Broken Relationships: पिछले एकदो दशकों में खासकर शहरी और उच्च वर्ग में एक नया और जटिल सामाजिक परिघटन उभर कर सामने आया है- ‘साथ रहते हुए भी अलग’ का चलन. यह स्थिति तलाक से अलग है और साथ रहने से भी अलग. पतिपत्नी कानूनी रूप से विवाहित रहते हैं लेकिन भावनात्मक, मानसिक और कई बार भौतिक रूप से अलगअलग जीवन जीने लगते हैं.

शक्ति सिंह और नंदिनी शाह दोनों सरकारी अधिकारी हैं. 20 साल पहले दोनों ने लवमैरिज की थी. इस कपल के 2 बच्चे हैं. 12 साल का बेटा पियूष और 18 साल की बेटी गार्गी. शक्ति सिंह की मां जीवित हैं. 5 लोगों का परिवार है मगर ये पांचों जन साथ नहीं रहते हैं.

शादी के 4-5 साल तक तो शक्ति सिंह और नंदिनी शाह ने एकदूसरे का खूब साथ निभाया. नौकरी से छुट्टियां लेले कर देशदुनिया घूमे. दोनों को देख कर ऐसा लगता था कि इन से ज्यादा मोहब्बत तो कोई कर ही नहीं सकता. मगर धीरेधीरे दोनों में दूरियां बढ़ने लगीं. शक्ति सिंह का नैचर कुछ गरम था. वे स्त्री पर पुरुष वाला दंभ रखना चाहते थे. घर के किसी भी फैसले में उन की ही सुनी जाए, ऐसी इच्छा रखते थे और सब से बड़ी बात यह कि वे चाहते थे कि नंदिनी दफ्तर में भले अपनी अफसरी झाड़े मगर घर में वह बिलकुल अम्मा जी की गाय बन कर रहे. यानी, शक्ति सिंह की मां जैसा कहें वैसा ही वह करे. जबकि, नंदिनी शाह जो पति के बराबर ही पढ़ीलिखी और उन के बराबर के ओहदे पर तैनात थीं, इस तरह का व्यवहार न तो झेलने के लिए तैयार थीं और न करने के लिए.

नंदिनी कहती हैं, ”शादी के तुरंत बाद की बात और थी. हमारी लवमैरिज थी. शक्ति के परिवार में मैं एडजस्ट होना चाहती थी. तब इन के बाबूजी भी जिंदा थे. काफी समय तक मैं ने बहुतकुछ सहन किया. सासससुर का बहुत लिहाज किया. सेवा भी की. उन की न मानने योग्य बातें भी सिर झुका कर मानीं. मगर मेरी भी अपनी पर्सनैलिटी है, सोच है, इच्छाएं हैं, पदप्रतिष्ठा है, जिम्मेदारियां हैं. ऐसे में अगर अम्मा जी चाहें कि मैं सुबह उठ कर उन के साथ पूजा में बैठूं, उन के कहे मुताबिक व्रत और त्योहार करूं, बच्चों को उन के मुताबिक पालूं, किचन में क्या बने यह वे बताएं, उन से पूछ कर कहीं आऊंजाऊं तो वह सब मुझ से नहीं हुआ.”

अम्मा जी अपने बेटे शक्ति से नंदिनी की शिकायत करतीं तो नंदिनी को बुरा लगता था. बच्चों पर शक्ति सिंह का गुस्सा और शक्ति प्रदर्शन भी उन को आहत करता था. और भी कई घरेलू वजहें थीं कि शक्ति और नंदिनी के बीच लड़ाईझगड़ा रोज की बात हो गई. आखिरकार नंदिनी ने दूसरे शहर में पोस्टिंग ले ली. बच्चों को अपने साथ ले गईं.

पिछले 10 वर्षों से शक्ति सिंह और नंदिनी अलगअलग जगहों पर काम कर रहे हैं. दोनों को सरकारी आवास मिला हुआ है. अम्मा जी अपने बेटे शक्ति के साथ रहती हैं. नंदिनी कभी तीजत्योहार पर ही उन के घर आती है. वह भी बस एक दिन के लिए. शक्ति से बातचीत न के बराबर है. बच्चे अपने पिता और दादी से मिल कर खुश हो जाते हैं. यानी रिश्तेदारों और समाज के लिए वह एक परिवार है, मगर अंदरूनी तौर पर रिश्तों में खामोश दरारें हैं. साथ दिखते हुए भी वे अलग हैं. यह विवाहित जीवन का नया शहरी चलन है जो तेजी से उच्च वर्ग में पैर पसार रहा है.

