Hindi Story: म्मीजी, आप कहीं जा रही हैं?’’
‘‘हां बेटा, हम सभी फ्रैंड्स ने मिल कर एक होटल में आज एक गेटटूगेदर रखा है. वहीं जा रही हूं. शाम
5 बजे तक वापस आ जाऊंगी. सौरी, आज लंच तुम लोगों के साथ नहीं कर पाऊंगी.’’
‘‘जी मम्मीजी, नो प्रौब्लम. हमारे साथ तो रोज ही करती हैं, जाइए, आज अपनी फ्रैंड्स के साथ कीजिए, आप को अच्छा लगेगा.’’ अनाया ने अपनी सासुमां शर्मीला से कह तो दिया पर मन ही मन सोचने लगी कि उसे और गौरव को भी तो एक संडे ही मिलता है आउटिंग के लिए. पूरा सप्ताह तो काम करतेकरते कैसे निकल जाता है, पता ही नहीं लगता. खैर, कोई नहीं. शाम को देखा जाएगा अगर मम्मीजी टाइम से आ गईं तो वे दोनों भी जा सकते हैं. यह सोच कर वह किचन में जा कर कंचन मेड के साथ खाना बनाने की तैयारी करने लगी.
किचन की खिड़की से कार के पीछे वाली सीट पर बैठी अपनी सास को जाते हुए देख कर उसे बड़ा अच्छा लगा. मम्मीजी खुद को इतना फिट रखती हैं, तभी तो 65 की उम्र में भी 50 से ज्यादा की नहीं लगतीं. स्टाइलिश बाल, करीने से बनी कमान जैसी सधी आईब्रो, गोरा रंग और उस पर नैचुरल ग्लो से दमकता चेहरा, होंठों पर सुर्ख लाल लिपस्टिक, करीने से बंधी सिल्क की साड़ी, अपनी कम हाइट को हाईहील सैंडल्स से बैलेंस कर के गूची का ब्रैंडेड पर्स टांग कर मम्मीजी जब निकलती हैं तो मानो हर तरफ कयामत आ जाएगी.
उसे याद है जब उसे देखने गौरव अपने मम्मीपापा के साथ आए थे. उस के परिवार के प्रत्येक सदस्य की नजर बस उस की सास पर ही थी. छोटे भाई ने उसे छेड़ते हुए कहा था,
‘तेरी सास तो बड़ी फैशनेबल और स्मार्ट हैं और तू ठहरी सीधीसाधी गऊ जैसी, कैसे बनेगी तेरी अपनी सास के साथ.’
‘अरे तो क्या, उन के साथ रह कर मैं भी उन के जैसी बन जाऊंगी,’ उस ने भी बड़े गर्व से कहा था.
2 साल पहले उस ने और गौरव ने कानपुर की नवीन मार्केट में सैंट्रल बैंक की एक ब्रांच में एकसाथ जौइन किया था. कानपुर में अच्छीखासी भीड़भाड़ वाले और बैस्ट क्वालिटी प्रोडक्ट के लिए माने जाने वाली नवीन मार्केट में सैंट्रल बैंक की ब्रांच में भी नवीन मार्केट की ही तरह खासी भीड़भाड़ रहती थी. कई बार तो यह भीड़ इतनी अधिक हो जाती थी कि कर्मचारियों को लंच तक करने की फुरसत न मिलती थी. दोनों अगलबगल की केबिन में ही बैठते थे. सो, जब भी सिर उठाने का अवसर मिलता, हलकीफुलकी बातचीत कर ही लेते थे.
उस दिन उस का बर्थडे था, हर कर्मचारी के जन्मदिन पर बैंक मैनेजर की तरफ से केक मंगवा कर कटवाया जाता था. सो, शाम 4 बजे के बाद जब मैनेजर के कक्ष में सब एकत्र हुए तो उस ने शरमातेसकुचाते हुए केक काटा था. बाद में जब वह अपनी डैस्क पर आ कर काम समाप्त कर रही थी तब गौरव ने उसे अलग से विश करते हुए कहा, ‘आज आप का बर्थडे था, आप ने बताया नहीं?’
‘वाह, जिस का बर्थडे है वह क्यों बताएगा, यह तो सामने वाले को खुद पता होना चाहिए. मैं क्या यह कहूंगी कि आज मेरा बर्थडे है, आओ, मुझे विश करो.’ उस ने तुनक कर कहा तो गौरव कुछ शरमा सा गया, बोला, ‘बात तो आप की सही है, चलिए, इसी बात पर आप का गिफ्ट और मेरी पार्टी ड्यू रही. कल मैं आप को गिफ्ट दूंगा और आप मु?ो पार्टी. बोलिए, मंजूर है?’
‘बड़े मतलबी हैं आप, बिना पार्टी के गिफ्ट नहीं देंगे?’ उस ने नहले पे दहला मारते हुए कहा,
‘चलिए, आप भी क्या याद रखेंगे, कल सैटरडे हैं न, बैंक से थोड़ा जल्दी भी फ्री हो सकते हैं. शाम को इंडियन कौफी हाउस में आप की पार्टी पक्की.’
