Social Issues: यह ठीक है कि दहेज का चलन कानून के जरिए बंद नहीं किया जा सकता ठीक वैसे ही जैसा छुआछूत और जातिगत भेदभाव का नहीं किया जा सकता. ये और ऐसे कई सामाजिक रोग दरअसल में धर्म की देन है जिन्हें सामाजिक बुराई करार देते दक्षिणपंथी इन की वकालात ही करते नजर आते हैं. दहेज के बिना शादियां अगर होने लगीं तो पंडों को इस के जरिए मिलने वाला दान भी बंद हो जाएगा.
31 वर्षीय ट्विशा शर्मा के साथ जो हुआ वह सभ्य समाज के उसूलों से मेल खाता हुआ नहीं है ट्विशा के साथ जो अब उस की मौत के बाद हो रहा है उसे भी सभ्य समाज के उसूलों से मेल खाता नहीं कहा जा सकता. क्योंकि मामला कथित तौर पर दहेज हत्या का है. बाग मुगलिया एक्सटेंशन भोपाल का पौश इलाका है जिस में सभ्य शिक्षित और मुख्यधारा वाले आधुनिक लोग रहते हैं. ऐसा ही एक परिवार रिटायर्ड जज गिरीबाला सिंह का है जिस में उन के साथ बेटा समर्थ सिंह और बहू ट्विशा रहते हैं.
ट्विशा अब रहती थी हो गई है क्योंकि बीती 12 मई को उस ने ससुराल में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. समर्थ से उस की शादी अब से कोई 6 महीने पहले हुई थी. शादी के बाद ट्विशा नोएडा का अपना जौब छोड़ कर भोपाल आ गई थी जहां समर्थ वकालत करते हैं शादी के पहले वह साउथ की एकाध दो फिल्मों में छोटेमोटे रोल भी कर चुकी थी. शुरूआती दिन ठीकठाक कटे लेकिन घर के अंदर के हालात कतई अच्छे नहीं थे. वक्त गुजरते पतिपत्नी में खटपट आम हो चली थी लेकिन उस का अंजाम ट्विशा की मौत की शक्ल में होगा यह अंदाजा किसी को नहीं था.
ट्विशा की आत्महत्या की खबर सुन कर मायके वाले भागेभागे भोपाल आए तो यह जान कर हैरान रह गए कि अभी तक पुलिस ने दहेज हत्या का मामला दर्ज नहीं किया है. सो उन्होंने पहले थाने में हल्ला मचाया फिर एसपी से मिल कर गुहार लगाई . 17 मई को मुख्यमंत्री निवास के सामने भी उन्होंने प्रदर्शन किया लेकिन मुख्यमंत्री मोहन यादव उन से नहीं मिले. इस दिन तक ट्विशा की लाश मरचुरी में पड़ी रही क्योंकि न्याय न मिलने तक मायके वालों ने लाश लेने से इंकार कर दिया था. ट्विशा के घर वाले इस मांग पर अड़े थे कि लाश का दोबारा पोस्टमार्टम एम्स दिल्ली में कराया जाए और मामले की जांच किसी और एजेंसी से कराइ जाए.
भारतीय सेना में मेजर ट्विशा के भाई हर्षित शर्मा ने आरोप लगाया कि मौत के पहले ट्विशा ने उन्हें फोन पर बताया था कि उस का पति पिछले 8 दिनों से उसे प्रताड़ित कर रहा है . ससुराल में बातबात पर उस की बेइज्जती की जाती है और मानसिक उत्पीड़न किया जाता है.
उस ने भाई को यह भी बताया था कि वह नोएडा आना चाहती है और इस बाबत उस ने रिजेर्वेशन भी करा लिया है. लेकिन नोएडा आ पाती इस से पहले ही उस ने फांसी लगा कर जान दे दी. ट्विशा की मौत की खबर उस की सास गिरीबाला सिंह ने फोन पर उस के मायके वालों को दी थी. इस से पहले वे पुलिस को भी अपने घर में हुए इस हादसे की खबर दे चुकी थीं. इस से भी पहले वह और समर्थ ट्विशा की लाश फंदे से उतार कर अस्पताल ले गए थे. जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था.
