Hindi News stories: आइए शुरुआत विषय के चंद कालजयी वाक्यों से करते हैं. ‘जिस फाइल में धूल चढ़ी हो वह रिश्वत के शगुन का इंतजार कर रही है.’ घूस वह मंत्र है जिस से सरकारीकर्मी मंत्रमुग्ध हो काम सहर्ष कर देता है. भ्रष्टाचार आम जनता को सरकारी कार्यालयों से जोड़ने वाला एक पुल है. वरना जनता मझेदार में ही फंसी रहती है. ईमानदारी से यदि कोई कार्य होता है तो वह है बेईमानी. आम आदमी आवश्यक नकदी के लिए तरसता है, दूसरी ओर, रिश्वतखोरों की नकदी जगह के लिए तरसती है.

अभी तक टेररिज्म को गुड व बैड में परिभाषित होते सुना था. इस समय टौप पर करप्शन चल रहा है. आम आदमी के लिए 52 ग्राम सोना भी स्वप्न से कम नहीं. भोपाल में पकड़े गए 52 किलो सोना को सुन कर तो वह गश खा गया है. व्यवस्था भ्रष्टाचार को केवल रोकने की इच्छा जाहिर करती है, इस के लिए ठोस आवश्यक कदम नहीं उठाती क्योंकि वह उठाना नहीं चाहती.

स्वतंत्रता के बाद से भ्रष्टाचार की गंगा का पाट व गहराई बढ़ती जा रही है. यह वर्षभर रिश्वतखोरी व करप्शन की बाढ़ से उफनती रहती है. इस बाढ़ में आम आदमी, युवाओं, व्यवसाइयों, उद्यमियों के अरमान बह जाते हैं. महंगाई व भ्रष्टाचार दोनों अमरबेल हैं. समय आ गया है इस की परिभाषा परिमार्जित कर इसे कुछ वैधानिक मान्यता दे दी जाए. रिश्वतखोरी को वैधानिकता का चोला पहनाने से काफी समस्या जड़ से खत्म हो जाएगी. छापामारी ईमानदारी की तरह न्यून हो जाएगी. तो, जनता के असहज होने की स्थिति भी नहीं बनेगी. दूसरी ओर, गुड करप्शन व बैड करप्शन के रूप में श्रेणीकरण समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में उठाया कदम साबित होगा.

गुड करप्शन यानी कि यदि कोई व्यक्ति अपनी मरजी से किसी को अपना कार्य संपन्न हो जाने के बदले कुछ दे दे तो इसे भ्रष्टाचार न माना जाए. इसी तरह यदि कोई सरकारी अधिकारी कोई निर्माण या अन्य कार्य करवाते हुए अपनी योग्यता संपर्क, पद या पुरुषार्थ से कुछ पेटी/खोखे की बचत कर ले तो उसे गुड करप्शन में सूचीबद्ध किया जाए. एक उदाहरण से समझते हैं. विधायक व सांसद महोदय अपने फंड से मान लीजिए एक तालाब सरपंच को स्वीकृत कर दें पर साथ ही उसे नसीहत दे दें कि तुझे इस में से 100 कुरसीटेबल निकाल कर स्थानीय स्कूल में देना है तो यह गुड करप्शन ही कहा जाना चाहिए.

गुड व बैड टच की तरह करप्शन को भी गुड व बैड के रूप में आम आदमी को समझने सैमिनार/वर्कशौप किए जाएं. जैसे कि किसी सरकारी कार्यालय में आप कोई बिल मान लीजिए 1,781 रुपए का जमा करने गए. अब कर्मी ने आप के 219 रुपए डकार लिए तो इसे बैड करप्शन नहीं मान कुपित होने की आवश्यकता नहीं. जो दूसरों की मलाई से अपने लिए मलाई निकाल लेता हो उसे वर्गीकृत करना समय की मांग है. अन्यथा, अभी देखिए न करप्शन का वर्गीकरण न होने से एक केस में आधा दर्जन एजेंसीज अपनी एनर्जी व समय लगाती हैं.

बैड करप्शन करने वाले को बिलकुल न छोडा़ जाए. जैसे कि कोई सरकारी अधिकारी या कर्मचारी किसी किसान की जमीन की नपाई उस के तपती धूप में भी बारबार गुहार करने के बाद भी नहीं कर रहा हो तो फिर उस की आवश्यक नपती एजेंसी अवश्यंभावी करे या फिर कोई शिक्षित बेरोजगार कोई स्वरोजगार शुरू करने जा रहा हो पर कोई अधिकारी-कर्मचारी या वित्तीय संस्था उस से खुरचन की उम्मीद करे तो फिर उस की नपती का भी इंतजाम जरूर किया जाए.

बैड करप्शन में और भी मामले सूचीबद्ध किए जा सकते हैं जैसे कि राशनकार्ड बनवाने में पैसे की मांग. यानी जो छोटेमोटे मामले हैं वे बैड करप्शन में आएंगे. आप के दिमाग में यह बात आ रही है कि किसी परिवहनकर्ता, जिस के कई दर्जन ट्रक-बस आदि हों, को परमिट देने को बैड करप्शन में माना जाए कि गुड में? तो यह चिंता तो करो कि जो विभाग इस के लिए जाना जाता है उस की इमेज का फिर क्या होगा. समृद्ध व साझ विरासत की जड़ पर मट्ठा डाल खत्म करने पर तुले हो क्या. वैसे, इस से रिच विरासत वाले विभाग हैं. वे जब सामने आएंगे तो आप गश खा कर गिर पड़ेंगे.