‘‘दीदी, कहां खो गईं, तेल जल रहा है.’’ कंचन मेड की आवाज सुन कर वह चौंक गई. अरे बाप रे, वह तो अरबी की सब्जी बना रही थी. यह तेल तो पूरा ही जल गया. अब दूसरा डालना पड़ेगा. कड़ाही में दूसरा तेल डाल कर उस ने सब्जी छौंकी और कंचन को आगे का काम पूरा करने का कह कर वह अपने कमरे में आ गई. वहां गौरव अपना पसंदीदा सीरियल देखने में व्यस्त था.
‘‘गौरव, आज शाम का क्या प्लान है,’’ उस ने पूछा.
‘‘अरे, क्या प्लान है, मतलब? हर संडे तो हम लोग बाहर घूमने जाते हैं और कभीकभी बाहर खाना भी खाते हैं. इस बार तो मैं ने कौमेडी मूवी देखने का भी टिकट बुक कर रखा है,’’ गौरव ने बेपरवाही से कहा.
‘‘लगता है तुम्हें पता नहीं है कि आज मम्मीजी अपनी फ्रैंड्स के साथ बाहर गईं हैं. 5 बजे तक आने का बोल कर तो गईं हैं पर नहीं आईं तो? और पापाजी को अकेला छोड़ कर हम जा नहीं सकते,’’ उस ने कुछ चिंतित होते हुए कहा.
‘‘आ गईं तो ठीक और नहीं आईं तो भी हम चलेंगे लेकिन अगर वे 5 बजे तक आने का कह कर गई हैं तो आ ही जाएंगी. तुम तो अपनी तैयारी करो.’’
‘‘अच्छा, ऐसा है क्या, मु?ो लगा कि आम औरतों की तरह मम्मीजी भी एकदो घंटे तो लेट हो ही जाएंगी.’’
‘‘तुम अभी अपनी मम्मीजी को जानती ही कितना हो. आखिर, वे मेरी मम्मी हैं, समझ’’ गौरव ने प्यार से उस की बांह पर चिकोटी काट दी तो वह खिलखिला कर वहां से रसोई की तरफ बढ़ ली.
लंच के बाद कंचन को रवाना करने के बाद वह भी आराम करने के लिए गौरव के बगल में आ लेटी. गौरव तो कब के खर्राटे लेने लगा था पर उसे तो फिर वही दिन याद आ गया जब बड़ी मुश्किलों के बाद वह दिन उस की जिंदगी में आया था जब गौरव अपने परिवार के साथ उस के घर आया था. बैंक में कभीकभार होने वाली मुलाकातें कब गहरे प्यार में तबदील हो गईं, वे दोनों जान ही नहीं पाए.
वह अपने मम्मीपापा की इकलौती बेटी थी. पापा के रिटायरमैंट में एक साल ही बचा था. सो, वे अब अपनी बिटिया का विवाह कर के फ्री हो जाना चाहते थे. एक दिन डिनर के समय मम्मी ने धीरे से बात छेड़ी, ‘बेटा, कल तेरी बूआ से बात हुई थी. उन की पहचान में एक बहुत अच्छा लड़का है. बैंक में पीओ है, तू कहे तो बात चलाएं.’
‘मम्मी, अभी मु?ो कोई शादीवादी नहीं करनी,’ कह कर उस ने किसी तरह बात को तो खत्म कर दिया था पर अपने कमरे में आ कर उसे बारबार गौरव का चेहरा याद आने लगा और तब पहली बार उसे महसूस हुआ कि दिल के किसी कोने में गौरव ने अपनी जगह बना ली है. गौरव के बारे में सोचते ही उस के पूरे बदन में सिहरन सी होने लगी, आईने में जब खुद को देखा तो गालों की सुर्ख लाली मानो उस के प्यार की दास्तां बयान करने लगी थी.
कहीं न कहीं गौरव भी उसे पसंद करने लगा था. सो, अकसर मुलाकातें दिनप्रतिदिन बढ़ने लगीं और प्यार परवान चढ़ने लगा. उस के बाद तो वैलेंटाइन डे पर गौरव ने उसे प्रपोज भी कर दिया. लेकिन गौरव के मम्मीपापा का शादी के लिए तैयार न होना बड़ी अड़चन थी. उन के पंडितजी के अनुसार, अनाया मांगलिक है जिस के कारण उन के बेटे की कभी भी जान जा सकती थी. पंडितों ने उन के दिमाग में यह बात इस कदर भर दी थी कि सब के लाख सम?ाने के बावजूद वे खुद को इस थोथे भ्रम से निकाल ही नहीं पा रहे थे.
