political Analysis: 5 राज्यों के विधानसभाओं के हुए चुनावों में 3 में भाजपा की जीत के पीछे वजह क्या है, यह बताने की जरूरत नहीं है. चिंता की बात यह है कि सब जानते हुए भी देश का एक बड़ा वर्ग, पढ़ालिखा, पैसे वाला, तर्क और तकनीक समझने वाला, देश की दुर्व्यवस्था पर अकसर रोने वाला भी इस वजह को नैतिक और संस्कारी मान रहा है.

भारतीय जनता पार्टी इन राज्यों में शायद बिना ईडी, सीबीआई, चुनाव आयोग, सैंट्रल फोर्सेस, केंद्रीय नौकरशाही और बिना वोट काटे भी जीत जाती. आखिर दशकों से भाजपा विधानसभाओं के चुनाव कांग्रेस के युग में भी जीतती रही है. जिन वोटरों को भाजपा की धार्मिक नीतियां पसंद हैं वे तनमनधन से भाजपा को सहयोग दे कर जिताते रहे हैं.

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को हराना मुश्किल नहीं था क्योंकि वे खुद भी कई दशकों से जमी कैडर बेस्ड पार्टी- मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी- को हरा कर सत्ता में आई थीं. यह बात दूसरी कि जब वे पहली बार वाम दलों को हरा कर सत्ता में आई थीं तो उन्हें उन्होंने ही वोट दिया था जिन्होंने अब भाजपा को दिया है. वे तब भी भाजपा के समर्थक थे लेकिन वोटर तृणमृल कांग्रेस के थे.

भाजपा के पास मंदिर व्यवसाय से जुड़े कर्मठ कार्यकर्ता हैं जो वर्णव्यवस्था में पूरी आस्था रखते हैं, वे बिना चुनाव सूचियों में धांधलियों, चुनाव आयोग के इस्तेमाल, ईडी, सीबीआई के डर के भी जिता देते. वे पहले से भी यही करते रहे हैं, अब भी कर सकते थे.

भाजपा ने नाहक अपने ऊपर धब्बा लगवाया है और यह लोकतंत्र की पीठ में छुरा मारने वाली बात जनता भूलेगी नहीं. जनता अब किसी नए पर्याय का इंतजार करेगी, वह किसी तमिलनाडु वाले चंद्रशेखर जोसेफ विजय या अपनी ही किसी ममता बनर्जी का इंतजार करेगी. चुनाव हो, यह जरूरी नहीं. जनता का गुस्सा या नाराजगी कई तरह से प्रकट हो सकती है. जब जनता नाराज होने लगती है तो उस का परिणाम कांग्रेस जैसा होने लगता है जिसे छोड़छोड़ कर कितनी ही पार्टियां बन गईं.

जो तरीके भाजपा ने पश्चिम बंगाल में अपनाए वे खौफ पैदा करते हैं. खौफ में कोई देश, कोई समाज न उन्नति कर सकता है, न जी सकता है. काफी लोग देश छोड़ जाएंगे तो काफी मात्र कठपुतलियां बन कर रह जाएंगे. दोनों स्थितियां भाजपा की केंद्र व राज्य सरकारों के लिए आफत हैं क्योंकि अब भाजपा के पास सिस्टम की जितनी बुलेट थीं, वे इस्तेमाल हो चुकी हैं. अब वह या तो लोकतंत्र वापस जनता को सौंपे या फिर मृतप्राय जनता पर राज करे. जिन राज्यों में भाजपा का अपना राज है वहां वह कितना भी कुछ कर ले, वोटरों की नाराजगी को रोक न सकेगी.