इस का एक और पहलू है. सरकार गरीबों, उद्योगपतियों सब के लिए स्कीम पर स्कीम ले कर आती रहती है. एक आम आदमी के लिए वह ले आए करप्शन क्षतिपूर्ति भत्ता. यह हर उस आदमी को मिलेगा जिस का कोई कार्य किसी सरकारी कार्यालय से होना है. आयुष्मान भारत की तरह आयुष्मान भ्रष्टाचार भव की तरह यह योजना होगी. अब आदमी बेखौफ सरकारी दफ्तर जाए, अपना कार्य करवाए और तय रकम दिलेरी से दे कर आए. कोई ईमानदार टाइप बेईमान कम मांगे तो चाहे तो टिप की तरह ज्यादा दे दे.

गुड व बैड में परिभाषित करने में आप को समस्या हो तो एक और तरीका है. जैसे कि बैक्टीरिया पौजिटिव व नैगेटिव होते हैं वैसे ही करप्शन को पौजिटिव व नैगेटिव के रूप में परिभाषित कर सकते हैं. दूध से दही पौजिटिव बैक्टीरिया ही बनाते हैं. ठेकेरूपी दुधारू गाय के कार्यरूपी दूध से यदि कुछ मलाई ठेकेदार ने निकाल खा ली और अफसर व नेताजी को भी कुछ चखा दी तो इसे पौजिटिव करप्शन ही माना जाएगा.

पौजिटिव जिस में लेने व देने वाले दोनों फील गुड करें. जैसे कि किसी ठेकेदार को कोई बड़ा ठेका मिलने पर वह इतना प्रफुल्लित  हो गया कि सब को खुश करना चाह रहा हो तो ये भी एक पौजिटिव करप्शन हो गया. पर यदि एक छात्र मूल निवासी प्रमाणपत्र बनवाने तहसील जाए और कोई उस से पैसे ऐंठ ले तो यह तो घोर नैगेटिव करप्शन कहलाएगा. नो नैगेटिव न्यूज की तरह ही नो नैगेटिव करप्शन भी महत्त्वपूर्ण है.

अभी विस्तार की बहुत गुंजाइश है.  गुड करप्शन में और भी श्रेणियां हैं जैसे कि यदि किसी नैशनल हाईवे के हजारों करोड़ के ठेके में सौ-एक करोड़ का लाभांश  ठेकेदार अपने कई सौ करोड़ के लाभांश  से ऊपर बैठे आकाओं की नजर उतारने को न्योछावर कर दे फिर भले ही खराब गुणवत्ता से वह नैशनल हाईवे हो जाए या माइनिंग के ठेके, जिन के नाम से सत्तासीनों के चेहरे शाइनिंग हो जाते हैं, में सीधे उन्हें सम्मानजनक प्रतिशत का पार्टनर मान कर उन का सम्मान कर दे.

मंदिर या अन्य धार्मिक स्थलों के नाम पर गरीब की जमीन को बलात कब्जा कर मुवाअजा न देने या आधाअधूरा देने को कोई करप्शन नहीं माना जाएगा. राष्ट्रनिर्माण के इस कार्य में छीनी गई जमीन के संबंध में परिसीमन आयोग के निर्णयों की तरह कोई सुनवाई नहीं होगी. हां, एक अतिमहत्त्वपूर्ण चीज तो हम भूल ही गए. राजनीतिक दलों के मोटे चंदे के प्रसाद का भोग लगा कर आरती उतारना कदापि बैड करप्शन नहीं कहलाएगा. इस में राष्ट्र प्रथम की बात करने वाली पार्टियों को विशेष सुपर गुड श्रेणीकरण के प्रावधान पर भी विचार किया जा सकता है.

एक और तरीका है कि लिमिट तय कर दी जाए जिस से नीचे के करप्शन को करप्शन ही नहीं माना जाएगा. पर इस में जीएसटी से भी ज्यादा जटिलता हो जाएगी. जीएसटी की जटिलता की गठानें तो सरकार सुलझ नहीं पा रही है, एक और उलझ हुई समस्यारूपी रस्सी से सरकार को न खींचा जाए. आखिर, करप्शन की राशि कार्य के परिमाण व पार्टी के स्टेटस के आधार पर तय होती है. एक सीमांत किसान की जमीन की नपती और उद्योगपति की सौ एकड़ जमीन की नपती में फर्क करेंगे कि नहीं. या मलाईदार विभाग जैसे परिवहन में पदस्थापना व भूंजी भांग वाले विभाग जैसे कि सांख्यिकी में पदस्थापना में अंतर करोगे कि नहीं.

कुल मिला कर गंगाधर का मानना, जो आप का भी मानना है कि समय आ गया है कि ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ को आदर्श मानते हुए हम करप्शन को गुड व बैड में अब वर्गीकृत कर ही दें. Hindi News stories

 

 

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