तब अनाया के पापा को इस समस्या से निदान का एक आइडिया आया और एक दिन वे गौरव के पापा के पंडितजी के पास जा पहुंचे और उन्हें 1,100 रुपए थमा कर बोले, ‘पंडितजी, अब इस मंगल को मेरी बेटी की खुशियों से दूर हटाना आप का दायित्व है.’
इस के बाद अपने पंडितजी के कहने पर गौरव के मम्मीपापा ने मंगल शांत कराने के तमाम उपाय पंडितजी से करवाए और उस के लिए पंडितजी ने अच्छीखासी राशि भी गौरव के पापा से वसूली. तब कहीं जा कर उन दोनों का विवाह हो पाया. अनाया के पापा तो आज तक हंसते हैं कि 1,100 रुपए ने जो कमाल किया वह मातापिता की ममता भी नहीं कर पाई.
ससुराल यानी यहां कानपुर में गौरव के मम्मीपापा के अलावा गौरव की एक बड़ी बहन मीता थी जिस की शादी लखनऊ में हुई थी. गौरव के मम्मीपापा दोनों ही एक कालेज में प्रोफैसर थे और अब दोनों ही रिटायर हो चुके थे. कुल मिला कर एक आदर्श परिवार था गौरव का. पापा बेहद सरल स्वभाव वाले थे. कुछ दिन पूर्व ही उन्हें हार्टअटैक आया था जिस के कारण उन्हें इस समय अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता होती थी. वहीं मम्मीजी काफी फैशनेबल और स्मार्ट थीं.
ये सब पुरानी बातें सोचतेसोचते उस की भी आंख लग गई थी. यों भी एक संडे ही तो मिलता है दिन में सोने को, सो, नींद आ ही जाती है. अचानक कौलबेल की आवाज से उस की आंख खुली. वह दरवाजे की तरफ भागी.
‘‘अरे, आप आ भी गईं,’’ उस ने आश्चर्य से अपनी सास को देख कर कहा.
‘‘टाइम से ही आई हूं न, लेट हो गई क्या मैं?’’
‘‘अरे नहींनहीं मम्मीजी. मैं तो ऐसे ही कह रही थी,’’ उस ने अपनी ?ोंप मिटाते हुए कहा.
शाम की चाय के बाद जब उस ने पति गौरव के साथ जाने की सास शर्मीली से परमिशन चाही तो वे खुशीखुशी बोलीं, ‘‘अरे, बिलकुल जाओ बेटा. यही तो दिन हैं तुम लोगों के एंजौय करने के, पहले कोई मूवी देखना, फिर बाहर ही डिनर कर के आ जाना. मैं पापा के लिए खिचड़ी, दलिया कुछ भी बना दूंगी.’’
डरतेडरते उस ने एक मैरून रंग की वन पीस ड्रैस पहनी और शरमातीसकुचाती सी बाहर आई तो उसे देख कर मम्मीजी बोलीं, ‘‘अरे, इतना डर क्यों रही हो, पहनो, जो पहनना है, बहुत सुंदर लग रही हो.’’
अनाया का सारा डर खत्म हो गया और वह सोचने लगी कि मम्मीजी कितनी अच्छी हैं वरना उस ने तो सासों के कितने डरवाने किस्से सुने हैं. उस दिन रात को घर वापस आतेआते 12 बज गए थे. बड़ा ही आदर्श वातावरण था गौरव के घर में. उस दिन भी मम्मीपापा सो गए थे. गौरव ने अपनी चाबी से ताला खोला और अंदर आ कर वे दोनों भी अपने रूम में जा कर सो गए.
अगले दिन सोमवार को औफिस जाना था. सो, वे दोनों फटाफट तैयार हो कर घर से निकल गए. शाम को घर वापस आए तो रात के डिनर पर सभी लोग एकसाथ बैठ कर खाना खाने बैठे तो गौरव बोला, ‘‘बैंक में कल मेरे ही सैक्शन का औडिट है. कल से अनाया, तुम को खुद घर आना होगा. तुम अपनी कार ले कर जाना और मैं अपनी.’’
‘‘अरे बेटा, यह औडिट तो बड़ी मुश्किल वाला काम होता है. एक तो औडिट टीम की भरपूर मेहमाननवाजी करो, फिर भी वे कुछ भी उलटासीधा लिखने से बाज नहीं आते,’’ पापा ने कहा.
‘‘हां पापा, वही तो टैंशन है. मैं ने वैसे भी 2 साल पहले ही जौइन किया है और औडिट हो रहा है पिछले 5 साल का,’’ गौरव बोला.
‘‘अरे बाप रे, फिर तो मेरे सैक्शन का भी नंबर आएगा. मेरे सैक्शन की स्थिति तो तुम से भी गईगुजरी है,’’ अनाया के तो हाथपांव ही फूलने लगे.
‘‘कौन है तुम्हारी टीम का औडिट औफिसर?’’ मम्मीजी ने खाना खातेखाते पूछा.
