Husband Wife Dispute: वर्किंग कपल्स ज्यादातर यूनिटरी फैमिलीज में रहते हैं. उन की चाहत यह होती है कि उन के बीच स्पेस न रहे जिस से कि किसी और की जगह न बन सके लेकिन आज मोबाइल के दौर में एक का दूसरे को बारबार फोन करना भी निगरानी जैसा लगने लगता है. दूसरी तरफ दिक्कत यह भी है कि ज्यादातर कपल्स के पास आपस में बात करने के मुद्दे नहीं होते और इसलिए फोन पर बेमतलब की बातें पूछने के अलावा कुछ होता नहीं है. इन हालात से आपसी तनाव और अलगाव की घटनाएं घट रही हैं.
उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग में परेशान पतिपत्नी के बीच जनसुनवाई चल रही थी. प्रदेश की राजधानी लखनऊ में राज्य महिला आयोग का कार्यालय तीसरी मंजिल पर है. राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डाक्टर बबिता सिंह के सामने रवि और रेखा नामक पतिपत्नी अपनी शिकायत ले कर पहुंचे थे. दोनों की सब से बड़ी परेशानी यह थी कि वे साथ रहना भी नहीं चाहते थे और अलग भी नहीं रहना चाहते थे लेकिन साथ रहने के लिए पतिपत्नी एकदूसरे की शर्तें मानने को तैयार नहीं थे. पत्नी रेखा का कहना था कि उस के पति रवि ने अपने साथ भतीजेभतीजियां रख रखी हैं. उन की पढ़ाई का पूरा खर्च उठा रहे हैं. ऐसे में वह उस के साथ नहीं रह सकती.
रेखा के अनुसार इन का लखनऊ के सीतापुर रोड पर दोमंजिला मकान है. नीचे के कमरों में वह रहती है और ऊपर के 2 कमरों में रवि के रिश्तेदार 4 बच्चे रहते हैं. उन में 2 लड़कियां हैं जो बीएससी और बीए कर रही हैं. 2 लड़के हैं जो 12वीं और बीए कर रहे हैं. रवि ज्यादातर उन के पास ही रहते हैं. उन्हें ट्यूशन पढ़ाते हैं. रेखा और रवि की शादी को 2 साल हो गए हैं. उन के अपने बच्चे नहीं हैं. रेखा सरकारी विभाग में क्लर्क है और रवि प्राइवेट कालेज में पढ़ाता है. रेखा का कहना है कि इतने समय में उन के बीच नजदीकियां कम जबकि दूरियां अधिक हैं.
रेखा का यह कहना भी था कि रवि की भतीजी उस के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती. ऐसे में वह इस घर में उस के साथ नहीं रह सकती और रवि उसे ले कर दूसरे घर में रहे जहां ये बच्चे न रहें. रवि पत्नी के साथ रहना चाहते थे लेकिन अपने भाईबहन के बच्चों का साथ छोड़ना नहीं चाहते थे. ये बच्चे अपनी पढ़ाई कर रहे थे और ये रवि व रेखा की शादी के पहले से रह रहे थे. सुनवाई के दिन रेखा के साथ उस की मां आई थी. दूसरी तरफ रवि के साथ उस का एक सहयोगी था.
महिला आयोग में जनसुनवाई के दौरान पतिपत्नी ही रहते हैं. महिला आयोग की अध्यक्ष और 2 सदस्य वहां रहती हैं. जनसुनवाई में पूरी गोपनीयता रहती है. परेशान लोगों के नाम और पहचान को गोपनीय रखा जाता है. सुनवाई एक दिन में पूरी न हो तो कई पेशी पड़ती हैं. सम?ाता होने की दशा में मुकदमा कोर्ट को भेज दिया जाता है. मसला हल होने पर पुलिस को सूचना चली जाती है कि इस मसले में सुलह हो गई है.
पुलिस थाना बनता जोड़े में दरार का कारण
केवल महिला आयोग के सामने ही नहीं, ऐसे मामले सब से पहले पुलिस थानों में पहुंचते हैं. हर थाने में महिला हैल्पलाइन डैस्क होती है. इस में सबइंस्पैक्टर रैंक की महिला दारोगा महिलाओं की समस्या को सुनती है. कई बार शिकायत पर मुकदमा कायम नहीं भी होता. महिला को सम?ा कर सुलह करा दी जाती है. ऐसे में पुलिस की भूमिका निगरानी तक सीमित रहती है. पुलिस के बाद मसले फैमिली कोर्ट जाते हैं.
