Madhya Pradesh Chief Minister: भाजपा यह कहती नहीं अघाती कि उस के राज में कहीं भ्रष्टाचार नहीं है लेकिन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव पर जमीन घोटाले पर उठी उंगलियों ने इस दावे की पोल खोल दी है. भाजपा आलाकमान का आशीर्वाद उन्हें फिलहाल बचा ले गया है पर राम मंदिर घोटाले की प्रतिछाया कब क्या हो, कहा नहीं जा सकता. मुमकिन है मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री  डाक्टर मोहन यादव और उन के  परिजनों पर जमीन घोटाले के जो आरोप लगे हैं वे कल को आएगए हो जाएं. यह चर्चा आम रही कि इन घोटालों को उजागर करवाने में खुद भाजपाइयों और उन में भी खासतौर से शिवराज सिंह चौहान के खेमे का रोल अहम रहा.

देश की राजनीति का चरित्र अब महाभारत के युद्ध जैसा है जिस में सगे ही एकदूसरे के खिलाफ हो गए थे और एक परिवार की अंदरूनी लड़ाई आम जनता की कहानी बन गई. मुगल शासकों के इतिहास का भी असर लोगों के जेहन में है कि सत्ता कुरसी पर बैठे हुए को धकिया कर भी हासिल की जा सकती है, युद्धक्षेत्र में जाना जरूरी नहीं.

जब उजागर हुआ कथित घोटाला

यह हल्ला कोई गुल खिला पाएगा, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि जिस अंगरेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रैस’ ने इसे उठाया है उस ने आंकड़े भर दिए हैं. किसी बहुत बड़े घोटाले या गोलमाल का जिक्र नहीं किया है. जो भाजपाई पलटवार को पुख्ता करने वाली बात है कि मोहन यादव और उन का परिवार अरसे से जमीनों का कारोबार कर रहा है. ऐसे में अगर उन्होंने कुछ जमीनों की खरीदफरोख्त कर ली तो इस में घोटाला कहां से आ गया? जमीनें खरीदना कोई गुनाह तो नहीं?

इंडियन एक्सप्रैस ने अपने 25 जून, 2026 के अंक में एक लंबीचौड़ी खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिस के मुताबिक- मोहन यादव के परिवार और उन से जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों ने मुख्यमंत्री बनने के बाद उज्जैन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जमीनें खरीदीं और उन जमीनों का एक बड़ा हिस्सा बाद में सरकारी सड़क एवं विकास परियोजनाओं से लाभान्वित होने वाले क्षेत्रों में था. कुल 137 प्लौट खरीदे गए जिन का कुल क्षेत्रफल 168 एकड़ है. इन जमीनों का खरीदी मूल्य 45 करोड़ रुपए है.

अधिकतर खरीद दिसंबर 2023 के बाद की गई जब मोहन यादव मुख्यमंत्री बन चुके थे. इस खोजी रिपोर्ट में कहा गया है कि जमीनें केवल मुख्यमंत्री के नाम पर नहीं बल्कि उन की पत्नी सीमा यादव, पुत्र वैभव, पुत्रवधु शालिनी यादव, भाई नारायण और नंदलाल यादव के अलावा नारायण यादव की पत्नी रेखा और चचेरे भाइयों गोविंद और नीलेश यादव तथा परिवार से जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों के नाम पर भी खरीदी गईं. इन जमीनों का अधिकांश हिस्सा उन क्षेत्रों में है जिन्हें उन की सरकार द्वारा घोषित सड़क परियोजनाओं और भूमि उपयोग परिवर्तन से लाभ हुआ है.

ये भूखंड या तो उज्जैन या फिर उस के आसपास घोषित नई सड़क परियोजनाओं के नजदीक हैं. उज्जैन मास्टर प्लान 2035 मोहन यादव के दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री बनने के पहले जारी किया गया था.

मोहन यादव भाजपा शासन के दौरान दशकों से उज्जैन के पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास में शामिल रहे हैं. 2004 से 2010 तक वे उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष थे और 2011 से 2013 तक मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम के मुखिया थे. हालांकि मोहन यादव के मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद दिसंबर 2023 में भी जयराम रमेश ने आरोप लगाया था कि यादव के खिलाफ उज्जैन मास्टर प्लान में बड़े पैमाने पर हेराफेरी करने के गंभीर आरोप हैं. तब प्रदेश कांग्रेस और जीतू पटवारी की भद्द इस बात पर पिटी थी कि इस तरह के आरोप जयराम रमेश को क्यों उजागर करना पड़ते हैं, प्रदेश कांग्रेस क्यों सोती रहती है.