‘‘रिटायर्ड बैंककर्मी हैं मनोज नेमाजी,’’ गौरव ने खाने का कौर मुंह में रखते हुए कहा.
‘‘मैं जानती हूं उन को, तुम दोनों के प्रति थोड़ी नरमी से पेश आने का
बोल दूंगी.’’
‘‘अरे, आप कैसे जानती हो उन्हें? और सच में क्या उन्हें आप बोल दोगी?’’ गौरव और अनाया एकसाथ बोल उठे.
‘‘जानती हूं तो जानती हूं. तुम्हारी मुश्किलें कम हों, इस की कोशिश करूंगी. मैं कैसे जानती हूं, कब से जानती हूं, इस से तुम्हें क्या?’’ कह कर मम्मीजी ने इस बात पर विराम लगा दिया.
रात को सोते समय अनाया फिर सोचने लगी कि कैसे कानपुर से 25 किलोमीटर दूर उन्नाव जैसे छोटे से कसबे में उस का पालनपोषण हुआ. पापा और मम्मी दोनों ही एक सरकारी स्कूल में टीचर थे पर उसे और उस से 2 साल छोटे भाई अनीश को पढ़ानेलिखाने में उन्होंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी. अनीश अभी इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में था और उस ने कड़ी मेहनत से अपने पहले ही प्रयास में बैंक में नौकरी प्राप्त कर ली थी. कानपुर से उन्नाव की दूरी बहुत अधिक नहीं थी. सो, समयसमय पर दोनों परिवारों का परस्पर मिलनाजुलना होता रहता था. हां, उस के घर के वातावरण और गौरव के घर के वातावरण में अवश्य बहुत अंतर था. गौरव के मातापिता यों तो काफी शिक्षित और पढ़ेलिखे थे पर पता नहीं क्यों अंधविश्वासी बहुत थे, इसीलिए उन के घर में पूजापाठ और पंडितों का आनाजाना बहुत था.
वहीं उस के मम्मीपापा काफी उदार विचारों वाले और धार्मिक अंधविश्वासों व रूढि़यों से कोसों दूर रहने वाले थे, इसीलिए जब उस की शादी गौरव से तय हो गई तो उस की मम्मी ने उसे सम?ाते हुए कहा था, ‘देखो बेटा, तू तो जानती ही है कि मैं थोथे व्रत, तरहतरह की पूजाओं में जरा भी विश्वास नहीं रखती पर मुझे लगता है कि तेरी ससुराल का माहौल हमारे घर के माहौल से अलग होगा. अब तू कैसे मैनेज करेगी, मुझे सोच कर ही घबराहट होती है.’
‘अरे, आप बिलकुल भी चिंता मत करो. मैं उन्हें भी अपने जैसा बना दूंगी,’ अनाया ने मम्मी को आश्वस्त करते हुए कहा था पर मम्मी की शंका थी कि कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी, सो बोलीं, ‘पता नहीं तू उन के जैसे बनेगी या उन्हें अपने जैसा बनाएगी क्योंकि बेटा हमारी सोसाइटी में बहू के आने के बाद सास द्वारा किए जाने वाले सारे व्रतउपवास, अंधविश्वास और रीतरिवाज नईनवेली बहू को ट्रांसफर कर दिए जाते हैं और फिर मन हो या न हो, ‘परंपरा को तो निभाना ही है’ सोच कर सारे काम करने ही पड़ते हैं. यह सिलसिला पीढ़ीदरपीढ़ी चलता ही रहता है.’
मम्मी की बातें सुन कर उसे थोड़ी घबराहट तो हुई थी पर अब जो होगा देखा जाएगा, यह सोच कर अनाया ने अपने मन को शांत कर लिया था. अंधविश्वास के साथसाथ उस की सास शर्मीली बड़ी स्ट्रिक्ट और अनुशासनप्रिय भी थीं. शायद, कालेज में प्रोफैसर होने के कारण वे ऐसी हो गई थीं. उन की बात को काटने या विरोध करने का साहस गौरव के पापा तक में न था.
दूसरी तरफ, अनाया के घर में लोकतंत्र था. मम्मीपापा और बच्चों की बौंडिंग बिलकुल दोस्तों जैसी थी. सब एकसाथ जो एकदूसरे की हंसी उड़ाते तो हंसतेहंसते पेट ही फूल जाता था. अनाया ने तो आज तक सिर्फ पढ़ाई ही की थी. पूजापाठ और व्रतउपवास से तो वह कोसों दूर थी. अकसर वह अपनी सास को ले कर बड़ी घबराई सी महसूस करती थी. इसी चक्कर में हड़बड़ाहट में गलतियां भी हो जाती थीं.
उस दिन शर्मीली की कुछ फ्रैंड्स घर पर सुंदरकांड करने को आने वाली थीं. उस के बाद उन का डिनर भी घर पर ही होना था. सैटरडे था, सो, उस ने भी शर्मीली के साथ मिल कर पूरे घर को सजाया और संवारा था ताकि शर्मीली के साथसाथ उन की फ्रैंड्स भी खुश हो जाएं.