जब बात आपसी समझते से नहीं बनती तो कोर्ट में तलाक की प्रक्रिया शुरू होती है. पुलिस में जाना जोड़े में एक दरार पैदा कर देता है जो बाद में बहुत मुश्किल से भरती है. पतिपत्नी के मामले में वर्किंग कपल्स की संख्या अधिक है. इस की वजह यह है कि इन के बीच औफिस के काम का भी अत्यधिक तनाव होता है. राज्य सरकारों ने वन स्टौप सैंटर बनाया है जहां फोन द्वारा पतिपत्नी अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं. इस के अनुसार, 60 फीसदी घरेलू हिंसा की घटनाएं आपसी विवाद की वजह से घटती हैं.
लखनऊ वन स्टौप सैंटर की प्रभारी अर्चना सिंह कहती हैं, ‘‘हर महिला की बात को सुन कर जो बेहतर समाधान होता है वह समझैया जाता है. कई बार पत्नियां बात को सम?ा जाती हैं. कई बार पति नहीं समझते जिस से बात बनतेबनते रह जाती है. समाधान करने के लिए इन की समस्याओं को समझना जरूरी होता है.’’
आपसी विवाद से बढ़ रहे झगड़े
मनोविज्ञानी डाक्टर मधुबाला यादव अपना काउसलिंग सैंटर चलाती हैं. वे कहती हैं, ‘‘वैवाहिक जीवन में कलह भावनात्मक थकावट, सैक्स की समस्याओं और शारीरिक व मानसिक हिंसा के रूप में सामने आती है. यह मारपीट, जबरदस्ती, आर्थिक नियंत्रण और अपमान के कारण आपसी तनाव बढ़ा रहा है. वर्किंग कपल्स में कार्यस्थल का तनाव घर पहुंच जाता है.
घर में उन के पास बात करने का मुद्दा नहीं होता. एकदूसरे के औफिस के बारे में बातचीत होती नहीं. समाज, फिल्म और राजनीति पर कितनी बात कर सकते हैं. राजनीतिक मसलों पर बातचीत झगड़े में बदल जाती है. असल में न्यूज चैनलों और धारावाहिकों में चीखचीख कर बोलना और एकदूसरे के खिलाफ साजिश के आरोप लगाना ही रह गया है. यंग कपल्स ने पढ़नालिखना बंद कर दिया है.
‘‘ऐसे में निराशा और चुप्पी तनाव बन जाती है. यहीं से एकदूसरे के लिए समय का अभाव होने लगता है जिस से रिश्ते में दरार आ रही है. कई बार ये घटनाएं घरेलू हिंसा ही नहीं, बल्कि अपमान, डर और आर्थिक परेशानियों में भी बदल जाती हैं. जहां बात बढ़ जाती है वहां तनाव के चलते गंभीर अपराध की संभावना बढ़ जाती है. नतीजतन, लड़ाई?ागड़े होने लगते हैं जो बाद में थाना और कचहरी तक पहुंच जाते हैं.’’
डाक्टर मधुबाला आगे कहती हैं, ‘‘वर्किंग कपल्स के जब बच्चे होते हैं तब उन पर काम का दबाव बढ़ जाता है. ऐसे में कई बार महिलाओं पर काम को छोड़ना पड़ता है. यह भी हिंसा का रूप ले लेता है. यहां ज्यादातर हिंसा पति द्वारा ही की जाती है. वर्किंग कपल्स में झगड़े का एक और कारण पैसा भी होता है. पति को लगता है कि पत्नी के पैसों पर भी उस का हक है. कमाने के बाद भी पत्नी जब पैसे खुद नहीं रख पाती तो वह झगड़ा करने लगती है. इन तनावपूर्ण स्थितियों से बचने के लिए कार्यों में संतुलन और आपसी संवाद को बेहतर बनाना सब से जरूरी होता है.’’
