Marriage Impact on Women : औफिस में कितने घंटे बैठना है, फील्ड वर्क करना चाहिए या नहीं, देर तक रुकना ठीक है या नहीं, यहां तक कि घर से बाहर कब और क्यों निकलना है इन सब पर पति और परिवार के सदस्य नियम तय करने लगते हैं. धीरेधीरे यह आजादी सिकुड़ती चली जाती है और महिला, जो कल तक आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी थी, आज अपनी ही जिंदगी के फैसलों के लिए सफाई देने को मजबूर हो जाती है.
राजेश प्राइवेट नौकरी में था. छह महीने या साल भर से ज्यादा कहीं टिक नहीं पाता था. उस की शादी जब रोमा से हुई थी तो राजेश सहित उस का पूरा परिवार बहुत खुश था. रोमा ने नर्सिंग की डिग्री ली हुई थी और वह एक सरकारी अस्पताल में काम कर रही थी. शादी के बाद रोमा ने नौकरी नहीं छोड़ी. दरअसल ससुराल वालों की तरफ से नौकरी छोड़ने का कोई दबाव उस पर नहीं आया. वजह यह कि उस की सैलरी राजेश की सैलरी से तीन गुना थी, लिहाजा सासससुर ने बहू को सिर आंखों पर रखा. शुरू के 2 साल तो आराम से निकल गए. बहू की तनख्वाह का हिसाबकिताब ससुर जी रखने लगे, हालांकि बेटा कितना कमाता है और कहां उड़ाता है, यह पूछने की हिम्मत उन की कभी नहीं हुई.

दो साल बाद जब रोमा मां बनी तो उस की जिम्मेदारियां बढ़ गईं. पति से भी कुछ अपेक्षाएं बढ़ीं. सुबह अगर वह किचन में सब के लिए जल्दीजल्दी नाश्ताखाना बना रही है तो आशा करने लगी कि राजेश उस दौरान बच्चे की देखभाल करे. मगर राजेश की तो नींद ही नहीं खुलती थी. बच्चा रोता, कपड़े गीले करता तो राजेश का पारा चढ़ जाता और वह बारबार रोमा को आवाजें लगाता. 3 महीने की लीव के बाद जब रोमा ने दोबारा अस्पताल जाना शुरू किया तो यह कह कर उस को बच्चा साथ ले जाने के लिए मजबूर किया गया, कि उस को हर 3 घंटे पर मां का दूध मिलना चाहिए.
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