Noida techie death : नोएडा सेक्टर-150 में हुए दर्दनाक हादसे ने सिर्फ एक युवा सौफ्टवेयर इंजीनियर की जान नहीं ली, बल्कि एक पूरे परिवार की दुनिया उजाड़ दी. इस हादसे के बाद से हर गुजरते दिन के साथ सवाल गहराते गए कि लापरवाही किस की थी, जिम्मेदारी कौन लेगा और क्या दोषियों पर सच में कार्रवाई होगी?
नोएडा के सेक्टर-150 में 27 वर्षीय सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत कोई “दुर्घटना” भर नहीं है; यह उस शासकीय उदासीनता, प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही के सन्नाटे का परिणाम है, जो वर्षों से शहर की सड़कों पर पसरा हुआ है. चमकते बिल्डर ब्रोशर, स्मार्टसिटी के दावे और हाई एंड इंफ्रास्ट्रक्चर के नारों के बीच एक युवा इंजीनियर की जान चली गई और हमेशा की तरह सवाल हवा में तैरते रह गए. यह हादसा बताता है कि दिल्ली एनसीआर में तेजी से फैलती शहरीकरण की कहानी में सुरक्षा, निगरानी और मानवीय संवेदनशीलता को कितनी बेरहमी से हाशिए पर धकेल दिया गया है.

सेक्टर-150 में युवराज की जान सिर्फ एक गड्ढे ने नहीं ली, बल्कि उन जिम्मेदारियों ने ली है जो दशकों से फाइलों में दफन हैं. कितने दुःख की बात है कि जब शहर का एक होनहार इंजीनियर एक गैरजिम्मेदार बिल्डर द्वारा खोदे गए गड्ढे में भरे पानी में डूब रहा था, तब नोएडा पुलिस, फायर ब्रिगेड की गाड़ियां और आपदा प्रबंधन की टीम मौके पर मौजूद थी, मगर युवराज को बचाने के लिए पानी में कोई नहीं उतरा. उन के पास बहाने कई थे- पानी बहुत ठंडा है, हम में से किसी को तैरना नहीं आता, अंधेरा और कोहरा घना है, पानी के नीचे खड़ी सरियां हैं, कोई पानी में उतरा तो सरिया गड़ने का डर है, आदिआदि.

युवराज के पिता किनारे पर खड़े अपने बेटे को आंख के आगे धीरेधीरे पानी में अंदर डूबता हुआ देख रहे थे, अधिकारियों से उसे बचा लेने की मिन्नतें कर रहे थे, मगर वह नामर्द प्रशासन की भीड़ थी, जो बस युवराज की मौत का तमाशा देखने के लिए वहां आ जुटी थी. चश्मदीदों में कोई मर्द था तो वह डिलीवरी बौय, जो अंततः प्रशासनिक अधिकारियों की निर्लज्जता देख खुद कमर में रस्सा बांध कर उस पानी में कूद पड़ा और 30-40 मिनट तक उस अंधेरे में पानी के भीतर डूबे युवराज मेहता को ढूंढता रहा. अगर कुछ देर पहले वह युवराज तक पहुंच जाता तो शायद युवराज को जीवित निकाल लाता, मगर अफसोस, जब तक वह युवराज तक पहुंचा, युवराज के प्राणपखेरू उड़ चुके थे.

क्या है मामला?
युवराज मेहता रोजाना की तरह अपने औफिस से घर आ रहा था. कोहरा अधिक होने और उस खतरनाक 90 डिग्री के मोड़ पर कोई रौशनी न होने के कारण उस की कार टूटी सड़क पर अचानक उछल कर उस कई फुट गहरे गड्ढे में भरे पानी में जा गिरी. यह गड्ढा एक एक बहुमंजिली इमारत खड़ी करने के इरादे से बिल्डर ने खुदवाया था और कई महीनों से यह ऐसे ही पानी से भरा हुआ था, और इस खतरे की तरफ से नोएडा पुलिस और नोएडा अथौरिटी में अपनी आंखें मूंद रखी थी. न तो वहां रौशनी की व्यवस्था थी, न खतरे से आगाह करने के लिए कोई बोर्ड लगाया गया था. नोएडा के सेक्टर–150 जैसे “प्राइम लोकेशन” में यदि बुनियादी सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हो रहा है तो बाकी जगहों का हाल समझा जा सकता है.
