 2024 की रिपोर्ट के अनुसार तेल कंपनियों को मिला 60 फीसदी इथेनॉल सीधे अनाज से यानी मक्का और चावल से तैयार किया गया. 2026 में ये आंकड़ा 72 फीसदी तक जाएगा. देश की 400 इथेनॉल फैक्ट्रियों में से 250 अब अनाज से चल रही हैं.
इंडियन एक्सप्रेस ने जुलाई 2026 में इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम पर एक डिटेल रिपोर्ट छापी है. इथेनॉल अब गन्ने से नहीं, अनाज से बन रहा है. फीडस्टॉक बदल गया, अब अनाज नंबर 1 है. 2023-24 के डेटा के अनुसार तेल कंपनियों को कुल 672 करोड़ लीटर इथेनॉल मिला. इसमें सिर्फ 40 प्रतिशत गन्ने से बना. 59 प्रतिशत अनाज से बना. अकेले मक्का से 286 करोड़ लीटर आया जो गन्ने से भी ज्यादा है. 2026 में अनुमान है कि 72 प्रतिशत इथेनॉल अनाज से आएगा बाकी 4780 करोड़ लीटर मक्का से और 2830 करोड़ लीटर चावल इस्तेमाल होगा.
सरकार कह रही है कि पुराना चावल जो FCI का सरप्लस है इथेनॉल में जा रहा है लेकिन इंडियन एक्सप्रेस ने हिसाब लगाया की FCI को 1 किलो चावल 44 रुपये में पड़ता है, वही चावल इथेनॉल प्लांट को 23 रुपये किलो दिया जा रहा है. यानी 21 रुपये प्रति किलो का घाटा. ये पैसा सब्सिडी के रूप में सीधे टैक्सपेयर की जेब से जा रहा है.
भारत 2025-26 में 154 MMT चावल पैदा करके दुनिया में नंबर 1 बन गया है. सरकार 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन भी दे रही है फिर भी FCI के गोदाम बफर स्टॉक से 5 गुना भरे हैं. सरकार ने इस एक्स्ट्रा स्टॉक का हल एथॉनल के रूप में ढूंढा है जबकि इस सरप्लस का इस्तेमाल एक्सपोर्ट और फूड प्रोसेसिंग में किया जा सकता था.
एथॉनल की खेती के चक्कर में मक्का-चावल को ज्यादा भाव मिलेगा तो किसान दाल और तिलहन कम बोएगा. इससे महंगाई और बढ़ेगी. भारत पहले से ही खाद्य तेल और दाल का बड़ा एक्सपोर्टर है. इससे एक्सपोर्ट पर असर होगा. इथेनॉल की वजह से देश के अंदर फसलों का संतुलन तो बिगड़ेगा ही एक्सपोर्ट भी चौपट होगा.
सरकार का दावा है कि 1 लीटर इथेनॉल बनाने में 3-5 लीटर पानी लगता है, 10000 लीटर नहीं. मक्का धान से कम पानी मांगता है लेकिन रिपोर्ट के अनुसार एक लीटर एथॉनल के लिए 2000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है. सरकारी दावे और हकीकत में जमीन आसमान का अंतर है. इंडियन एक्सप्रेस ने कहा कि इथेनॉल नीति कागज पर फायदेमंद जरूर नजर आता है लेकिन जमीन पर ये अन्न से ईंधन बनाने की नीति ही है. इसमें 3 चीजें दांव पर हैं. सरकारी खजाना, खाने का अनाज और खेती का संतुलन.
अब आते हैं सबसे बड़े मुद्दे पर. सरकार कहती है E20 से माइलेज में सिर्फ 5 फीसदी का फर्क आता है लेकिन सड़क पर तस्वीर बिलकुल उलट है. पहले जो गाड़ी 1 लीटर में 18 किलोमीटर चलती थी, अब 14-15 किलोमीटर चल रही है. पुरानी गाड़ी में इंजन मेंटेन रखने का खर्च अलग से बढ़ गया है.
सीधा गणित है. 100 रुपये लीटर पेट्रोल अगर 20 फीसदी कम चले तो वो असल में 125 रुपये का पड़ा. अगर 30 फीसदी कम चले तो 140-150 रुपये का इसीलिए लोग कह रहे हैं ये 100 रुपये का मिलावटी पेट्रोल असल में 170 रुपये वाला है.
सबसे बड़ा सवाल ये है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव गिर रहा है. 2014 में जब तेल 110 डॉलर बैरल था तब पेट्रोल 70 रुपये था वो भी बिना मिलावट वाला. आज तेल 60-70 डॉलर है पर पेट्रोल जिसमें 20 परसेंट एथॉनल मिला है 100 रुपये के ऊपर है. सरकार हर लीटर पर मोटा टैक्स और सेस वसूल रही है. ऊपर से इथेनॉल मिलाकर माइलेज भी गिरा दिया. इस तरह जनता दोहरी मार झेलने को मजबूर है.