फिर वही हुआ जो आमतौर पर ऐसे मामलों में होता है. मायके वालों ने बारबार पुलिस और मीडिया के सामने दोहराया कि यह दहेज हत्या है . चूंकि ट्विशा ने नोएडा की नौकरी छोड़ दी थी और भोपाल में वह कोई जौब नहीं करना चाहती थी इसलिए ससुराल वाले उसे नाकारा कहते ताने मारने लगे थे. ट्विशा 5 महीने की प्रैगनेंसी लिए थे इस पर भी विवाद होते रहते थे. बकौल हर्षित शर्मा यह अनप्लान्ड प्रैगनेंसी थी और समर्थ अकसर ट्विशा को बच्चा किसी और के होने का ताना मारा करता था. वह नशेड़ी है और ट्विशा को भी ड्रग्स की लत लगाना चाहता था जिस का वह विरोध करती थी.
हल्ला बढ़ने पर सास और पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई. लेकिन इस के पहले ही गिरिबाला जिला अदालत से अग्रिम जमानत करा लाई. इस बाबत उन्होंने जो सबूत कोर्ट में पेश किए थे उन में प्रमुख यह था कि ट्विशा को खर्चे के लिए औनलाइन पैसे दिए जाते थे. उन्होंने पूरे ट्रांजैक्शन डिटेल कोर्ट में पेश किए जिन की बिना पर उन्हें अग्रिम जमानत मिल गई. लेकिन समर्थ फरार हो गया. उस की अग्रिम जमानत की अर्जी भी अदालत ने खारिज कर दी.
गिरिबाला के मुताबिक ट्विशा मानसिक रोगी थी और उस का इलाज मनोचिकित्सक के यहां चल रहा था. इसके लिए उन्होंने मनोचिकित्सक डाक्टर सूर्यकांत त्रिवेदी का प्रिस्क्रिब्शन भी कोर्ट में पेश किया. अब सच क्या और झूठ क्या यह जब मुकदमे का फैसला आएगा तब पता चलेगा. लेकिन यह अभी से पता चल चुका है कि हम सभ्य होने और सभ्य समाज में रहने का पाखंड भर करते हैं जिस में दहेज जैसा रिवाज कायम है और बेटी के ससुराल में आत्महत्या कर लेने पर उसे दहेज हत्या ही करार देने पर मायकेवाले आसमान सर पर उठा लेते हैं. लेकिन उस की लाश उठा कर अंतिम संस्कार कर देना उन्हें मंजूर नहीं होता.
हत्या अगर दहेज के लिए की गई तो यह भी जिल्लत वाला काम है और अगर आरोप दहेज हत्या का लगाया गया तो यह भी किसी जलालत से कम नहीं. तसवीर के ये दोनों पहलू साबित करते हैं कि हम दिखने दिखाने के ही सभ्य हैं वर्ना तो हमारे अंदर का जानवर और जंगलीपना साफसुथरे चमकते चेहरों और कपड़ों की खोल के भीतर ही रहता है.
संसद में बना था कानून
दहेज से जुड़ी मौत का यह कोई पहला या आखिरी मामला नहीं है जिस पर हल्ला मचा. ऐसे मामलों पर अकसर ससुराल वाले कहते हैं कि बहू ने व्यक्तिकगत या दीगर वजहों जिन में कलह प्रमुख है के चलते आत्महत्या की है तो उस के मायके वाले कहते नजर आते हैं कि उन की बेटी को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था इसलिए उस की हत्या की गई है जिसे शक्ल आत्महत्या की देने की जा रही है.
ऐसे मामलों में न्याय के लिए साल 1961 में एक अधिनियम संसद ने पारित किया था जिस का नाम था दहेज निषेध अधिनियम 1961 जो जुलाई 1961 में लागू हुआ था. तब केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार थी और प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु थे. इस के पहले यह सरकार हिंदू कोड बिल के 4 टुकड़े कर 4 अहम कानून बना चुकी थी जो महिलाओं के हित के थे. दरअसल में ये कानून न केवल महिलाओं बल्कि पूरे हिंदू समाज के हित के थे आज की महिलाओं में जो आत्मविश्वास दिखता है वह इन्हीं कानूनों की वजह से है इन अधिनियमों से समाज से दकियानूसी महिलाओं का शोषण और रूढ़ियां कम हुईं और स्वस्थ माहौल बनने की शुरुआत हुई.
