मध्यप्रदेश उन हिंदी भाषी राज्यों में से एक है जहाँ कांग्रेस अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत है लेकिन इसका फायदा वह नहीं उठा पाती वजह उसमे पसरी शाश्वत गुटबाजी और अंदरूनी कलह है . मुख्यमंत्री मोहन यादव पर जमीन घोटाले पर उठी उँगलियाँ जल्द ही मुट्ठी में सिकुड़ गईं . सनसनी मची और मोहन यादव कटघरे में भी खड़े आए लेकिन भाजपा आलाकमान का आशीर्वाद उन्हें बचा ले गया .

कांग्रेस नेत्री मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा के लिए जब नामांकन चुनाव अधिकारी ने रद्द किया था तब बहुत सी चर्चाओं के बीच एक यह भी हुई थी कि उनके खिलाफ तेलंगाना के मामले की खबर खुद कांग्रेसियों और उनमें भी दिग्विजय सिंह ने लीक की थी . क्योंकि वे दोबारा राज्यसभा जाना चाहते थे . लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने सख्ती से मना कर दिया था . दिग्विजय सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी अनदेखी सियासी हलकों में बहुत हलके में ली जाए . इस बात या अफवाह को फ़ैलाने में भाजपाइयों का रोल अहम रहा था . आम लोगो ने भी इस पर असहमति नहीं जताई थी .

सच जो भी हो , बात हो हल्ले के बाद  आई गई हो गई थी . मुमकिन है मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव और उनके परिजनों पर जमीन घोटाले के जो आरोप लगे हैं वे भी कल को आए गए हो जाएँ जिनके बारे में यह चर्चा आम रही कि इन घोटालों को उजागर करवाने में खुद भाजपाइयों और उनमें भी खासतौर से शिवराज सिंह चौहान का रोल अहम रहा . जो यह जताना चाह रहे थे कि उन्हें हल्के में न लिया जाए उनके बगैर कोई और प्रदेश नहीं चला सकता .

गौरतलब है कि उठापटक और खुराफात की राजनीति में शिवराज सिंह दिग्विजय सिंह से उन्नीस नहीं माने जाते  .राजनीति के चरित्र का यह स्वभाव या विशेषता महाभारत के युद्ध से प्रेरित ज्यादा है जिसमे कोई किसी का सगा नहीं था .मुगल शासकों के इतिहास का भी असर आम लोगों के जेहन में है कि सत्ता कुर्सी पर बैठे हुए को धकियाकर ही हासिल की जा सकती है . .मोहन यादव और उनके परिवार पर लगे आरोपों पर कांग्रेस स्वभाविक रूप से हमलावर है . उसके वरिष्ठ नेता राज्यसभा सांसद जयराम रमेश के मुताबिक भाजपा प्रशासन के तहत भ्रष्टाचार  फल फूल रहा है . मध्यप्रदेश में `डबल इंजिन` बाली सरकार में लूट का इंजिन पूरी रफ़्तार से चल रहा है . जिसके मास्टर माइंड खुद मोहन यादव हैं . बकौल जयराम रमेश मुख्यमंत्री के खिलाफ खबरें फ़ैलाने का काम केन्द्रीय कृषि मंत्री ( शिवराज सिंह चौहान ) ने करवाया है . ऐसा लगता है कि कुर्सी और लूट में हिस्सेदारी को लेकर अंदरूनी कलह चल रही है .

जयराम रमेश के सोशल मीडिया पर दिए गए इस कमेंट के बाद मध्यप्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने प्रेस कांफ्रेंस करते कहा , `मोहन यादव पर लगे आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में मौजूदा जस्टिस से सलाह लेना चाहिए . खुद मोहन यादव को स्पष्ट करना चाहिए कि उनके पदभार सँभालने के बाद उनके परिवार की जमीन `कथित तौर` पर 100 एकड़ से बढ़कर 335 एकड़ कैसे हो गई` .

