Judicial Dilemma Story : कठघरे में खड़ी थी ईशरी, इलजाम था 2 लोगों के कत्ल का. उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया था लेकिन उस की पूरी कहानी सुन कर जज भी कोई फैसला नहीं कर पा रहे थे.
‘‘ई शरी, तुम पर इलजाम है कि तुम ने बिशन सिंह और काला सिंह का कत्ल किया है. क्या तुम अपना जुर्म कुबूल करती हो?’’
‘‘हुजूर, मैं ने कत्ल किए हैं, यह तो मुझे कुबूल है लेकिन मैं इस को जुर्म नहीं मानती.’’
‘‘तुम्हारा कोई वकील?’’
‘‘हुजूर, न मेरे पास वकील करने लायक पैसे हैं, न मैं चाहती हूं कि कोई वकील मेरी मदद को आए.’’
‘‘तुम चाहो तो अदालत तुम्हें वकील मुहैया करा सकती है.’’
‘‘माईबाप, आप इतने मेहरबान हैं तो धीरज धर कर मेरी पूरी बात सुन लीजिए, उस के बाद आप को जो फैसला लिखना है, लिख लीजिए.’’
‘‘हां कहो, क्या कहना है,’’ यह कह कर जज ने कुरसी की पीठ पर अपना शरीर ढीला छोड़ दिया और ईशरी की ओर देखने लगा.
‘‘हुजूर, 25 साल पहले मेरे बापू बिशन सिंह के पिता सरदारा सिंह के पास खेत मजदूरी का काम करता था. मेरी मां उस के घर पर काम करती थी. एक बार सरदारा सिंह की पत्नी अपने बच्चों को साथ ले कर अपने मायके गई हुई थी. सरदारा सिंह के 3 मित्र कहीं बाहर से आ गए. हमारी बिरादरी का बीरू भी उन के घर पर गायभैसों की देखभाल का काम करता था. बीरू और मेरी मां को मेहमानों की सेवा करने पर लगा दिया गया.
‘‘उन चारों ने बैठ कर खूब शराब पी. बीरू और मां ने उन के लिए मुरगा भूना, उन के लिए रोटी पकाई. मेरी मां जूठे बरतन उठाने के लिए अंदर गई तो सरदारा सिंह ने उचक कर उस की बांह पकड़ी और उस को चारपाई पर गिरा लिया. मेरी मां ने बहुत हाथपांव जोड़े, मिन्नत की, अपनी इज्जत का वास्ता दिया, अपने शादीशुदा और एक बच्ची की मां होने की दुहाई दी लेकिन उस की एक न चली. मां ने वहां से भाग निकलने की भरपूर कोशिश की. इस कोशिश में उस के कपड़े तारतार हो गए.
‘‘अपने हाथों से अपनी नंगी छातियां ढकती हुई वह बारबार वहां से भाग खड़े होने की कोशिश करती रही लेकिन कामयाब न हो सकी. आठ हाथ एकसाथ उस के शरीर को नोंच रहे थे. वह दहाड़ें मार कर रोई लेकिन सिवा बीरू के, वहां उस की सुनने वाला कोई न था. बीरू नीची जात का बेबस मजबूर, उन का नौकर, उन के टुकड़ों पर अपना परिवार पालने वाला नाली का कीड़ा जैसा था. उस की हैसियत ही क्या थी. वह देखता रहा बर्बरता का नंगा नाच. चारों ने बारीबारी से मेरी मां का रेप किया और फिर शराब के गिलास भर लिए.
‘‘अपनी लुटी हुई इज्जत और फटे हुए कपड़े ले कर मां उन के कमरे से बाहर निकली तो उस को समझ नहीं आ रहा था कि घर जा कर अपने पति और अपनी बच्ची को क्या मुंह दिखाएगी. कुछ पल सरदारा सिंह के आंगन में खड़ी हो कर उस ने कुछ सोचा और उस के घर से निकल कर महल्ले के कुएं में छलांग लगा दी. बीरू में न मेरी मां के पीछे दौड़ कर उस को बचाने की हिम्मत थी, न हौसला. सवेरे महल्ले वालों ने मेरी मां की लाश बाहर निकाली और आत्महत्या का मामला बता कर लाश मेरे बापू के हवाले कर दी.’’