पतिपत्नी के बीच बातचीत के मुद्दों का अभाव
पुरुष प्रधान समाज में पत्नी को केवल सुनने के लिए रखा जाता है. पत्नी की बात को सुनने वाले पति को जोरू का गुलाम कहा जाता है. ऐसे में पति, पत्नी की कही सही बात को भी नकार देता है जिस से आपसी बातचीत बंद हो जाती है. बातचीत में पति का आदेश ज्यादा होता है.
पत्नी को यह समझाया जाता है कि पति की बात मानना उस का कर्तव्य और अधिकार दोनों है. घरपरिवार के सारे बड़े फैसले पति करता है. अब जब पत्नी खुद कमाती है तो उसे लगता है कि फैसलों में उस की भी बात सुनी जानी चाहिए और उस का भी हक होना चाहिए. यहीं से विवाद शुरू हो रहे हैं.
पहले पतिपत्नी के बीच उन के परिवार के लोग होते थे जो मसलों को सम?ाने का काम करते थे. आज के वर्किंग कपल्स अकेले होते हैं. इन के बीच होने वाले मतभेद सुलझने वाले लोग कम हो गए हैं. दूर बैठे पेरैंट्स अपनेअपने हिसाब से सोचते हैं. उन को भी संबंधों को जोड़ने की कला नहीं आती है. ऐसे में लड़भिड़ कर मसले थानेकचहरी तक पहुंच जाते हैं. जिस से वर्किंग कपल्स तलाक की ओर बढ़ जाते हैं. तलाक सरल नहीं रह गया है. यह जीवन को कई तरह से जटिल बना देता है.
वर्किंग कपल्स का झगड़ा दोनों के जीवन में गहरा असर डालता है. वर्किंग कपल्स में तलाक के नएनए रूप सामने आने लगे हैं. इन में एक नाम है स्लीप डिवोर्स. इस में कपल्स साथसाथ तो रहते हैं पर बेहतर नींद के लिए अलगअलग बिस्तरों या कमरों में सोते हैं. हालांकि इस का मतलब यह नहीं है कि उन का रिश्ता टूट रहा है बल्कि यह एक तरीका है जिस से वे एकदूसरे को परेशान किए बिना अच्छी नींद ले सकते हैं.
कई बार पार्टनर के खर्राटे लेने की आदत से दूसरे की नींद खराब हो जाती है. वहीं कुछ कपल्स के सोने और जागने के समय अलगअलग होते हैं, जिस से एक की नींद दूसरे की वजह से प्रभावित हो सकती है जबकि किसी एक पार्टनर को स्लीप डिसऔर्डर हो सकता है, जिस से दूसरे की नींद में खलल पड़ता है. यह स्थिति अकसर तलाक या अलगाव की ओर बढ़ सकती है. इस की नौबत न आए, इस का प्रयास किया जाना चाहिए. तलाक की नौबत आने पर तरहतरह के विकल्प हैं.
आपसी सहमति से तलाक
आपसी सहमति से तलाक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है जिस में पति और पत्नी दोनों सहमति से अपने विवाह को समाप्त करने का निर्णय लेते हैं. यह प्रक्रिया विवादित तलाक की तुलना में सरल और कम तनावपूर्ण होती है. आपसी सहमति से तलाक का मतलब है कि दोनों पतिपत्नी इस बात पर सहमत होते हैं कि वे अब साथ नहीं रह सकते और अपने विवाह को समाप्त करना चाहते हैं. इस में दोनों पक्ष चाइल्ड कस्टडी, संपत्ति का विभाजन और गुजाराभत्ता जैसे मुद्दों पर सहमत होते हैं.
सहमति से तलाक हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 के तहत पतिपत्नी द्वारा संयुक्त रूप से फाइल किया जाता है. इस में संपत्ति, बच्चों की कस्टडी और भरणपोषण पर सहमति बना कर कोर्ट में 2 याचिकाएं दायर की जाती हैं. इस में 6 से 18 महीने की प्रक्रिया के बाद डिक्री मिलती है. यह पतिपत्नी तब करते हैं जब वे एकसाथ रहने में असमर्थ हों. इस में दोनों पक्ष गुजाराभत्ता, संपत्ति और बच्चों की कस्टडी को ले कर लिखित समझता तैयार करते हैं. पहली याचिका दोनों के वकील परिवार न्यायालय में संयुक्त याचिका दायर करते हैं. कोर्ट दोनों के बयान दर्ज करता है.