यह चलन बौलीवुड में काफी पहले से था. 90 के दशक की बेहद खूबसूरत और मशहूर अभिनेत्री राखी और प्रसिद्ध गीतकार और फिल्मकार संपूर्ण सिंह कालरा उर्फ गुलजार का रिश्ता किसी से छिपा नहीं है. दोनों ने 1973 में शादी की थी. शादी के लगभग एक साल के अंदर ही उन के रिश्ते में दरार आ गई और वे अलग हो गए. इस के बावजूद, उन्होंने कभी कानूनी तौर पर तलाक नहीं लिया. वे कई दशकों से अलगअलग रह रहे हैं. उन का रिश्ता एक तरह का ‘रिस्पैक्ट सेप्रेशन’ यानी सम्मानजनक अलगाव का है. दोनों अलग रहते हुए एकदूसरे के प्रति एक शांतिपूर्ण सम्मान बनाए हुए हैं. कानूनी रूप से वे अब भी पतिपत्नी हैं. मगर दोनों के बीच भावनात्मक लगाव नहीं है. हां, उन की बेटी मेघना गुलजार दोनों से जुड़ी रहती हैं.

बौलीवुड में इस तरह का जीवन जीने वाले कई कपल हैं. कई चर्चित जोड़े वर्षों तक अलग रहने के बावजूद कानूनी रूप से शादीशुदा रहे हैं या लंबे समय तक रिश्तों को खींचते रहे. जावेद अख्तर और हनी ईरानी का विवाह खत्म हुआ मगर रिश्ता पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. दोनों ने अपने बच्चों फरहान अख्तर और जोया अख्तर की परवरिश में सहयोग किया. आज भी दोनों के बीच कोई कटुता नहीं है.

ऋतिक रोशन और सुजैन का रिश्ता लंबे समय तक खिंचा और आखिरकार तलाक में बदला, लेकिन अलग रहने का दौर काफी लंबा रहा. आज भी कई मौकों पर दोनों अपने बच्चों के साथ इकट्ठा दिख जाते हैं. सैफ अली खान और अमृता सिंह के बीच भी लंबे समय तक मतभेद रहे, जिन का अंत अलगाव में हुआ. कई ऐसे भी उदाहरण हैं जहां कपल औपचारिक रूप से अलग नहीं होते, लेकिन निजी जीवन में दूरी बना लेते हैं, हालांकि वे सार्वजनिक रूप से कम चर्चा में आते हैं.

बौलीवुड, जो अकसर समाज का ट्रैंडसैटर माना जाता है, से शुरू हुआ यह व्यवहार अब शहरी उच्च वर्ग में भी दिखाई देने लगा है. भारतीय समाज में जहां वैदिक काल से विवाह को एक अटूट बंधन माना गया है, पति को परमेश्वर बता कर पत्नी को उस की सेविका के रूप में दर्शाया गया है, उस समाज में वैवाहिक जीवन में चुपचाप पैर पसारता अलगाववाद धीरेधीरे ऊपर से नीचे की ओर बढ़ रहा है.

पिछले एकदो दशकों में खासकर शहरी और उच्च वर्ग में एक नया और जटिल सामाजिक परिघटन उभर कर सामने आया है- ‘साथ रहते हुए भी अलग’ का चलन. यह स्थिति तलाक से अलग है, और साथ रहने से भी अलग. पतिपत्नी कानूनी रूप से विवाहित रहते हैं, लेकिन भावनात्मक, मानसिक और कई बार भौतिक रूप से अलगअलग जीवन जीने लगते हैं. कुछ साथ रहते हुए भी गहरी चुप्पी इख़्तियार कर लेते हैं, अलगअलग कमरों में सोने लगते हैं. यह बदलाव अचानक नहीं आया है. इस के पीछे सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारणों का एक जटिल तानाबाना है.

