Cockroach Controversy: चीफ जस्टिस सूर्यकांत के कुछ हालिया बयानों को ले कर गंभीर सवाल पैदा होते हैं. उन के बयान सोशल मीडिया एक्टिविस्ट, जनहित याचिका, आरटीआई, पर्यावरण एक्टिविस्ट और मजदूर यूनियनों के खिलाफ हैं जबकि वे आरएसएस/बीजेपी के नैरेटिव को मजबूत करते हैं. जस्टिस सूर्यकांत के कौकरोच और पैरासाइट्स वाले ताज़ा बयान पर विवाद इस कदर बढ़ा कि सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर ‘कौकरोच जनता पार्टी’ ट्रैंड करने लगा. हालांकि किसी इश्यू का सोशल मीडिया पर ट्रैंड होना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन यह न्याय की सब से ऊंची कुरसी पर बैठे हुए व्यक्ति की मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह तो है? अब सवाल यह है कि क्या सूर्यकांत के निशाने पर वे लोग हैं जो बिके हुए मीडिया के दौर में वैकल्पिक मीडिया बन कर जनता के सवाल उठाते हैं और पीआईएल व आरटीआई के जरिए सिस्टम की खामियां उजागर करते हैं?

15 मई, 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक वकील की डिग्री की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि समाज में पहले से ही पैरासाइट हैं जो सिस्टम पर हमला करते हैं. कुछ युवा कौकरोच की तरह हैं जिन्हें नौकरी नहीं मिलती, प्रोफैशन में जगह नहीं मिलती. उन में से कुछ युवा मीडिया एक्टिविस्ट तो कुछ सोशल मीडिया, कुछ आरटीआई, कुछ पीआईएल एक्टिविस्ट बन जाते हैं और सिस्टम पर हमला करने लगते हैं. विवाद बढ़ने पर सीजेआई ने सफाई दी कि उन्होंने सिर्फ ‘फर्जी डिग्री’ ले कर प्रोफैशन में घुसे लोगों के बारे में टिप्पणी की थी, देश के युवाओं पर नहीं. अगर ऐसा ही है तो क्या कारण है कि जस्टिस सूर्यकांत अकसर आरएसएस के नैरेटिव को मजबूत करते नजर आए हैं.

चीफ जस्टिस सूर्यकांत के कुछ हालिया बयानों को ले कर गंभीर सवाल पैदा होते हैं. उन के बयान सोशल मीडिया एक्टिविस्ट, जनहित याचिका, आरटीआई, पर्यावरण एक्टिविस्ट और मजदूर यूनियनों के खिलाफ हैं जबकि आरएसएस/बीजेपी के नैरेटिव को मजबूत करते हैं. जस्टिस सूर्यकांत के कौकरोच और पैरासाइटस वाले ताज़ा बयान पर विवाद इस कदर बढ़ा कि सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर कौकरोच जनता पार्टी ट्रैंड करने लगा. हालांकि कोई इश्यू सोशल मीडिया पर ट्रैंड होना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन यह न्याय की सब से ऊंची कुरसी पर बैठे हुए व्यक्ति की मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह है. अब सवाल यह है कि क्या सूर्यकांत के निशाने पर वे लोग हैं जो बिकी हुई मीडिया के दौर में वैकल्पिक मीडिया बन कर जनता के सवाल उठाते हैं, पीआईएल और आरटीआई के जरिए सिस्टम की खामियां उजागर करते हैं?

आरटीआई वाले पैरासाइटस तो जान पर खेलते हैं

आरटीआई और पीआईएल का मकसद था धर्म, सत्ता, जाति से ऊपर उठ कर तथ्यों के आधार पर सत्ता से सवाल पूछना और लोकतंत्र के हित में सत्ता संस्थानों को जवाबदेह बनाना लेकिन चीफ जस्टिस कहते हैं कि जिन के पास कोई काम नहीं, वे ही आरटीआई एक्टिविस्ट बन गए हैं. आरटीआई यानी सूचना का अधिकार कानून 2005 में कांग्रेस ले कर आई थी ताकि आम आदमी सरकारी फाइलों की धूल झाड़ सके. लेकिन अब यह कानून सवाल पूछने वालों के लिए मौत का जरिया बन गया है. आरटीआई एक्टिविस्टों पर पिछले 20 साल में 600 से ज्यादा हमले हुए हैं और 21 लोग मारे जा चुके हैं.

अक्टूबर 2025 में गुजरात के बनासकांठा के दिव्यांग आरटीआई एक्टिविस्ट रसिक परमार ने अहमदाबाद म्युनिसिपल कौर्पोरेशन के बिल्डरों के घोटाले खोले थे. रसिक परमार बिजली के झटके से दोनों हाथ और एक पैर गंवा चुके थे. इन्हें बिल्डर कलपेश छाछणी ने 20 लाख रुपए दे कर मरवाया. 12 अक्टूबर को गला घोंट कर शव नहर में फेंक दिया गया.