कूलिंग औफ की समय सीमा 6 महीने तक हो सकती है. पहली और दूसरी याचिका के बीच आमतौर पर 6 महीने का समय दिया जाता है ताकि सुलह की गुंजाइश देखी जा सके. इस अवधि को कोर्ट की अनुमति से कम भी किया जा सकता है. दूसरी याचिका 6 से 18 महीने के भीतर होती है. यदि पति और पत्नी तलाक पर अडिग रहते हैं तो कोर्ट डिक्री पारित कर देता है. तलाक के लिए जरूरी कागजात में शादी का प्रमाणपत्र, पतिपत्नी के आधार कार्ड, पैन कार्ड, पता प्रमाण में आधार, वोटर आईडी शामिल हैं. अगर बच्चे हैं तो उन का जन्म प्रमाणपत्र और पेरैंट्स का आय प्रमाणपत्र लगाया जाता है.
विवादित तलाक से बचें
विवादित तलाक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है जिस में एक पक्ष तलाक चाहता है जबकि दूसरा पक्ष इस के लिए तैयार नहीं होता. यह प्रक्रिया आपसी सहमति से तलाक की तुलना में अधिक जटिल और समय लेने वाली होती है. इस तलाक का मतलब है कि पति या पत्नी में से एक तलाक चाहता है, लेकिन दूसरा पक्ष इस के लिए सहमत नहीं है. इस में अदालत को यह तय करना होता है कि तलाक के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं.
हमारे देश में तलाक एक कठिन प्रक्रिया है. विदेशों में यह अलगअलग रूपों में मौजूद है. विदेशों में 50 वर्ष या उस से अधिक उम्र के बीच होने वाले तलाक को ‘ग्रे डिवोर्स’ कहते हैं. यहां लोग शादी के कई वर्षों बाद तलाक लेने का निर्णय लेते हैं.
?तलाक के बाद आर्थिक स्थिति पर बड़ा प्रभाव पड़ता है. पैंशन, संपत्ति और अन्य वित्तीय संसाधनों का विभाजन करना पड़ता है, जिस से दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है. इस को ही ‘ग्रे डिवोर्स’ कहते हैं. दूसरा ‘नो फौल्ट तलाक’ है. जिस में पक्षों को अपनी शादी के तोड़ने के लिए कोई विशेष आधार या कारण साबित करने की जरूरत नहीं होती.
मुसलिम वर्ग में भी तलाक के कई रूप हैं. इन में से एक तलाक ए अहसन है. इस में पति अपनी पत्नी को एक बार तलाक कहता है और फिर 3 महीने का इंतजार करता है. इस दौरान अगर पतिपत्नी के बीच सुलह हो जाती है तो तलाक रद्द हो सकता है. इस एक और तलाक ए हसन होता है. इस में पति 3 महीने के अंतराल पर 3 बार तलाक कहता है. हर महीने एक बार तलाक कहने के बाद, अगर पतिपत्नी के बीच सुलह नहीं होती है तो तीसरे महीने के बाद तलाक हो जाता है.
तलाक ए बिदत को तीन तलाक भी कहा जाता है. इसलाम में एक विवादास्पद और अब भारत में गैरकानूनी घोषित किया गया तलाक का तरीका है. इस में पति एक ही बार में तीन बार ‘तलाक’ कह कर अपनी पत्नी को तलाक दे देता है. इस प्रक्रिया में तलाक तुरंत प्रभावी हो जाता है और पतिपत्नी के बीच विवाह संबंध समाप्त हो जाता है.
समझदारी दिखाएं
वर्किंग कपल्स के लिए तलाक अंतिम विकल्प होना चाहिए. इस की वजह यह है कि लड़कालड़की दोनों की दूसरी शादी के लिए साथी का मिलना सरल नहीं है. दूसरी शादी के बाद भी कई तरह के विवाद चलते रहते हैं. ऐसे में आपसी बातचीत और समझदारी के जरिए रिश्ता बनाने का प्रयास करना चाहिए. उन को अपने कामकाज के साथ ही साथ अपने लिए स्पेस निकालना चाहिए. पतिपत्नी दोनों के ही पास करीबी लोगों का अभाव होता है. ऐसे में पतिपत्नी ही सब से अच्छे दोस्त होते हैं.
