FIR fear: मुंबई के वर्ली इलाके में भाजपा नेता गिरीश महाजन की रैली चल रही थी. रैली के कारण ट्रैफिक जाम हो गया. एक औरत ने जाम से परेशान हो कर मंत्री से सवाल किया और अपना गुस्सा जताया. वीडियो वायरल हुआ तो मुंबई पुलिस ने रैली आयोजकों के खिलाफ ट्रैफिक नियमों के तहत शिकायत दर्ज की. यहां तक सब लोकतांत्रिक था क्योंकि एक आम नागरिक की बात सुनी गई लेकिन अगले ही दिन मामले में नया मोड़ आया और वही पैटर्न दोहराया गया जो बीजेपी अकसर अपने विरोधियों को डराने के लिए करती है.
मुंबई के वर्ली इलाके में हाल ही में हुई इस घटना ने सत्ता के दुरुपयोग और आम नागरिकों की आवाज दबाने की मानसिकता को बेनकाब कर दिया है. बीजेपी द्वारा आयोजित महिला जन आक्रोश रैली के दौरान सड़कें जाम हो गईं, आम लोग घंटों फंसे रहे. इस बीच एक साधारण महिला, जो अपनी बेटी को स्कूल से लेने जा रही थी, जाम में फंस गई. उस ने सवाल किया कि क्यों आम जनता को परेशान कर के राजनीतिक प्रदर्शन किया जा रहा है. इस के जवाब में उसी महिला के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज करवा दी गई. बीजेपी की रैली में सड़क जाम किया गया, आम नागरिक परेशान हुआ. ऐसे में एक औरत ने आवाज उठाई तो उसी के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज करवा दी गई. क्या यह विरोधियों को चुप कराने का एक घटिया हथकंडा नहीं है?
वकील गुनरत्ना सदावरते की बेटी जेन सदावरते ने वर्ली पुलिस स्टेशन में सरकार को हिदायत देने वाली औरत के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई. जेन ने आरोप लगाया कि उस महिला ने गालीगलौज की, रैली में बाधा डाली, शांति भंग की और लोगों को परेशान किया. हालांकि, पुलिस ने कहा कि अभी एफआईआर नहीं दर्ज हुई है, सिर्फ शिकायत की गई है. लोग शिकायत न करें और सरकारी गुंडई चलती रहे, इस के लिए पुलिस कंप्लेंट सब से कारगर उपाय होता है. इस कंप्लेंट के बाद सजा तो शायद कोई मजिस्ट्रेट नहीं देगा पर 10-20 बार पुलिस थाने जाना ही सजा हो जाती है. यह मुंह बंद करने का तरीका है.मुंबई के वर्ली की घटना में जिस तरह एक आम नागरिक की नाराज़गी पर कानूनी कार्रवाई की तलवार लटका दी गई वह सिर्फ एक घटना नहीं बल्कि उस पैटर्न की झलक है जो बीजेपी की संस्कृति का हिस्सा बन गई है. एक आम नागरिक का सवाल पूछना यह लोकतंत्र की सामान्य तसवीर होनी चाहिए थी लेकिन सवाल पूछने वाली औरत के खिलाफ ही थाने में शिकायत दर्ज होना यह लोकतंत्र में अभिव्यक्ति और आजादी के खिलाफ बढ़ते खतरे का खतरनाक उदाहरण है. आमतौर पर यह शिकायत किसी दूर के थाने में दर्ज कराई जाती है और बहुत सी निरर्थक धाराएं जोड़ दी जाती हैं.
ऐसी शिकायत या FIR के बाद वास्तव में होता क्या है
एफआईआर के बाद असली कहानी शुरू होती है. कागज़ों में एफआईआर एक निष्पक्ष जांच की शुरुआत है लेकिन ज़मीनी हकीकत तो यह है की ऐसी एफआईआर ही सज़ा बन जाती है. एफआईआर के बाद सब से पहले पुलिस आप को जांच में सहयोग के नाम पर बुलाती है. यह बुलाना एक सजा है क्योंकि सब कामधाम छोड़ कर वकील को मोती फीस दे कर साथ ले कर जाओ और सारे दिन थाने में बैठे रहो. कब कोई छोटा सा पुलिसवाला बयान दर्ज करेगा, पता नहीं.