‘‘योर औनर…’’ कुछ कहने का प्रयास किया सरकारी वकील ने लेकिन हाथ के इशारे से मना कर दिया जज ने, कहा, ‘‘कहने दो इसे.’’
‘‘हुजूर, मैं उस वक्त 5 साल की थी. अपनी छाती पर पड़ा मनों बोझ हलका करने के लिए बीरू ने सारी कहानी मेरे बापू को सुनाई तो मैं ने सुन ली. मेरे तनबदन में आग लग गई. मैं ने कहा, ‘मैं सरदारा सिंह का खून पी जाऊंगी.’ लेकिन मुझे समझया गया कि हम नीची जात के लोगों की हैसियत नाली के कीड़ों की सी होती है. पिछले जन्म के कर्मों का फल है कि हम नीच जात में जन्म लेते हैं.
‘‘हमारे शरीर इन ऊंची जात के लोगों के लिए खिलौने हैं. वे जब चाहें, खेलें और जब चाहें किसी खिलौने को फेंक दें. कई दिन तक रोधो कर मैं ने मान लिया कि मां के साथ जो हुआ, वह उस के पिछले जन्मों के कर्मों का ही फल था. मैं 14 साल की हुई तो मुझे भी सरदारा सिंह के घर काम करने के लिए लगा दिया गया.’’
एक लंबी आह भर कर ईशरी ने आगे कहा, ‘‘20 साल बाद इतिहास ने अपने को दोहराया. गांव के बाहर सरदारा सिंह के खेत हैं. खेतों में मोटर लगी हुई है, जिस के ऊपर एक कमरा बना हुआ है. सरदारा सिंह के बेटे बिशन सिंह का मित्र काला सिंह कहीं बाहर से आया हुआ था. वह उसे ले कर मोटर वाले कमरे में चला गया. खेतों की रखवाली करने वाले भीमा ने कमरे में चारपाई बिछा दी और सामने तिपाई रख दी. तिपाई पर 2 गिलास और शराब की बोतल सजा दी. दोनों दोस्त बैठ कर गुलछर्रे उड़ाने लगे.
‘‘बिशन सिंह की मां ने मुरगा भूना, पापड़ भूने, रोटी सेंकी और टिफिन में डाल कर मुझ से कहा कि जा कर मोटर पर दे आऊं. मैं टिफन ले कर मोटर पर पहुंची तो दोनों को शराब खूब चढ़ी हुई थी. दोनों बारबार एकदूसरे को गले लगा कर चूमाचाटी कर रहे थे. जैसे ही मैं ने टिफिन तिपाई पर रखा, बिशन सिंह ने मेरा बाजू पकड़ कर मुझे चारपाई पर गिरा लिया. मैं ने अपने को छुड़ाने की बहुत कोशिश की लेकिन उन 2 राक्षसों के सामने मैं हार गई. फिर दोनों ने मेरा रेप किया और मुझ से कहा, ‘जा घर जा, रात बहुत हो गई.’
‘‘मैं मोटर वाले कमरे से बाहर निकली तो मैं ने निश्चय किया कि मैं अपनी लुटी हुई इज्जत ले कर न घर जाऊंगी, न किसी कुएं में कूद कर जान दूंगी. मैं ने भीमा से कहा, ‘तू तो हमारी जात का है, अपनी जबान बंद रख और मुझ को यहीं खेतों में छिप कर सो जाने दे.’ भीमा मान गया.
‘‘मैं गेहूं के खेत में जा लेटी. आधी रात तक इंतजार किया मैं ने. मोटर वाले कमरे में पड़ी कुल्हाड़ी मैं ने देख ली थी. शराब के नशे में गा कर, लहरा कर दोनों वहीं चारपाई पर गिर कर सो गए. मैं चुपके से कमरे में गई और कुल्हाड़ी उठा कर दोनों की गरदनें उड़ा दीं. उन के नापाक लहू से लथपथ कुल्हाड़ी ला कर मैं ने उसी कुएं में फेंक दी जिस में कूद कर 25 वर्ष पहले मेरी मां ने जान दी थी. यह मेरी श्रद्धांजलि थी अपनी मां को.’’
