Max Min Meowzaki Movie: कहानी की शुरुआत ही एक टूटते रिश्ते से होती है. जिंगल गाने वाले महेश उर्फ मैक्स (सिद्धार्थ मेनन) और उस की मुसलिम गर्लफ्रैंड मिनारा उर्फ मिन (मेधा शंकर) का ब्रेकअप हो चुका है. दोनों लिवइन में रहते थे और अब दोनों के बीच सामान के बंटवारे को ले कर बहस हो रही है. सब से बड़ी लड़ाई ‘म्याऊजाकी’ नाम की एक बिल्ली को ले कर है.

जापानी डायरैक्टर हायाओ मियाजाकी के नाम पर रखी गई इस बिल्ली के घर वालों से मैक्स को एलर्जी है और उसे हर वक्त नेजल स्प्रे पर निर्भर रहना पड़ता है. इस के बावजूद, मिन से मिले इस ‘गिफ्ट’ और बिल्ली को संभालना ही मैक्स के जीवन में बदलाव की वजह बनता है.

यहीं से कहानी 3 पीढ़ियों के मर्दों के इर्दगिर्द घूमने लगती है. मैक्स को अपनी मां को खोने की टीस और मिन से दूरी का गम सता रहा है. वहीं उस के पिता रमेश (आदिल हुसैन) एक जिद्दी कारोबारी हैं, जो पत्नी की मौत के बाद नींद की कमी से जूझ रहे हैं और रूढ़िवादी सोच से बंधे हैं. वे मैक्स और मिन के रिश्ते से खुश नहीं थे. वहीं सब से बड़े बुजुर्ग श्रीधर (नासर) एक मशहूर कर्नाटका संगीतकार रहे हैं, जो अब ओल्डएज होम में अपनी पुरानी यादों के सहारे दिन काट रहे हैं.

बिल्ली के घर में आने के बाद पूरे घर का माहौल बदल जाता है. मैक्स बिल्ली संभालने के लिए कैरोल (विधात्री बंदी) को बुलाता है. कैरोल सीधीसादी लड़की है, जो जानवरों को इंसान से बेहतर समझती है. वह मैक्स को समझाती है कि बिल्ली उस की एलर्जी की वजह नहीं है, उस की एलर्जी असल में उस तनाव और दुख से है जिसे उस ने अपने अंदर दबा कर रखा है.

उधर, रातों की नींद न आने से परेशान हो कर रमेश चुपचाप एक थेरैपिस्ट धारा (मंदिरा बेदी) के पास जाने लगते हैं. धारा के क्लिनिक में बैठ कर रमेश पहली बार स्वीकार करते हैं कि वे अपनी पत्नी के जाने के बाद अकेले पड़ गए हैं और अपने बेटे की जिंदगी पर जो हक जमाना चाहते थे, वह उन की अपनी नाकामी थी. केयरहोम में दादा श्रीधर की मुलाकात जेनिफर (नफीसा अली) से होती है. जेनिफर को अल्जाइमर है, वे चीजें भूल जाती हैं, लेकिन संगीत समझती हैं. श्रीधर जो तानपुरा बरसों पहले छोड़ चुके थे, जेनिफर के सामने फिर से बजाने लगते हैं.

फिल्म का पहला हाफ काफी अच्छा है. मुंबई का मानसूनी माहौल और किरदारों का अकेलापन स्क्रीन पर साफ दिखता है. निर्देशक पद्माकुमार नरसिम्हामूर्ति अपनी फिल्मोग्राफी में सामाजिक मुद्दों को छूने की कोशिश करते हैं जैसे साल 2016 में आई उन की फिल्म ‘अ बिलियन कलर स्टोरी’ की कहानी कम्युनल टैंशन में आए एक अंतरधार्मिक विवाह पर आधारित थी. इस फिल्म में भी दक्षिणपंथी सोच, किसान आंदोलन, समलैंगिकता और व्हाट्सऐप फौरवर्ड जैसे मुद्दों से रूबरू कराते हैं.

फिल्म में मोड़ तब आता है जब मिन बिल्ली को वापस लेने के लिए आती है. लेकिन इन कुछ हफ्तों में बहुतकुछ बदल चुका है. मैक्स अब वह रोता हुआ लड़का नहीं रहा जो मिन के पीछे भागता था. उस ने समझ लिया है कि मिन का जाना उस की जिंदगी का अंत नहीं था. जब मिन बिल्ली उठाने लगती है, तो मैक्स उसे रोकता नहीं. लेकिन इस बार उस की आंखों में वह बेचैनी नहीं होती जो पहली बार मिन के जाने पर थी. उस की एलर्जी भी अब कम होने लगी है.

रमेश अपने पिता श्रीधर से मिलने केयरहोम जाते हैं. कोई रोनाधोना या बड़ा ड्रामा नहीं होता, बस, 2 बूढ़े आदमी एक कमरे में बैठते हैं, चाय पीते हैं और पुराने गानों पर बात करते हैं. सालों की खामोशी एक झटके खत्म हो जाती है. हालांकि फिल्म में एक दिक्कत इस के संवादों और महिला किरदारों की बनावट में है. फिल्म की औरतें सिर्फ इन तीनों पुरुषों के सुधरने या बदलने का ज़रिया बन कर रह गई हैं.

अदाकारी के मामले में फिल्म निराश नहीं करती. आदिल हुसैन ने एक सख्त, पूर्वाग्रही लेकिन अंदर से अकेले बाप का किरदार शानदार तरीके से निभाया है. थेरैपीरूम में उन का धीरेधीरे पिघलना और अपने दर्द को स्वीकार करना फिल्म का सब से मजबूत हिस्सा है. वे इस किरदार को एकतरफा विलेन बनने से बचा लेते हैं. सिद्धार्थ मेनन ने भी अपनी उलझन और दुख को ईमानदारी से परदे पर उतारा है. अभिनेता नासर ने अपने छोटे से रोल में कमाल का काम किया है. जबजब वे स्क्रीन पर आते हैं, सीन अपनेआप जीवंत हो जाता है.

तकनीकी तौर पर फिल्म का संगीत अच्छा है. मौडर्न रौक और क्लासिकल म्यूजिक का मेल कानों को सुकून देता है. लेकिन 138 मिनट के रनटाइम को 15 मिनट तक कम किया जा सकता था. कई सबप्लौट बेवजह खींचे गए हैं, जिस से फिल्म की रफ्तार बहुत धीमी हो जाती है और दर्शक स्लो फील करता है. बावजूद इस के, यह एक इंडी ड्रामा फिल्म बनाई गई है, जिस में वह कामयाब भी होती दिखती है. Max Min Meowzaki Movie

 

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