RSS in Indian Judiciary: लोकतंत्र में हमेशा यह अपेक्षा की जाती है कि जज अपनी निजी धारणाओं के बजाय संविधान के सिद्धांतों को ऊपर मानें. लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता. जज भी आखिर समाज का ही हिस्सा होते हैं. वे किसी शून्य में पैदा नहीं होते. उन के अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक अनुभव होते हैं, इसलिए कभीकभी उन के फैसलों और टिप्पणियों में व्यक्तिगत मान्यताओं की झलक दिखाई दे जाती है.
वहीं, सत्ता के लिए भी अपने नैरेटिव को कानूनी जामा पहनाने के लिए न्यायपालिका में घुसपैठ जरूरी होती है, इसलिए सत्ता अपनी विचारधारा के लोगों को न्यायपालिका में फिट करने की हर संभव कोशिश करती है. यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में न्यायालयों के ऐसे निर्णयों की भरमार नजर आने लगी है जिन के फैसलों में आरएसएस का नैरेटिव साफ नजर आता है. कुछ जजों ने महिलाओं के कपड़ों, प्रेम संबंधों या नैतिकता को ले कर ऐसी टिप्पणियां कीं जिन की बाद में खूब आलोचना हुई. कई बार सुप्रीम कोर्ट को ऐसे फैसलों को पलटना भी पड़ा.
परिवार की इज्जत व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर नहीं
परिवार की इज्जत को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर रखने के पीछे की मानसिकता असल में प्रेम विवाह पर रोक लगाने की साजिश ही है. एक लोकतांत्रिक समाज में व्यक्ति की आजादी परिवार की प्रतिष्ठा से बड़ी होनी चाहिए. अदालतों में बैठे जजों का दायित्व भी इसी सिद्धांत की रक्षा करना है न कि सामाजिक रूढि़यों को न्यायिक मान्यता देना.
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारतीय न्यायपालिका में बैठे कुछ लोगों के दिमाग में पितृसत्ता की मानसिकता गहरी जड़ें जमाए हुए है. यह फैसला न सिर्फ 2 बालिगों की पसंद के खिलाफ है बल्कि औरतों की आजादी पर सीधा हमला भी है. इस फैसले के बाद यह तय है कि कुछ जज औरत को स्वतंत्र नागरिक के रूप में देखना पसंद नहीं करते बल्कि वे औरत को परिवार की इज्जत का बो?ा उठाने वाली वस्तु के रूप में देखते हैं.
परिवार की इज्जत का कौन्सेप्ट सदियों से औरतों के शरीर और उन की पसंद को कंट्रोल करने का सब से ताकतवर औजार रहा है. जवान बच्चों के घर छोड़ कर अपने पार्टनर के साथ रहने से मातापिता की इज्जत धूल में मिलती है. यह सोच दरअसल औरतों को उन की सैक्सुअलिटी और रिलेशनशिप की पसंद से जोड़ कर परिवार की प्रौपर्टी मानने की पुरानी और सड़ी हुई मानसिकता का हिस्सा ही है.
दो बालिगों के अपनी मरजी से साथ रहने के फैसले से अगर मातापिता की गरिमा को चोट पहुंचती है तो क्या औरतों का शरीर, उन की इच्छा और उन का जीवन परिवार की प्रतिष्ठा का हिस्सा मान लिया जाए? पितृसत्तात्मक समाज औरतों को आजाद इंसान नहीं, बल्कि परिवार, जाति और समाज की इज्जत की जीतीजागती मूर्ति मान कर चलता है. RSS in Indian Judiciary





