Jantar Mantar Protest: 20 जुलाई 2026 को जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट के दौरान दिल्ली पुलिस ने जो क्रूरता दिखाई उसकी मिसाल सिर्फ ब्रिटिश रूल से ही की जा सकती है. 17 जुलाई तक कमिश्नर सतीश गोलछा दिल्ली पुलिस की कमान संभाल रहे थे. जून से चल रहे प्रोटेस्ट में 17 जुलाई तक दिल्ली पुलिस ने किसी शख्स को थप्पड़ तक नहीं मारा था. कोई हिंसा नहीं हुई थी. सबकुछ शांतिपूर्वक चल रहा था लेकिन 17 जुलाई के बाद अचानक ऐसा क्या हुआ कि दिल्ली पुलिस ने बर्बरता की हदें पार कर दीं? क्या यह महज लौ एन्ड आर्डर का मामला था या पूरी प्लानिंग के तहत इस पुलिसिया बर्बरता को अंजाम दिया गया?

दिल्ली पुलिस गृहमंत्रालय के तहत काम करती है जिसके चीफ अमित शाह हैं. 17 जुलाई को दिल्ली पुलिस के कमिश्नर को हटाने के लिए कमिटी बैठी जिसमें नरेंद्र मोदी और अमित शाह शामिल थे. दोनों ने आनन फानन में दिल्ली पुलिस कमिश्नर सतीश गोलछा का तबदला कर दिया जो मार्च में रिटायर होने वाले थे. इनकी जगह आईबी के अफसर अनुराग कुमार को जिनका फील्ड मैनेजमेन्ट का कोई एक्सपीरियंस नहीं था उन्हें दिल्ली का नया कमिश्नर बनाया गया.

18 जुलाई को अनुराग कुमार ने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर का पद संभाला और इसी दिन सुबह भारी पुलिस और RAF फोर्स जंतर मंतर पहुंची. कुछ पुलिस वाले सादे कपड़ों में थे. यह पूरा ऑपरेशन कैमरे में न आए इसलिए पुलिस ने स्टेज और वांगचुक को सफेद चादरों से ढक दिया. 59 साल के वांगचुक को स्ट्रेचर पर लादकर गाड़ी में डाला गया और उन्हें सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया. इस दौरान अभिजीत दीपके के साथ पुलिस ने मारपीट की और उन्हें कुछ समय के लिए डिटेन भी किया लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के दौरान आंदोलन में शामिल लाखों युवाओं में से किसी एक ने भी क़ानून नहीं तोड़ा और न ही किसी भी तरह की कोई झड़प हुई.

इस घटना के विरोध में ही CJP ने 20 जुलाई को संसद मार्च का ऐलान किया था. अनुराग कुमार के पद संभालने के दो दिनों के बाद यानी 20 जुलाई को ही आंदोलनकारियों के साथ पुलिसिया बर्बरता की दर्दनाक घटना हुई. पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया. 150 से ज्यादा लोग घायल हुए और अस्पताल पहुंचे. कइयों को गंभीर चोटे आई हैं. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में 65 मेडिको-लीगल केस दर्ज हुए. एक महिला प्रदर्शनकारी पर DCP संदीप लंबा द्वारा थप्पड़ मारने का वीडियो वायरल हुआ, जिस पर PIL भी दायर हुई है. 70 से ज्यादा प्रदर्शनकारी हिरासत में लिए गए.

सोशल मीडिया पर पुलिस के लाठीचार्ज की क्रूर तस्वीरें वाइरल हुईं और जिनमें युवाओं, औरतों और बच्चों पर पुलिस ने लाठियाँ चलाई. मुख्यधारा की मीडिया में पुलिस की इस बर्बरता की कवरेज गायब रहीं. दिल्ली पुलिस की बर्बरता के सैकड़ों वीडियो शोशल मीडिया पर अपलोड हुए लेकिन इस पर मेन स्ट्रीम मीडिया में चर्चा तक नहीं है. दिल्ली पुलिस कह रही है कि संसद सत्र चल रहा था इसलिए कानून व्यवस्था बनाए रखना जरूरी था. पुलिस यह भी कह रही है कि दूसरी तरफ से पत्थरबाजी और हिंसा हुई तो कार्रवाई की गई लेकिन सच यही है कि यह बिलकुल शांतिपूर्ण मार्च था. पुलिस ने बिना जरूरत के लाठी चार्ज किया. सादे कपड़ों में भी कई लोग लाठियाँ भांजते दिखे. ज्यादातर पुलिसवालों के नेम प्लेट और बैच गायब थे. अनशन पर बैठे लोगों के टेंट के पास भी आंसू गैस छोड़ी गई.

क्रोनोलोजी समझने की जरूरत है. सतीश गोलछा के कमिश्नर रहते दिल्ली पुलिस का व्यवहार बिलकुल अलग था. कोई अप्रिय घटना नहीं हुई. पूरा प्रोटेस्ट बिलकुल शांतिपूर्वक चल रहा था. तो फिर सवाल यह उठता है कि अमित शाह को अचानक कमिश्नर को बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? अनुराग कुमार के पद संभालते ही दिल्ली पुलिस ने अचानक रंग क्यों बदला? क्या यह महज इत्तेफ़ाक है कि एक कमिश्नर के कार्यकाल के दौरान दो महीनों तक पुलिस शांत रही और कमिश्नर बदलने के अगले दिन ही सैकड़ों लोगों पर हिंसक तरीके से लाठियाँ बरसा दी गईं और सैकड़ों को डिटेन कर लिया गया? पुलिस की यह बर्बरता महज एक दुर्घटना नहीं थी और यह सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला नहीं था बल्कि यह पूरी तरह गहरी प्लानिंग का हिस्सा था. Jantar Mantar Protest

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