Gen Z Protest: कभी आंदोलन का मतलब होता था एक ऊंचे मंच पर धरना, नारे और लम्बे लम्बे भाषण. आज के जेन-ज़ी ने इस परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया है. अब विरोध सिर्फ सड़कों पर नहीं, इंस्टाग्राम की रीलों, एक्स की पोस्टों, मीम्स, रैप, वायरल वीडियो और तंज भरे कैप्शन में हो रहा है. सरकार में बैठे 60 से ऊपर के बूढ़े नेता सोचे रहे थे कि छत्रों के पिछवाड़े पुलिस के चार डंडे पड़ेंगे और सारा प्रदर्शन ठंडा पड़ जाएगा, लेकिन उसे शायद अंदाजा नहीं था कि इस बार मुकाबला उस जेन-ज़ी से है, जो हर लाठीचार्ज को मीम बना रहे हैं, हर आंसू गैस को रील का बैकग्राउंड और हर सरकारी बयान को इंटरनेट का नया मजाक. तभी तो कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन देखते-देखते जंतर-मंतर से निकलकर पूरे सोशल मीडिया पर छा गया.
दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ आंदोलन अब मुंबई, हैदराबाद, इंदौर, उदयपुर और कई दूसरे शहरों तक पहुंच चुका है. हजारों छात्र केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. लेकिन इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां गुस्सा भी है और हंसी भी. नाराजगी भी है और व्यंग्य भी.
एक विकलांग लड़का अपने दिव्यांग वाहन पर धरना स्थल पर पहुंचा और रील बना कर हंसता हुआ बोला – मैं भी पहुंच गया ही गया साला इनकी मां …..
20 जुलाई को जब प्रदर्शनकारियों को संसद की ओर बढ़ने से रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि कुछ ही मिनटों में वो दृश्य सोशल मीडिया पर लाखों लोगों के मनोरंजन और राजनीतिक चर्चा का विषय बन जाएंगे. किसी ने चक दे इंडिया के गाने पर भागते हुए वीडियो डाला, तो कोई सबवे सर्फर का संगीत लगाकर बता रहा था कि पुलिस से बचने का असली अनुभव कैसा होता है.
एक वायरल वीडियो पर लिखा था – ‘थैंक्स फॉर द कार्डियो, दिल्ली पुलिस!’ यानी सरकार ने फिटनेस अभियान को नया रूप दे दिया. व्यंग्य की यही ताकत है कि वह वहां भी चोट कर देता है, जहां लंबे भाषण असर नहीं कर पाते हैं.
सोशल मीडिया पर धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर खूब चुटकियां ली जा रही हैं. किसी ने लिखा कि ‘देश में नौकरियां इतनी कम हैं कि शायद मंत्री जी को दूसरी नौकरी नहीं मिल रही, इसलिए इस्तीफा नहीं दे रहे हैं.’
एक ने लिखा – ‘शायद महीने की सैलरी आने का इंतजार है, ताकि ‘फुल एंड फाइनल सेटलमेंट’ में नुकसान न हो.’ यह हास्य सिर्फ मनोरंजन नहीं है, बल्कि सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाने का नया तरीका है.
दिलचस्प बात यह है कि यह आंदोलन सिर्फ नारों तक सीमित नहीं रहा. युवा प्रदर्शनकारी ‘गेट रेडी विद मी’ और ‘आउटफिट ऑफ द डे’ जैसी रीलें बनाकर प्रदर्शन में पहुंच रहे हैं. एक युवती ने अपने वीडियो में लिखा – ‘आज सरकार के पतन का गवाह बनने जा रही हूं. मैंने पहन रखी है अपनी रीढ़ की हड्डी, झुमके और संवैधानिक अधिकार’ दूसरी ने कहा कि उसका मेकअप पूरे दिन नहीं बिगड़ा क्योंकि ‘मेरा फाउंडेशन मजबूत है, सरकार की तरह नहीं’
पर्यावरण को भी जेन-ज़ी ने व्यंग्य का हिस्सा बनाया. पुलिस द्वारा आंसू गैस छोड़े जाने पर एक पोस्ट में लिखा गया – ‘दिल्ली पुलिस, कृपया आंसू गैस मत छोड़िए. इससे प्रदूषण बढ़ता है, फिर हमें पर्यावरण मंत्री का इस्तीफा भी मांगना पड़ेगा’.
