Iran Israel War: ईरान और इजराइल के बीच चल रहे युद्ध के हालातों ने पूरी दुनिया की इकोनौमी और पौलिटिक्स को हिला कर रख दिया है. इस संघर्ष ने ऊर्जा, बाजार और कूटनीतिक समीकरणों का तानाबाना तो उधाड़ ही दिया है, इस का सब से गहरा और दीर्घकालिक असर उन आम लोगों पर पड़ रहा है, जो जंग की धधकती आग के बीच रहने के लिए मजबूर हैं.

ईरान-इजरायल युद्ध जैसेजैसे आगे बढ़ रहा है, वैसेवैसे इस के गंभीर परिणाम पूरी दुनिया पर और प्रमुखता से दिखने लगे हैं. ईंधन से ले कर एलपीजी की बाधित सप्लाई, मार्केट क्रैश, बदलती सरकारी और सैन्य रणनीतियां पर तो सब का ध्यान है, लेकिन इस बीच युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में रह रहे लोगों की मानसिक व भावनात्मक स्थिति पर कोई बात करता दिखाई नहीं दे रहा है. साइकोलौजिस्ट एंड ह्यूमन एंड सोशल राइट्स एक्टिविस्ट मालिनी सबा की मानें तो युद्ध से जन्मी स्थितियां मानव मन पर इतनी गहरी छाप छोड़ती हैं कि इस का असर पीढ़ियों तक नजर आता है. भले ही ईरान-इजरायल युद्ध कुछ महीने बाद खत्म हो जाए, लेकिन कड़वा सच यह है कि इस से जन्मी मानसिक और भावनात्मक समस्याएं एक से दूसरी पीढ़ी को विरासत में मिलती रहेंगी.

वर्ल्ड हेल्थ और्गेनाइजेशन का भी कहना है कि युद्ध और सशस्त्र संघर्ष से प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लगभग हर पांच में से एक व्यक्ति किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझता है. यह आंकड़ा सामान्य परिस्थितियों की तुलना में कई गुना अधिक है. मिसाइल सायरन, बम धमाके, रातों की नींद हराम कर देने वाली अनिश्चितता, ये सब मिल कर युद्ध क्षेत्र में निवास कर रहे लोगों के नर्वस सिस्टम को लगातार अलर्ट मोड में रखते हैं.ऐसे हालात में शरीर के अंदर कोर्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे स्ट्रेस हार्मोन लगातार उच्च स्तर पर बने रहते हैं. यही स्थिति आगे चल कर पोस्ट ट्रौमेटिक स्ट्रेस डिसऔर्डर, क्रोनिक एंग्जाइटी और फोबिया जैसी समस्याओं को जन्म देती है.

मानव शरीर और मस्तिष्क पर यह असर सिर्फ जंग जारी रहने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के मन, व्यवहार और व्यक्तित्व तक में उतर जाता है. युद्ध की सब से भयावह सच्चाई यही है कि यह सिर्फ सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि इंसानी दिमाग के भीतर भी चलता रहता है, कभी खत्म न होने वाली लड़ाई की तरह.

यूएन की रिफ्यूजी एजेंसी के अनुसार, हमलों के पहले 48 घंटों में 100,000 से ज्यादा लोगों को ईरान की राजधानी तेहरान को छोड़ कर भागना पड़ा है. लगातार होते हमले, मिसाइलों का गिरना, घर नष्ट हो जाना, परिवारों का अलग हो जाना और पूरी दिनचर्या का बिखर जाना, लोगों को भावनात्मक रूप से तोड़ देता है. ईरान और इजरायल दोनों ही जगहों पर लोग सिर्फ जान का खतरा नहीं झेल रहे, बल्कि अपनी पहचान और सुरक्षा के टूटने का दर्द भी झेल रहे हैं.