उस की शादी के बाद पहला अवसर था जब घर में मम्मीजी की सहेलियां आ रही थीं. सो, वह थोड़ी घबरा भी रही थी. आते ही पान शौट्स सर्व किए जाने थे. उस ने और कंचन ने पूरी सावधानी बरतते हुए सबकुछ किया था लेकिन जैसे ही डिनर कर के सब चले गए, मम्मीजी बिफर पड़ीं, ‘यह क्या है, अनाया, अब तुम बच्ची नहीं रहीं, तुम्हारी शादी हो चुकी है. अरे, कुछ तो जिम्मेदारी समझ.’
‘क्या हुआ मम्मीजी?’ सकुचातेडरते हुए उस ने कहा.
‘यह देखो, यह दूध लगा हुआ है इन गिलासों में जिन में तुम शौट्स ले कर आई थीं. आज तक की मेरी लाइफ में ऐसा नहीं हुआ जैसा कि तुम्हारे आने पर हुआ है. शर्म से नजरें झुक गईं मेरी. क्या सोच रही होंगी मेरी फ्रैंड्स कि कितने गंदे बरतन रखते हैं हम लोग. आई डू नौट वांट दिस रिपीटिशन अगेन.’
उस की आंखों से तो आंसू ही निकलने लगे थे पर सच में गिलास में दूध जमा हुआ था जिसे न उस ने देखा था और न कंचन ने. सच पूछो तो उसे भी अपनेआप पर उस दिन बहुत शर्म आई थी. उस दिन से वह बहुत अलर्ट हो गई थी. किसी भी बरतन को यूज करने से पहले कई बार चैक करती कि कहीं कुछ गंदगी तो नहीं लगी रह गई.
बैंक का औडिट पूरा हो गया था. पता नहीं मम्मीजी ने नेमाजी पर क्या जादू चलाया था कि उस के और गौरव के सैक्शन को छोड़ कर हर सैक्शन के लिए नोटिस जारी किया गया था. उन दोनों का सैक्शन सेव रहा है, यह जान कर मम्मीजी काफी खुश हुईं और बोलीं, ‘‘चलो, नेमा ने मेरी बात का मान तो रखा.’’
‘‘मां, अब तो बता दो नेमाजी को आप कैसे जानती हो?’’ गौरव और अनाया ने एकसाथ कहा.
‘‘वह मेरा बचपन का दोस्त है. ट्वैल्थ तक हम क्लासमेट रहे हैं और आज भी मिलते हैं,’’ मम्मीजी ने बताया.
अनाया बुरी तरह चौंक गई. मतलब, मम्मीजी का अफेयर है और पापाजी कुछ बोले भी नहीं. खैर, मुझे क्या जब किसी को कोई परेशानी नहीं है तो मैं क्यों बुरी बनूं, यह सोच कर वह चुप रही.
उस की शादी के बाद पहला पर्व करवाचौथ पड़ रहा था. सो, शर्मीली एक दिन नाश्ते की टेबल पर एक बहुत सुंदर सी साड़ी और गोल्ड के कानों के झुमके उस के हाथ में देते हुए बोलीं, ‘‘बेटा, अगले हफ्ते करवाचौथ है. मैं तो निर्जला व्रत रखती हूं. तुम नहीं रह पाओगी, सो चाय पी लेना.’’
‘‘जी मम्मीजी,’’ उस ने कह तो दिया पर उसे पता था कि सुबह अगर 10 बजे तक उसे नाश्ता न मिले तो उस के सिर में दर्द होने लगता है. बैंक भी जाना है. यही सब सोचतेसोचते जब उस ने कमरे में प्रवेश किया तो गौरव उस का खोयाखोया और बुझ चेहरा देख कर बोला, ‘‘क्या हुआ, चेहरे पर बारह क्यों बजा रखे हैं.’’
‘‘कुछ नहीं, बस, यों ही.’’ पर गौरव के ज्यादा पूछने पर उस ने सारी बात कह सुनाई.
पूरी बात सुन कर गौरव बोला, ‘‘अगले हफ्ते की अगले हफ्ते देखेंगे. अभी तो एंजौय करते हैं.’’ यह कह कर उस ने अनाया को अपनी बांहों के घेरे में ले लिया.
अगले हफ्ते करवाचौथ वाले दिन मम्मीजी जब अनाया को अगले दिन होने वाले व्रत के बारे में बता रही थीं तो गौरव बोला, ‘‘मम्मी, मैं भी व्रत रखूंगा.’’
‘‘क्यों, तुम क्यों भूखे रहोगे. तुम्हें शुगर के कारण डाक्टर ने भूखा रहने को मना किया है.’’