सब से बड़ी बात यह है कि हर कपल को अपनी सोच का दायरा बढ़ाना चाहिए और यह उपन्यासों, कहानियों, लेखों, समाचारपत्र, पत्रिकाओं को पढ़ कर, सिर्फ सुन कर नहीं, ही बढ़ सकता है. सुनते समय या स्क्रीन पर देखते समय रुक कर किसी भी बताए जा रहे मामले को अपनी समस्या से जोड़ना असंभव है जबकि पढ़ते समय यह संभव है. सदियों तक तो पढ़ने की सुविधा नहीं थी और इसीलिए परिवार एक छत के नीचे रहते हुए भी मशीनों की तरह एकदूसरे की भावनाओं से अपरिचित रहते थे.
आज जब पड़ोसी, रिश्तेदार, दोस्त कम होने लगे हैं तो ऐसे में किताबें ही कुछ नया रास्ता सु?ा सकती हैं, टीवी व मोबाइल नहीं. आज भी सब से ज्यादा सफल व्यवसायों में लगे लोग पढ़ने से नहीं चूकते लेकिन मध्यवर्ग ने पढ़ना छोड़ कर अपनों के बीच स्पेस क्रिएट कर लिया है.
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भरणपोषण की हकदार नहीं अपनी मरजी से पति से अलग रहने वाली पत्नी
बौम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बैंच ने हाल ही में एक महत्त्वपूर्ण फैसला सुनाया है जिस में कहा गया है कि बिना किसी ठोस कारण अपनी मरजी से पति से अलग रहने वाली पत्नी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरणपोषण की हकदार नहीं है.
रत्नप्रभा प्रकाश और ध्यानाबाजी की शादी 1985 में हुई थी. रत्नाकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे और जून 2018 में रिटायर हुए. रिटायरमैंट तक दोनों पतिपत्नी साथ रहे. रिटायरमैंट के बाद रत्नाकर अपने गांव चले गए लेकिन ध्यानाबाजी पति के साथ गांव जाने को तैयार नहीं हुईं. यहीं से दोनों के बीच विवाद बढ़ा और मामला कोर्ट पहुंचा. कोर्ट में ध्यानाबाजी ने आरोप लगाया कि पति ने उन के साथ दुर्व्यवहार किया और दूसरी महिला के साथ रहते हैं लेकिन इन दोनों आरोपों को वह कोर्ट में साबित नहीं कर पाई.
ध्यानाबाजी 34 साल तक पति के साथ रही. उस दौरान दोनों के बीच कोई विवाद नहीं हुआ. रिटायरमैंट के बाद गांव जाने की वजह से दोनों के बीच दूरियां पैदा हुईं. सीआरपीसी की धारा 125(4) के अनुसार, ‘‘जो पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण के अपने पति के साथ रहने से इनकार करती है, वह सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरणपोषण की हकदार नहीं है.’’ इस मामले में पति की ओर से कोई गलत व्यवहार साबित नहीं हुआ, इसलिए पत्नी का भरणपोषण का दावा खारिज हो गया.
फैमिली कोर्ट ने पहले ही पत्नी का दावा खारिज कर दिया था. अब हाईकोर्ट ने भी पत्नी की रिवीजन याचिका खारिज कर दी. सीआरपीसी की धारा 125 केवल जरूरतमंद पत्नी को सुरक्षा देता है वहीं धारा 125(4) साफतौर पर कहती है कि यदि पत्नी बिना पर्याप्त कारण पति के साथ रहने से मना करती है तो वह भरणपोषण नहीं पा सकती.
पर्याप्त कारणों में क्रूरता, खतरा, शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न शामिल हैं. हर केस के तथ्य अलग होते हैं. अगर पत्नी के पास क्रूरता या खतरे के ठोस सुबूत हों तो कोर्ट भरणपोषण दे सकती है. यह फैसला सिर्फ उन मामलों पर लागू होता है जहां अलगाव पूरी तरह मरजी से हो. Husband Wife Dispute