बिहार में मार्च 2025 को औरंगाबाद के रंजीत पासवान, जो आरटीआई एक्टिविस्ट थे और अपने यूट्यूब चैनल पर सामाजिक मुद्दे उठाते थे, 19 मार्च को काम पर जाते समय सिंटू सिंह, चीकू सिंह और विनय सिंह ने घेर कर उन्हें सीने में गोली मार दी और शव पुल के नीचे फेंक दिया.

छत्तीसगढ़ में नवंबर 2023 को एक व्यक्ति का कंकाल जंगल में जला हुआ मिला. कबीरधाम के पत्रकार-एक्टिविस्ट विवेक चौबे 12 नवंबर से लापता थे. जांच में पता चला कि गांव के सरपंच अमित यादव समेत 4 लोगों ने हत्या कर शव जलाया. मोटरसाइकिल के 3 टुकड़े कर जमीन में गाड़ दिए. विवेक चौबे की गलती यह थी कि वे आरटीआई के जरिए पंचायत का भ्रष्टाचार उजागर कर रहे थे.

2015 तक के ही आंकड़े बताते हैं कि 10 साल में 39 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हुई. महाराष्ट्र में सब से ज्यादा 10, गुजरात में 6 और यूपी में 6, कर्नाटक में 4. आरटीआई एक्टिविस्टों पर हमलों के मामलों में भी महाराष्ट्र 60 केस के साथ पहले नंबर पर था. लखनऊ की एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा कहती हैं, “सत्ता पारदर्शी नहीं होना चाहती. जो ऐसा करने के लिए सत्ता को मजबूर करता है उस की जान खतरे में पड़ जाती है.”

पीएम केयर फंड पर सवाल मत पूछो

28 मार्च, 2020 को कोरोना महामारी के दौरान केंद्र सरकार ने प्राइम मिनिस्टर सिटीजन असिस्टेंस एंड रिलीफ इन इमरजैंसी सिचुएशन्स फंड यानी पीएम केयर्स फंड बनाया. यह एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट है. इस के अध्यक्ष पीएम मोदी हैं, रक्षा, गृह, वित्त मंत्री ट्रस्टी हैं. इस फंड पर विवाद इसलिए हुआ क्योंकि पहले से आपदा प्रबंधन कानून 2005 के तहत एनडीआरएफ मौजूद था. फिर नए फंड की जरूरत ही क्यों पड़ी? इसे आरटीआई एक्ट से बाहर रखा गया और सब से बड़ी बात कि इस फंड का सीएजी औडिट नहीं हो सकता.

लुधियाना के होजरी व्यापारी रजनीश सिद्धू ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल कर मांग की कि पीएम केयर्स फंड को आरटीआई के दायरे में लाया जाए और सीएजी औडिट हो. 10 मार्च, 2026 को इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सीजेआई सूर्यकांत की बैंच ने व्यापारी से पूछा कि इतनी तकनीकी भाषा की याचिका आप ने खुद लिखी? रजनीश सिद्धू ने कहा कि उन्होंने एआई टूल्स और इंटरनैट की मदद से ड्राफ्ट तैयार किया. सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ‘तुम्हारी यह याचिका निराधार और स्कैंडलस है. जाओ, लुधियाना में दोतीन स्वेटर और बेचो.’ सीजेआई सूर्यकांत ने पीआईएल खारिज कर दी और चेतावनी दी कि ऐसी फुजूल याचिकाओं पर भविष्य में भारी जुर्माना लगेगा.

पीएम केयर्स को ले कर सुप्रीम कोर्ट का रुख शुरू से सख्त रहा है. अप्रैल 2020 में वकील एम एल शर्मा ने पीएम केयर्स को घोटाला साबित करने वाली याचिका दायर की लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा बिना आधार के आरोप कह कर यह याचिका ख़ारिज कर दी गई. अगस्त 2020 में प्रशांत भूषण ने पीआईएल दायर करते हुए कहा कि पीएम केयर का सारा पैसा एनडीआरएफ में ट्रांसफर होना चाहिए लेकिन यह याचिका भी ख़ारिज कर दी गई. तब सुप्रीम कोर्ट ने दलील दी थी कि पीएम केयर्स अलग चैरिटी है, इसलिए इस का ट्रांसफर एनडीआरएफ में जरूरी नहीं. 2022 में पीएम केयर फंड की वैधता को चुनौती देने वाली पीआईएल दायर हुई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया और कहा कि हाईकोर्ट में रिव्यू दाखिल करो.

हाईकोर्ट में सरकार ने कहा कि पीएम केयर्स एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट है, इसे सरकारी बजट नहीं मिलता. ट्रस्ट डीड में आरटीआई/सीएजी का प्रावधान नहीं है तो कोर्ट निर्देश नहीं दे सकता. बौम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि दान देना मजबूरी नहीं है. जिसे शक है वो दान न दे. हाईकोर्ट की बात छोड़ भी दें तो आज तक सुप्रीम कोर्ट ने पीएम केयर्स की सीएजी औडिट, आरटीआई में लाने या एनडीआरएफ में मर्ज करने की एक भी पीआईएल स्वीकार नहीं की.

सीजेआई सूर्यकांत ने 10 मार्च, 2026 को पीएम केयर्स वाली पीआईएल खारिज करते हुए याचिकाकर्ता की औकात पर टिप्पणी की लेकिन पीएम रिलीफ फंड की पारदर्शिता पर एक शब्द नहीं कहा.