आज बयान के लिए आओ, कल फिर आओ, एक और कागज़ पर साइन करो. यह सिलसिला 10 से 20 बार भी चल सकता है. कोई तय सीमा नहीं. गिरफ्तारी हो या न, हैरासमैंट के लिए पुलिस का एक फोन ही काफी होता है. ‘आप के खिलाफ गंभीर आरोप हैं,’ ‘अगर सहयोग नहीं किया तो कार्रवाई होगी,’ यह भाषा अपनेआप में डर पैदा करती है भले ही केस कमजोर हो.
एक बार नाम पुलिस रिकौर्ड में आ गया या घर के दरवाजे पर कोई पुलिसकर्मी आ गया तो समाज की नज़र बदल जाती है. पड़ोसी शक की नज़र से देखते हैं. सज़ा अदालत से पहले समाज देना शुरू कर देता है. मानसिक सुकून छिन जाता है. समय और पैसा दोनों की बरबादी होती है वह अलग. एफआईआर में नाम आ जाने के बाद वकील रखना पड़ता है, छुट्टियां लेनी पड़ती हैं, रोज़मर्रा का काम प्रभावित होता है. घर का वातावरण बदल जाता है. हर तारीख पर जाना, दस्तावेज़ जुटाना यह सब एक आम आदमी को थका देने के लिए काफ़ी है.
मुंबई के जाम वाले केस में शिकायत करने वाली औरत की गिरफ्तारी शायद न भी हो लेकिन एफआईआर का डर ही काफ़ी है. आवाज़ को धीरेधीरे दबा देने का यही सब से बड़ा हथियार है. एक आम नागरिक ने सिर्फ अपनी परेशानी जताने के लिए ट्रैफिक जाम पर सवाल उठाया और उस के खिलाफ शिकायत दर्ज हो गई. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या क़ानून न्याय दिलाने के लिए है या सबक सिखाने के लिए?
एफआईआर नहीं, बल्कि एफआईआर का पूरा प्रोसैस ही एक तरह की सज़ा है. कानून कहता है कि हर व्यक्ति निर्दोष है जब तक दोष साबित न हो लेकिन व्यवहार में सच्चाई उलट है. आप भले ही निर्दोष हों लेकिन प्रक्रिया आप को दोषी जैसा महसूस करा देगी. इसलिए ऐसी शिकायतें सिर्फ कानूनी कार्रवाई नहीं होतीं बल्कि एक संदेश भी होती हैं कि सवाल मत पूछो, वरना प्रक्रिया ही तुम्हें चुप करा देगी.
विरोध की आवाज को दबाने का सब से आसान तरीका
राजनीतिक रैलियां, मोरचे और प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा हैं लेकिन जब ये मुंबई जैसे महानगर की व्यस्त सड़कों पर बिना इंतजाम के आयोजित किए जाते हैं तो आम नागरिकों की जिंदगी ठप हो जाती है. स्कूल जाने वाले बच्चे, अस्पताल पहुंचने वाले मरीज, औफिस जाने वाले कर्मचारी सभी घंटों जाम में फंस कर परेशान होते हैं. इस घटना में भी यही हुआ. एक मां अपनी बेटी को समय पर स्कूल पहुंचाने की जद्दोजेहद में थी लेकिन रैली ने सड़कें ब्लौक कर दीं. उस का गुस्सा स्वाभाविक था. वह मंत्री से पूछ रही थी की यह सड़क आप की निजी नहीं है, आम जनता की है, जाम क्यों लगाया?
सब से बड़ी विडंबना यह है कि रैली महिला आरक्षण बिल के समर्थन में आयोजित की गई थी. महिलाओं के सशक्तीकरण की बात हो रही थी लेकिन जब एक आम महिला ने अपनी रोजमर्रा की समस्या पर आवाज उठाई तो उसी के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज करवा कर चुप कराने की कोशिश की गई. यहां सवाल यह है कि क्या महिलाओं का सशक्तीकरण सिर्फ रैलियों तक सीमित है? क्या सड़क पर फंसी एक मां की आवाज महिला सशक्तीकरण के खिलाफ है? सत्ता पक्ष को अपनी रैलियों के लिए सड़कें ब्लौक करने का अधिकार है लेकिन क्या आम आदमी को अपनी परेशानी बताने का अधिकार नहीं है? क्या यह दोहरा मापदंड लोकतंत्र के लिए सही है?
बीजेपी जैसी बड़ी पार्टी को अपनी रैलियों का आयोजन जिम्मेदारी से करना चाहिए. राज्य में सरकार बीजेपी की है, ऐसे में ट्रैफिक मैनेजमैंट, वैकल्पिक रूट और आम जनता को कम से कम परेशानी हो, क्या यह सुनिश्चित करना बीजेपी का काम नहीं है?
