Single Life Benefits : अकेले रहने का चलन बढ़ रहा है तो महज इसलिए नहीं कि लोग घर, परिवार और समाज की बंदिशों से परे आजादी से रहना चाहते हैं बल्कि इसलिए भी कि लोग जिंदगी में कुछ नया ट्राई करना चाहते हैं जो रोमांच भी है और सिस्टम को चुनौती भी है. जिन देशों ने इसे स्वीकार किया है वे खुशहाल और संपन्न हैं. अकेले रहने को मौज का पर्याय भी माना जाता है जो बहुत ज्यादा गलत भी नहीं.
तुम इस दुनिया में अकेले आए थे और अकेले ही जाओगे, इस जैसी चलताऊ बात बताने के एवज में लाखोंकरोड़ों रुपए झटक लेने वाले बाबा लोग खुद अकेले नहीं रहते बल्कि भव्य मठों और आश्रमों में रहते हैं. उन के इर्दगिर्द सोने के वक्त में भी कोई न कोई साथ होता है (या होती है, यह हकीकत के ज्यादा करीब है). निचोड़ यह कि अकेलेपन का भी डर दिखा कर अपना अरबोंखरबों का साम्राज्य खड़े करने वाले धर्मगुरुओं की पहली और आखिरी कोशिश यही रहती है कि कोई और अकेला न रहे. क्योंकि, लोग अगर अकेले रहना सीख लेंगे तो इन की दुकान खतरे में पड़ जाएगी. फिर न तो लोग भगवान को मानेंगे और न ही धर्मस्थलों पर जा कर जेब ढीली करेंगे.
जिस असुरक्षा ने आदमी को समूह यानी परिवार और समाज में रहना सिखाया वह असुरक्षा अब दम तोड़ रही है. अब लोगों को अकेले रहना ज्यादा सहूलियत और सुख वाला काम लगने लगा है, जहां कोई रोकटोक, लड़ाईझगड़ा या क्लेशकलह नहीं होते. सोने, उठनेबैठने और आनेजाने पर कोई पाबंदी नहीं होती. और तो और, आप के रिमोट तक पर पूरा कब्जा आप का होता है. मोबाइलफोन बिना पासवर्ड के रहने पर कोई रिस्क नहीं रहता.
बिस्तर पर गीला तोलिया पड़ा हो तो कोई खीझ कर यह कहने वाली नहीं होती कि यह क्या बेहूदगी है, रोजरोज समझाती हों पर आप को समझ ही नहीं आता. सैंटर टेबल पर रखी एश ट्रे में पड़ी सिगरेटें अचार में भी तबदील हो जाएं तब भी कोई नहीं कहता कि यह क्या लापरवाही है. सिंक में मैगी के अवशेष वाली झूठी प्लेटें अपने समय को महीनों रोती रहें तो रोती रहें उन की बला से, उन का काम तो अख़बार या मैगजीन के पन्ने फाड़ कर भी लिया जा सकता है.
दीवारों पर मकड़िया बिना किसी डर के अपना वंश बढ़ाती रहें और आम घरों में उन का परिवार नियोजन करने वाली झाड़ू किसी कोने में पड़ी उबासियां लेती सोचती ही रह जाए कि क्या पता मुझे क्यों ख़रीदा गया था. मकड़ियों समेत तमाम कीटपतंगों का स्वच्छंद विचरण, जो बुद्ध की करुणा और महावीर की अहिंसा सहित ओशो की उच्छंखलता का मिक्सचर होता है, किसी अकेले के यहां ही देखने को मिलता है. ऐसा और इस से भी बहुत ज्यादाकुछ किसी अकेले के घर में ही मुमकिन है.