बदलते रिश्तों की वजह

पहले विवाह को निभाने की जिम्मेदारी अधिकतर महिलाओं पर होती थी. पुरुष आर्थिक रूप से सक्षम होता था और स्त्री सामाजिक दबावों व पुरुष पर आर्थिक रूप से आश्रित होने की वजह से हर तरह का समझौता करती थी. ब्याही गई बेटी से मांबाप कहते थे- ‘अब वही तेरा घर है. वहीं से तेरी अर्थी उठेगी.’ मतलब यह कि जिस घर में ब्याह दिया है वही लोग अब लड़की का आर्थिक बोझ उठाएंगे और उस के बदले में लड़की को चुप रह कर हर जुल्म बरदाश्त करना होगा. सदियों तक औरतों ने यही किया. आज भी कर रही हैं. मगर अब पढ़ीलिखी और नौकरीपेशा औरतों की संख्या बढ़ रही है. शिक्षित, आत्मनिर्भर महिला जहां अपने आत्मसम्मान और मानसिक शांति को प्राथमिकता देती हैं, वहीं अपने उत्पीड़न के खिलाफ मुखर भी हैं.

उधर, पुरुष आज भी अपनी पारंपरिक भूमिकाओं और आधुनिक अपेक्षाओं के बीच उलझा हुआ है. अभी भी वह खुद को पतिपरमेश्वर ही मान कर चल रहा है. उसे पत्नी की तनख्वाह का भी लालच है और वह पत्नी को आजाद भी नहीं देखना चाहता है. नतीजा यह कि शादी के 10-12 वर्षों के भीतर, जब प्रारंभिक आकर्षण और उत्साह कम हो जाता है, असली व्यक्तित्व और मतभेद सामने आने लगते हैं. इस के साथ ही कैरियर का दबाव, बच्चों की जिम्मेदारी, समय की कमी और संवादहीनता, ये सब मिल कर रिश्ते में दरारें पैदा कर देते हैं.

तलाक क्यों नहीं

यह सवाल महत्त्वपूर्ण है कि रिश्ते में संतोष नहीं है, तो लोग तलाक क्यों नहीं ले लेते? तलाक न ले कर अलगअलग रहने का औप्शन क्यों कैरी करते हैं? इस की कई वजहें हैं-

कानूनी जटिलताएं : भारत में तलाक की प्रक्रिया अभी भी एक लंबी और बेहद थकाऊ है. अदालतों के चक्कर, तारीख पर तारीख और मानसिक तनाव के अलावा वकील की लंबीचौड़ी फीस लोगों को तलाक से पीछे हटने पर मजबूर करती है. कोर्ट भी तलाक का फैसला देने से पहले पूरी कोशिश करती है कि परिवार बना रहे. इसलिए कई बार मामले को काउंसलिंग में भेज दिया जाता है. फिर भरणपोषण, बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी, संपत्ति में हिस्सेदारी जैसी कई अन्य समस्याओं का समाधान निकलने में लंबा समय लगता है. इन प्रक्रियाओं के चलते तलाक मिलने में 2 साल से ले कर 10 साल तक लग जाते हैं.

आर्थिक पहलू : तलाक के केस में औरतें पुरुषों पर कई तरह के झूठे आरोप लगाती हैं ताकि अदालत उस आधार पर तलाक को जल्दी मंजूर कर ले. इस से पुरुष की सामाजिक छवि बहुत खराब हो जाती है. कई मामलों में तो गंभीर आरोप लगने की वजह से पुरुषों को नौकरी तक से हाथ धोना पड़ा है. इस के अलावा पुरुषों को अकसर एलिमनी यानी स्त्री को भरणपोषण का पैसा देने का डर सताता है. पति की नेट इनकम का 30-40 फीसदी इस में जा सकता है. ऐसे में वह सोचता है कि अलग रहना तलाक लेने से कहीं बेहतर है.

महिलाएं आर्थिक असुरक्षा और बच्चों के भविष्य को ले कर चिंतित रहती हैं. अगर पति उन को अलग रख कर उन का खर्चापानी देता रहे तो यह चिंता भी खत्म हो जाती है. ऐसी स्थिति में पति बच्चों के संपर्क में भी रहता है. फिर जो स्त्रियां नौकरी करती हैं, वे तो अपने लिए पति से कोई पैसा भी नहीं चाहती हैं. वे, बस, सुकून से जीवन जीना चाहती हैं जैसे नंदिनी शाह चाहती हैं.

सामाजिक दबाव : आज भी ‘तलाकशुदा’ शब्द समाज में एक धब्बे की तरह देखा जाता है, खासकर महिलाओं के लिए. परिवार, रिश्तेदार और सामाजिक सर्कल में फुसफुसाहटें और जजमैंट तलाक लेने के फैसले को कठिन बना देता है.