एक लड़के ने लिखा – ‘E20 पेट्रोल में मिलावट हो सकती है, लेकिन आंसू गैस पूरी तरह शुद्ध निकली’.
एक लड़के ने पुलिस द्वारा फेंके गए आंसू गैस के गोले को उठा कर वापस पुलिस वालों के बीच उछाल दिया और फिर वह नजारा कई लोगों ने कैप्चर कर वायरल कर दिया जब पुलिस वाले अपनी आँखें रगड़ते हुए भागते देखे गए.
एक अन्य लड़के ने आंसू गैस के गोले के खोल को उठा कर उसकी एक्सपायरी डेट देखी जो दिसंबर 2025 थी, वह हंसा और बोला – यार, चीज तो ठीक लाया करो.
मोदी सरकार की मुश्किल यह है यहां एक मीम कई बार पूरे सरकारी बयान पर भारी पड़ जाता है. जेन-ज़ी राजनीतिक भाषणों से कम और हास्य, व्यंग्य तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति से ज्यादा प्रभावित होती है. इसलिए हर नया वीडियो, हर नई रील और हर नया मीम आंदोलन को और आगे बढ़ा रहा है.
प्रदर्शन में बैटमैन, स्पाइडर-मैन, सुपरमैन और आयरन मैन जैसे किरदार भी दिखाई दे रहे हैं. महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर की वेशभूषा में भी लोग पहुंचे हुए हैं. संदेश साफ है – इस दौर का आंदोलन सिर्फ नारों से नहीं, प्रतीकों और दृश्य संस्कृति से चलेगा.
हास्य का यह सिलसिला निजी जिंदगी तक भी पहुंच गया है. एक ने अपनी एक्स के बारे में लिखा – ‘आज आंसू गैस के धुएं में उन्हें याद करके रो दिया.’ दूसरे ने कहा – ‘इतना इग्नोर तो उसने भी नहीं किया था’ और एक प्रदर्शनकारी ने तो यहां तक कह दिया कि जो अब तक सिंगल हैं, उन्हें आंदोलन में जरूर आना चाहिए, शायद यहीं जीवनसाथी मिल जाए.
यह सब देखकर सरकार के लिए चुनौती बढ़ गई है. विरोध का यह नया रूप पारंपरिक राजनीति की समझ से बाहर है. यहां युवाओं के हाथ में सिर्फ पोस्टर नहीं, कैमरा भी है. सिर्फ नारे नहीं, मीम्स भी हैं. सिर्फ भाषण नहीं, वायरल रीलें भी हैं. सत्ता इसे हल्के में ले या गंभीरता से, लेकिन यह साफ है कि डिजिटल दौर में आंदोलन की भाषा बदल चुकी है.
लोकतंत्र में असहमति कोई नई बात नहीं है, लेकिन जेन-ज़ी ने यह दिखा दिया है कि विरोध हमेशा गुस्से में नहीं होता है. कभी-कभी एक तीखा मजाक, एक वायरल वीडियो और एक मीम भी सत्ता से उतने ही असहज सवाल पूछ सकता है, जितने किसी लंबे भाषण या बड़े धरने से पूछे जाते हैं. और शायद यही वजह है कि आज सरकार को सिर्फ सड़कों पर नहीं, मोबाइल स्क्रीन पर भी सबसे बड़ी चुनौती दिखाई दे रही है. और यही वजह है कि वह बार बार इंटरनेट बंद कर रही है, सेवाएं बाधित कर रही है. Gen Z Protest