प्रशासन की लापरवाही का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इंजीनियर युवराज मेहता के साथ हुए दर्दनाक हादसे के कुछ दिन पहले ही उसी जगह से एक ट्रक भी फिसल कर पानी से भरे 70 फुट गहरे प्लाट में गिरने वाला था, मगर ट्रक का पहिया किनारे पर फंसने के कारण ट्रक आधा हवा में लटक गया. तब भी ट्रक ड्राइवर को सकुशल स्थानीय लोगों ने उतारा था. ट्रक हादसा भी कोहरे के चलते हुआ था.
वीडियो में साफ तौर पर कोहरा दिखाई दे रहा है, लेकिन वहां कोई साइनबोर्ड या बैरिकेडिंग उस हादसे के बाद भी नहीं लगाई गई. रात 12 बजे ट्रक फंसा और अगले चार घंटे तक वहीं फंसा रहा. ये तो ट्रक ड्राइवर गुरविंदर सिंह की किस्मत अच्छी थी कि उस की जान बच गई. ट्रक ड्राइवर का कहना था कि 2-3 पुलिसकर्मी वहां आए तो थे लेकिन मदद नहीं मिली. नोएडा प्राधिकरण और पुलिस अधिकारियों की लापरवाही का सबूत यह कि ट्रक हादसे वाले दिन के वीडियो फुटेज में पुलिस दिखाई दे रही है. मगर उन्होंने किया कुछ नहीं. मगर अगले दिन दोपहर में नोएडा अथौरिटी की टीम आई और उल्टा ड्राइवर गुरविंदर सिंह को धमका कर बोली- इस टूटे नाले की मरम्मत का पैसा कौन देगा? ये है योगी प्रशासन की संवेदनशीलता. 31 दिसंबर की देर रात ट्रक के टकराने की वजह से ही किनारे की दीवार टूट गई थी. अगर नाले की उस दीवार की समय रहते मरम्मत कर दी गई होती तो युवराज मेहता के साथ हुआ जानलेवा हादसा टाला जा सकता था.
युवराज की मौत का असली गुनहगार?
हर दुर्घटना के पीछे कारण होते हैं – खुले गड्ढे, अधूरे काम, अपर्याप्त साइन बोर्ड, खराब लाइटिंग, टूटी सड़कों की मरम्मत में देरी और सड़कोंमोड़ों पर उपस्थित खतरे के प्रति कोई आगाह करने वाला संदेश न लिखा जाना. सवाल यह नहीं कि युवराज मेहता के साथ क्या हुआ, असल सवाल यह है कि क्यों हुआ? सवालों की जद में नोएडा प्राधिकरण और नोएडा पुलिस है. सवाल यह कि क्या क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्यों की नियमित सुरक्षा औडिट होती थी? क्या चेतावनी संकेत, बैरिकेडिंग और रात की रोशनी पर्याप्त थी? और अगर नहीं, तो इस की जिम्मेदारी किस की है? कौन है युवराज की मौत का असली गुनहगार? क्या सिर्फ वो अकेला बिल्डर जिस ने गड्ढा खोद कर छोड़ दिया?
इन सवालों के जवाब सीधे नोएडा प्राधिकरण के उन अफसरों तक जाते हैं, जिन के हस्ताक्षर फाइलों पर हैं, जिन की निगरानी में ठेके दिए जाते हैं और जिन की जिम्मेदारी में सड़कें, फुटपाथ और सार्वजनिक स्थल बनते हैं. सवाल यह है कि जब बजट करोड़ों का है तो सुरक्षा के इंतजाम शून्य क्यों हैं? सवाल यह भी कि जब घटनास्थल पर बचाव और राहत टीमें मौजूद थीं और युवराज न सिर्फ जीवित था बल्कि अपनी कार के ऊपर खड़ा हो कर लगातार अपने मोबाइल फोन की टौर्च जला कर मदद के लिए चीख रहा था, तो रैस्क्यू में देरी क्यों हुई? और सब से बड़ा सवाल यह कि इतनी बड़ी लापरवाही के बाद भी किसी अफसर पर योगी सरकार की गाज अब तक क्यों नहीं गिरी?
नोएडा अथौरिटी के सीईओ लोकेश एम. जिन पर शहर के रखरखाव और ब्लैक स्पौट्स को खत्म करने की जिम्मेदारी है, उन्हें अब तक तलब क्यों नहीं किया गया? लोकेश एम से पूछा जाना चाहिए कि क्या वे कभी अपने शानदार एसी दफ्तरों से बाहर निकल कर शहर के हालात से दोचार होते हैं?
शहर में ट्रैफिक से ले कर फायर और सुरक्षा तक संभालने की जिम्मेदारी पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह की है. नोएडा प्राधिकरण के साथ तालमेल बिठा कर रिफ्लेक्टर और चेतावनी बोर्ड लगवाना पुलिस का काम था. मौके पर अंधेरा था और मौत का मुंह महीनों से खुला हुआ था, आखिर पुलिस को यह खतरा दिखाई क्यों नहीं दिया?