कोर्ट में सरकार ने कहा कि पीएम केयर्स ‘राष्ट्रसेवा’ है, इसे आरटीआई-सीएजी से बाहर रखना जरूरी है. सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील मान ली. जबकि सीएम रिलीफ फंड को सीएसआर का फायदा देने से इनकार करने पर राजस्थान सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा था. आपदा कानून 2005 कहता है कि आपदा के समय सारी राशि एनडीआरएफ में जाएगी. जनता द्वारा इकठ्ठा किए गए धन के लिए एनडीआरएफ ही एकमात्र कोष होगा. फिर पीएम केयर्स क्यों? अगर कल को हर मंत्री अपना फंड बना ले तो कानून का क्या मतलब रह जाएगा?

2020-21 में पीएम केयर्स में 10,990 करोड़ रुपए जमा हुए. इन पैसों से वैंटिलेटर और वैक्सीन खरीद हुई लेकिन कितने वैंटिलेटर खराब निकले, कितना पैसा कहां गया, यह सीएजी नहीं बताएगा, आरटीआई नहीं बताएगा. बस, सरकार पर आस्था रखो. नतीजा यह है कि पीएम केयर फंड पर 5 साल बाद भी न सीएजी औडिट हो पाया और न आरटीआई से कोई जवाब मिला. जब जनता सुप्रीम कोर्ट से पूछे कि मेरा पैसा कहां गया तो जवाब मिलता है- राष्ट्रहित में सवाल मत पूछो. यही वह नैरेटिव है जिसे कोर्ट की चुप्पी मजबूत करती है. लोकतंत्र में कोई भी ट्रस्ट ‘भगवान’ नहीं होता, सभी को हिसाब देना होता है.

पीएम केयर्स फंड में कब, किस से, कितने पैसे आए और उसे कब, कहां, कितना, कैसे खर्च किया गया? क्या यह वाजिब सवाल नहीं है? इतनी साधारण सी बात जाहिर न करने के पीछे सरकार की मंशा क्या है? और इतनी सी छोटी बात न समझने वाली अदालत की मंशा क्या है? अदालत का कर्तव्य नागरिक अधिकार और संविधान का संरक्षण करना होना चाहिए न कि सरकार का कवच बनना. जो अदालत अपना डर और अपनी झेंप छिपाने के लिए याचिकाकर्ता को अपमानित करने पर उतर आए उस की मंशा पर देश को सवाल क्यों नहीं उठाना चाहिए?

जनहित की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

सीजेआई की ‘पैरासाइट’ वाली टिप्पणी में एक बात सही है. कुछ लोग फर्जी डिग्री ले कर, ब्लैकमेल करने के लिए आरटीआई-पीआईएल का इस्तेमाल करते हैं. बात कुछ हद तक सही है लेकिन दिक्कत यह है कि एक ही लाठी से सब को हांक देना उचित नहीं है. जब न्याय के सब से बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के मुंह से ‘कौकरोच’ जैसे शब्द निकलते हैं तो मामूली दरोगा को भी सोशल एक्टिविस्ट को डराने का लाइसैंस मिल जाता है. ये एक्टिविस्ट सिस्टम पर हमला नहीं करते बल्कि ऐसे बयान देने वाले लोग लोकतंत्र पर हमला करते हैं, इसलिए इस में हैरानी की बात नहीं कि सीजेआई सूर्यकांत से जुड़ी आरटीआई का जवाब देने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया था. जब सब से ऊंची अदालत खुद हिसाब नहीं देगी तो बिल्डर-खनन माफिया से क्या उम्मीद करें?

2006 से 2026 के बीच 21 आरटीआई एक्टिविस्ट मारे गए. 600 से ज्यादा पर हमले हुए. ये लोग पुल, राशन, स्कूल, खनन के घोटाले खोल रहे थे, कोई मंदिरमसजिद नहीं तोड़ रहे थे. 12 साल पहले महाराष्ट्र ने अंधश्रद्धा विरोधी कानून बनाया. नियम आज तक नहीं बने. कोल्हापुर के एक्टिविस्टों ने पीआईएल दायर की लेकिन आज भी रिजल्ट जीरो है. जनहित की पीआईएल को अदालतें खुद लटका देती है जबकि आरएसएस नैरेटिव वाली पीआईएल पर कोर्ट का रुख नरम रहता है.

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कुछ पीआईएल के पैटर्न से सवाल उठते हैं. सुप्रीम कोर्ट की भाषा, सुनवाई का तरीका और फैसलों के नतीजे देख कर कई बार लगता है कि धार्मिक और राष्ट्रवादी एजेंडे वाली याचिकाएं आसानी से स्वीकार की जाती हैं, जबकि मजदूर, आदिवासी, पर्यावरण और पीएम केयर से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर कोर्ट भड़क जाता है. घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन वाली पीआईएल खारिज कर दी गई और इस मामले में ट्रेड यूनियनों से कहा गया कि एक बार न्यूनतम वेतन तय हो गया तो लोग काम पर रखने से मना कर देंगे, हर घर मुकदमेबाजी में होगा.