ये कानून थे- हिंदू विवाह अधिनियम 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिंदू अल्पसंख्यकता अधिनियम 1956 और हिंदू दत्तक ग्रहण और भरणपोषण अधिनियम 1956. दहेज निषेध अधिनियम इन्हीं समाजसुधार कानूनों की एक कड़ी था जिस का हिंदू कोड बिल जितना विरोध तो हिंदूवादी नेता और पार्टियां नहीं कर पाए थे, लेकिन इतना सवाल और दलीलें उन्होंने संसद में पेश की थीं कि लोकसभा और राज्यसभा की जौइंट मीटिंग बुलाना पड़ी थी जो 6 से ले कर 9 मई 1961 तक चली थी इस के बाद यह एक्ट सहमति से पारित हो गया था.
तब जनसंघ के युवा सांसद अटल बिहारी वाजपेयी तेजतर्रार वक्ता के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे. उन्होंने सीधे तो दहेज एक्ट का विरोध नहीं किया पर उस के लागू होने पर सवाल उठाए थे. लेकिन आखिरकार वे सरकार से सहमत हो गए थे. सरकार क्या समाज से सहमत हो गए थे क्योंकि देश भर से इस अधिनियम को समर्थन मिल रहा था. हर कोई चाहता था कि दहेज का लेनदेन खत्म हो जिस की वजह से हजारों महिलाएं मारी जाती हैं और लाखों घुटन भरी जिंदगी जीने मजबूर होती हैं. क्योंकि उन के पेरैंट्स मांग के मुताबिक दहेज नहीं दे पाते.
दक्षिणपंथी जौइंट मीटिंग में कमजोर पड़ने लगे तो उन्होंने नेहरु के सामने घुटने टेक दिए जबकि हिंदू कोड बिल की ड्राफ्टिंग के दौरान उन्होंने सड़क से ले कर संसद तक उत्पात मचाया था. क्योंकि यह न केवल ब्राह्मणवादी और पौराणिक व्यवस्था पर प्रहार था बल्कि इस से पितृसत्तात्मक व्यवस्था को भी चुनौती मिल रही थी. सरकार को दहेज एक्ट पर भी सख्त होते देख अटलबिहारी ने यह मशवरा दिया था कि वधु को दिए जाने वाले उपहारों यानी दहेज का मूल्य दो हजार रु निर्धारित कर दिया जाए.
यह सुझाव दरअसल में दहेज को न्यूनतम तौर पर कानूनी घोषित करवाने की मंशा लिए हुए था जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. जबकि नेहरु सांप को मार देने पर आमादा थे अगर वाजपयी का यह प्रस्ताव खारिज न होता तो आज लाखों का दहेज कानूनन मान्य और वैधानिक होता. इसे सोने के भाव से देखें तो तब 10 ग्राम सोने की कीमत 119 रु थी यानी वर पक्ष 168 ग्राम सोना बतौर दहेज सीना तान कर ले सकता था जिस की कीमत आज 27 लाख रु होती है.
बहस के अंत में दक्षिणपंथियों की ये दलीलें खुद ब खुद खारिज हो गईं थी कि इस तरह के कानून सामाजिक रीतिरिवाजों और धार्मिक मान्यताओं में जरूरत से ज्यादा दखल देते हैं. इन की हिम्मत इसलिए भी टूटी थी कि समाज ने खुले दिल से हिंदू कोड बिल के चारों अधिनियमों का स्वागत किया था. माहौल अपने हक में न देख अटल बिहारी ने एक सटीक बात यह कही थी कि जरूरत इस बात की है कि देश की आर्थिक प्रगति की जाए जातपात के बंधन तोड़े जाएं और लड़केलड़कियां उन्मुक्त भाव से विवाह करें. शादियां परमात्मा के यहां से नहीं बल्कि आपस में तय हो तभी दहेज खत्म होगा.
ये सुझाव या विचार रत्ती भर भी मौलिक नहीं थे बल्कि डाक्टर भीमराव आंबेडकर की फिलासफी और आइडियोलाजी की कापी थे. जिन का विस्तार से उल्लेख उन्होंने अपनी किताब जाति का उन्मूलन में किया है. हालांकि अटल बिहारी इस सच को हजम कर गए थे कि आंबेडकर जाति व्यवस्था की जड़ धर्म को ठहराते थे .पर यह हर्ज की बात इस लिहाज से नहीं थी कि अच्छे विचारों की नकल भी उन का प्रचार ही करती है जिस से लोगों को प्रोत्साहन मिलता है. मौजूदा भगवा गैंग अफसोस की बात है कि इन बातों से कोई वास्ता नहीं रखती है कि युवा अपनी मर्जी से शादी यानी लव मैरिज करें और जातपात के बंधन तोड़े जाएं.