यह घटना महज एक ट्रैफिक जाम की कहानी नहीं है. यह सत्ता के अहंकार की कहानी है जहां आम आदमी की छोटीछोटी आवाजों को भी दबाने की कोशिश की जाती है. लोकतंत्र में रैलियां, प्रदर्शन और आलोचना का अधिकार सभी को समान रूप से होना चाहिए. अगर सत्ता पक्ष को सड़क जाम कर जनता को परेशान करने का अधिकार है तो जनता को भी बिना डरे और बिना शिकायत का शिकार बने सवाल पूछने का हक है.
थाने में शिकायत दर्ज कराने वाली जैन सदावरते कौन हैं
जैन सदावरते गुनरत्ना सदावरते की बेटी हैं और गुनरत्ना सदावरते महाराष्ट्र के एक मशहूर वकील हैं. उन की पत्नी जयश्री पाटिल भी वकील हैं. गुनरत्ना सदावरते एक समय दलितों के नेता रहे हैं और उन्होंने बहुजन आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई लेकिन अब बीजेपी के चाटुकार बन गए हैं. एक समय था जब गुनरत्ना सदावरते दलित-बहुजन नेता के रूप में जाने जाते थे लेकिन इसे संयोग कहें या कुछ और कि पिछले 8-10 सालों में गुनरत्ना सदावरते के मुद्दे बीजेपी के हितों से मेल खाते रहे. यही वजह है कि विपक्ष उन्हें बीजेपी का प्रौक्सी वकील या चाटुकार कहता है.
बार काउंसिल ने गुनरत्ना सदावरते को कुछ समय के लिए सस्पैंड भी किया गया था. 2024 में उन्होंने बिग बौस 18 में हिस्सा लिया था. गुनरत्ना सदावरते की बेटी जेन सदावरते ने 2018 में अपने अपार्टमैंट में लगी आग में कुछ लोगों की जान बचाई थी. इस के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार दिया था.
2022 में एमएसआरटीसी यानी महाराष्ट्र राज्य मार्ग परिवहन निगम के कर्मचारियों की लंबी हड़ताल चली. एमएसआरटीसी कर्मचारी राज्य सरकार में विलय की मांग को ले कर आंदोलन कर रहे थे. सदावरते इस आंदोलन में कर्मचारियों के वकील थे. 8 अप्रैल, 2022 को मुंबई में शरद पवार के घर बाहर बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जमा हुए. वहां हिंसक प्रदर्शन और तोड़फोड़ हुई. पुलिस का आरोप था कि सदावरते ने कर्मचारियों को उकसाया. इसी आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया. गुनरत्ना सदावरते पर हिंसा भड़काने के आरोप लगे. उन्हें मुंबई की आर्थर रोड जेल में रखा गया. कुछ समय बाद कोर्ट से उन्हें जमानत मिल गई. जेल से बाहर आने के बाद गुनरत्ना सदावरते ने सार्वजनिक तौर पर देवेंद्र फडणवीस और अमित शाह का धन्यवाद किया था.
गुनरत्ना सदावरते की बीजेपी से इन नजदीकियों को देखते हुए यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि उन की बेटी जेन सदावरते ने सत्ता की उद्दंडता के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली एक आम औरत के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज क्यों करवाई. जाम में फंसी औरत की आवाज कोई राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि एक आम नागरिक की दैनिक संघर्ष की पुकार थी लेकिन बीजेपी इसे बरदाश्त नहीं कर सकी. जिस महिला ने सवाल उठाया उस के खिलाफ ही वर्ली थाने में शिकायत दर्ज करवा दी गई. जेन सदावरते ने आरोप लगाए कि महिला ने हंगामा किया, अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और शांति भंग की.
यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि थाने में दर्ज की गई जेन सदावरते की इस शिकायत के पीछे असल में कौन है? विरोधियों को चुप कराने का यह क्लासिक हथकंडा है. सत्ता में बैठे लोग जब अपनी गलतियों पर सवाल उठता देखते हैं तो ऐसे ही हठकंडे अपनाते हैं. इस शिकायत का मकसद साफ है. डराना और चेतावनी देना कि सत्ता की आलोचना करने वालों का क्या हश्र हो सकता है. FIR fear





