Water Crisis: मुगलों को गाली देने वाली मोदी और योगी सरकार अगर मुगल काल में दिल्ली और अवध क्षेत्र में जल प्रबंधन का इतिहास पढ़ लेतीं और उस को अमल में ले आतीं तो शायद जनता पानी की किल्लत से न जूझ रही होती. मुगल काल का जल प्रबंधन केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं, बल्कि शासन, समाज और पर्यावरण के बीच संतुलन की एक परिपक्व समझ का परिणाम था.
दिल्ली और उत्तर प्रदेश के अधिकांश शहरों में भूजल के अत्यधिक दोहन से जलस्तर तेजी से नीचे गिर रहा है. दो दशकों पहले तक जिन शहरी इलाकों में पानी की कोई समस्या नहीं थी, घर के नलों में दिनभर पानी आता था, गलीनुक्कड़ पर लगे हैंडपंपों में भी खूब पानी आता था, वहां अब सूखा पड़ा है. जो अफोर्ड कर सकते हैं और जिन्हें कानून का डर नहीं है, उन्होंने अपने घरों में अवैध बोरिंग करवा ली है, जिस के जरिए जमीन का पानी जबरन खींचा जाता है.
ग्रामीण क्षेत्रों में कभी कुएं और हैंडपंप जल के मुख्य स्रोत हुआ करते थे लेकिन अब कुएं लगभग पट गए हैं. नहरें और तालाब होते थे जो अब बचे नहीं हैं. शहरी क्षेत्रों में तो तालाबों की जगह ऊंची इमारतें खड़ी हो चुकी हैं. सरकार 'घरघर नल से जल' पहुंचाने का दावा करती है, नारे देती है, मगर हकीकत यह है कि सरकार की तमाम योजनाएं सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं. शहरी और ग्रामीण दोनों ही जगहों पर पानी की किल्लत बढ़ती जा रही है. नतीजा यह है कि हमारी प्यास अब बाजार के हवाले है.
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