मौके पर पहुंची फायर ब्रिगेड की निकम्मी टीम तमाशबीन बनी रही और मरते हुए युवराज का वीडियो बनाती रही. जब वह डूब गया तो सीएफओ प्रदीप चौबे कहते हैं – टीम में किसी को तैरना नहीं आता था और हमारे पास इक्विपमेंट भी नहीं थे. कितना हास्यास्पद है कि हाईटेक नोएडा की हाईटैक फायर ब्रिगेड के पास किसी की जान बचाने के लिए एक नाव और एक लाइफ जैकेट तक नहीं थी. पर्याप्त समय होने पर भी अगर युवक को नहीं बचाया गया तो इस का मतलब है प्रबंधन ट्रेनिंग के नाम पर उत्तर प्रदेश में केवल खानापूर्ति होती है.

दुर्घटना या लापरवाही?
सब से बड़ा सवाल तो शहर की डीएम मेधा रूपम से पूछा जाना चाहिए जो जिले की डिजास्टर मैनेजमैंट हैड हैं. मगर इन की घड़ी तो इतनी सुस्त है कि ये घटना के चौथे दिन घटनास्थल पर पहुंची और एसडीएम तीसरे दिन. ये है योगी सरकार के प्रशासनिक तंत्र की हकीकत. इन तमाम जिम्मेदारों से अबतक कोई सवाल नहीं हुआ बल्कि मामले को ठंडा करने की कवायतों के साथ बिल्डर अभय कुमार को अरेस्ट कर जेल भेजने और दोएक और बिल्डरों को गिरफ्तार करने के बाद सब अपनेअपने खोल में दुबक गए हैं.
एक एसआईटी बना दी गई है. उस की रिपोर्ट आ जाएगी और शहर का हाल जस का तस बना रहेगा. हर बड़े हादसे के बाद वही रटीरटाई स्क्रिप्ट – जांच के आदेश, समिति का गठन, और कुछ दिनों बाद खामोशी. क्या कभी यह तय हुआ कि दोषी अधिकारी पर व्यक्तिगत कार्रवाई होगी? क्या कभी मुआवजे से आगे बढ़ कर प्रिवैंटिव एक्शन लिया गया, ताकि अगली जान बच सके? क्या सेक्टर–150 में चल रहे सभी कार्यों की सेफ्टी कंप्लायंस रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी? हादसे से पहले आखिरी निरीक्षण कब हुआ था, और किस अधिकारी ने किया? क्या जिम्मेदार अफसरों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी, या यह मामला भी “दुर्घटना” कह कर दफन कर दिया जाएगा?
खुलती सिस्टम की पोल
नोएडा को निवेश का हब बनाने की होड़ में विकास की रफ्तार तेज है, पर सुरक्षा की चाल बेहद सुस्त. स्मार्ट सिटी का दावा तब खोखला लगता है, जब स्मार्ट लाइटिंग, सुरक्षित फुटपाथ, स्पष्ट साइनज और समयबद्ध मरम्मत जैसी बुनियादी चीजें गायब हों. विकास का असली पैमाना ऊंची इमारतें नहीं, सुरक्षित नागरिक जीवन है. नोएडा में अक्सर ठेकेदार बदल जाते हैं, अफसर ट्रांसफर हो जाते हैं, लेकिन सिस्टम वही रहता है, जहां जवाबदेही फाइलों के बीच गुम हो जाती है. युवराज की मौत ने इसी सिस्टम की पोल खोली है.
युवराज मेहता के परिवार के लिए न्याय का अर्थ सिर्फ आर्थिक सहायता नहीं है. न्याय तो तब होगा जब दोषियों की पहचान होगी, कार्रवाई होगी, और शहर में ऐसी परिस्थितियां दोहराई नहीं जाएंगी. न्याय तब होगा जब नोएडा प्राधिकरण यह मानेगा कि शहर का हर नागरिक उसकी जिम्मेदारी है और हर लापरवाही की कीमत किसी की जिंदगी हो सकती है.
युवराज की मौत हमें एक कड़वी सच्चाई से रूबरू कराती है कि प्रशासनिक लापरवाही जानलेवा हो सकती है. यह घटना एक चेतावनी कि अगर आज भी जिम्मेदार अफसर कटघरे में नहीं आए, अगर आज भी जवाबदेही तय नहीं हुई तो अगली खबर फिर किसी और युवराज की होगी. Noida techie death





