Lawrence Bishnoi: सिनेमा केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि संवाद का सशक्त माध्यम भी है. इसी परिभाषा का बेहतरीन उपयोग करते हुए बौलीवुड लगातार कुछ ऐसी फिल्में बनाता जा रहा है जिन के माध्यम से वह कुछ लोगों की इमेज को सुधारने का काम करते हुए उन्हें विलेन से हीरो बनाता रहा है. जब किसी बड़ी हस्ती की धूमिल छवि विवादों, अदालती मामलों या बदनामी के घेरे में आती है तो सिल्वर स्क्रीन/फिल्में उन के पक्ष को रखने व जनता की सहानुभूति बटोरने का सब से सशक्त माध्यम भी बन जाती हैं.

मोहम्मद अजहरुद्दीन और फिल्म ‘अजहर’

वर्ष 2016 में निर्देशक टोनी डिसूजा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘अजहर’ रिलीज हुई थी. यह फिल्म भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कैप्टन मोहम्मद अजहरुद्दीन पर बनाई गई थी और मोहम्मद अजहरुद्दीन का किरदार इमरान हाशमी ने निभाया था. क्रिकेट के भगवान माने जाने वाले अजहर जब मैच फिक्ंिसग के आरोपों में फंसे तो उन का कैरियर तबाह हो गया लेकिन इस फिल्म के बाद उन की छवि सुधर गई और वे एक बार फिर हीरो बन गए. फिल्म ‘अजहर’ ने मोहम्मद अजहरुद्दीन को पाकसाफ दिखाने की कोशिश करते हुए दिखाया कि उन्होंने जो कुछ भी किया वह अपने साथियों को बचाने या मजबूरी में किया. अंत में उन्हें एक क्लीन चिट वाला हीरो बना कर दिखाया गया.

संजय दत्त और फिल्म ‘संजू’

वर्ष 2018 में राज कुमार हिरानी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘संजू’ रिलीज हुई थी. यह कहानी अभिनेता संजय दत्त के जीवन पर आधारित थी. इस में संजय दत्त का किरदार रणबीर कपूर ने निभाया है. सभी को पता है कि संजय दत्त की छवि एक बिगड़े हुए इंसान की रही है. वे कई वर्षों तक जेल की सजा भी काट चुके हैं लेकिन फिल्म ‘संजू’ ने उन की छवि को सुधारने का काम किया था.

फिल्मकार राजकुमार हिरानी का मकसद संजय दत्त पर लगे आतंकवादी के टैग को धो कर उन्हें केवल एक नासम?ा और हालात का शिकार इंसान दिखाना रहा. फिल्म ‘संजू’ में सारा दोष मीडिया की सनसनीखेज रिपोर्टिंग और संजय दत्त की ड्रग्स की लत पर डाल दिया गया. एके-56 रखने के गंभीर अपराध को एक पितापुत्र के भावनात्मक रिश्ते की आड़ में दबा दिया गया.

दाउद की बहन और फिल्म हसीना पारकर

अंडरवर्ल्ड सरगना दाउद की बहन हसीना पारकर की छवि को सुधारने के लिए फिल्मकार अपूर्व लाखिया 2017 में फिल्म ‘हसीना पारकर’ लाए थे, जिस में हसीना पारकर का किरदार श्रद्धा कपूर ने निभाया. यों तो अंडरवर्ल्ड डौन की बहन की छवि को सुधारना एक मुश्किल काम था लेकिन फिल्म ने इस की कोशिश की. हसीना पारकर को एक अपराधी के बजाय ऐसी महिला के रूप में दिखाया जो अपनों को खोने के बाद मजबूरी में अपराध की दुनिया में आती है.

इन सभी फिल्मों पर यदि गंभीरता या यों कहें कि बहुत बारीकी से गौर किया जाए तो इन फिल्मों में सफेद ?ाठ का सहारा ले कर नायक की गलतियों को छोटा कर और उन की मजबूरियों को बड़ा कर पेश किया गया है. हकीकत तो यह है कि बौलीवुड अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि परसैप्शन मैनेजमैंट की बड़ी मशीन बन चुका है.

