Political Controversy: देश में दो तरह के युवा हैं पहले वे जो कांवड़ यात्रा करते हैं और जिन पर सरकार हैलिकौप्टर से न केवल फूल बरसाती है बल्कि जगहजगह उन का स्वागतसत्कार करती है और 56 तरह के व्यंजन खिलाती है. दूसरे वे युवा हैं जो दिल्ली के जंतरमंतर पर धरने पर सरकारी सिस्टम में सुधार की मांग ले कर बैठे हैं. अपने अधिकार मांग रहे इन युवाओं पर सरकार की पुलिस लाठियां भांज रही है. पहली तरह के युवाओं को चायपकौड़े का ठेला लगा कर गुजर करना है तो दूसरी तरह के युवाओं को डाक्टर बन अपना कैरियर बनाना है. सरकार इन से डरी हुई क्यों है?
अयोध्या के राम मंदिर चढ़ावा चोरी की परतें जैसे ही उधड़ना शुरू हुईं तो उंगलियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी उठने लगी थीं कि जब राम को वही लाए हैं, मंदिर का भूमिपूजन 5 अगस्त, 2020 को उन्होंने ही किया था, 30 दिसंबर, 2023 को अयोध्या में अरबों की विकास योजनाओं का भी उदघाटन उन्हीं ने किया था और 22 जनवरी, 2024 को रामलला की मूर्ति स्थापना यानी प्राण प्रतिष्ठा समारोह में वही मुख्य यजमान थे, उसी दिन उन्होंने देशभर में घरघर दीये जलवाए थे, राम मंदिर ट्रस्ट में भरतियां उन्हीं के कहने पर हुईं तो क्यों न चढ़ावा चोरी के चर्चित मामले में उन्हीं को जिम्मेदार ठहराया जाए.
जुलाई के तीसरे हफ्ते तक ये सवाल तेजी से सिर उठाने लगे थे. लेकिन मोदी ने इस मामले पर आदतन ख़ामोशी ओढ़े रखी मानो राम मंदिर से उन का कोई लेनादेना ही न हो. जबकि हर कोई जानता और समझता है कि इसी राम मंदिर के चलते वे सत्ता के शिखर तक पहुंचे हैं. उन्होंने राम मंदिर बनाने के हजार वादे और दावे किए थे जो पूरे भी हुए.
एवज में जनता ने उन्हें सिरआंखों पर बैठाया और सनातनियों के एक बड़े वर्ग ने तो उन्हें भगवान व अवतार तक घोषित कर दिया मानो अब देश में कोई समस्या नहीं रही हो. सनातनियों की तो छोडिए, खुद मोदी ने ही लोकसभा चुनावप्रचार के दौरान 14 मई, 2024 को वाराणसी में खुद को नान बायोलौजिकल घोषित कर दिया था.
मंदिर बनने के बाद और उस से पहले भी उन के पास करने के नाम पर गिनाने और बताने को कुछ खास था नहीं था, लिहाजा, जनता का ध्यान भटकाने के लिए गिरोहबद्ध तरीके से जम कर हिंदूमुसलिम किया गया. उस से भी ज्यादा जम कर पूजापाठ किए गए ताकि मंदिर की राजनीति का जिन्न चिराग के बाहर ही रहे.
ऐसा हो भी रहा था लेकिन 2024 के ही लोकसभा चुनाव प्रचार में जब भाजपा 400 पार का नारा लगा रही थी तब राहुल गांधी ने भगवा गैंग की मंशा जनता को बताई कि यह लोकतंत्र और संविधान को खत्म व कमजोर करने की साजिश है तो जनता को थोड़ा होश आया. नतीजतन, भाजपा 240 पर रह गई और जैसेतैसे जदयू व टीडीपी का सहारा ले कर तीसरी बार सरकार बनाने पाई.