‘‘अनाया को भी भूख सहन नहीं होती, मैं भी उस की लंबी उम्र के लिए व्रत करूंगा क्योंकि अगर वह मेरे से पहले इस संसार से चली गई तो मैं अकेला जी कर भी क्या करूंगा.’’ इस विषय पर गौरव और उस की मम्मी की लंबी बहस चली जिस का अंत इस प्रकार हुआ कि अनाया और गौरव दोनों फलाहार ले कर व्रत रखेंगे और मम्मी बिना पानी पिए पापाजी की लंबी उम्र के लिए व्रत रखेंगी.
करवाचौथ वाले दिन पूरे दिन व्रत रख कर रात को जब मम्मीजी पापाजी की आरती उतार कर पैर छूने लगीं तो उसे मन ही मन हंसी आ गई क्योंकि हर दिन तो मम्मीजी दूसरों के सामने भी पापाजी की कोई इज्जत नहीं करती थीं और आज मानो उन्हें सुप्रीम दर्जा दे रही हों.
अनाया ने तो फल और दूध खा कर मजबूरी में व्रत रखा था पर उस के बाद भी उस की तबीयत बिगड़ गई और 3 दिन की बैंक से छुट्टी लेनी पड़ी. बैड पर लेटीलेटी भी वह सोच रही थी कि एक तरफ तो मम्मीजी इतनी पढ़ीलिखी मौडर्न पहनावे वाली और दूसरी तरफ इतनी अंधविश्वासी कि लाख कहने पर भी उसे व्रत न रखने की परमिशन नहीं दी.
उस की सोच कुछ और आगे जा पाती, तभी मम्मीजी ने हाथ में ढेर सारी मिर्चें ले कर उस के कमरे में प्रवेश किया और उस के सिर से ले कर पांव तक 7 बार मिर्चों को घुमाया और गैस पर ले जा कर जला दिया जिस से पूरे घर में मिर्ची का धुआं ही धुआं हो गया और सारे सदस्य खांसते हुए इधरउधर भागने लगे. उस ने अपनी सास से पूछना चाहा कि वे क्या कर रही हैं तो उन्होंने उंगली के इशारे से उसे बोलने से मना कर दिया, फिर बाद में बोलीं, ‘‘नजर उतारते समय बीच में बोलते नहीं हैं न, इसलिए मैं ने उस समय तुम्हारे प्रश्न का जवाब नहीं दिया था. कल तुम ने करवाचौथ की पूजा के समय शादी वाला लहंगा पहना था जिस में बहुत सुंदर लग रही थीं. बस, देखो नजर लग गई और तुम बीमार पड़ गईं. सो, मैं उस समय तुम्हारी नजर उतार रही थी.’’
अनाया के लिए यह एक और ?ाटका था. कालेज में इंग्लिश की प्रोफैसर से रिटायर वैलएजुकेटेड और खुद को बहुत मौडर्न सम?ाने वाली अपनी सास का यह रूप देख कर तो वह दंग रह गई. क्या ही फायदा ऐसे मौडर्न होने से जो आप दिमाग से मौडर्न नहीं हुए. उसे गर्व हो आया अपनी मम्मी पर जो एक स्कूल में एक प्राइमरी टीचर थीं पर अंधविश्वासी बिलकुल भी नहीं. उन्होंने कभी अपने बच्चों की नजरवजर नहीं उतारी थी. बल्कि, वे तो यही कहतीं थीं, ‘कैसे किसी को नजर लग सकती है और कैसे वह मिर्ची से उतर सकती है.’
सबकुछ ठीकठाक चल रहा था कि एक दिन अचानक पापाजी सीढि़यों से गिर गए. उस समय मम्मीजी अकेली ही घर पर थीं. अनाया और गौरव औफिस में थे और ड्राइवर उन दिनों छुट्टी पर था. पापा के गिरने की सूचना सुन कर अनाया और गौरव दोनों हड़बड़ाते हुए बैंक से निकले ही थे कि मम्मीजी का फोन आ गया, ‘‘मैं सिटी हौस्पिटल पापा को ले कर आ गई हूं, तुम लोग घर की जगह यहां आ जाओ.’’
जब तक वे दोनों हौस्पिटल पहुंचे तब तक तो मम्मीजी पापा का इलाज शुरू करवा चुकी थीं क्योंकि सूचना मिलते ही निकलने के बावजूद वे दोनों जाम में फंस गए और लगभग एक घंटे बाद ही हौस्पिटल पहुंच पाए थे. अनाया एक बार फिर मम्मीजी को हौस्पिटल में देख कर हैरान रह गई थी क्योंकि घर से गार्ड की मदद से पापाजी को गाड़ी में लिटा कर मम्मीजी खुद कार ड्राइव कर के हौस्पिटल लाई थीं.
डाक्टरों के अनुसार, पापाजी के ब्रेन में क्लौट आ गया था जिस के कारण वे गिर गए थे. प्राइमरी ट्रीटमैंट प्रारंभ कर के उन्हें आईसीयू में रखा हुआ था. खतरे की कोई बात नहीं थी. रात होने वाली थी और पेशेंट के पास किसी को रुकने नहीं देते हौस्पिटल वाले. फिर भी गौरव बोला, ‘‘मम्मी, मैं रात को यहीं रुक जाता हूं, आप दोनों घर चली जाइए.’’