इस दौर के दक्षिणपंथियों की तो कोशिश और एजेंडा यही है कि जातपात बनी रहे और शादियां धार्मिक रीतिरिवाजों और परंपरागत तरीके से हों ताकि पंडेपुजारियों को दानदक्षिणा मिलती रहे. ऐसा इफरात से हो भी हो रहा है लेकिन उस से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि दहेज एक्ट में क्या प्रावधान रखे गए थे और कैसे धर्म और पंडेपुजारियों के राज और दबदबे के चलते दहेज दिनोदिन फलफूल रहा है.
यह था दहेज एक्ट में
दहेज निषेध अधिनियम 1961 में दहेज की परिभाषा को तफसील से बताया गया था मसलन इस एक्ट की धारा 2 में दहेज को स्पष्ट करते हुए कहा गया था कि शादी के वक्त पहले या बाद में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तौर पर दी गई कोई भी संपत्ति या आइटम दहेज कहलाएगा जो गैरजमानती अपराध होगा. धारा 3 के मुताबिक दहेज देने लेने या इस में मदद करने पर कम से कम 5 साल की सजा और 15000 रु तक का जुर्माना लगाया जाएगा. धारा 4 में दहेज की मांग करने पर 2 साल तक की सजा का प्रावधान किया गया था.
अधिनियम की धारा 6 के तहत अगर दहेज लिया भी जाए तो वह स्त्री की संपत्ति यानी स्त्री धन होगा. जिसे 3 महीने के अंदर वधु या उस के वारिसों को सौंपना पड़ेगा वारिसों का फैसला हिंदू उत्तराधिकार अधिनयम के मुताबिक होगा जिस में पहला यानी क्लास वन वारिस उस का पति ही होता है उस के बाद संतानों का नंबर आता है और फिर मांबाप का. लेकिन मौत अगर शादी के 7 साल के अंदर हुई हो और संदिग्ध हो तो धारा 6 ( 3 ) के मुताबिक स्त्री धन पर पहला हक संतानों का और फिर मांबाप का हक बनता है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनयम 1956 की धारा 25 में साफसाफ लिखा भी है कि कातिल वारिस नहीं हो सकता.
इस एक्ट के पहले दहेज से ताल्लुक रखते मामले आईपीसी की धारा 498 ( ए ) और धारा 304 ( बी ) के तहत निबटाये जाते थे. 498 ( ए ) बेहद प्रचिलित धारा है जिसके मुताबिक पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा किसी भी तरह की क्रूरता खासतौर से दहेज के लिए गैर जमानती अपराध है जिस में 3 साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है. अब कानूनों के नामों के बदलाव में यह धारा भारतीय न्याय संहिता यानी बीएनएस की धारा 85 हो गई है .
धारा 304 ( बी ) भी घर घर जानी पहचानी जाती है जिसके तहत अगर किसी महिला की शादी के 7 साल के अंदर संदिग्ध मौत होती है और मौत से पहले दहेज प्रताड़ना साबित हो जाए तो दोषियों को 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा होगी . अब यह बीएनएस की धारा 80 हो गई है .
दहेज एक्ट में जो बदलाव वक्त वक्त पर किए गए उन में प्रमुख 1984 का है जिस में दहेज मांगने वालों की परिभाषा और स्पष्ट की गई व पुलिस के अधिकार भी बढ़ा दिए गए. इस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी. इस के बाद राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल ( 1986 ) में कानून को और कड़ा किया व आईपीसी की धारा 304 ( बी ) जोड़ी. 1984 के बदलाव का विरोध भी भाजपा सांसदों ने किया था जिन में विजयाराजे सिंधिया प्रमुख थीं उन्होंने भी अटल बिहारी की तरह यह कहा था कि दहेज के पीछे सामाजिक परम्पराएं और दिखावा जिम्मेदार है.
इन कानूनों को ट्विशा की मौत के मद्देनजर देखें तो उस के मायके वालों ने दहेज मांगने का आरोप भी लगाया है. निश्चित रूप से उस की मौत संदिध है लेकिन अदालत में कौन क्या और कितना साबित कर पाता है यह फैसले के बाद पता चलेगा.