भाजपा राज में उपमुख्यमंत्री

भारतीय जनता पार्टी को कई राज्यों में सरकारें बनाने के लिए उपमुख्यमंत्री नियुक्त करने पड़ रहे हैं, वहां भी जहां भाजपा का अपना भारी बहुमत है. पश्चिम बंगाल ऐसे ही राज्यों में से एक है. उत्तर प्रदेश में 2 उपमुख्यमंत्री हैं जहां योगी आदित्यनाथ का एकछत्र शासन है. भाजपा के दिखने वाले ये भारीभरकम कवच उस की कमजोरियां ही साबित करते हैं. भाजपा ने अपने फैलने में सही नीति या सही शासन को नहीं, भावनाओं को भुनाया है. हिंदू संस्कारों की भावना की आड़ में जो राजनीति भाजपा ने देश पर थोपी है उस में उस का स्वार्थ और स्वहित ही सर्वोपरि है.

परोपकार या बहुमत के लिए काम करना हमारे संस्कारों में आता ही नहीं है जहां मोटेतौर पर यही कहा जाता है कि हे मूढ़ प्राणी, तू अकेला आया था, अकेला है. अकेला जाएगा, अपने साथ केवल अपने कर्म ले जाएगा जिन के बल पर अगले जन्म में तुझे सही घर में जगह मिलेगी. भाजपा से जुड़ा हर व्यक्ति अपनी ही सोचता है, दूसरों का भला हो जाए, उस से उसे फर्क नहीं पड़ता.

हमारे संस्कार हमें पगपग पर ‘मैं’ सिखाते हैं, ‘हम’ नहीं. प्रवचनों में संस्कार बताए जाते हैं, भजनों में गाए जाते हैं, आरतियों में संस्कारों को जोड़ा गया है. हे प्रभु, मेरा कल्याण कर. मेरे परिवार, मेरे पड़ोसियों, मेरे राज्य, मेरे देश को छोड़ कर मु?ो दे. हर वह व्यक्ति जो भाजपा के लिए काम करता है वह इसी स्व:स्वार्थ के लिए करता है. भाजपा के पास लाखों कर्मठ लोगों का कैडर है लेकिन जान लें कि सब खुद अपने लिए काम कर रहे हैं.

लोकतंत्र की मूल भावना यह है कि समूह की अपनी ताकत होती है. उस से सभी लोगों को ताकत मिलती है, प्राकृतिक अनहोनी से लड़ने की क्षमता बढ़ती है. सभी के उपयोग के लिए पानी, सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों का प्रबंध होता है. यानी, बहुत से ऐसे काम होते हैं जो सब के फायदे के लिए होते हैं. मोहनजोदड़ो या हड़प्पा के खंडहर बताते हैं कि बिना किसी आराध्य की मूर्ति के, उन्होंने विशाल नगर बसाए थे. वैसा संयुक्त प्रयास से ही संभव हुआ था.

आज देश उस पौराणिक संस्कार पर चलने लगा है जिस में ‘मैं’ महत्त्व का है और ‘हम’ को किसी गहरे गड्ढे में दबा दिया गया. पौराणिक कहानियों में किसी राजा ने जनता के सामूहिक सुख के लिए काम किया हो, नजर नहीं आता. किसी ने आम जनता के लिए लड़ाई लड़ी हो, पता नहीं चलता. सभी राजा चक्रवर्ती बनने और ऋषि इंद्र या देवता का स्थान पाने के लिए खुद के सुख की कामना करते नजर आते हैं. जब माहौल कुछ ऐसा ही हो, तो भाजपा के कर्मठ नेता पद की लालसा क्यों न करें.

जो मुख्यमंत्री बनाए जा रहे हैं, जो उपमुख्यमंत्री बनाए जा रहे हैं वे सत्ता में अपने लिए पद, गाड़ी, पैसा चाहते हैं. उन्हें पार्टी की ही चिंता नहीं, देश और समाज की तो छोड़ दें.

संविधान की संवैधानिकता

कांग्रेस पार्टी ने केरल में हुए विधानसभा चुनाव भारी बहुमत से जीतने के साथ तमिलनाडु में चंद्रशेखर जोसेफ विजय की तमिलगा वेत्री कषगम यानी टीवीके को खुला समर्थन दे कर  भारतीय जनता पार्टी की दक्षिण में घुसपैठ फिलहाल इस बार तो रोक ली लेकिन अगली बार यह संभव न होगा.