गैंगस्टर लौरेंस बिश्नोई और डौक्युमैंट्री

फिल्मकार राघव दार की डौक्युमैंट्री फिल्म ‘लौरेंस औफ पंजाब’ भी इसी कड़ी का हिस्सा है, जहां फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्मकार गैंगस्टर को खोजी पत्रकारिता के नाम पर पेश कर रहा है. यह डौक्युमैंट्री 27 अप्रैल से ओटीटी प्लेटफौर्म ‘जी 5’ पर स्ट्रीम होनी थी लेकिन 19 अप्रैल को जैसे ही ‘जी 5’ ने इस का ट्रेलर बाजार में जारी किया, वैसे ही विवाद शुरू हुआ. मगर ‘जी 5’ ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का ऐलान किया.

जी हां, जब से राघव दार निर्देशित डौक्युमैंट्री फिल्म ‘लौरेंस औफ पंजाब’ का ट्रेलर ओटीटी प्लेटफौर्म ‘जी 5’ की तरफ से रिलीज किया गया है, तब से इस के खिलाफ माहौल गरमा गया है. लोग सवाल उठा रहे हैं कि पंजाब की धरती वीरों की है या गैंगस्टरों की? मशहूर पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला के मर्डर केस में मुख्य आरोपी और जेल में बंद गैंगस्टर लौरेंस बिश्नोई पर आधारित इस डौक्युमैंट्री को ले कर पंजाब में गुस्सा चरम पर है.

यह डौक्युमैंट्री लौरेंस बिश्नोई के छात्र राजनीति से ले कर जुर्म की दुनिया का सब से बड़ा नाम बनने तक के सफर को दिखाती है. इस में दिखाया गया है कि कैसे पंजाब के एक अमीर परिवार का लड़का अपराध के दलदल में धंसता चला गया लेकिन विवाद इस की कहानी से ज्यादा इस के ग्लोरिफिकेशन यानी अपराधी को बड़ा दिखाने के तरीके को ले कर है.

सिद्धू मूसेवाला के पिता बलकौर सिंह ने जताया कड़ा एतराज

इस विवाद की आग में आहूति डालने का काम सब से पहले सिद्धू मूसेवाला के पिता बलकौर सिंह ने यह कह कर किया कि, ‘मेरा बेटा चला गया, अब उस के हत्यारों को सैलिब्रिटी बनाया जा रहा है.’ बलकौर सिंह ने सरकार और ओटीटी प्लेटफौर्म पर सवाल उठाए कि आखिर एक गैंगस्टर के जीवन को इतना ग्लैमराइज क्यों किया जा रहा है? उन का दर्द जायज है, क्योंकि इंसाफ की लड़ाई अभी भी कोर्ट में जारी है. उस के बाद सिद्धू मूसेवाला के फैंस भी सक्रिय हो गए और सोशल मीडिया पर इस फिल्म के खिलाफ आग उगली जाने लगी.

सिद्धू मूसेवाला के फैंस का भी मानना है कि यह डौक्युमैंट्री लौरेंस बिश्नोई के प्रति लोगों की सहानुभूति बटोरने के मकसद से बनाई गई है जोकि पूरी तरह से न्याय प्रणाली और पीडि़त परिवार के लिए अपमानजनक है. वहीं, पंजाब कांग्रेस के साथ ही पंजाब पुलिस भी इस डौक्युमैंट्री को बैन करने की मांग करने लगी. पंजाब सरकार और पुलिस लंबे समय से युवाओं को हथियारों और अपराध की चमकधमक से दूर रखने की कोशिश कर रही है. आलोचकों का तर्क है कि जब बड़े ओटीटी प्लेटफौर्म्स किसी गैंगस्टर के जीवन को ग्लैमराइज कर दिखाते हैं तो इस से युवा प्रभावित होते हैं.