आंकड़ों की हकीकत
दहेज हत्या से जुड़े मामलों में आमतौर पर मौत की वजह हत्या होना साबित नहीं हो पाती है राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के साल 2022 के आंकड़ों के मुताबिक दोष सिद्धि यानी अपराध के साबित होने की दर महज 15 फीसदी के लगभग ही थी. देश भर की अदालतों में पिछले 3 साल से बड़ेबड़े इवेंट हो रहे हैं. नीचे से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक के जस्टिस साहबान बड़ीबड़ी बातें करते नजर आते हैं लेकिन इन वक्तव्यों और भाषणों से अदालतों में पसरी लालफीता शाही और भ्रष्टाचार की समस्या हल होती नजर नहीं आ रही.
मिसाल दहेज मौतों की ही लें तो देश भर की अदालतों में साल 2022 के आखिर तक कुल लंबित मामलों की तादाद 60577 थी इन में से भी 54416 मामले पहले से घिसटते चले आ रहे हैं साल 2023 में दहेज मौतों के लंबित मामलों की तादाद 83327 हो गई थी जिन में से 69434 मामले पिछले सालों से चले आ रहे थे . इस साल दहेज मौतों की कुल तादाद 6156 थी लेकिन एनसीआरबी ने आंकड़ों में दहेज प्रताड़ना के भी आंकड़े नामालूम वजहों के चलते जोड़ दिए थे. यानी दहेज मौतों के लम्बित मामलों की संख्या नहीं बताई थी. यह जरूर उसने बताया थी कि देश में दहेज के चलते लगभग 17 से 20 मौतें रोज होती हैं.
दहेज से हुई मौतों के मामले आमतौर पर 5 से 7 साल तक अदालतों में चलते हैं. क्यों इतने लंबे चलते हैं इस का दो टूक जवाब तो दो टूक बातें करने वाले जस्टिसों को ही देना चाहिए कि क्यों न्याय में इतनी देरी होती है.
धर्म है वजह
दहेज मूलतय अरबी और फारसी का शब्द है लेकिन दूसरे नामों में यह त्रेतायुग से चलन में है ये शब्द स्त्रीधन और वर दक्षिणा हैं. एक तीसरे नाम यौतुक का उल्लेख धर्म ग्रंथों में मिलता है जिस का मतलब शादी के मौके पर वधु को दिए जाने वाले सामान यथा कपड़े, नगदी, तोहफे और गहनों से है. मनुस्मृति, नारद स्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति में यौतुक शब्द का जिक्र है. संस्कृत के एक परंपरागत श्लोक में कहा गया है-
यौतुक हि विवाहेषु कन्याये प्रदीयते
अर्थात –
विवाह में कन्या को जो दिया जाए वह यौतुक कहलाता है
वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक शब्द बदलते रहे लेकिन दहेज कायम रहा जिसका दोष दक्षिणपंथी कभी मुगलों या अंग्रेजों पर नहीं थोप पाए और इसकी जरूरत भी उन्हें महसूस नहीं हुई. क्योंकि यह वह चाहते ही नहीं थे कि दहेज कभी खत्म हो इसलिए वे इसे किसी न किसी तरह प्रोत्साहित ही करते रहे . राम सीता के विवाह में जनक ने भर भर कर दहेज दिया था पांडवों और द्रौपदी की शादी में भी दहेज का उल्लेख मिलता है उत्तरा और अभिमन्यु की शादी में विराट ने खासा दहेज दिया था .इन दोनों युगों में तो सोना, चांदी, रत्न, आभूषण. घोड़े, हाथी और गायों के साथ साथ दासदासियां यानी गुलाम तक दहेज में दिए जाते थे.
पंडे पुजारियों की इसमें दिलचस्पी बेवजह नहीं थी और न आज है क्योंकि विवाह हिंदू धर्म के सौलह संस्कारों में से एक है जो ब्राह्मण पुरोहित यानी पंडे पुजारी की मौजूदगी में ही सम्पन्न होता है .वजह शादी के तमाम मन्त्र और तरीके वही जानता है . शादी में ढेरों तरह के रीति रिवाज होते हैं जिन में पंडित का होना अनिवार्यता है .