जब उजागर हुआ `कथित` घोटाला

जीतू पटवारी और मोहन यादव दोनों एक दूसरे पर चढ़ाई करने का कोई मौका नहीं छोड़ते , उलटे कई बार तो वे खुद मौका गढ़ लेते हैं . लेकिन जमीन घोटाले को लेकर जीतू का बेहद संभलकर शब्द “कथित तौर` पर` … इस्तेमाल करना.बताता है कि वे खुद आश्वस्त नहीं हैं कि जमीन इतने से उतनी हुई होगी . जबकि होना तो यह होना चाहिए था कि वे इस आरोप में नमक मिर्च लगाकर पूरे दमखम और आत्मविश्वास से उठाते और हवा देते .

उनके बयान के मुकाबले लोगों ने जयराम रमेश के बयान पर ज्यादा तवज्जुह दी क्योंकि वह मध्यप्रदश की राजनीति के हिसाब से मौजू है . लोग ऐसी ही गासिप पसंद करते हैं , उसमे सच कितना है और झूठ कितना है इससे कोई वास्ता नहीं रखते . उन्हें तो बस चटखारे लेने के लिए मसौदा चाहिए रहता है .

यह हल्ला कोई गुल खिला पायेगा ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि जिस अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने इसे उठाया है उसने आंकड़े भर दिए हैं . किसी बहुत बड़े घोटाले या गोलमाल का जिक्र नहीं किया है . जो भाजपाई पलटवार को पुख्ता करने बाली बात है कि मोहन यादव और उनका परिवार अरसे से जमीनों का कारोबार कर रहा है . ऐसे में अगर उसने कुछ जमीनों की खरीद फरोख्त कर ली तो इसमें घोटाला कहाँ से आ गया . जमीने खरीदना कोई गुनाह तो नहीं .एक तरह से विवाद उठाना या उठवाना स्पांसर्ड ज्यादा लग रहा है .

इंडियन एक्सप्रेस ने अपने 25 जून 2026 के अंक में एक लम्बी चौड़ी खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसके मुताबिक – मोहन यादव के परिवार और उनसे जुडी रियल एस्टेट कम्पनियों ने मुख्यमंत्री बनने के बाद उज्जैन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जमीनें खरीदीं और उन जमीनों का एक बड़ा हिस्सा बाद में सरकारी सडक एवं विकास परियोजनाओं से लाभान्वित होने बाले क्षेत्रों में था . बकौल इंडियन एक्सप्रेस , कुल 137 प्लाट ख़रीदे गए जिनका कुल क्षेत्रफल 168 एकड़ है . इन जमीनों का खरीदी मूल्य 45 करोड़ रु है .

इसमें गौरतलब बात यह है कि अधिकतर खरीद दिसम्बर 2023 के बाद की गई जब मोहन यादव मुख्यमंत्री बन चुके थे . इस खोजी रिपोर्ट में कहा गया है कि जमीनें केवल मुख्यमंत्री के नाम पर नहीं बल्कि उनकी पत्नी सीमा यादव , पुत्र वैभव , पुत्रवधु शालिनी यादव ,  भाई नारायण और नन्दलाल यादव के अलावा नारायण यादव की पत्नी रेखा और चचेरे भाइयों गोविन्द और नीलेश यादव तथा परिवार से जुडी रियल एस्टेट कम्पनियों के नाम पर भी खरीदी गईं .इन जमीनों का अधिकांश हिस्सा उन क्षेत्रों में है जिन्हें उनकी सरकार द्वारा घोषित सडक परियोजनाओ और भूमि उपयोग परिवर्तन से लाभ हुआ है .