इस के बाद 2013 में मोहन यादव उज्जैन दक्षिण सीट से विधायक चुने गए थे. बकौल इंडियन एक्सप्रैस, मोहन यादव के पुत्र वैभव यादव और बहन कलावती के नाम उज्जैन के आसपास कम से कम 179 एकड़ के 108 भूखंड हैं जिन में से कम से कम 85 एकड़ जमीन 2021 से ले कर 2023 के दौरान खरीदी गई थी जब मोहन यादव उच्च शिक्षा मंत्री थे.

कुल जमा इस रिपोर्ट का सार यह है कि यादव परिवार और उस की कंपनियों के पास पहले से भी जमीने थीं लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद जमीनें मुहिम की शक्ल में खरीदी गईं और सरकारी योजनाओं व परियोजनाओं को कुछ ऐसे अंजाम दिया गया कि इन जमीनों की कीमत बढ़े.

अखबार ने खरीदी गई जमीनों की पूरी जमीन कुंडली प्रकाशित की है जिस में यह बताया गया है कि ये किन इलाकों में हैं, उन का पंजीयन रिकौर्ड, रैवेन्यू रिकौर्ड और कंपनी रिकौर्ड भी दिया गया है जो कि जरूरी भी था वरना कोई इस रिपोर्ट पर आसानी से यकीन न करता.

1 रुपए में 500 करोड़ रुपए की जमीन

जुलाई का तीसरा सप्ताह आतेआते मोहन यादव की जमीनों का मुद्दा हवा हो गया लेकिन लोगों ने यह मान लिया कि यह धुआं बेवजह तो नहीं उठा होगा, कुछ तो सच्चाई इस में होगी जरूर. इसी बीच, एक आरोप जीतू पटवारी ने यह लगा डाला कि मोहन यादव सरकार ने उज्जैन के एक निजी ट्रस्ट को महज 1 रुपए की सालाना लीज पर 500 करोड़ रुपए की जमीन दे दी. इस मामले की भी जांच होनी चाहिए.

कुछ होता, इस से पहले ही कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह के इस बयान ने और ज्यादा खलबली मचा दी कि उपलब्ध रिकौर्ड के मुताबिक वीर भारत न्यास कोई निजी ट्रस्ट नहीं बल्कि प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग के तहत काम करने वाला सरकारी ट्रस्ट है, इसलिए निजी ट्रस्ट को 1 रुपए में जमीन देने वाला आरोप सही नहीं है.

इस विरोधाभास पर भी कांग्रेस की किरकिरी हुई थी कि उस के नेता आरोप लगाने के पहले जांच तो कर लिया करें कि वे जो बोल रहे हैं उस में तथ्य हैं या नहीं. इसे कांग्रेस की गुटबाजी की लड़ाई के तौर भी देखा गया था क्योंकि जीतू पटवारी की गिनती कमलनाथ खेमे में होती है. मोहन यादव को कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई से लाभ हुआ क्योंकि कुछ आरोपों जब टायंटायं फिस हो जाएं तो मुख्य आरोपों पर भी संदेह होने लगता है.

रिपोर्ट बनाम सफाई 

इंडियन एक्सप्रैस की रिपोर्ट के उजागर होते ही न केवल मध्य प्रदेश बल्कि देशभर के सियासी हलकों में चर्चाओं और अफवाहों का बाजार गरम हो उठा. भाजपा ने एकजुट हो कर मोहन यादव के बचाव की रणनीति पर काम किया. सब से पहले तो खुद मोहन यादव ने सफाई दी कि 2023 के बाद उन की व्यक्तिगत भूमि में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है और उन का परिवार वर्षों से रियल एस्टेट कारोबार में सक्रिय है.

मोहन यादव ने मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी बयान में इंडियन एक्सप्रैस की रिपोर्ट का पौइंट टू पौइंट खंडन करते हुए यह भी कहा कि पत्नी सीमा यादव की भूमि में भी कोई बदलाव नहीं हुआ है. जमीनों का अधिकतर हिस्सा मुख्यमंत्री बनने के पहले 2008 और 2019 के बीच खरीदा गया. इस स्पष्टीकरण को सच मानें तो शक इंडियन एक्सप्रैस की रिपोर्ट पर ही गहराता है.