इस पंडित को बेहतर मालूम रहता है कि कितने का लेनदेन हुआ . लेकिन उसे इस पर कोई एतराज नहीं होता वजह इसकी दक्षिणा यानी कमीशन उसे मिलता है , फिर भला क्यों वह अपनी रोजी रोटी पर लात मारेगा. उसे हर नेग, हर पूजा और हर रस्म के पैसे मिलते हैं . एक शादी कराने के पंडे को यजमान की हैसियत के मुताबिक दस हजार से लेकर एक लाख रु तक दान में मिलते हैं . इसलिए वह मन ही मन भगवान से प्रार्थना किया करता है कि यह दहेज कभी बंद या खत्म न हो जिसके चलते उसे तगड़ा दान मिलता है . .
दान दक्षिणा पर रहता है ध्यान
दहेज को लेकर समय समय पर आन्दोलन होते रहे हैं . इस कुप्रथा का विरोध बड़े पैमाने पर विरोध समाज सुधारकों ने किया है . राजा राममोहन राय, इश्वरचन्द्र विद्यासागर , ज्योतिराव फुले , सावित्रीबाई फुले से लेकर महात्मा गांधी , भीमराव आम्बेडकर , पेरियार ई बी स्वामी और विनोवा भावे तक ने दहेज प्रथा का जितना हो सकता था विरोध किया .यह समझ से परे है कि इन लोगों को समाज सुधारक क्यों कहा जाता है धर्म सुधारक क्यों नहीं कहा जाता दूसरे तरीके से कहें तो दहेज को सामाजिक बुराई कहने की साजिश क्यों धार्मिक बुराई कहने से परहेज क्यों.
ऐसा इसलिए कि कोई ब्रांडेड से लेकर शादियां कराने बाला छुटभैया पंडा भी नहीं चाहता कि दहेज पर किसी तरह का अंकुश लगे इसलिए वे कभी दहेज जैसी धार्मिक बुराई पर चूं भी नहीं करते उनका पूरा ध्यान पाप पुण्य और मोक्ष के जरिये पैसे बनाने का रहता है . ऐसे सैकड़ों टोटके लोगों को लूटने के इन्होने इजाद कर रखे हैं जिनका खौफ इतना फैला दिया गया है कि यजमान खुद इन्हें पैर पकड़ कर घर ले जाता है और दक्षिणा देता है .
अभी भी कई इलाकों में रिश्ते पंडे तय कराते हैं इस बाबत इनका कमीशन दोनों पक्षों से तय रहता है . ये दोनों पक्षों के पास जाकर एक दूसरे की खूबियाँ बताते हैं लडके बालों को लालच देते हैं कि लडकी वाले बहुत अमीर हैं इतना सोना नगदी कार और दूसरे आयटम तो बिना मांगे देंगे ही फिर आगे जैसा आप दोनों के बीच तय हो जाए ,. लडकी बालों को बताते हैं कि लड़का लाखों में एक है और परिवार तो गऊ है जिसमे आपकी बिटिया राज करेगी . जन्मकुंडली तो यह हाथों हाथ मिला देता है . शुभ तिथियाँ और शुभ महूर्त निकालने भी ये मास्टर होते ही हैं यानी शादी के सारे सूत्र इनके हाथ में होते हैं .
.आरएसएस जैसे तमाम हिंदू धर्म के ठेकेदार संगठन भी इस पर कन्नी काटते नजर आते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि उनके एजेंडो मनुवाद और हिंदू राष्ट्र को स्विगी और ज़ुमेटो के डिलेवरी बाय जैसे घर घर ढोते ये डिलवरी पंडित पैसों को तरसें नहीं तो इन्हें भी वैश्यों और दलितों जैसे मेहनत कर पैसा कमाने मेहनत करना पड़ेगी . जिसके लिए ये पंडागिरी का अपना कारोबार छोड़ने मजबूर हो जायेंगे और हिंदूवादियों का एजेंडा और मंशा दोनों नागपुर तक सिमट कर रह जायेंगे .
कोई ट्विशा ख़ुदकुशी कर मरे या फिर ससुराल वाले उसकी हत्या दहेज के लिए कर दें यह इनके लिए फायदे का ही सौदा है . क्योंकि किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जाता कि नशे की तरह इस बुराई की जड भी धर्म है . इन ज्ञानियों को ज्यादा समझ आता है कि न केवल दहेज सरीखी धार्मिक बुराई बल्कि जातिवाद और छुआछूत हजारों तरह के अन्धविश्वास बगैरह कैंसर के मानिंद फ़ैल चुके हैं . जिनका इलाज अकेला कानून नहीं बल्कि जागरूकता है जिसे धर्म कभी आने नहीं देगा . Social Issues
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