ये भूखंड या तो उज्जैन या फिर उसके आसपास घोषित नई सडक परियोजनाओ के नजदीक हैं . उज्जैन मास्टर प्लान 2035 मोहन यादव के दिसम्बर 2023 में मुख्यमंत्री बनने के पहले जारी किया गया था . लेकिन मोहन यादव दशकों से उज्जैन के पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास में शामिल रहे हैं . 2004 से 2010 तक वे उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष थे और 2011 से 2013 तक मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम के मुखिया थे .हालाँकि मोहन यादव के मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद दिसंबर 2023 में भी जयराम रमेश ने आरोप लगाया था कि यादव के खिलाफ उज्जैन मास्टर प्लान में बड़े पैमाने पर हेराफेरी करने के गंभीर आरोप हैं .तब भी प्रदेश कांग्रेस और जीतू पटवारी की भद्द इस बात पर पिटी थी कि इस तरह के आरोप जयराम रमेश को क्यों उजागर करना पड़ते हैं प्रदेश कांग्रेस क्यों सोती रहती है .

इसके बाद 2013 में वे उज्जैन दक्षिण सीट से विधायक चुने गये थे .बकौल इंडियन एक्सप्रेस मोहन यादव के पुत्र  वैभव यादव और बहन कलावती के नाम उज्जैन के आसपास कम से कम 179 एकड़ के 108 भूखंड हैं . जिनमे से कम से कम 85 एकड़ जमीन 2021 से लेकर 2023 के दौरान खरीदी गई थी जब मोहन यादव उच्च शिक्षा मंत्री थे .

कुल जमा सार इस रिपोर्ट का यह कि यादव परिवार और उसकी कम्पनियों के पास पहले से भी जमीने थीं लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद जमीने मुहिम की शक्ल में खरीदीं गईं और सरकारी योजनाओ और परियोजनाओ को कुछ ऐसे अंजाम दिया गया कि इन जमीनों की कीमत बढ़े . अख़बार ने खरीदी गई जमीनों की पूरी जमीन कुंडली प्रकाशित की है जिसमे यह बताया गया है कि ये किन इलाकों में हैं , उनका पंजीयन रिकार्ड , रेवेन्यू रिकार्ड और कम्पनी रिकार्ड भी दिया गया है जो कि जरुरी भी था नहीं तो कोई इस रिपोर्ट पर आसानी से यकीन नहीं करता .

1 रु में 500 करोड़ की जमीन

जुलाई का तीसरा सप्ताह आते आते मोहन यादव की जमीनों का मुद्दा हवा हो गया लेकिन लोगों ने यह मान लिया कि यह धुआ वेवजह तो नहीं उठा होगा . कुछ तो सच्चाई इसमें होगी . इसी बीच एक आरोप जीतू पटवारी ने यह लगा डाला कि यादव सरकार ने उज्जैन के एक निजी ट्रस्ट को महज 1 रु की सालाना लीज पर 500 करोड़ की जमीन दे दी . इस मामले की भी जांच होनी चाहिए .

कुछ होता इससे पहले ही दिग्विजय सिंह के इस बयान ने और ज्यादा खलबली मचा दी कि उपलब्ध रिकार्ड के मुताबिक वीर भारत न्यास कोई `निजी ट्रस्ट` नहीं बल्कि प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग के तहत काम करने बाला सरकारी ट्रस्ट है .इसलिए `निजी ट्रस्ट` को 1 रु में जमीन देने बाला आरोप सही नहीं है .
इस विरोधाभास पर भी कांग्रेस की किरकिरी हुई थी कि उसके नेता आरोप लगाने के पहले जांच तो कर लिया करें कि वे जो बोल रहे हैं उसमे तथ्य हैं या नहीं . इसे कांग्रेस की गुटबाजी की लड़ाई के तौर भी देखा गया था क्योंकि जीतू पटवारी की गिनती कमलनाथ खेमे में होती है . यह चर्चा भी आम रही कि दिग्विजय सिंह अपने बेटे जयवर्धन सिंह को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनबाना चाहते हैं इसलिए तुरंत उन्होंने जीतू पटवारी के आरोप की पोल खोल कर भाजपाई खेमे को तकलीफ उठाने का मौका नहीं दिया .