मुख्यमंत्री के मुताबिक जो आरोप उन की कंपनी सिद्धि विनायक देवकांन प्राइवेट लिमिटेड पर लगे हैं उस की स्थापना साल 2008 में कृषि गतिविधियों के लिए की गई थी. इस कंपनी के निदेशक पद से मोहन यादव और सीमा यादव फरवरी 2017 में ही इस्तीफा दे चुके हैं. और तो और, इस कंपनी की जमीन बढ़ने के बजाय घटी है. जून 2026 तक यह 65.69 एकड़ रह गई जो नवंबर 2023 में 68.43 एकड़ थी.

लंबेचौड़े स्पष्टीकरण में वैभव और शालिनी यादव की जमीनों की स्थिति का हवाला दिया गया है लेकिन यह पौइंट उस से भी ज्यादा अहम है कि यह दावा बेबुनियाद है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद सड़कों, राजमार्गों या विकास परियोजनाओं की योजनाएं उन्हें या उन के परिवार को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई थीं.

तो फिर दिक्कत क्या यह है, यह बात सम?ा से परे है क्योंकि जितनी शिद्दत से रिपोर्ट जारी की गई थी उस से ज्यादा उदासीनता से खारिज सी भी हो गई. चार दिन पूरे भाजपाई खासतौर से मोहन यादव मंत्रिमंडल के सदस्य उन के बचाव में तरहतरह की दलीलें देते रहे.

यादव जाति की सियासत

लेकिन सभी लोग ऐसा नहीं मानते. आम लोगों की राय वही है जो जयराम रमेश ने जाहिर की या फिर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने की जो महज यादव होने के नाते यादव धर्म निभाते मोहन यादव का बचाव करते नजर आए. उन के मुताबिक, यह विवाद मोहन यादव को बदनाम करने के लिए रचा गया है ताकि भाजपा मध्य प्रदेश सहित उत्तर प्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों को भी बदल सके. मोहन के बहाने अखिलेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी लपेटे में लेते हुए बोले कि उन्होंने भी 300 से 600 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है.

अखिलेश यादव के अनुसार मोहन यादव राजनीति में आने से पहले रियल एस्टेट का काम करते थे, इसलिए उन के जमीन खरीदने या उन में निवेश करने में कोई नई या गलत बात नहीं है. क्या यह बात भाजपा को मालूम नहीं थी. एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश कर रहे अखिलेश यादव की दिलचस्पी मध्य प्रदेश से ज्यादा मोहन यादव के बचाव और उस से भी ज्यादा योगी आदित्यनाथ को घेरने में दिखी.

हालांकि उन के बयान पर सोशल मीडिया पर आम प्रतिक्रिया यह रही कि योगी को घेरने के चक्कर में आप अपनी बिरादरी के भ्रष्टाचारी मोहन यादव को बचाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? जमीन विवाद या कथित घोटाले का रुख जाति की तरफ मोड़ने में भाजपा भी पीछे नहीं रही. मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने एक वीडियो जारी करते कहा, कांग्रेस का इतिहास हमेशा से पिछड़ा वर्ग के नेतृत्व को कमजोर करने का रहा है. जब भी मध्य प्रदेश में ओबीसी का कोई मुख्यमंत्री बना है चाहे वह उमा भारती हो या शिवराज सिंह चौहान हों या मोहन यादव, कांग्रेस ने उन के खिलाफ साजिश रच कर उन्हें कमजोर करने की कोशिश की है.

हालत यह रही कि कांग्रेस और भाजपा एकदूसरे पर यह आरोप लगाते रहे कि इंडियन एक्सप्रैस की यह खोजी रिपोर्ट उस के प्रोत्साहन और शह पर रची गई. यानी, इस अंगरेजी दैनिक का इस रिपोर्ट में अपना कुछ नहीं है. जो भी उजागर किया गया उस में या तो भाजपा का या फिर कांग्रेस का हाथ था. यह मोदी राज में मीडिया की बदहाली का ही उदाहरण है कि उस की अहमियत, रसूख, साख, विश्वसनीयता और वजूद राजनीति की बलि चढ़ गए हैं.