न तू मेरा न पराया वाला रिश्ता

40-50 साल की आयु आतेआते स्त्री और पुरुष दोनों की सैक्स भूख लगभग खत्म सी हो जाती हैं. इस उम्र में वे शांति और सुकून ज्यादा चाहते हैं. ऐसे में यदि एकदूसरे की शक्ल अब अच्छी नहीं लगती या मनभेद और मतभेद अधिक उभर गए हैं, तो इस स्थिति में कई कपल बीच का रास्ता चुन लेते हैं. वे कानूनी रूप से विवाहित रहते हैं लेकिन अलगअलग कमरों या घरों में रहते हैं. कुछ पतिपत्नी एक ही घर में रहते हुए भी अलग कमरे में सोते हैं. कुछ अलगअलग शहरों या घरों में रहना पसंद करते हैं. कई मामलों में वे सामाजिक आयोजनों में साथ दिखाई देते हैं लेकिन निजी जीवन में पूरी तरह अलग होते हैं. यह व्यवस्था उन्हें रोजमर्रा के झगड़ों से राहत देती है और एक तरह की ‘व्यवस्थित दूरी’ बना देती है.

बच्चों पर बुरा असर

सच यह है कि यह अलगाववादी व्यवस्था एक कंप्रोमाइज मौडल है- न पूरी तरह अलग, न पूरी तरह साथ. यह उन लोगों के लिए एक अस्थायी राहत हो सकती है जो तलाक के कानूनी, सामाजिक और आर्थिक परिणामों से बचना चाहते हैं. मगर लंबे समय तक इस स्थिति का गहरा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है. वे ऐसे माहौल में बड़े हो रहे होते हैं जहां मातापिता दुनिया को दिखाने के लिए साथ हैं, मगर असलियत में साथ नहीं हैं. ऐसे बच्चे भावनात्मक रूप से बेहद असुरक्षित होते हैं. रिश्तों को ले कर उन का दृष्टिकोण बहुत भ्रमित सा रहता है.

बच्चे स्वभावतया संवेदनशील होते हैं. वे शब्दों से अधिक भावनाओं को पढ़ते हैं. मातापिता के बीच का तनाव, संवादहीनता, ठंडापन या छिपी हुई कड़वाहट, इन सब बातों को वे आसानी से महसूस कर लेते हैं, भले ही उन से कुछ कहा न जाए. जब मातापिता दुनिया के सामने एक आदर्श परिवार का दिखावा करते हैं, लेकिन घर के भीतर संबंध खोखले होते हैं, तो बच्चे एक गहरे द्वंद्व में फंस जाते हैं.

ऐसे में आगे आने वाले समय में वे किसी पर भरोसा नहीं कर पाते यहां तक कि वे अपने जीवनसाथी के साथ भी अच्छे से कनैक्ट नहीं हो पाते हैं. उन के लिए सभी रिश्ते बड़े उथलेउथले से होते हैं. कई बार बच्चे मांबाप के अलगाव के लिए खुद को दोषी समझने लगते हैं. उन्हें लगता है कि शायद उन की किसी गलती या कमी के कारण घर का माहौल बिगड़ा है. वे ग्लानि और हीनभावना से ग्रस्त हो जाते हैं, जो उन के आत्मविश्वास और व्यक्तित्व विकास पर गहरा असर डालता है.

यह समझना जरूरी है कि बच्चे सिर्फ भौतिक सुविधाओं से नहीं, बल्कि स्वस्थ भावनात्मक वातावरण से विकसित होते हैं. मातापिता का साथ होना तभी सार्थक है जब उस में सच्चाई, सम्मान और संवाद हो. केवल सामाजिक छवि बनाए रखने के लिए एक टूटे हुए रिश्ते को ढोना, दरअसल बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है.

समाधान आसान नहीं है, लेकिन स्पष्ट है कि या तो रिश्ते को ईमानदारी से सुधारने की कोशिश की जाए, या फिर सम्मानजनक और स्पष्ट अलगाव का रास्ता अपनाया जाए. आधेअधूरे रिश्ते बच्चों को पूरा नहीं बना सकते. बच्चों को एक ‘परफैक्ट परिवार’ नहीं, बल्कि एक ‘सच्चा और स्वस्थ माहौल’ चाहिए होता है, जहां रिश्ते दिखावे के नहीं, बल्कि विश्वास और भावनात्मक सच्चाई पर टिके हों.

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