गुजरे कल की इन बातों का मौजूदा दौर से गहरा ताल्लुक है खासतौर से मंदिरों की चढ़ावा चोरी और नीट पेपर लीक का जिस के बारे में आप सरिता के जून (प्रथम) अंक में `एनटीए का युवाओं के सपनों के साथ निरंतर खिलवाड़` शीर्षक से विस्तार से प्रकाशित हो चुका है. इन दोनों ही मामलों और मोरचों पर मोदी सरकार के दावों की पोल खुली है कि वह सलीके से कुछ भी मैनेज नहीं कर पा रही. राम मंदिर चढ़ावा चोरी की तरहतरह की चर्चाओं के दौरान देशभर के मंदिरों से इसी तरह के घोटालों की खबरें सामने आने लगीं तो मोदी सरकार की भद्द ज्यादा पिटने लगी कि आखिर सरकार कर क्या रही है.
उत्तराखंड के बद्रीनाथ मंदिर से दानपेटियों से नकदी उड़ाने के अलावा कीमती आयटमों के गायब होने की खबर आई तो सबरीमाला, तिरुमाला, कृष्ण जन्मभूमि मथुरा सहित छोटेबड़े मंदिरों के घोटाले उजागर हुए. जाहिर है इसलिए हो पाए कि लोगों के दिलोदिमाग से पंडों और तथाकथित भगवान का डर जाता रहा कि जब उस सर्वशक्तिमान के घरों से ही खुलेआम चोरी हो सकती है तो बेचारे नीट और उस से जुड़े युवाओं की क्या बिसात. इस में ऊपरवाले का कोई दोष नहीं. दोष तो किसी नीचे वाले का है. और वह नीचे वाला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिवा कोई और हो भी नहीं सकता क्योंकि देश उन के अकेले के ही इशारे पर चलता है.
मनमानी की मिसाल मोदी
2014 में जब पहली दफा मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री शपथ ली थी तो देश में उत्सव सा माहौल था. हरकोई अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त था कि अब धर्मराज गद्दी पर बैठ गए हैं जो चुटकियां बजाते ही हमारी हर परेशानी दूर कर देंगे. बेरोजगारों को रोजगार मिलने लगेंगे, महंगाई खत्म हो न हो कम जरूर हो जाएगी और भ्रष्टाचार का तो नामोनिशान मोदी जी मिटा देंगे. मोदी ने भी इन अपेक्षाओं को समझते हुए ताबड़तोड़ वादे कर डाले. अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे दर्जनों लुभावने नारे ठीक पंडेपुजारियों सरीखे निकले जो हजारपांच सौ रुपए की दक्षिणा के एवज में भक्तों का हर कष्ट हर लेने का झांसा देते रहते हैं.
तकलीफें तो मोदी दूर नहीं कर पाए, उलटे, उन्होंने नईनई तकलीफें जनता को देनी शुरू कर दीं जिस से देश की जनता पब्लिक मीटिंगों में उन के भाइयो और बहिनो के संबोधनों से घबराने लगी कि अब न जाने क्या नई गाज गिरने वाली है. नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के उस के घाव मुद्दत तक हरे रहेंगे. महंगाई और बेरोजगारी के हाल तो उन के भक्त भी महसूसने लगे हैं. लेकिन, अब उन से यह कहते और स्वीकारते नहीं बन रहा कि हां, मोदी जी एक नाकाम मैनेजर साबित हो रहे हैं जो डींगे हांकने में तो मास्टर हैं लेकिन सिवा पूजापाठ और धरमकरम के उन्हें कुछ सूझता व आता नहीं.
नीट पेपर लीक मुद्दे पर तो मोदी भक्तों सहित भगवा गैंग की ख़ामोशी यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि चढ़ावा चोरी की तरह पेपर चोरी भी इसी कुप्रबंधन की देन है. जैसे ही सीजीपी ने दिल्ली के जंतरमंतर पर धरना, प्रदर्शन और आंदोलन शुरू किया तो देशभर से उसे समर्थन मिलने लगा. लाखों-करोड़ों युवाओं और उन के पेरैंट्स ने भी इस मांग से इत्तफ़ाक रखा कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.