साल 2018 में याचिकाकर्ता स्वामी अग्निवेश ने पीआईएल दाखिल कर मांग की थी कि 50 करोड़ असंगठित मजदूरों को संगठित क्षेत्र जैसा वेतन मिलना चाहिए. तब सीजेआई रंजन गोगोई ने याचिका ख़ारिज करते हुए कहा था, ‘हम इस पीआईएल पर विचार नहीं कर सकते, संबंधित अधिकारियों के पास जाओ.’

पैरासाइट कौन

बड़ा सवाल यह भी है कि जनहित याचिका दाखिल करने वाले ‘पैरासाइट’ हैं या लोकतंत्र के पहरेदार? जो लोग अपनी जान पर खेल कर जनता के हक की पीआईएल दाखिल करते हैं, क्या वे भी सीजेआई की नजर में ‘सिस्टम पर हमला’ कर रहे हैं? गुजरात के अमित जेठवा ने गिर अभयारण्य में अवैध खनन के खिलाफ पीआईएल दायर की. उन्हें हाईकोर्ट के बाहर ही गोली मार दी गई. सीबीआई ने पूर्व भाजपा सांसद दीनू सोलंकी समेत 7 को आरोपी बनाया. निचली अदालत ने सजा दी. लेकिन 2024 में गुजरात हाईकोर्ट ने सब को बरी कर दिया क्योंकि 196 गवाहों में 105 मुकर गए.

आरएसएस के नैरेटिव वाली पीआईएल पर अलग तेवर क्यों

प्लेसेज औफ वर्शिप अधिनियम 1991 को कांग्रेस की पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने सांप्रदायिक तनाव को रोकने के लिए बनाया था. इस क़ानून का मकसद था 15 अगस्त, 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस धर्म का था, वैसा ही बना रहे. इस क़ानून की धारा 3 के अनुसार किसी भी पूजास्थल को एक धर्म से दूसरे धर्म में या उसी धर्म के दूसरे संप्रदाय में बदलना अपराध है. धारा 4(1) कहती है कि 15 अगस्त, 1947 को किसी पूजास्थल का धार्मिक स्वरूप जो था, वही बना रहेगा.

धारा 4(2) के अनुसार 15 अगस्त, 1947 को किसी पूजास्थल के स्वरूप को ले कर जो मुकदमे लंबित थे, वे खत्म माने जाएंगे. नए मुकदमे दायर नहीं हो सकते. हालांकि अयोध्या का रामजन्मभूमि-बाबरी मसजिद विवाद इस कानून से बाहर था और प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व स्थल अधिनियम 1958 के तहत संरक्षित स्मारक भी इस कानून के दायरे से बाहर हैं. कानून का मकसद था कि बाबरी के बाद अब कोई नया मंदिरमसजिद विवाद न हो.

वर्ष 2020 में कुछ बीजेपी नेताओं ने इस क़ानून को कमजोर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर की और सुप्रीम कोर्ट ने इस पीआईएल को स्वीकार भी कर लिया. इस याचिका को काशी नरेश की बेटी कृष्ण प्रिया, देवकीनंदन ठाकुर, रिटायर्ड कर्नल अनिल कबोत्रा और स्वामी जितेंद्रानंद ने दाखिल किया था. इस याचिका के तहत मांग की गई थी कि 1991 का कानून रद्द होना चाहिए ताकि ज्ञानवापी, मथुरा, कुतुबमीनार पर केस हो सके क्योंकि हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना जरूरी है. सीजेआई संजीव खन्ना ने 6 पीआईएल स्वीकार कीं. ज्ञानवापी-मथुरा केसों की बाढ़ इसी पीआईएल के बाद आई.

2019 में अयोध्या फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने खुद कहा था कि 1991 का यह एक्ट संविधान की मूल संरचना और धर्मनिरपेक्षता के दायित्व से जुड़ा महत्त्वपूर्ण क़ानून है. फिर भी 2020 से भाजपा नेताओं और हिंदुत्व संगठनों ने पीआईएल की बाढ़ ला कर इसे कमजोर किया. ऐसी याचिकाएं खारिज करने के बजाय सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में केंद्र को नोटिस जारी किया. 2024 में सीजेआई संजीव खन्ना की बैंच ने केंद्र सरकार से 4 हफ्ते में जवाब मांगा. यानी, 1991 के एक्ट की वैधता पर सवाल को सुनवाई योग्य मान लिया.

2020 की पीआईएल में 1991 के क़ानून के अपवादों का फायदा उठाते हुए तर्क दिया गया कि धारा 4(3) कहती है कि प्राचीन स्मारकों पर 1991 का एक्ट लागू नहीं होता और मध्य प्रदेश की भोजशाला 1958 के कानून के तहत संरक्षित स्मारक है, इसलिए यहां हिंदू पूजा का अधिकार मांग सकते हैं.

2024 में एएसआई की सर्वे रिपोर्ट के आधार पर भोजशाला को सरस्वती मंदिर घोषित कर दिया गया. 1991 के एक्ट की सब से बड़ी कमजोरी धारा 4(3) बन गई. अब हर मसजिद को प्राचीन मंदिर बता कर एएसआई सर्वे की मांग हो रही है. इस से हुआ यह कि निचली अदालतों में इस तरह के मुकदमों की बाढ़ आ गई और ऐसे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की सख़्ती गायब हो गई.

पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने मई 2022 में ज्ञानवापी केस में कहा कि, ‘1991 एक्ट धार्मिक स्थल की पहचान करने से नहीं रोकता, सिर्फ स्वरूप बदलने से रोकता है.’ इस का नतीजा यह हुआ कि इस के बाद देशभर में 18 मुकदमे दायर हो गए. मथुरा, संभल, धार और कुतुबमीनार सभी जगह एक ही पैटर्न नजर आने लगा. निचली अदालतों ने सर्वे के आदेश देने शुरू कर दिए. नतीजा यह हुआ कि संभल में सर्वे के दौरान हिंसा में 5 लोग मारे गए. तब 12 दिसंबर, 2024 को सीजेआई संजीव खन्ना ने आदेश दिया कि, ‘जब तक हम एक्ट की वैधता पर फैसला नहीं देते, कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं होगा और लंबित केसों में सर्वे समेत कोई आदेश नहीं होगा’ लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और भानुमति का पिटारा खुल चुका था.

1991 के एक्ट की धारा 3 और 4 किसी भी धर्मस्थल के स्वरूप को बदलने पर रोक लगाते हैं लेकिन हर मसजिद के नीचे सर्वे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नई तरकीब निकाल ली. सुप्रीम कोर्ट ने मई 2022 में कहा कि, ‘किसी धर्मस्थल के धार्मिक चरित्र का पता करने के लिए जांच हो सकती है.’ इसी का फायदा उठा कर ज्ञानवापी, मथुरा, भोजशाला में एएसआई सर्वे हुए. सर्वे में मंदिर के अवशेष मिलने लगे, फिर हाईकोर्ट उसी आधार पर पूजा का अधिकार देने लगा, यानी, ‘स्वरूप बदले बिना कब्जा’ होना संभव हो गया. 1991 का कानून कहता है जो 1947 में था वही रहेगा लेकिन धारा 4(3) की कमजोरी का फायदा उठाते हुए चरित्र पता करने के लिए सर्वे की छूट दे कर कोर्ट ने ही रास्ता दे दिया. अब हर मसजिद ‘संरक्षित स्मारक’ बता कर खोदी जा रही है.

1991 के एक्ट को दक्षिणपंथियों द्वारा दायर की गई पीआईएल ने 3 तरीके से खोखला किया. सीधी चुनौती दे कर, प्राचीन स्मारक का अपवाद इस्तेमाल कर के और सर्वे की आड़ ले कर. सुप्रीम कोर्ट ने भी 3 तरीकों से दक्षिणपंथियों के नैरेटिव का साथ दिया. नोटिस जारी कर के, सर्वे की इजाजत दे कर और 2 साल तक रोक न लगा कर. अब एक्ट कागज पर है और जमीन पर ज्ञानवापी से भोजशाला तक ‘मंदिर’ निकल रहे हैं. सच तो यह है कि जब कानून की व्याख्या आस्था से होने लगे तो 1947 की ‘कट-औफ डेट’ का कोई मतलब नहीं रह जाता.

सत्ताहित में बदलता जनहित

अब सवाल यह है कि जनहित की परिभाषा कौन तय करेगा? जब 50 करोड़ मजदूरों के वेतन की पीआईएल गैरजरूरी मामला बता कर खारिज हो जाती है और 1991 का कानून रद्द करने की पीआईएल संवैधानिक मामला बन जाती है तो लगता है कि जनहित असल में सत्ताहित बनता जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट आरएसएस की शाखा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने बिल्किस बानो केस में गुजरात सरकार को लताड़ा था और इलैक्टोरल बौंड रद्द करने जैसे बेहद महत्त्वपूर्ण फैसले लिए थे लेकिन यह भी सच है कि सुप्रीम कोर्ट आरएसएस के नैरेटिव को मजबूत करने वाले धर्म, राष्ट्रवाद और संस्कृति जैसे मुद्दों से जुड़ी पीआईएल को संवैधानिक सवाल मान कर स्वीकार करता है और रोटी, मजदूरी, जल जंगल जमीन से जुड़ी पीआईएल को नीतिगत मामला या यूनियनबाजी कह कर टाल देता है.

जब न्याय के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के मुंह से हर प्रोजैक्ट पर ‘प्रोटैस्ट क्यों’ और ‘झंडा यूनियन काम नहीं करना चाहते’ जैसे जुमले निकलते हैं तो वो आरएसएस के भाषण से अलग नहीं लगते और जब जनता के हक की पीआईएल पर जज भड़क जाते हैं तो सवाल उठता है कि संविधान की शपथ किस के लिए ली थी- जनता के लिए या सरकार के लिए?

लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं होता, यह लोकतंत्र के लिए औक्सीजन जैसा होता है. अमित जेठवा पैरासाइट नहीं थे. वो खुद एक वकील थे जिन्होंने जंगल बचाने के लिए पीआईएल दायर की थी. उन्हें हाईकोर्ट के गेट पर मार दिया गया. रसिक परमार पैरासाइट नहीं थे. दिव्यांग होने के बावजूद वे अपना नागरिक होने का कर्तव्य निभा रहे थे. उन्हें 20 लाख रुपए की सुपारी दे कर नहर में फिंकवा दिया गया.

अगर ऐसे लोगों को पैरसाइट कहा जाएगा तो बचेगा कौन? नेता, अफसर, माफिया का गठजोड़ तो मंदिर में प्रसाद बांट कर ‘पुण्य’ कमा लेगा लेकिन मरेगा तो वही जो हक मांगेगा. जस्टिस सूर्यकांत की नजर में ये ‘पैरासाइट’ हैं या नहीं, ये वे जानें लेकिन इतिहास की नजर में अमित जेठवा, सत्येंद्र दुबे, लिंगाराजू जैसे लोग लोकतंत्र के असली हीरो हैं. ‘कौकरोच’ तो वो हैं जो अंधेरे, गंदगी और भ्रष्टाचार में पलते हैं. सवाल पूछने वाला तो टौर्च ले कर आता है.

सुप्रीम कोर्ट में पाखंडवाद का नंगा खेल

मीडिया की तरह आरटीआई और पीआईएल जैसे जनता के लोकतांत्रिक औजार भी बीजेपी ने हाइजैक कर लिए हैं. अब मीडिया, आरटीआई और पीआईएल के जरिए जनता के मुद्दे उठाने की हिम्मत करने वाले लोग पैरासाइट हो गए हैं. आरटीआई और पीआईएल सिर्फ दक्षिणपंथियों के नैरेटिव के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं, इसलिए ऐसीऐसी पीआईएल दाखिल की जा रही हैं जिन से आम आदमी का कोई सरोकार नहीं, सिर्फ धर्म का फायदा है.

बीजेपी शासन में तर्क की धज्जियां उड़ाने का पैटर्न चल पड़ा है, इसलिए सुप्रीप कोर्ट में लगातार ऐसी पीआईएल दायर की जा रही हैं जिन के जरिए तर्क और क्रिटिकल थिंकिंग की मौत निश्चित है. अभी हाल ही में एक पीआईएल दायर हुई जिस में मांग की गई थी कि प्याज़ की तामसिक ऊर्जा पर रिसर्च हो. 2014 से ऐसे फ्रिवोलस केसों का सिलसिला बढ़ा है क्योंकि सत्ता खुद वैदिक साइंस, प्राचीन ज्ञान और सनातन परंपरा जैसी बातों को प्रमोट करती है.

भाजपा के शासन के दौरान ही गौमूत्र और गोबर पर शोध के लिए रिसर्च प्रोजैक्ट्स बने. स्कूल सिलेबस में ज्योतिष, वास्तु और आयुर्वेद को वैज्ञानिक दर्जा मिला. आईआईटी में वैदिक मैथ्स और रामसेतु को ब्रिज इंजीनियरिंग का प्रोजैक्ट पढ़ाया जा रहा है. कोविड में कोरोना क्योर के नाम पर तुलसी-अश्वगंधा का प्रचार हुआ और अब बात प्याजलहसुन पर रिसर्च तक पहुंच गई.

जब प्रधानमंत्री खुद योग और आयुर्वेद को ‘वर्ल्ड हैरिटेज’ बताते हैं, जब आरएसएस और इस से जुड़े तमाम हिंदूवादी संगठन हिंदू विज्ञान की बात करते हैं तब सचिन गुप्ता जैसे वकील प्याज़ ले कर सुप्रीम कोर्ट क्यों न पहुंचें? कोर्ट का समय बरबाद हो, इस से क्या फर्क पड़ता है? टैक्सपेयर का पैसा सूडो साइंस की भेंट चढ़े, इस से भी किसे फर्क पड़ता है? युवा पीढ़ी की क्रिटिकल थिंकिंग जाए भाड़ में. यही कारण है कि यूट्यूब पर प्याज खाने से नर्क वाले वीडियो वायरल होते हैं. इस तरह के मामलों से विज्ञान और धर्म को अलग रखने वाले संविधान की सैकुलर स्पिरिट की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं लेकिन सरकार भी तो यही चाहती है.

आम आदमी वैज्ञानिक नजरिए से सोचने लगे तो वह भक्त कैसे बना रह पाएगा. जनता भक्त बनी रहे, इस में सरकार और धार्मिक गिरोहों का ही तो फायदा है. हालांकि, इस मामले में सीजेआई का रुख सराहनीय है. उन्होंने इस पीआईएल को सिरे से ख़ारिज कर दिया लेकिन यह सिर्फ एक केस सिस्टम के धर्मभीरु होने का सुबूत नहीं है.

अश्विनी उपाध्याय नाम के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की. इस में वे मांग कर रहे हैं कि सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों के पुजारियों और कर्मचारियों को कर्मचारी का दर्जा मिले और उन्हें न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और अच्छी सुविधाएं दी जाएं. पुजारी शोषित हो रहे हैं, उन का वेतन मजदूरों से भी कम है.