भारत अपने पड़ोसी देशों को पेट्रोल बेच रहा है. वहां आम आदमी को पेट्रोल हमसे सस्ता मिल रहा है. पाकिस्तान में जुलाई 2026 में पेट्रोल 75 से 80 रुपये के आसपास है. श्रीलंका में 85 से 90 रुपये. बांग्लादेश में 90 से 95 रुपये. नेपाल में 95 से 100 रुपये और भारत में 100 से 105 रुपये. ऊपर से माइलेज भी कम. मतलब पड़ोसी देश में आदमी 80 रुपये में जितना चलेगा, भारत में उतना चलने के लिए 150 रुपये खर्च करने पड़ेंगे और सबसे बड़ी बात यह है कि अभी पड़ोसी देशों में भारत जैसा बीस फीसदी वाला इथेनॉल वाला पेट्रोल नहीं मिल रहा. भारत ने अप्रैल 2025 से पूरे देश में ई बीस यानी बीस फीसदी इथेनॉल मिलाना अनिवार्य कर दिया है लेकिन नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में अभी ऐसी कोई मजबूरी नहीं है.
नेपाल ने दिसंबर 2026 में जाकर दस फीसदी इथेनॉल वाला पेट्रोल यानी ई दस को मंजूरी दी है पर वहां इसे पूरी तरह लागू होने में अभी एक से डेढ़ साल लग जाएंगे और नेपाल की नीति में साफ लिखा है कि खाने वाले अनाज से इथेनॉल नहीं बनेगा. सिर्फ शीरा, घास और खेती के बचे हुए सामान से बनेगा. अभी नेपाल के पास खुद की इथेनॉल फैक्ट्री भी नहीं है इसलिए भारत नेपाल को इथेनॉल बेचने की बात कर रहा है.
पाकिस्तान में दस फीसदी इथेनॉल वैकल्पिक है, कोई जबरदस्ती नहीं है. वहां भी सरकार ने अभी इसे अनिवार्य नहीं किया है. बांग्लादेश में अभी पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का कोई कानून नहीं है. वहां की सरकार ने भारत से इथेनॉल खरीदने में दिलचस्पी जरूर दिखाई है. इसे लेकर नितिन गडकरी कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री से बात भी हुई है.
इसका सीधा मतलब यह है कि भारत जो पेट्रोल पड़ोसी देशों को बेच रहा है वह अभी नॉर्मल पेट्रोल है या फिर बहुत कम इथेनॉल वाला है. वहां की जनता भी अभी शुद्ध पेट्रोल या दस फीसदी तक का ही पेट्रोल भरवा रही है. भारत में ही बीस फीसदी इथेनॉल थोपा गया है और इसी की वजह से माइलेज भी गिर रहा है इसलिए यहां सौ से 105 रुपये का पेट्रोल असल में 140 से 150 रुपये जैसा पड़ रहा है.
इसका असर सीधा महंगाई पर पड़ा है. ट्रक, टेम्पो, बस सबका डीजल-पेट्रोल का खर्च बढ़ा तो सब्जी, दूध, आटा सब महंगा हुआ. ऊपर से इथेनॉल के चक्कर में किसान भी अब मक्का और चावल ज्यादा बोएगा. दाल और तेल की खेती घटेगी तो आगे चलकर खाने का सामान और महंगा होगा.
सरकार कहती है ये ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है. किसान को पैसा मिल रहा है लेकिन किस कीमत पर? एक तरफ टैक्सपेयर का पैसा लुट रहा है. दूसरी तरफ आम आदमी की जेब कट रही है. तीसरी तरफ खाने की थाली महंगी हो रही है. ब्राजील में भी इथेनॉल चलता है पर वहां सरकार ने लोगों को चॉइस दी है. कोई E100 ले, कोई E27 ले, कोई सादा पेट्रोल ले लेकिन भारत में चॉइस नहीं है. जबरदस्ती E20 थोप दिया गया है.
सवाल यह है की सरकार माइलेज का असली डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं करती? लैब का नहीं, आम आदमी की गाड़ी का डाटा. दूसरा, जब दुनिया में तेल सस्ता है तो भारत में पेट्रोल पर टैक्स कम क्यों नहीं? भारत की जनता पड़ोसी देशों से महंगा पेट्रोल क्यों ले रही है? ऊर्जा बचाना जरूरी है और पर्यावरण का ख्याल रखना भी जरुरी है लेकिन यह काम आम आदमी को बर्बाद करने की कीमत पर नहीं होना चाहिए. 100 रुपये का पेट्रोल अगर 170 जैसा चले और वही पेट्रोल पड़ोसी को 80 में मिले तो इसे विकास नहीं, ठगी कहते हैं. Ethanol Policy