पंजाब पुलिस का कड़ा रुख

पंजाब सरकार और पुलिस ने इस डौक्युमैंट्री को ले कर बेहद सख्त रुख अपनाया है. पंजाब के पुलिस महानिदेशक गौरव यादव ने स्पष्ट किया है कि किसी भी सामग्री को राज्य की शांति भंग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. पंजाब पुलिस का मानना है कि फिल्म में दिखाए गए नाटकीय चित्रण और वास्तविक फुटेज का मिश्रण संगठित अपराध को सही ठहराने जैसा है. इस से सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड जैसे संवेदनशील मामलों की जांच और गवाहों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है.

निर्देशक राघव दार की सफाई

डौक्युमैंट्री फिल्म ‘लौरेंस औफ पंजाब’ के निर्देशक राघव दार की यह कोई पहली फिल्म नहीं है. राघव दार ने अपने कैरियर की शुरुआत मणिरत्नम के साथ बतौर सहायक निर्देशक फिल्म ‘गुरु’ से की थी. उस के बाद राघव दार ने लंबे समय तक संजय लीला भंसाली के साथ काम किया. राघव दार ने संजय लीला भंसाली निर्मित फिल्म ‘माई फ्रैंड पिंटो’ का निर्देशन किया था, जोकि 2011 में रिलीज हुई थी. राघव दार लिखित व निर्देशित डौक्युमैंट्री ‘मुंबई माफिया: पुलिस बनाम अंडरवर्ल्ड’ नैटफ्लिक्स पर 2023 मे स्ट्रीम हुई थी और कई पुरस्कार भी जीते थे.

विवाद बढ़ने के बाद इस डौक्युमैंट्री के निर्देशक राघव दार ने सफाई देते हुए कहा, ‘‘हमारा मकसद किसी को हीरो बनाना नहीं, बल्कि अपराध की जड़ को सम?ाना है.‘लौरेंस औफ पंजाब’ को हम ने सिर्फ एक क्राइम स्टोरी की तरह नहीं देखा. हमारा इरादा उन कारणों को समझना था कि ऐसे अपराधी बनते कैसे हैं. कैसा माहौल और कैसे सिस्टम उन्हें आकार देते हैं. यह डौक्युमैंट्री इन्फौर्मेटिव है और मानवीय पहलुओं को भी दिखाती है, ताकि लोग इस के खतरनाक नतीजों को समझ सकें. यह कोई बायोपिक या महिमामंडन नहीं है, बल्कि एक गहन खोजी डौक्युमैंट्री है. इस में दिखाया गया है कि कैसे एक सामान्य छात्र नेता अपराध की दुनिया का इतना बड़ा नाम बन गया.’’

अपराध का उदारीकरण

आखिरकार, ‘लौरेंस औफ पंजाब’ जैसी डौक्युमैंट्री हो या ‘संजू’ और ‘अजहर’ जैसी बायोपिक्स ही क्यों न हों, ये सभी एक बड़े सवाल के घेरे में हैं. अहम सवाल तो यही है कि क्या मनोरंजन के नाम पर समाज के नैतिक मूल्यों से सम?ाता किया जा सकता है? जब सिनेमा किसी अपराधी के अतीत को भावुक संगीत और मजबूरी की चादर में लपेट कर पेश करता है तो वह अनजाने में ही सही, अपराध के प्रति समाज की नफरत को कम कर देता है.

यदि फिल्में इसी तरह छवि सुधारने का औजार बन जाएंगी तो आने वाली पीढि़यां न्याय और अन्याय के बीच का फर्क भूल जाएंगी. आज जरूरत इस बात की है कि फिल्मकार अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझें और ओटीटी प्लेटफौर्म्स ज्यादा से जयादा दर्शक बटोरने की दौड़ में गन कल्चर को ग्लैमरस बनाना बंद करें. फिलहाल पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस डौक्युमैंट्री को रिलीज करने की अनुमति दे दी है लेकिन सख्त शर्तें जोड़ी गई हैं. जी 5 के निर्माताओं को टाइटल से ‘लौरेंस’ और ‘पंजाब’ शब्दों को हटाने का निर्देश दिया है. Lawrence Bishnoi

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