सवाल यह है कि क्या अश्विनी उपाध्याय की याचिका वाजिब है? क्या पुजारियों को सरकारी वेतन मिलना चाहिए? यह याचिका भी पाखंडवाद को हवा देने का एक और तरीका ही है. असल में तो यह पूरी बहस बेकार और हास्यास्पद है. पुजारी क्या करते हैं? वे मूर्तियों के आगे घंटी बजाते हैं, मंत्र पढ़ते हैं, चढ़ावा इकट्ठा करते हैं और लोगों को यह विश्वास दिलाते हैं कि भगवान उन की समस्याएं हल कर देंगे. वैज्ञानिक युग में अंधविश्वास के इस कारोबार से फायदा किस का है?

सरकार या अदालत को अंधविश्वास के युगों पुराने इस बिजनैस में शामिल कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ाने की क्या जरूरत है? अगर पुजारी इस कारोबार में खुश नहीं हैं तो वे कोई दूसरा पेशा क्यों नहीं चुन सकते? वे शिक्षक, डाक्टर, इंजीनियर या मजदूर बन कर समाज को उन्नति की ओर ले जाने में योगदान दे सकते हैं. इन पेशों में कम से कम समाज को कुछ ठोस फायदा तो होता है.

मंत्र पढ़ने से बीमारी नहीं जाती, दवा से जाती है. समस्या हल करने के लिए पूजा नहीं, मेहनत और शिक्षा की जरूरत पड़ती है. 21वीं सदी में हमें अस्पताल, स्कूल, रिसर्च लैब और रोजगार चाहिए. मंदिरों में घंटी बजाने वाले नहीं. ईश्वर, पूजापाठ और पुजारी सब मिथ्या ही होते हैं. इन पर टैक्स का पैसा या अदालती समय बरबाद करना राष्ट्र की प्रगति के खिलाफ है. जब ऐसी पीआईएल सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच रही हैं तो समझ लीजिए कि बीजेपी काल में साइंटिफिक टैंपर की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है.

असली कौकरोच कौन

टीवी खोलो तो लगता है भारत में 2 ही मुद्दे बचे हैं. विपक्ष कितना निकम्मा है और मोदी जी कितने महान हैं. इस से थोड़ी फुरसत मिले तो ज्योतिष, धर्म, मंदिरमसजिद, हिंदूमुसलमान और एलियन पर जरूरी खबरें दिनभर चलती रहती हैं. शाम के शो में एंकर चीख रहा होता है, रिपोर्टर स्टूडियो से ग्राउंड जीरो बता रहे होते हैं और एक्सपर्ट पैनल में 4 लोग बैठ कर घर के टीवी का स्पीकर ब्लास्ट कर रहे होते हैं.

इसी को नाम दिया गया है गोदी मीडिया. भारत में पत्रकारिता की कब्र इसी गोदी कल्चर ने खोद कर रख दी है. भारत में पत्रकारिता 157वें नंबर पर यों ही नहीं पहुंची. गोद में बैठ कर सवाल नहीं, सिर्फ हां में हां मिलाई जाती है. मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक, अस्पतालों की लूट, किसान की बदहाली, जलजंगलजमीन पर संकट, हिंसा, उत्पीड़न और जातिवाद ये सब नौनइश्यू हैं. असली इश्यू है कि फलां नेता ने कपड़े कैसे पहने? फलां कम्युनिटी कितनी महान है? फलां धर्म कितना पुराना है? फलां प्राचीन ग्रंथ में कितनी साइंस है?

पत्रकारिता का मतलब होता है जनता के पक्ष में सत्ता से सवाल, लेकिन, अब मतलब बदल गया है. मीडिया संस्थान अब मीडिया हाउस बन गए हैं और सत्ता के प्रवक्ता की भूमिका पूरी ईमानदारी व निर्लज्जता के साथ निभा रहे हैं. कैमरा जनता की तरफ कम, विपक्ष के घर की तरफ ज्यादा घूमता है. स्टूडियो में बैठे वरिष्ठ पत्रकार की रीढ़ की हड्डी ऐसी लचीली हो गई है कि वो 90 डिग्री पर भी झुक जाए तो दर्द नहीं होता. इसे ही चाटुकारिता कहते हैं और इसी चाटुकारिता ने पत्रकारिता को टीआरपी के शोरूम में बदल दिया है.

अब जब मेनस्ट्रीम चैनल सो गए तो जनता ने अपना मीडिया खुद बना लिया. टीवी बीमारी फैलाने लगे तो कुछ लोग यूट्यूब, इंस्टाग्राम, ट्विटर के जरिए इलाज ढूंढ़ने लगे. गांव का एक लड़का फोन उठाता है, खेत में खड़ी सूखी फसल दिखाता है और पूछता है साहब, एमएसपी कहां है? कालेज की लड़की लाइब्रेरी की फीस बढ़ने पर लाइव आ जाती है. ट्रेन में औरत से बदतमीजी करने वाले सेना के जवान को माफ़ी मांगनी पड़ती है. थाने में बैठा दरोगा एक वीडियो से सस्पैंड हो जाता है.