प्रधान और चंपत ही क्यों – मोदी भी क्यों नहीं
लाख टके का सवाल यहां यह जो कम ही लोगों के दिमाग में आया कि धर्मेंद्र प्रधान ही क्यों, नरेंद्र मोदी भी क्यों न इस्तीफ़ा दें जिन की लापरवाही और मनमानी का खमियाजा लाखों युवा भुगत रहे हैं. इन युवाओं को कुछ हासिल हुआ हो या न हो, अपनी भड़ास और आक्रोश तो उन्होंने आंदोलन के जरिए निकाल ही दी. लेकिन वे भक्त बेचारे कसमसा कर रह गए जिन के चढ़ावे पर डाका चंपत राय जैसों ने डाला था. जैसे चंपत राय को मंदिर ट्रस्ट में मोदी ने अपौइंट किया था वैसे ही धर्मेंद्र प्रधान को भी अपने मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी उन्होंने ही सौंपी थी.
विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल मंदिर सहित कई मंदिरों में फर्जी वीआईपी पास छपवा कर भक्त और भगवान दोनों को दलालों ने चूना लगाया था, उसी तर्ज पर नीट पेपर भी दलालों ने लीक किया था. कहने वाले यह कहने से नहीं चूक रहे कि ऐसा होना संभव नहीं कि बगैर मोदी जी की जानकारी या सहमति के चढ़ावा चोरी मुमकिन हो. यह बात नीट पेपर चोरी पर लागू क्यों न हो, खासतौर से उस सूरत में जब मुखिया जी मुंह चुराते नजर आएं. दोनों चोरियों की बाबत आखिरी जिम्मेदारी और जवाबदेही तो मोदी जी की ही बनती है.
नरेंद्र मोदी हमेशा से ही जवाबदेही से कतराते रहे हैं. इस बार भी कतराते नजर आए. लेकिन राहुल और प्रियंका गांधी सहित अखिलेश यादव ने 21 जुलाई को प्रधानमंत्री आवास घेर कर सरकार को यह कहने को मजबूर कर ही दिया कि वह बातचीत के लिए तैयार है.
बिलाशक कांग्रेस अगर कौकरोचों का साथ न देती तो लाठी मारमार कर युवाओं को 20 जुलाई को ही दिल्ली से खदेड़ दिया जाता. ऐसे में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का यह आरोप कम हैरतभरा नहीं था कि आंदोलन में कांग्रेस की एंट्री भाजपा के इशारे पर हुई जिस से छात्रों का यह आंदोलन कमजोर हो. यह हकीकत हर कोई समझ रहा है कि कांग्रेस सहित सपा के समर्थन देने और पीएम हाउस घेरने के बाद न केवल कौकरोचों बल्कि राहुल से असहमत लोगों में भी नई ऊर्जा का संचार हुआ. ये वो लोग हैं जो पूजापाठी तो हैं पर अंधभक्त नहीं हैं.
राहुल के नए तेवर
प्रधानमंत्री आवास घेर कर राहुल गांधी ने एक नए अंदाज और तेवर दिखाते हर किसी को चौंका दिया तो सरकार के माथे पर सलवटें पड़ने लगीं. वजह, राहुल को देशभर से समर्थन मिला और युवाओं ने उन के होंठ से खून बहते फोटो को खूब शेयर किया. अब सरकार की मजबूरी हो गई थी कि वह बातचीत की पहल करे जो कि उस ने की भी लेकिन नए जोश से भरे कौकरोचों ने यह कहते सरकार के पैर उस के गले में ही उलझा दिए कि सरकार जंतरमंतर आ कर बात करे या फिर किसी तटस्थ जगह को चुन ले.