किसी इंसान का घर उजड़ना सिर्फ उस का भौतिक नुकसान नहीं होता, बल्कि यह व्यक्ति की स्मृतियों, रिश्तों और पहचान को भी खत्म कर देता है. गाजा पट्टी में ऐसे अनेक लोग हैं जिन के प्रियजन युद्ध में मारे जा चुके हैं. ऐसी औरतें और बच्चे बड़ी संख्या में हैं, जिन के घर के पुरुष खत्म हो चुके हैं. ऐसे में इनमें से कई खुद के बच जाने के अपराध बोध से ग्रस्त हैं. इस स्थिति को सर्वाइवर गिल्ट कहते हैं. वहीं, बिना किसी शारीरिक कारण के दर्द, थकान और घबराहट जैसे लक्षण भी आम होते जा रहे हैं. इसे मनोविज्ञान में साइकोसोमैटिक प्रभाव कहा जाता है.

आज का युद्ध सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया और 24×7 न्यूज कवरेज के कारण दुनिया भर के लोग भी इस हिंसा, आगजनी, चीख़पुकार, खून में नहाये शवों को प्रत्यक्ष देख रहे हैं. लगातार ऐसे दृश्य देखने से दिमाग वास्तविक और वर्चुअल अनुभव में फर्क नहीं कर पाता है. इस से सेकेंडरी ट्रौमा पैदा होता है, जिस में व्यक्ति खुद युद्ध क्षेत्र में न होते हुए भी एंग्जाइटी, बेचैनी और भावनात्मक थकान महसूस करता रहता है.

बच्चों के पास भले ही वह भाषा नहीं होती जिस में वह  सटीकता के साथ अपने ट्रौमा को जाहिर कर सकें, लेकिन ये बात तय है कि उन के आसपास क्या हो रहा है और भावनात्मक माहौल कैसा है, इसे वो गहराई से अपने सबकौन्शियस ब्रेन में एब्जौर्ब करते  हैं. वे युद्ध को अपने व्यवहार, खेल और खामोशी में जीने लगते हैं. उन में बिहेवियरल चेंज दिखने लगते हैं. वे डर के मारे बार बार बिस्तर गीला करते हैं, कभी वे अचानक चुप हो जाते हैं या अत्यधिक आक्रामक हो जाते हैं. खेलखेल में वे टैंक, बंदूक और धमाकों की दुनिया रचते हैं. यह उन के भीतर जमा डर का संकेत होता है. जब बच्चा बारबार टैंक, बंदूक, बम बनाता है, तो वह असल में अपने अनुभव को समझने और नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा होता है. युद्ध प्रभावित क्षेत्र में पलेबढ़े होने के कारण बच्चों में अक्सर ट्रौक्सिक स्ट्रेस भी मौजूद रहता है. जो डिप्रेशन, नशे की लत और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ट्रौमा के लक्षण पास होने के जोखिम को बढ़ाता है.

न्यूरोसाइंस बताता है कि बचपन में लगातार डर और असुरक्षा का अनुभव ट्रौक्सिक स्ट्रेस पैदा करता है, जो मस्तिष्क के विकास को प्रभावित करता है.  इसका असर जीवन भर रहता है. युद्धग्रस्त देशों में बच्चों में कम आत्मविश्वास, रिश्तों में अस्थिरता और निर्णय लेने की क्षमता पर युद्ध का प्रभाव साफ देखा गया है. इतिहास गवाह है, चाहे वह वियतनाम युद्ध हो, सीरिया का संघर्ष या द्वितीय विश्वयुद्ध, युद्ध खत्म होने के दशकों बाद भी उसके मनोवैज्ञानिक घाव बने रहे हैं. मातापिता का अधूरा डर, असुरक्षा और तनाव अगली पीढ़ी के व्यवहार और सोच में उतरता है. ऐसे समाजों में अविश्वास, हिंसा की स्वीकृति और भावनात्मक दूरी सामान्य व्यवहार में आ जाती है.

दुनियाभर के देश जो युद्ध की विभीषिकाओं से निकले हैं, वहां सड़कों, पुलों और इमारतों के पुनर्निर्माण पर तो जोर दिया जाता है, लेकिन लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है. जब तक लोगों को सुरक्षित माहौल, सामुदायिक सहयोग और मनोवैज्ञानिक सहायता नहीं मिलती, रिकवरी अधूरी रहती है. युद्ध के बाद जीवित बचे लोगों को मेंटल हेल्थ सपोर्ट, ट्रौमा काउंसलिंग और खुल कर बातचीत का माहौल मिलना उतना ही जरूरी हैं जितना कि आर्थिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया आवश्यक है. Iran Israel War

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