यह पक्का है कि अब भविष्य में भारतीय जनता पार्टी का कैडर नहीं, बल्कि चुनाव आयोग का कैडर अपने साथ बंदूकधारी पुलिसवालों को ले कर चुनाव लड़ेगा और बीजेपी को वह तोहफे में दक्षिणी राज्य देगा.

दक्षिण भारत के राज्यों के बहुत अधिक कट्टरपंथी राजा ब्रिटिश दौर में अंगरेजों के साथ मिल कर सदियों तक राज करते रहे. पेरियार के नाम से लोकप्रिय इरोड वेंकट रामासामी पेरियार के सक्रिय होने के बाद ही द्रविड़ आंदोलन का जन्म हुआ जिस ने पिछले कई वर्षों तक राज कर रही तब की पुरोहितवादी कांग्रेस को सत्ता से धकेल दिया था.

चुनाव आयोग जब चुनाव प्रचार करे तो जनता सहम जाती है, डर जाती है. चुनाव आयोग के पास वे अपार अधिकार हैं जो मंदिरों से निकले भाजपा कैडर के पास नहीं हैं. चुनाव आयोग का एक अफसर पेन से चार लाइनें लिख कर एक नागरिक से नागरिकता छीन कर उसे लगभग जिंदामृत घोषित कर सकता है. पश्चिम बंगाल का यह उपयोग दक्षिण में किया जाएगा, इस में कोई शक नहीं होना चाहिए.

चुनाव आयोग संविधान की गरिमा को ध्यान में रखते हुए बिना किसी पार्टी का विशेष हित सोचे चुनाव कराए, यह अब भूलीबिसरी बात हो गई है. मौजूदा भारत सरकार ने संविधान को बाइबिल, वेद, कुरान, ग्रंथसाहिब की तरह पूजनीय बना दिया, उस को युद्धों का एक हथियार बना दिया है. सुप्रीम कोर्ट की मिलीभगत से चुनाव आयोग अब संविधान से उसी तरह किसी को मार सकता है, जेल में बंद कर सकता है, चुनाव जिता सकता है जैसे बाइबिल, कुरान ले कर हमलावर सदियों से एकदूसरे से और परायों से लड़ते रहे हैं.

हर कोई इन तथाकथित ईश्वरीय ग्रंथों को अपनेअपने ग्रंथों का हवाला देते हुए जनता को बहकाता रहा और दूसरों को उकसाता रहा. भगवा सरकार ने ऐसी हालत उत्पन्न कर दी है कि आज संविधान की शपथ ले कर चुनाव आयोग संविधान की आत्मा की ही नहीं, उस के शब्दों की भी हत्या कर रहा है.

मत देने का हक बाकी दूसरे हकों से ऊपर है, यह बात आज हर नागरिक जानता है. इसीलिए पश्चिम बंगाल में 93 फीसदी मतदान हुआ क्योंकि जिस का नाम मतदाता सूची में बचा था, उस ने ईवीएम मशीन पर भरोसा न होते हुए भी बटन दबाया.

देश की मौजूदा सरकार द्वारा चुनाव आयोग का निजी प्रयोग कर संविधान और कानून का गला घोंटा गया है. सुप्रीम कोर्ट टुकुरटुकुर देखती रही. अब जो भी संवैधानिक अधिकार संविधान में लिखे हैं, निरर्थक हो गए हैं. चुनाव आम देशवासियों के लिए एक उम्मीद होते थे कि शासक ने सही तरह से शासन नहीं किया तो उसे सबक सिखाया जा सकता है. देशवासियों की उस उम्मीद को सत्ताधारी भाजपा ने चुनाव आयोग को अपने कैडर में शामिल कर तोड़ दिया है.

