Ek Din Movie Review: यह 2016 में आई थाई फिल्म ‘वन डे’ की रीमेक है. कहानी सेम है. फिल्म दो लोगों पर केंद्रित है, जो एक विश के चलते एक दिन के लिए एकदूसरे के करीब आते हैं. फिल्म का आइडिया बेवकूफाना है मगर स्टोरी को किक देने के लिए चल जाता है. असल समस्या यह है कि फिल्म उस भावनात्मक गहराई तक पहुंच ही नहीं पाती जहां इन दोनों का प्यार दर्शकों को महसूस हो सके.

फिल्म की कहानी दिनेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ डीनो (जुनैद खान) के इर्दगिर्द घूमती है. डीनो ऐसा लड़का है जिसे औफिस में शायद ही कोई नोटिस करता है. वह आईटी सपोर्ट में काम करता है, इंट्रोवर्ट है और खुद को ‘इनविजिबलमैन’ मान चुका है. उसे लगता है उसे कोई क्यों ही पसंद करेगा. उस की जिंदगी की सब से बड़ी खुशी है मीरा (साईँ पल्लवी) को देखना. मीरा औफिस की वह लड़की है जिस से हरकोई प्रभावित है, लेकिन मीरा अपने बौस नकुल (कुनाल कपूर) के साथ रिश्ते में है, जो खुद अपनी शादी और अफेयर के बीच झूल रहा है.

कंपनी का स्टाफ 5 दिनों की ट्रिप पर जापान जाता है. डीनो वहां पहुंच कर विश बेल के आगे मन्नत मांगता है कि एक दिन के लिए मीरा उस की गर्लफ्रैंड बन जाए. उस की विश पूरी हो जाती है. एक हादसे में मीरा को टीजीए नाम की रेयर कंडीशन हो जाती है जिस में उस की एक दिन के लिए याददाश्त चली जाती है. इसी एक दिन में वह डीनो के करीब आ जाती है. फिल्म का तीनचौथाई हिस्सा इसी ‘एक दिन’ का है जिस में दोनों जापान में घूम रहे होते हैं. बर्फीली गलियों में घूमते हैं, बातें करते हैं, खाना खाते हैं और धीरेधीरे करीब आते हैं. सोचने में यह रोमांटिक लगता है, लेकिन फिल्म देखते हुए महसूस नहीं होता. आप कहानी को समझते जरूर हैं, लेकिन उस में डूब नहीं पाते.

असल समस्या डीनो और मीरा की कैमिस्ट्री है. डीनो का किरदार निभा रहा भारीभरकम जुनैद बहुत ही हलका दिखाई देता है. ऐसा लगता है वह एक ही टोन में फंसा है, कोई एक्सप्रैशन नहीं बदलता. फिल्म उसे ‘शर्मीला’ और ‘इनसिक्योर’ दिखाना चाहती है, लेकिन उस की लाइफ में इतना कुछ घट जाने के बाद भी हावभाव गायब लगते हैं. वह प्रेमी कम स्टौकर ज्यादा लगता है.

फिल्म की सब से अच्छी चीज जापान की बर्फीली लोकेशंस, शांत सड़कें और धीमा बैकग्राउंड म्यूजिक है. कई जगह फिल्म देखने में खूबसूरत लगती है, यह कुछकुछ कोरियन रोमांटिक ड्रामा जैसी फील कराती है. लेकिन इस के बावजूद यह इमोशनलेस लव स्टोरी बन कर रह जाती है. साईं पल्लवी का काम अच्छा है. उस ने साउथ इंडियन की भूमिका निभाई है, हिंदी में दक्षिण भारतीय लहजा भी किरदार के हिसाब से नैचुरल लगता है. वह अपनी भूमिका में सहज लगी है, कुछ सीन में तो जान डाल दी है उस ने, जैसे जब उसे बौस कुनाल की हकीकत का पता चलता है और वह रोती है, या जब वह लबुबू डौल के लिए खुश होती है.

फिल्म का एक और कमजोर हिस्सा इस का लेखन है. कुछ संवाद अच्छे हैं. कई बार फिल्म खुद को बहुत ‘क्यूट’ बनाने की कोशिश में बनावटी लगने लगती है. फिल्म में अगर मीरा की याददाश्त खोने को जादुई एंगल से न भी जोड़ा जाता तो भी फिल्म में कुछ न बदलता. फिल्म खत्म होने के बाद कोई बड़ा असर नहीं छोड़ती, न इस के संवाद याद रहते हैं, न ही डीनो-मीरा की जोड़ी. फिल्म देख कर भुला देने लायक है. बस, सुकून यह कि सिर पर जोर नहीं पड़ता.

यह फिल्म हलकीफुलकी, शांत फिल्मों को पसंद करने वालों को ठीक लग सकती है. फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक अच्छा है. सुनील पांडे का डायरैक्शन ठीकठाक है. लोकेशन लाजवाब हैं. गाने अरिजीत सिंह से गंवाए गए हैं. ‘एक दिन…’, ‘ख्वाब देखूं…’ सुनने में अच्छे लगते हैं. सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है. Ek Din Movie Review

 

 

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