रिपोर्ट बनाम सफाई  

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के उजागर होते ही न केवल मध्यप्रदेश बल्कि देश भर के सियासी हलकों में चर्चाओं और अफवाहों का बाजार गर्म हो उठा जिनमे से एक यह अहम थी कि अब मोहन यादव `नप` जायेंगे . कांग्रेस ने उनके इस्तीफे की मांग की लेकिन भाजपा ने एक जुट होकर मोहन यादव के बचाव की रणनीति पर काम किया .सबसे पहले तो खुद मोहन यादव ने सफाई दी कि 2023 के बाद उनकी व्यक्तिगत भूमि में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है और उनका परिवार वर्षों से रियल एस्टेट कारोबार में सक्रिय है .

मोहन यादव ने मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी बयान में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का पॉइंट टू पॉइंट खंडन करते हुए यह भी कहा कि पत्नी सीमा यादव की भूमि में भी कोई बदलाव नहीं हुआ है .जमीनों का अधिकतर हिस्सा मुख्यमंत्री बनने के पहले 2008 और 2019 के बीच ख़रीदा गया . इस स्पष्टीकरण को सच माने तो शक इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर ही गहराता है . मुख्यमंत्री के मुताबिक जो आरोप उनकी कम्पनो सिद्धि विनायक देवकांन प्राइवेट लिमिटेड पर लगे हैं उसकी स्थापना साल 2008 में कृषि गतिविधियों के लिए की गई थी . इस कम्पनी के निदेशक पद से मोहन यादव और सीमा यादव फरबरी 2017 में ही इस्तीफ़ा दे चुके हैं .और तो और इस कम्पनी की जमीन बढ़ने के बजाय घटी ही है . जून 2026 तक यह 65.69 एकड़ रह गई जो नवम्बर 2023 में 68.43 एकड़ थी .

इस लम्बे चौड़े स्पष्टीकरण में वैभव और शालिनी यादव की जमीनों की स्थिति का हवाला दिया गया है लेकिन यह पॉइंट उससे भी ज्यादा अहम है कि यह दावा बेबुनियाद है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद सड़कों राजमार्गों या विकास परियोजनाओ की योजना उन्हें या उनके परिवार को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गईं थीं .

तो फिर दिक्कत क्या यह है यह बात समझ से परे है क्योंकि जितनी शिद्दत से रिपोर्ट जारी की गई थी उससे ज्यादा उदासीनता से ख़ारिज सी भी हो गई . चार दिन पूरे भाजपाई खासतौर से मोहन यादव मंत्रिमंडल के सदस्य उनके बचाव में तरह तरह की दलीलें देते रहे . प्रशासनिक गलियारों में जो चर्चाएँ आम रहीं उनमे सबसे प्रमुख यह थी कि खेल या लोंचा सरकारी  विज्ञापनों का हो सकता है . मध्यप्रदेश जन संपर्क विभाग सालाना मोटा भुगतान इंडियन एक्सप्रेस को विज्ञापनों के एवज में करता है मुमकिन है उसमे कटौती कर दी गई हो या हो गई हो .

जनसंपर्क विभाग के बाहर चाय पान की इकलौती गुमठी पर मार्केटिंग प्रतिनिधियों के बीच यह चर्चा ज्यादा रही कि असल में मोहन यादव के कार्यकाल में नागपुर और दिल्ली के इशारे पर भाजपा और आरएसएस समर्थित पत्र पत्रिकाओं को भर भर कर विज्ञापनों के जरिये `ओबलाइज` किया जा रहा है जिससे बड़े और प्रभावी मीडिया हाउस चिढ़े हुए हैं . इंडियन एक्सप्रेस को कुल कितने के विज्ञापन दिए गये यह आंकड़ा किसी के पास नहीं क्योंकि ऐसे आंकड़े जारी करने का प्रावधान ही नहीं है .