गोरों की मजबूरी

पश्चिमी देशों में गोरे उग्रवादी कट्टरपंथी चर्च जाने वाले एशियाई लोगों की बढ़ती भीड़ को देख कर परेशान हो गए हैं. वे यह मांग करने लगे हैं कि इन्हें जल्दी भगाया जाए और पश्चिम को गोरों का देश ही रहने दिया जाए. यह ठीक है कि पश्चिम के बहुत से शहर भारत, पाकिस्तान, चीन, दक्षिण अमेरिकी या अफ्रीकी लगने लगे हैं पर यह न भूलें कि ये लोग, गोरों के अमीर देशों में अमीरों की कृपा पर नहीं जी रहे, मेहनत से कमा कर खा रहे हैं.

अमीर देशों ने हमेशा अपनी ताकत का इस्तेमाल सस्ते मजदूर पाने के लिए किया है. पहले दूसरे देशों पर आक्रमण कर के कैदियों को गुलाम बनाया जाता था. गोरों की शुद्धि की आर्यन परिभाषा गढ़ने वाले एडौल्फ हिटलर को भी पूर्वी यूरोप से लाखों लोगों को छोटे कामों के लिए बुलाना पड़ा था. उन्होंने यहूहियों को मारा भी था पर मारने से पहले उन से जबरदस्त काम कराया था, बहुत कम मजदूरी में.

यूरोप, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया में जो भी भारतीय, पश्चिम एशियाई, फिलिस्तीनी, इंडोनेशियाई आ कर बसे हैं, गोरों की सेवा कर रहे हैं. वे खेतों में काम कर रहे हैं. फैक्ट्रियों में हैं, ट्रांसपोर्टेशन में हैं, टैक्सी ड्राइवर हैं, सफाई करते हैं. कुछ जरूर सफल डाक्टर, वकील, टीचर, कंप्यूटर एक्सपर्ट हैं पर ज्यादातर, जो गोरों को चुभते हैं, कम पैसे में काम करने वाले मजदूर ही हैं.

कट्टरपंथी गोरों को पता नहीं चलता कि वे कहां काम कर रहे हैं, कितने में काम कर रहे हैं पर बाजारों में, मैट्रो में, कुछ खास इलाकों में दिख जाते हैं, इसी से उबल कर वे हल्ला मचा रहे हैं. ऐसा हल्ला भारत में भी मच रहा है, शिवसेना ने एक जमाने में तमिलों और गुजरातियों के खिलाफ मोरचा खोला था और अब वे बिहारियों को भगाने की जुगत में हैं. अमित शाह और नरेंद्र मोदी बंगलादेशियों को भगाने के सैंटीमैंट्स को वोटों के लिए भुनाने की पूरी कोशिश में लगे हैं.

अमेरिकी मागा और पश्चिमी यूरोप के चर्चों से जुड़े भक्त गैरगोरों के पीछे पड़े हैं. वे नहीं जानते कि उन के जाते ही उन के व्यापार व उद्योग ठप हो जाएंगे. गोरे अब कई पीढि़यों से पूरी तरह निकम्मे हो गए हैं. वे एशियाइयों से ज्यादा धर्मभीरु और पूजापाठी होने लगे हैं. उन का नया धर्म मोबाइल गेमिंग या मोबाइल चैटिंग है. वे न पढ़लिख रहे हैं, न काम कर रहे हैं.

वैसे भी, गोरों में जन्मदर घट रही है और आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस आने से मिडिल लैवल की जौब्स कम होने लगी हैं. अगर सामान महंगा होने लगा क्योंकि गोरे मजदूर महंगे ही होंगे, तो परिवारों की सुखसुविधाएं हवा हो जाएंगी. सदियों से यूरोप और अमेरिका केवल गुलामों के बलबूते फलेफूले हैं. उन्हें निकाल कर वे नष्ट हो सकते हैं. political Analysis

 

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