Satluj Movie Review: फिल्म ‘सतलुज’ की कहानी 1990 के दशक के उस दौर की है जब पंजाब उबल रहा था. राज्य में इमरजैंसी जैसे हालात थे और कई विद्रोही गुट सिस्टम के खिलाफ हथियारबंद हो गए थे. उसी ‘इमरजैंसी’ को खत्म करने के लिए पुलिस को खुली छूट मिली हुई थी. खुली छूट में पुलिस वाले अपने निजी हित भी साध रहे थे, जिस में रिप्रेशन और फेक एनकाउंटर का लंबा दौर भी चल पड़ा था. यह फिल्म पुलिस द्वारा खींची इसी बारीक मगर गहरी लकीर को दिखाने की कोशिश करती है.
फिल्म ‘सतलुज’ मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के इर्दगिर्द घूमती है, जिस की भूमिका दिलजीत दोसां?ा ने निभाई है. खालरा कोई बड़े नेता या क्रांतिकारी नहीं थे, वे अमृतसर के एक सीधेसाधे बैंक मैनेजर थे. उन की जिंदगी में मोड़ तब आता है जब उन का एक दोस्त किरपाल अचानक गायब हो जाता है और उस की लाश महल्ले के चौराहे पर पड़ी मिलती है. किरपाल की मां अपने बेटे की खोजबीन में पुलिस के हाथों मारी जाती है.
खालरा जब इस सच का पता लगाने निकलते हैं तो उन के हाथ नगर पालिका के रजिस्टर और श्मशान घाट की लकडि़यों के वे बहीखाते लगते हैं, जिन में सैकड़ों लोगों को लावारिस बता कर जला दिया गया था. आगे बढ़ कर यह आंकड़ा करीब 25 हजार लोगों तक पहुंच जाता है. इस बात को ले कर जसवंत मुहिम छेड़ देते हैं, जिस के चलते उन्हें पुलिस द्वारा गायब कर दिया जाता है.
निर्देशक हनी त्रेहान ने फिल्म की कहानी को 2 हिस्सों में बांटा है. पहला हिस्सा जसवंत खालरा के किरदार को दिखाता है कि कैसे एक आम नौकरीपेशा इंसान अपनी सामाजिक जिम्मेदारी की वजह से इस रास्ते पर आ जाता है. वहीं दूसरा हिस्सा फिल्म को एक सस्पैंस और खोजी थ्रिलर के ट्रैक पर ले जाता है, जहां खालरा के अचानक गायब होने के बाद कोर्ट सीबीआई को मामला सौंप देती है और सीबीआई अफसर समुद्र सिंह (अर्जुन रामपाल) पंजाब आ कर जांच शुरू करता है.
इस जांच में वह जसवंत सिंह के गायब होने व पुलिस के इन्वौल्वमैंट के सुबूतों व चश्मदीदों की पड़ताल करता है. खास बात यह कि निर्देशक ने फिल्म में जबरदस्ती का कोई ड्रामा नहीं डाला है बल्कि यह फिल्म उस लाचारी को हूबहू दिखाने की कोशिश करती है जिस दौर से कभी पंजाब गुजरा.
हालांकि, फिल्म का विषय सब्जैक्टिव है. इस पर लंबी चर्चाएं चल सकती हैं. पंजाब में इमरजैंसी के दौर को संभालना एक बड़े चैलेंज से कम न था. फेक एनकाउंटर भी उस समय की हकीकत रहे, जिसे इग्नोर नहीं किया जा सकता. खुद सीबीआई जांच में जसवंत की हत्या मामले में हाईकोर्ट ने पंजाब पुलिस के 6 में से 4 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई.
फिल्म का टेंपलेट डार्क है, जो कुछकुछ अनुराग कश्यप की ‘ब्लैक फ्राइडे’ की याद ताजा कराता है. उस फिल्म को भी कई प्रतिबंध ?ोलने पड़े. ‘सतलुज’ की शुरुआत ही इस की एक बड़ी ?ालक है, जहां कुछ पुलिसवाले बैठ कर आराम से शराब पी रहे हैं, शादी और प्रमोशन जैसी घरेलू बातें कर रहे हैं और अचानक बात खत्म करते ही बंधक बनाए लोगों को गोली मार देते हैं. एक जूनियर पुलिसवाले का प्रमोशन तो सिर्फ इसलिए तुरंत कर दिया जाता है क्योंकि उस ने 2 कैदियों को मार गिराया.
इसी तरह एसएसपी सुग्गा (सुविंदर विक्की) का एक मां से बड़े प्यार से सागरोटी बनवाना और फिर उसी परिवार को खत्म करने की तैयारी करना सिहरन पैदा कर देता है. मोटामोटी फिल्म सिस्टम पर सवाल खड़े करती है.
ऐक्ंिटग के मामले में यह फिल्म मजबूत है. दिलजीत दोसां?ा ने जसवंत सिंह खालरा के किरदार को अच्छे से निभाया है. यह उन के पूरे कैरियर का सब से बढि़या काम कहा जा सकता है. दूसरी तरफ, सुविंदर विक्की ने एसएसपी सुग्गा के रोल में कमाल की ऐक्ंिटग की है. उन का ठंडा और क्रूर अंदाज अंदर तक डरा देता है. अर्जुन रामपाल ने सीबीआई अफसर समुद्र के रूप में अपना काम बखूबी किया है.
कंवलजीत सिंह ने डीजीपी बिट्टा के रोल में ताकत के उस घमंड को दिखाया है जो हर जायज आवाज को ‘विदेशी ताकतों का हाथ’ या ‘पब्लिसिटी स्टंट’ कह कर खारिज कर देता है. खालरा की पत्नी परमजीत के रोल में गीतिका विद्या के हिस्से ज्यादा स्क्रीनटाइम नहीं आया मगर क्लाइमैक्स में बिना कहे वह बहुतकुछ कह जाती हैं.
तकनीकी तौर पर के यू मोहनन का कैमरावर्क फिल्म की जान है. उन्होंने टोन को डार्क रखा है. पंजाब की अंधेरी रातों, सूने खेतों और गाडि़यों की हैडलाइट्स के जरिए एक ऐसा माहौल तैयार किया है जो फिल्म में थ्रिल बढ़ा देता है. एडिटिंग लैवल पर भी फिल्म में अच्छी कसावट दिखती है. बैकग्राउंड म्यूजिक का इस्तेमाल बहुत कम रखा गया है, जिस से सीन का असर बना रहे. Satluj Movie Review