यादव जाति की सियासत

लेकिन सभी लोग ऐसा नहीं मानते . आम लोगों की राय वही है जो जयराम रमेश ने जाहिर की या फिर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने दी जो महज यादव होने के नाते यादव धर्म निभाते  मोहन यादव का बचाव करते नजर आए . उनके मुताबिक यह विवाद मोहन यादव को बदनाम करने के लिए रचा गया है . ताकि भाजपा मध्यप्रदेश सहित उत्तरप्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों को भी बदल सके . मोहन के बहाने अखिलेश उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी लपेटे में लेते हुए बोले कि उन्होंने भी 300 से 600 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है .

बकौल अखिलेश मोहन यादव राजनीति में आने से पहले रियल एस्टेट का काम करते थे इसलिए उनके जमीन खरीदने या उनमे निवेश करने में कोई नई या गलत बात नहीं है . क्या यह बात भाजपा को मालूम नहीं थी .एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश कर रहे अखिलेश यादव की दिलचस्पी मध्यप्रदेश से ज्यादा मोहन यादव के बचाव और उससे भी ज्यादा योगी आदित्यनाथ को घेरने में दिखी .हालाँकि उनके बयान पर सोशल मीडिया पर आम प्रतिक्रिया यह रही कि योगी जी को घेरने के चक्कर में आप अपनी बिरादरी के भ्रष्टाचारी मोहन यादव को बचाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं .

जमीन विवाद या कथित घोटाले का रुख जाति की तरफ मोड़ने में भाजपा भी पीछे नहीं रही . मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने एक वीडियो जारी करते कहा , कांग्रेस का इतिहास हमेशा से पिछड़ा वर्ग के नेतृत्व को कमजोर करने का रहा है . जब भी मध्यप्रदेश में ओबीसी का कोई मुख्यमंत्री बना है चाहे वह उमा भारती हो या शिवराज सिंह चौहान हों या मोहन यादव कांग्रेस ने उनके खिलाफ साजिश रचकर उन्हें कमजोर करने की कोशिश की है .

हेमंत खंडेलवाल के बयान से सहमति जताते सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर भाजपा सोशल मीडिया प्रमुख अमित मालवीय का भी बयान यह आया कि विपक्ष का यह अभियान जबाबदेही के लिए नहीं बल्कि जनता के समर्थन में लोकतान्त्रिक राजनीति में आगे बढ़े एक ओबीसी मुख्यमंत्री को बदनाम करने की साजिश है .

हालत यह रही कि कांग्रेस और भाजपा एक दूसरे पर यह आरोप लगाते रहे कि  इंडियन एक्सप्रेस की यह खोजी रिपोर्ट उसके प्रोत्साहन और शह पर रची गई . यानी इस अंग्रेजी दैनिक का इस रिपोर्ट में अपना कुछ नहीं है . जो भी उजागर किया गया उसमें या तो भाजपा का या फिर कांग्रेस का हाथ था . यह मोदी राज में मीडिया की बदहाली का ही उदाहरण है कि उसकी अहमियत , रसूख ,साख , विश्वसनीयता और वजूद राजनीति की बलि चढ़ गए हैं . हालाँकि इसकी जिम्मेदार उसकी व्यवसायिक मानसिकता भी कम नहीं .

लोकप्रियता और आज्ञाकारिता बनी ढाल  

मोहन यादव को भाजपा ने जिन हालातों में मुख्यमंत्री बनाया था वे चौंका देने बाले थे . क्योंकि यह नाम अप्रत्याशित था . सियासी पंडितों की लिस्ट में मोहन यादव का नाम सबसे नीचे भी नहीं था . विधानसभा चुनाव में भाजपा के बहुमत में आने के बाद माना यह जा रहा था कि उसके पास शिवराज सिंह चौहान को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाने का अलावा कोई रास्ता नहीं है . क्योंकि अगर वह दूसरी पंक्ति के किसी नेता को यह कुर्सी सौंपती है तो पार्टी दो फाड़ हो जाएगी वजह ये छह सात नेता एक दूसरे की टांग खिंचाई में लग जायेंगे . क्योंकि लाइन में शिवराज सिंह के ठीक पीछे दिग्गज कैलाश विजयवर्गीय सहित प्रह्लाद पटेल ,बीडी शर्मा , नरेन्द्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी थे .

