RSS Dynastic Politics: धर्मेंद्र प्रधान का जन्म 26 जून 1969 को ओडिशा के तालचेर में हुआ. उनके पिता डॉ. देवेंद्र प्रधान आरएसएस के पुराने और कर्मठ स्वयंसेवक थे जो बाद में भाजपा में सक्रिय हुए और वाजपेयी सरकार में राज्य मंत्री बने. धर्मेंद्र प्रधान की मां बसंता मंजरी भी राजनीती में सक्रिय रहीं और दोनों ने मिलकर ओडिशा में बीजेपी की नींव तैयार की. धर्मेंद्र प्रधान ने 1983 में एबीवीपी से राजनीति शुरू की और तालचेर कॉलेज में छात्र संघ के पदाधिकारी बने. पिता की छत्रछाया में धर्मेंद्र प्रधान ने कदम-दर-कदम राजनैतिक तरक्की की. वैसे यह आरएसएस की पुरानी परंपरा रही है जिसमें एक पीढ़ी की सेवा के बदले दूसरी पीढ़ी को सत्ता-हस्तांतरण होता है.

आरएसएस का सारा खेल राष्ट्रभक्ति की आड़ में चलता है. वह दूसरी पार्टियों पर परिवारवाद का आरोप लगाती है लेकिन हकीकत यह है कि इस मामले में आरएसएस किसी से कम नहीं है. यहाँ बाप की मेहनत का इनाम बेटे को मिलता है. देवेंद्र प्रधान के बाद उनके बेटे ने न सिर्फ उनकी जगह ली बल्कि शिक्षा मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद तक पहुंच गए. भाजपा वाले चिल्लाते हैं कि उनकी पार्टी में परिवारवाद नहीं है लेकिन सच यह है कि योग्यता की बजाय खून के रिश्ते यहां पद तय करते हैं.

भाजपा खुद को पार्टी विद डिफरेंस कहती है और परिवारवाद के खिलाफ बोलती है लेकिन जमीनी स्तर पर हकीकत कुछ और है. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह UP सरकार में मंत्री हैं, पियूष गोयल की पत्नी सीमा गोयल भाजपा महिला मोर्चा में सक्रिय हैं, केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के पिता प्रेम कुमार धूमल हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं, वर्तमान में भी वे हमीरपुर से सांसद हैं. योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ पीठ के पूर्व महंत के भतीजे हैं. केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय चौहान भाजपा युवा नेता हैं और चुनाव प्रचार संभालते हैं. ये लिस्ट पूरी नहीं है.

ऊपर सिर्फ वो नाम हैं जो सांसद, मंत्री या CM लेवल तक पहुंचे हैं. ऐसे लोगों की एक लम्बी सूची है जो नेपोटिज्म की विरासत से बीजेपी में नेता बने बैठे हैं. भाजपा का तर्क होता है कि ये लोग चुनाव जीतकर आते हैं, जनता चुनती है. पार्टी टिकट वंश के आधार पर नहीं, काम के आधार पर देती है. सवाल यह है कि बीजेपी फिर दूसरी पार्टियों पर परिवारवाद का आरोप क्यों लगाती है? उनके पास भी तो बिलकुल यही तर्क होते हैं. असल में भाजपा भी परिवारवाद पर ही चलती है बस नाम ‘परिवारवाद’ का नहीं लेती.

आरएसएस और भाजपा की विचारधारा का आधार ही परिवारवाद है. आरएसएस, रामराज्य के नाम पर जिस पौराणिकता को फिर से स्थापित करना चाहती हैं वहाँ सिर्फ परिवारवाद ही है. असल में सत्ता के ऊँचे पदों पर भरोसे के लोगों की जरुरत होती है और ऐसे में नये लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. आरएसएस के लिए शिक्षा मंत्रालय सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एजुकेशन सिस्टम को अपनी विचारधारा में ढालना सबसे जरुरी काम मानती है.

शूद्र यानी ओबीसी, एससी, एसटी और मुसलमानों को ऐसी शिक्षा की जरूरत ही क्या है जिससे वह द्विजों की बराबरी कर सकें? इसी मानसिकता के तहत आरएसएस ने शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर बर्बाद किया. यही वजह है शिक्षा जैसे संवेदनशील मंत्रालय को धर्मेंद्र प्रधान जैसे दो पीढ़ी के सबसे भरोसेमंद आदमी के हाथों में सौंप दिया गया ताकी शिक्षा पर पूरा कंट्रोल बना रह सके. RSS Dynastic Politics

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