यह सब कहतेकहते हांफने सी लग गई ईशरी लेकिन वह थकी नहीं थी.
‘‘हुजूर, मैं ने कोई जुर्म नहीं किया. 2 राक्षसों का वध किया है. मुझे मालूम है कि आप मुझे फांसी की सजा सुनाएंगे. औरत की जिंदगी का तो अंजाम ही यही है, जनाब. अगर उस की इज्जत लूट ली जाए तो वह या तो मेरी मां की जैसी मौत मरती है या वह मौत मरती है जो आप मुझे देने वाले हैं. लेकिन हुजूर, मैं चाहती हूं कि रेप का शिकार होने वाली औरतों के जीवन में अगर यही अंजाम लिखा है तो वे मेरी मां की मौत न मरें, बलात्कारी की हत्या कर के फांसी के फंदे पर झलने को तरजीह दें.
‘‘सरकार, मेरे संबंधियों ने मुझ से कहा कि तुम अदालत में चुप रहना. इस घटना का न कोई चश्मदीद गवाह है, न कत्ल में इस्तेमाल किया गया हथियार ही बरामद हुआ है. लेकिन हुजूर, आप ने गीता पर हाथ रखवा कर मुझे सच बोलने की कसम दिलाई है तो मैं झठ क्यों बोलूं? आप अगर फांसी नहीं भी देंगे तो इज्जत लुट जाने के बाद मेरी जिंदगी मौत से क्या बेहतर होगी. मेरे जैसियों को मरने से बचाना है तो ऐसी घटनाओं को रोकिए, सरकार. मारना ही है तो कलम आप के हाथ में है, चलाइए और चला कर तोड़ दीजिए. बस, मुझे और कुछ नहीं कहना.’’
फटीफटी आंखों से ईशरी को देख रहे जज ने अदालत की कार्यवाही अगले दिन के लिए मुल्तवी कर दी.
“प्राइवेट पार्ट छूना, पाजामे का नाड़ा खींचना, रेप का प्रयास नहीं”
रेप की सही डैफिनेशन क्या है? किन हालात में कहा जा सकता है कि लड़की का रेप हुआ है क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुताबिक लड़की के ब्रैस्ट छूना और पाजामे के नाड़े को खींचना रेप या अटैम्प्ट टू रेप के मामले में नहीं गिना जा सकता लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को सिरे से नकार दिया है.
चीफ जस्टिस की बैंच ने कहा कि यौन अपराधों में खासकर जब इन में विक्टिम बच्चे हों तो कोर्ट को कैसे टिप्पणी करनी है और अपने फैसले को कैसे फ्रेम करना है, इस के लिए गाइडलाइंस बनाने की जरूरत है. हालांकि, यह कोई इकलौता मामला नहीं है जब कोर्ट की तरफ से ऐसी टिप्पणी सामने आई है.
यह घटना साल 2021 में एक नाबालिग लड़की के साथ हुई थी जब लड़की के ब्रैस्ट को दबाया गया, पाजामे का नाड़ा तोड़ा गया और उसे जमीन पर घसीटा गया था. कोर्ट का कहना है कि ये सभी बलात्कार करने की कोशिश के लिए काफी नहीं है. जब अदालतों से इस तरह के फैसले आते हैं तो आम लोगों को यही महसूस होता है कि कहीं न कहीं आरोपियों को बचाने की कोशिश हो रही है.
सवाल है कि अगर किसी महिला या नाबालिग के साथ जबरन बदसलूकी की जाए, उस के शरीर के अंगों को दबाया जाए या कपड़े उतारने की कोशिश की जाए तो क्या यह बलात्कार की नीयत नहीं दिखाता? क्या हम तब तक इंतजार करें कि असल में बलात्कार हो जाए, तभी जा कर बलात्कार या उस के प्रयास की धाराएं लगें?
ऐसी सोच और जवाबदेही का तरीका न सिर्फ आरोपियों को राहत देता है, बल्कि कहीं न कहीं उन का बचाव भी करता है, जो बिलकुल भी सही नहीं कहा जा सकता. Judicial Dilemma Story :