अकेले रह रहे आदमी की मौज क्या होती है, यह तो कोई घरग्रहस्थी वाला ही बता सकता है जो रात नौ बजे से ही घड़ी देखने लगता है. मोबाइल की घंटी बजते ही उस के चेहरे का रंग उड़ जाता है और थोड़ी देर महफिल से न उठने की झूठी मर्दानगी दिखा कर आख़िरकार बोल ही पड़ता है, चलता हूं यार, बहुत देर हो गई, पत्नी इंतजार कर रही होगी. सुबह मुन्ने को स्कूल बस पर भी छोड़ना है और पापा की दवाई का भी वक्त हो रहा है. इस वक्त उस की आवाज और जिंदगी की बेबसी घायल की गति घायल ही जाने वाली तर्ज पर कोई गृहस्थ ही समझ सकता है. ऐसा लगता है मानो कश्मीर की हसीन वादियों में विचर रहे उस लाचार पुरुष को उठा कर सीधे यूपी के गोंडा शहर में ला कर छोड़ दिया गया हो.
अकेले रहना एक नेमत है जो भाग्यवाग्य से नहीं बल्कि कोशिश और दिलेरी से मिलती है. दुनियाजहांन की नश्वरता छोड़ पाने की कूवत किसी ऐरेगैरे में नहीं हो सकती. यह उसी मर्द में हो सकती है जो स्वार्थी रिश्तेनातों और मोहमाया के फंदों को काट चुका होता है. अकेला आदमी मेहनती और स्वावलंबी होता है जो सुबह की चाय के लिए अलालों की तरह बिस्तर पर पड़ा किसी मांबहन या बीवी का मुहताज नहीं होता.
निडरता भी अकेले आदमी में ही पाई जाती है जो वह भूतप्रेतचुड़ैलपिशाचों के अस्तित्व को नकारता आधीआधी रात तक जाग कर तनहाई को मात देता रहता है. वह जय हनुमान ज्ञान गुण सागर…नुमा भूत भगाऊ दोहेचौपाई नहीं पढ़ता. यह और बात है कि इस चक्कर में वह महीनेभर का डाटा दोतीन रातों में ही खत्म कर फिर से मोबाइल रिचार्ज करवाता रहता है. सो, टैलीकाम कंपनियों के आर्थिक विकास में उस का योगदान किसी कर्ण से कम नहीं होता.
वह समझौतावादी और संयमी भी होता है. रातभर लिहाफ को सीने से लगाए करवटें बदलता रहेगा पर क्या मजाल जो शादी कर चौबीसों घंटे बजने वाला ढोल गले में लटका कर दूसरों की तरह किलपता यह कहता फिरे कि इस से तो अकेले ही अच्छे थे, सुबहशाम की खिचखिच तो नहीं थी. यह ज्ञान चूंकि उसे दुकेले होने से पहले ही प्राप्त हो चुका होता है, इसलिए वह स्त्री दुख से खुद को वंचित ही रखता है. परिवार नियोजन में अगर किसी की सच्ची आस्था होती है तो वह अकेले रह रहे अघोषित ब्रह्मचारी में ही होती है.
आजकल ऐसे फर्जी ब्रह्मचारी, जो संगठित रहते हैं, ही राष्ट्रवादी होते हैं जिन का घोषित मकसद देश की तरक्की और उस को विश्वगुरु बनाना होता है जबकि अघोषित मकसद धार्मिक एजेंडा होता है. उन का फलसफा बड़ा नेक होता है कि तुम शादी करो, बालबच्चे पैदा करो, देश की आबादी बढ़ाओ, घरगृहस्थी के झंझटों में पड़ो. उस पर धर्म की दुकान हम चलाएंगे. चूंकि हम देश को खुशहाल बनाना चाहते हैं इसलिए तुम्हें दुखों में डाल कर, दुख दूर करने के टोटके बता कर देश को हम हांकेंगे. अकेला आदमी वास्तविक और नास्तिक संत होता है. उस की नजर में दुनियादारी में पड़े लोग कीड़ेमकोड़ों की तरह होते हैं जो दुख को ही सुख समझने की गलतफहमी पाले दुनिया को बायबाय कर जाते हैं. वे जिंदगीभर सुख और मौज का भोग ही नहीं कर पाते.