‘‘क्या करोगे बेटा यहां रुक कर. नंबर नोट करा दिया है मैं ने, कोई प्रौब्लम होगी तो वे हमें इन्फौर्म कर देंगे. घर पर चल कर आराम से सोओ और हां, अभी गुडि़या को बताने की कोई जरूरत नहीं है. जब पापा घर आ जाएंगे तब हम बता देंगे.’’ इस तरह मम्मीजी हमें घर ले कर आ गईं.
घर आ कर मम्मीजी निढाल सी सोफे पर पसर सी गईं. जब मैं चाय ले कर आई तो मम्मीजी किसी से फोन पर बात कर रही थीं, ‘‘ठीक है, आप कल से ही शुरू करवा दो. जो भी पेमेंट होगा मैं दे दूंगी.’’ मु?ो देखते ही मम्मीजी बोलीं, ‘‘वही मैं सोच रही थी कि एकदम से ऐसे कैसे हो गया, कल तो एकदम ठीकठाक थे तुम्हारे पापा. पंडितजी ने बताया है कि इस समय शनि बहुत भारी चल रहा है. सो, उस को शांत करना पड़ेगा वरना यह शनि आगे भी परेशान करता रहेगा.’’
उफ, मम्मीजी को कैसे सम?ाऊं कि पंडित उन्हें मूर्ख बना रहा है जैसे मेरा मंगल शांत करवाया गया था वैसे ही पापाजी का शनि शांत करवा कर वह उन से मोटी रकम वसूलेगा. इस बारे में गौरव से भी कुछ कहना बेकार था क्योंकि अपने पापा से वह बहुत अटैच्ड था और उन के लिए मम्मीजी जो भी करें वह उस में इंटरफियर नहीं करेगा. सो, अभी अनाया ने शांत रहना ठीक सम?ा.
अगले दिन जब उस के मम्मीपापा उन्नाव से हौस्पिटल में पापाजी को देखने आए तो बोले, ‘‘यह सब एकदम से कैसे हो गया, अभी परसों ही तो बात की थी हम ने.’’
‘‘अरे, कुछ नहीं भाईसाहब, पंडितजी ने बताया है कि शनि इस समय भारी चल रहा है. उन्होंने आज से ही पूजा शुरू करवा दी है, अब सब ठीक हो जाएगा,’’ मम्मीजी ने अपने तथाकथित पंडितजी का गुणगान करते हुए कहा.
इस समय उस के पापामम्मी ने भी कुछ कहना उचित नहीं सम?ा. पापाजी को अगले दिन हौस्पिटल से छुट्टी मिलने वाली थी. सो, अनाया ने छुट्टी ले कर पूरे घर को पापा के वैलकम के लिए तैयार कर दिया था. पापाजी के सकुशल घर आ जाने से नि:संदेह सभी बहुत खुश थे.
डिनर के समय मम्मीजी बोलीं, ‘‘अनाया, पापा के सकुशल घर वापस आ जाने के उपलक्ष्य में मैं ने कल सुंदरकांड का पाठ रखा है. तुम्हें छुट्टी लेनी पड़ेगी. मैं अकेले इतना सब मैनेज नहीं कर पाऊंगी. पंडितजी ने कहा है कि वे अपनी भजन मंडली 5 बजे भेज देंगे.’’
‘‘मां, इस हफ्ते मैं ने 3 छुट्टियां ले ली हैं, अब छुट्टी तो नहीं मिलेगी.’’
‘‘अरे, अब मजबूरी में तो इंसान छुट्टी लेगा ही न. यह क्या बात हुई. अब कल घर में प्रोग्राम है तो बिना छुट्टी लिए कैसे काम होगा,’’ मम्मीजी ने अपनी बात कह दी और उठ कर चली गईं.
अगले दिन सुबह 4 बजे उठ कर अनाया ने अधिकांश काम निबटाया, फिर औफिस पहुंची और हाफटाइम में मैनेजर की बड़ी चिरौरी कर के वह घर आ पाई. रास्ते में वह यही सोच रही थी कि क्यों पढ़ेलिखे लोग भी इतने अंधविश्वासी हो जाते हैं कि जिंदगी में जो समस्या है ही नहीं, उसे भी समस्या बना लेते हैं और फिर निदान के लिए पंडितों के पास पहुंच जाते हैं मानो वे कोई देवदूत हों. उस दिन रात के 11 बजे तक लोगों का आनाजाना लगा रहा. जिस से पापाजी को जरा भी रैस्ट नहीं मिल पाया और एग्जर्शन के कारण पापाजी अगले
2 दिन तक बेसुध से पड़े रहे. उधर, कानफोड़ू लाउडस्पीकर पर 4 घंटे तक चीखतेचिल्लाते हुए पंडितजी द्वारा भेजी गई भजन मंडली मम्मीजी से 11 हजार रुपए सुंदरकांड की फीस ले कर चली गई. मेड को जरूरत पड़ने पर बड़ा एहसान कर के उस की मेहनत का एडवांस देने वाली मम्मीजी ने खुशीखुशी 11 हजार रुपए निकाल कर दे दिए.