लोकप्रियता और आज्ञाकारिता बनी ढाल 

मोहन यादव को भाजपा ने जिन हालात में मुख्यमंत्री बनाया था वे चौंका देने वाले थे क्योंकि यह नाम अप्रत्याशित था. विधानसभा चुनाव में भाजपा के बहुमत में आने के बाद माना यह जा रहा था कि उस के पास शिवराज सिंह चौहान को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है क्योंकि अगर वह दूसरी पंक्ति के किसी नेता को यह कुरसी सौंपती है तो पार्टी दोफाड़ हो जाएगी. वजह, 6-7 नेता एकदूसरे की टांगखिंचाई में लग जाएंगे क्योंकि लाइन में शिवराज सिंह के ठीक पीछे दिग्गज कैलाश विजयवर्गीय सहित प्रह्लाद पटेल, बी डी शर्मा, नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया थे.

आरएसएस के मार्ग निर्देशन में जब मोहन यादव का नाम शिवराज सिंह के मुंह से ही घोषित करवाया गया तो इन सभी का दिल टूटा था. लेकिन खुशी इस बात की थी कि एक नएनवेले को सीएम बनाया गया, हमारी कदकाठी वाले को नहीं. उधर शिवराज सिंह भी सकते में थे जिन का जनता के बीच भारी विरोध था और लोग उन से खफा भी थे.

इस हकीकत से वाकिफ भाजपा आलाकमान ने उन्हें बतौर सीएम प्रोजैक्ट न करने में ही भलाई सम?ा थी. हालांकि एक आकलन यह भी कमजोर नहीं था कि अगर शिवराज सिंह 5वीं बार मुख्यमंत्री बने तो वे प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार हो जाएंगे, इसलिए भी उन के पर मोदी शाह के इशारे पर कुतरे गए.

अब हर किसी की निगाह मोहन यादव पर थी कि वे कैसे प्रदेश चला पाएंगे क्योंकि उन्हें इतना तजरबा नहीं है कि वे शिवराज सिंह के विकल्प बन सकें. आम अंदाजा यह था कि सालछह महीने में मोहन यादव चलता कर दिए जाएंगे और जनता की नाराजगी दूर हो जाने पर शिवराज सिंह को फिर से यह पद सौंप दिया जाएगा लेकिन मोहन यादव ने ताबड़तोड़ मेहनत की और खुद को साबित कर दिखाया तो शिवराज सहित दूसरी पंक्ति के तमाम नेता निराश हो उठे जिन्हें भोपाल में ही समेटते मोहन यादव के अंडर में ही काम करने को मजबूर कर दिया गया था.

ढाई साल मोहन यादव ने किया कुछ खास नहीं है. वे सुबह हवाई जहाज में बैठ कर प्रदेश में कहीं भी फुर्र हो कर शिलान्यास, भूमिपूजन, उद्घाटन करते रहे और इन से भी ज्यादा प्रिय काम लाड़ली बहनों की राशि सिंगल क्लिक पर उन के खाते में डालते रहे. यही सिंगल क्लिक – सिंगल क्लिक का खेल किसान कल्याण राशि के मामले में भी उन्होंने बहुत खेला. इस दौरान उन्होंने जम कर यादववाद फैलाया, अपनी पसंद के अफसर मलाईदार और अहम महकमों में बैठाए लेकिन मध्य प्रदेश कर्ज की खाई में गहरे तक धंस चुका है और प्रदेश में भ्रष्टाचार चरम पर है, इस पर उन्होंने कभी गौर नहीं किया.

मोहन यादव ने कुरसी पर बने रहने का इकलौता फार्मूला अच्छे से कंठस्थ कर लिया कि जैसा मोदी, शाह और भागवत कहें उसे ‘बिनही विचार करिए शुभ जानी’ की तर्ज पर करते जाना है. फिर भले ही यूसीसी लागू करना हो, मंदिरों को करोड़ों रुपए खर्च कर चमकाना हो, अजान के माइकों की आवाज बंद कराना हो या फिर मुसलमानों व आदिवासियों, दलितों पर अत्याचार होते रहने देना हो.

अब इस के एवज में कुछ जमीनजायदाद बना भी ली तो यह तो उन का हक या मेहनताना, कुछ भी कह लें, बनता है. उस पर हल्ला बेवजह है. भाजपा का बिरला ही मंत्री होगा जो जमीनजायदाद और पैसा न बना रहा हो. इस की बेहतर मिसाल खुद शिवराज सिंह चौहान हैं जिन की जमीनें अपने गांव जेत सहित विदिशा से सटे गांव उदयगिरी, बेस, टीला से ले कर ढोलखेड़ी तक विस्तार ले चुकी हैं और, और लेती भी जा रही हैं. Madhya Pradesh Chief Minister

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