आरएसएस के मार्ग निर्देशन में जब मोहन यादव का नाम शिवराज सिंह के मुंह से ही घोषित करवाया गया तो इन सभी का दिल टुटा था . लेकिन ख़ुशी इस बात की थी कि एक नये नवेले को सीएम बनाया गया हमारी कद काठी बाले को नहीं . उधर शिवराज सिंह भी सकते में थे जिनका जनता के बीच भारी विरोध था और लोग उनसे खफा भी थे , इस हकीकत से वाकिफ भाजपा आलाकमान ने उन्हें बतौर सीएम प्रोजेक्ट न करने में ही भलाई समझी थी .हालाँकि एक आकलन यह भी कमजोर नहीं था कि अगर शिवराज सिंह पांचवी बार मुख्यमंत्री बने तो प्रधानमन्त्री पद के स्वभाविक दावेदार हो जायेंगे इसलिए उनके पर मोदी शाह के इशारे पर कुतरे गए .

अब हर किसी की निगाह मोहन यादव पर थी कि वे कैसे प्रदेश चला पाएंगे क्योंकि उन्हें इतना तजुर्बा नहीं है कि वे शिवराज सिंह के विकल्प बन सकें . आम अंदाजा यह था कि साल छह महीने में मोहन यादव चलता कर दिए जायेंगे और जनता की नाराजी दूर हो जाने पर शिवराज सिंह को फिर से यह पद सौंप दिया जायेगा . लेकिन मोहन यादव ने ताबड़तोड़ मेहनत की और खुद को साबित कर दिखाया तो शिवराज सहित दूसरी पंक्ति के तमाम नेता निराश हो उठे जिन्हें भोपाल में ही समेटते मोहन यादव के अंडर में ही काम करने मजबूर कर दिया गया था .

ढाई साल मोहन यादव ने किया कुछ खास नहीं है . वे सुबह हवाई जहाज में बैठकर प्रदेश में कहीं भी फुर्र होकर शिलान्यास , भूमि पूजन , उद्घाटन करते रहे और इनसे भी ज्यादा प्रिय काम लाडली बहनाओं की राशि सिंगल क्लिक पर उनके खाते में डालते रहे . यही सिंगल क्लिक- सिंगल क्लिक का खेल किसान कल्याण राशि के मामले में भी उन्होंने बहुत खेला . इस दौरान उन्होंने जमकर यादव वाद फैलाया अपनी पसंद के अफसर मलाईदार और अहम महकमो में बैठाये . लेकिन मध्यप्रदेश कर्ज की खाई में गहरे तक धंस चुका है और प्रदेश में भ्रष्टाचार चरम पर है इस पर उन्होंने कभी गौर नहीं किया .

मोहन यादव ने कुर्सी पर बने रहने का इकलौता फार्मूला अच्छे से कन्ठष्ठ कर लिया कि जैसा मोदी , शाह और भागवत कहें उसे “बिनही विचार करिए शुभ जानी“……. की तर्ज पर करते जाना है . फिर भले ही यूसीसी लागू करना हो ,मन्दिरों को करोड़ों रु खर्च चमकाना हो , अजान के माइको की आवाज बंद करना हो या फिर मुसलमानों और आदिवासी, दलितों पर अत्याचार होते रहने देना हो  .

अब इसके एवज में कुछ जमीन जायदाद बना भी लीं तो यह तो उनका हक या मेहनताना कुछ भी कह लें बनता है उस पर हल्ला वेवजह है . क्योंकि भाजपा का बिरला ही मंत्री होगा जो जमीन जायदाद और पैसा न बना रहा हो .इसकी बेहतर मिसाल खुद शिवराज सिंह चौहान हैं जिनकी जमीने अपने गाँव जेत सहित विदिशा से सटे गाँव उदयगिरी , बेस , टीला से लेकर ढोलखेडी तक विस्तार ले चुकी हैं और , और लेती भी जा रही हैं .

 

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