यही हैं आज के असली रिपोर्टर जो बिना मेकअप, बिना स्क्रिप्ट, बिना नोएडा में दफ्तर लिए सच दिखा रहे हैं. इन बेरोजगार युवाओं के पास स्टूडियो नहीं, सच्चाई है लेकिन ये सच्चाई कुछ लोगों को चुभती है. ये आजाद पत्रकार कुछ लोगों को कौकरेच जैसे लगते हैं, मतलब कीड़ेमकोड़े. यानी, जो सवाल पूछे, सत्ता को आईना दिखाए और जनता की पत्रकारिता करे वो गंदगी फैलाने वाला जीव हो गया.

अब सवाल यह है कि असली कौकरेच कौन हैं? वो मामूली यूट्यूबर जो पेपर लीक पर युवाओं की परेशानियां रिकौर्ड कर रहा है या वो एंकर जो पेपर लीक वाले दिन मंदिर में चमत्कार पर डिबेट करा रहा है? कौकरेच वो है जो बेरोजगारी पर बात कर रहा है या वो जो बेरोजगारों को कौकरेच कह रहा है? सिस्टम में घुसे असली कौकरेच वे हैं जो सिस्टम के अंधेरे कोनों में पलते हैं, इन्हें सच्चाई से बदबू आती है और रोशनी से दिक्कत होती है. सो, जब कोई मोबाइल की टौर्च जला कर सिस्टम का असली सच दिखाता है तो वो इन्हें कीड़ा ही लगता है.

सरकार के तलवे चाटना मीडिया की ही नहीं, सिस्टम में बैठे ज्यादातर लोगों की मजबूरी बन गई है. पेंशन और प्रमोशन पक्का तो होता ही है, रिटायरमैंट के बाद भी सरकारी खर्चे वाली ऐयाशी जारी रहती है और चाटुकारिता के ग्राफ को देखते हुए किसी सरकारी संस्थान में चेयरमैन बना दिए जाएं तो बुढ़ापा लग्जरी में बीतता है. जब तक पद पर हैं तब तक आंखें बंद कर के सब चंगा सी का भजन गाते रहिए, बस.

महंगाई कैसे नजर आएगी जब गाड़ी के साथ ड्राइवर और गाड़ी में तेल भी सरकार का हो. बेरोजगारी भी नहीं दिखेगी क्योंकि अपने बच्चे विदेशों में सेट हैं. अस्पताल की लूट नहीं दिखती क्योंकि अपना इलाज तो फ्री है. ऐसे में जब कोई बेरोजगार युवा सोशल मीडिया पर सवाल पूछता है कि नौकरी कहां है तो उसे जवाब मिलता है- तुम देशद्रोही हो, कौकरोच हो. सवाल पूछने वाला कीड़ा और सवाल दबाने वाला देशभक्त. इस में कोई हैरानी नहीं कि न्याय की सर्वोच्च कुरसी पर बैठे व्यक्ति की ऐसी वाहियात मानसिकता है.

सच तो यह है कि आज का वैकल्पिक मीडिया ही असली मीडिया है क्योंकि वो विज्ञापन से नहीं, जनता के दर्द से चलता है, उस के पास एजेंडा नहीं बल्कि एजेंडे पर सवाल हैं. कौकरोच होना बुरी बात नहीं है, वे रसोई की गंदगी साफ करते हैं. लग्जरी में बैठे कौकरोच और जमीन वाले कौकरोच में फर्क होता है क्योंकि लोकतंत्र में राजा की गोद नहीं, जनता की जमीन ज्यादा माने रखती है.

सीएमआईई के मुताबिक, वर्ष 2025 में भारत में 20-24 साल के 45 प्रतिशत ग्रेजुएट बेरोजगार हैं. जब सिस्टम रोजगार नहीं देगा तो युवा सवाल पूछेंगे, आरटीआई डालेंगे, सोशल मीडिया पर लिखेंगे. इन्हें ‘कौकरोच’ कहना बीमारी को गाली देना है, इलाज नहीं. हजारों करोड़ के बैंक फ्रौड, चुनावी बौंड और पीएम केयर्स का हिसाब मांगने वाले आरटीआई कार्यकर्ता पैरासाइट नहीं हैं बल्कि असली पैरसाइट वो हैं जो सिस्टम में बैठ कर लोकतंत्र को खोखला कर रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद निष्पक्षता की होती है, किसी ‘नैरेटिव’ की नहीं. जब न्याय के सर्वोच्च पद पर बैठे जजों की भाषा सत्ता के भाषण जैसी लगने लगे तो सवाल उठना लाजिमी है चाहे ऐसे सवाल उठाने वाले पैरासाइट कहलाएं या कौकरोच.

सवाल जिंदा रहेगा, तो लोकतंत्र जिंदा रहेगा. अगर पीआईएल सिर्फ मंदिरमसजिद के लिए दायर होंगी और आरटीआई सिर्फ ब्लैकमेल के लिए, तो नुकसान धर्म का नहीं, लोकतंत्र का होगा. और, जब लोकतंत्र बीमार होगा तो सब से पहले सवाल पूछने वाले ‘कौकरोच’ ही मारे जाएंगे. सो, ये कौकरेच लोकतंत्र को बीमार होने से बचाने में लगे हैं. Cockroach Controversy

 

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