11 हजार तो मम्मीजी ने दिए, इस के अलावा चढ़ावे के 3-4 हजार रुपए मिल गए, सो अलग. यानी, हमारे अंधविश्वास का फायदा तो भजन मंडली को मिला जो 3 घंटे में बिना कोई खास मेहनत किए 15 हजार रुपए कमा कर चली गई. उसे कुछ सम?ा नहीं आ रहा था कि मम्मीजी मौडर्न हैं या दकियानूसी. रात को पूरा काम निबटा कर जब सब एकसाथ बैठे तो मम्मीजी कहने लगीं, ‘‘चलो, सुंदरकांड भी अच्छे से हो गया. पंडितजी बिलकुल सही कह रहे थे कि हनुमान बाबा की ही कृपा से पापा बालबाल बच गए वरना पता नहीं क्या हो जाता.’’
‘‘मां, पापा आप की सजगता से बचे हैं जो आप ने पापा की जीभ के नीचे एक गोली रख दी और किसी का इंतजार किए बिना खुद ही कार ड्राइव कर के समय पर पापा को हौस्पिटल ले गईं. सुना नहीं था डाक्टर कह रहे थे कि यदि जरा सी देर हो जाती तो मामला रिस्की हो सकता था.’’ लाख कोशिश करने के बाद भी अनाया इस बार खुद को रोक नहीं पाई.
कल वीकैंड था और लखनऊ से ननद गुडि़या यानी मीता के आने का प्रोग्राम था. सुबह से ही जोरशोर से तैयारियां हो रही थीं. अनाया के विवाह के बाद मीता पहली बार आ रही थी, सो, उस का उत्साह भी कुछ कम न था. मीता अपने पापा की बहुत लाड़ली थी. सो, आते ही पापा के गले लग कर रो पड़ी. कुछ देर के लिए माहौल थोड़ा भारी हो गया था.
खाना खा कर सभी गप्पें लगाने लगे. तभी मम्मीजी मीता से बोलीं, ‘‘तेरे और राहुल के प्रमोशन का क्या हुआ. पिछले 3 वर्षों से सुनते आ रहे हैं कि प्रमोशन होने वाला है और अभी तक हुआ
ही नहीं?’’
‘‘अरे मां, क्या बताऊं पता नहीं क्या है कि बस होतेहोते रह जाता है. कभी कोई अड़चन आ जाती है, कभी कोई,’’ मीता ने कुछ परेशानी से कहा.
‘‘अच्छा लाओ, मैं पंडितजी से बात करती हूं. जरूर उन के पास कोई उपाय होगा जिस से तुम्हारा काम जल्दी हो जाएगा,’’ कहते हुए मम्मीजी ने फिर से फोन उठा लिया.
‘‘मम्मीजी, आप हर बात के लिए अपने पंडितजी को क्यों इतनी इंपोर्टेंस देतीं हैं. जिस औफिस, जिस प्रक्रिया के बारे में पंडितजी को पता ही नहीं है उस में वे आप को क्या बताएंगे. प्लीज हर बात में उन्हें इतना तवज्जुह मत दीजिए. जराजरा सी बात पर वे आप से हजारों रुपए ऐंठ कर ले जाते हैं.’’ न चाहते हुए भी अनाया बोल ही पड़ी पर पता नहीं मम्मीजी ने कुछ सुना या नहीं, पर पंडितजी ने जरूर उन्हें उपाय बता दिया था कि, ‘बहनजी, कालसर्प योग है मीता और उन के पति की जन्मकुंडली में. अगले किसी भी शुभमुहूर्त में नासिक या उज्जैन में पूजा करानी पड़ेगी. लगभग 11 हजार रुपए का खर्चा आएगा और 6 महीने में प्रमोशन हो जाएगा.’
मम्मीजी उज्जैन जाने की डेट तय करने में लग गई थीं और अनाया सोच रही थी कि मम्मीजी क्या सच में मौडर्न हैं क्योंकि मौडर्न आउटफिट पहनने और घर में एक से बढ़ कर एक आधुनिक उपकरण लाने से कोई इंसान मौडर्न नहीं हो सकता जब तक कि वह दिमाग और सोच से मौडर्न न हो और जब तक इंसान दिमाग से मौडर्न नहीं होगा, अंधविश्वास उसे अपनी गिरफ्त में लेता रहेगा और पंडितजी मंगल, गुरु, शनि और कालसर्प योग जैसे कर्मकांडों के सहारे अपना उल्लू सीधा करते रहेंगे.