अकेला आदमी ही चाहता है कि देश वाकई में खुशहाल हो और तरक्की करे, इस के बेहतर उदाहरण यूरोपियन और नार्डिक देश हैं जहां अकेलों की तादाद दिनोंदिन बढ़ रही है. इसलिए ये देश खुशहाली के इंडैक्स पर टौप पर रहते हैं.
दुनियाभर के देशों के सांखियकीय कार्यालयों सहित आर्गनाइजेशन फौर इकोनौमिक कोऔआपरेशन एंड डैवलपमैंट यानी ओईसीडी और संयुक्त राष्ट्र आर्थिक आयोग फौर यूरोप जैसी एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि नार्वे में 45.8 फीसदी लोग अकेले रहते हैं. डेनमार्क में 44.1 फीसदी, फिनलेंड में 43 फीसदी और स्वीडन में 42.5 फीसदी लोग अकेले रहते हैं. ये वे देश हैं जो खुशहाली के अलावा प्रति व्यक्ति आमदनी के मामले में भी टौप देशों में शुमार होते हैं.
यह लिस्ट बहुत लंबी है जो बताती है कि जरमनी में 41.7, एस्तोनिया में 40.3, नीदरलैंड में 36 और आस्ट्रिया में 33.5 फीसदी लोग अकेले रहते हैं. ये सभी देश हाई इनकम वाले हैं जबकि लो इनकम वाले देशों की लिस्ट में अफ्रीका और साउथ एशिया के देश नीचे से टौप पर हैं. वहां अकेले रहने वालों की औसत दर महज 4 फीसदी है. भारत में यह दर 4.2 के लगभग है. इन देशों की गरीबी, धार्मिक और सांप्रदायिक हिंसा सहित भ्रष्टाचार वगैरह किसी सुबूत के मुहताज नहीं.
जाहिर है, अकेले रहने वाले चाहे वे 4 हों या 40 फीसदी, जहां भी हों हर तरह की दरिद्रता से मुक्त रहते हैं. वे दूसरों के दबाव में फैसले लेने को मजबूर नहीं होते और वही वास्तविक सभ्य शहरी भी होते हैं. जो जरूरत से ज्यादा न किसी की जिंदगी में दखल देते और न ही अपनी जिंदगी में लेते. न काहू से दोस्ती न काहू से बैर की तर्ज पर जीने और रहने वाले अकेले लोग आमतौर पर मस्तमौला होते हैं. जिस ने अकेले रहने का चैलेंज स्वीकार लिया उस के लिए जिंदगी मुश्किल नहीं रह जाती.
न जाने क्यों अपने देश में अकेलापन बदनाम है. अकेले आदमी को किराए का मकान तक मिलने में दुश्वारियां झेलने पडती हैं. समाज उसे उसी निगाह से देखता है जैसे सब्जी विक्रेता सब्जी मंडी में घूमते छुट्टे सांड को देखते हैं. अकेले आदमी के कैरेक्टर पर भी शक किया जाता है. उसे पारिवारिक व सामाजिक मान्यता नहीं मिलती. दरअसल, ये पूर्वाग्रह उन जिम्मेदार लोगों ने रचेबुने हैं जो जिंदगीभर गृहस्थी की गाड़ी में बैल की तरह जुते रहते हैं. इन से अकेलों का सुख और मौज बरदाश्त नहीं होती. और अगर वह महिला हो तो उस का राह चलना दूभर कर दिया जाता है.
लेकिन, अच्छी बात यह है कि अब अकेली युवतियों की तादाद भी बढ़ रही है जो धर्म और समाज की परवा किए बगैर माई लाइफ का नारा बुलंद करते अनिरुद्धाचार्यों से ले कर कुमार विश्वासों तक को ठेंगा दिखा रही हैं जो औरत को आजाद देखने भर से तिलमिला उठते हैं. ये धर्मगुरु और सैमी धर्मगुरु रूढ़ियों, परंपराओ और अंधविश्वासों के स्वयंभू गार्जियन बने बैठे अपना पेट पाल रहे हैं. Single Life Benefits