इधर, जैसे ही राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग की तो देशभर के भक्त तिलमिला उठे लेकिन उन्हें कोई ठोस तार्किक या लोकतांत्रिक तरीका नहीं सूझा जिस से राहुल पर हमलावर हुआ जा सके. छिटपुट नएपुराने बेमतलब के और अप्रासंगिक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर कर भक्तों ने भड़ास जरूर निकाल ली जो एक नाकाम कोशिश साबित हुई.
धरमकरम नहीं मिला
ढूंढ़े से भी भाजपाइयों और हिंदूवादी संगठनों को ऐसा कोई एंगल या बहाना नहीं मिला जिस में धर्म को फिट कर राहुल और कौकरोचों को अर्बन नक्सली, नास्तिक, देशद्रोही करार दिया जा सके तो उन की बेचारगी पर तरस आना स्वाभाविक बात थी. वजह यह कि मोदी सरकार की नाकामियों और मनमानियों के लिए धर्म और धार्मिक भावनाए व मान्यताएं ढाल की तरह इस्तेमाल की जाती रही हैं. इस्तीफे के मामले में यह सब नहीं चला तो भगवा खेमा खिसियाता नजर आया.
इसी दौरान मंदिर चोरी पर भी ये कमैंट्स बहुत आम रहे कि सरकार कुछ भी तो मैनेज नहीं कर पा रही. अगर करोड़ों युवा एक मंत्री के इस्तीफे की जिद पर अड़ गए हैं तो चाणक्य नीति के मुताबिक उस की बलि देने में हर्ज नहीं. वैसे भी, दूसरे मंत्रियों की तरह धर्मेंद्र प्रधान हैं तो महज नुमाइश की चीज ही जिन्हें आरएसएस के गोदाम से उठा कर सरकार ने अपने शोकेस में सजा लिया है.
कौकरोच आंदोलन और कांग्रेस सहित धीरेधीरे एकजुट हो रहे विपक्ष के विरोध का बल्कि तगड़े विरोध से मोदी या उन की सरकार के कान पर जूं भी रेंगेगी, ऐसा कहना दरअसल यह कहना होगा कि सरकार के कान हैं और वह सुनती भी है.
जहां तक जिम्मेदारी का सवाल है तो इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का उपहार सिनेमा कांड का फैसला अहम है. 13 जून, 1997 को दिल्ली के उपहार सिनेमा में भयंकर आग लग गई और 59 लोगों की मौत हो गई. उपहार सिनेमा के मालिक सुशील अंसल और गोपाल अंसल उसी तरह के उपहार सिनेमा के मालिक थे जैसे नरेंद्र मोदी नीट परीक्षा कराने वाली एनटीए और राम मंदिर चलाने वाले ट्रस्ट, जो चंदा इकठ्ठा करता है, के मालिक हैं. नरेंद्र मोदी के कहे बिना न एनटीए और न ही चंपत राय कोई फैसला ले सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने सुशील अंसल और गोपाल अंसल को जिम्मेदार ठहराया था कि यह उन का मालिक होने के नाते कर्तव्य था कि वे दर्शकों के जीवन की सुरक्षा की प्रणाली बनाएं. ऐसी ही जिम्मेदारी नीट पेपर्स की और राम मंदिर चंदे की है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रबंधन की गड़बड़ियों और व्यावसायिक लाभ अंसल भाइयों को मिलना है तो वे कौर्पोरेट रिसपौंसिबिलिटी के अंतर्गत जिम्मेदार हैं और आईपीसी (इंडियन पीनल कोड) की धारा 304, 337, 338 के तहत जिम्मेदार हैं. नीट की परीक्षा और चंदे का राजनीतिक लाभ किसे मिल रहा है, यह बताने की जरूरत है क्या.
19 अगस्त, 2015, 9 फरवरी, 2017, 20 फरवरी, 2020 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और 8 नवंबर, 2021 का पटियाला हाउस की कोर्ट का निर्णय पढ़ लें और देखें कि नीट पेपर्स होने, चंदे की चोरी होने और उपहार सिनेमा में आग लगने के मामलों में कितनी एकसी बातें हैं. Political Controversy





