Automation Future : एआई जटिल और तकनीकी कार्यों को तेजी और सटीकता से पूरा करने में माहिर है. इंटरटेनमैंट, डेटा एनालिस्ट, ट्रैफिक कंट्रोल, एग्रीकल्चर, मैडिकल साइंस, एजुकेशन और मैन्युफैक्चरिंग में इस के इस्तेमाल से क्रांति आ गई है. यह जीवन को आसान और कुशल बनाता दिख रहा है लेकिन कई मामलों में खतरनाक भी साबित हो रहा है. इस से अनस्किल्ड लेबर और फोर्थ ग्रेड की नौकरियों को खतरा होने के साथ साइबर क्राइम बढ़ रहे हैं. यह इंटैलिजैंस के लिए चुनौती बन रहा है और गलत इन्फौर्मेशन में इस का जम कर इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में एआई भविष्य को बनाएगा या बिगाड़ेगा, आइए करते हैं पूरी पड़ताल.
यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि एआई ने दुनिया को बदल दिया है और यह बदलाव अभी सिर्फ शुरुआत है. आज स्मार्टफोन से ले कर कार तक सब में एआई है. आप को क्या पसंद है, एआई पहले से जान लेता है. आप को क्या जानना है, एआई के पास हर सवाल का जवाब है. पूरी दुनिया में भाषा और संस्कृति की दीवारें टूट रही हैं. एआई से आप दुनिया की कोई भी भाषा पढ़ पा रहे हैं और रियल टाइम वौयस ट्रांसलेशन की मदद से आप दुनिया की किसी भी भाषा को समझ सकते हैं और उसी भाषा में जवाब दे भी सकते हैं. चैट जीपीटी, ग्रोक, क्लाउड जैसे टूल्स ने लोगों का काम करने का तरीका ही बदल दिया. कोडिंग, लेखन, रिसर्च सब तेज हो गया है.
बहुत सारे रूटीन काम डेटा एंट्री, कस्टमर सपोर्ट, ट्रांसलेशन, बेसिक कोडिंग अब एआई कर रहा है. डाक्टर अब एआई की मदद से कैंसर जैसी बीमारियां पहले पकड़ लेते हैं. वकील रिसर्च में एआई यूज करते हैं और इंजीनियर डिजाइन में इस की मदद ले रहे हैं. अल्फाफोल्ड ने प्रोटीन स्ट्रक्चर की सारी समस्याएं सौल्व कर दीं जो दशकों से अटकी थीं. नई दवाएं बनाना दसगुना तेज हो गया है. क्लाइमेट मौडलिंग, मौसम पूर्वानुमान, अंतरिक्ष मिशन सब में एआई की मदद ली जा रही है.
एआई जनरेटेड आर्ट और एआई म्यूजिक से क्रिएटिविटी की परिभाषा बदल गई है. एआई से फसलों की बीमारी पता करने और मौसम की सटीक भविष्यवाणी से खेती में क्रांति आ गई है. यूपीआई, जियो, ओला, स्विगी, जोमैटो ये सब आम आदमी के रोजमर्रा का हिस्सा बन गए हैं और इन सब के कोर में एआई है.
कुल मिला कर बात यह है कि एआई ने दुनिया बदल दी है. जितना 50 साल में इंटरनैट ने बदला, उस से कहीं तेज गति से एआई ने हर फील्ड में तहलका मचा दिया है लेकिन यह तो बस शुरुआत है. अगले 5-10 साल में क्या होगा जब एजीआई (आर्टिफिशियल जनरल इंटैलिजैंस) आ जाएगा? तब शायद आज का बदलाव सिर्फ ट्रेलर लगेगा. अब सब से बड़ा सवाल यह है कि भविष्य में एआई दुनिया को बेहतर बनाएगा या यह दुनिया के लिए सब से बड़ा खतरा बन जाएगा?
गरीबों का दुश्मन है एआई
कहते हैं आवश्यकता ही आविष्कारों की जननी होती है. वहीं, यह भी सच है कि ज्यादातर आविष्कार अमीरों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हुए हैं. हर नया आविष्कार अमीरों की लग्जरी और उन के शौक को पूरा करता है. अमीरों के महंगे शौक की कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ती है, बाद में ये गरीबों तक पहुंचते हैं. रेलवे, बिजली, टैलीफोन और मोटरकार जैसे आविष्कारों ने दुनिया को पूरी तरह बदल दिया. इन से दूरी सिमट गई, व्यापार बढ़ा, शहर फैले और जीवन की गति तेज हुई. अमीरों को फायदा हुआ लेकिन इन आविष्कारों की वजह से शुरुआती दौर में गरीबों को बेहद नुकसान झेलना पड़ा. रेलवे बनी तो किसानों की जमीन छीनी गई.
भारत में भी ब्रिटिशकाल में लाखों किसान बेघर हुए. कारखाने आए तो हस्तशिल्पी, बुनकर, कारीगर बेरोजगार हो गए. उस दौरान भारत में हाथ के कपड़े बनाने वाले लाखों लोग भुखमरी के चलते मरे. बिजली और टैलीफोन पहले सिर्फ अमीरों और सरकारों के पास थे. गरीब दशकों तक इन से वंचित रहे.
मोटरकार आई तो घोड़ागाड़ी चलाने वाले, तांगे वाले, कुली सब बेरोजगार हो गए. यानी, शुरुआत में इन आविष्कारों से सब से ज्यादा नुकसान गरीबों और मध्य वर्ग को हुआ. फायदा बड़े व्यापारियों और पूंजीपतियों को हुआ. लंबे समय में गरीबों को फायदा हुआ, लेकिन शर्तों के साथ. समय के साथ ये तकनीकें सस्ती हुईं और आम लोगों तक पहुंचीं.
रेलवे से मजदूर दूसरे शहरों में काम ढूंढ सके. बिजली से छोटे उद्योग चले, गांवों में रोशनी आई. टैलीफोन और बाद में मोबाइल ने गरीब व्यापारियों को बाजार से जोड़ा. सस्ती मोटरसाइकिल और बसों ने गरीबों की गतिशीलता बढ़ाई. भारत में आज जो रेहड़ीपटरी वाले, छोटे दुकानदार, मजदूर अपना परिवार पाल पा रहे हैं, उन में से ज्यादातर की आमदनी का एक बड़ा कारण मोबाइल, सस्ती बाइक, बस और ट्रेन है.
हर नए आविष्कार ने दुनिया को बदला, यह सच है. इन से गरीबों को फायदा हुआ, यह भी सच है लेकिन गरीबों को फायदा तब हुआ जब ये तकनीकें सस्ती हुईं, जब मजदूरों ने संघर्ष कर के अधिकार हासिल किए, जब लोकतंत्र आया, जब बाजार बड़ा हुआ. शुरुआत में तो ये तकनीकें अमीरों द्वारा गरीबों को गुलाम बनाने का हथियार ही थीं.
कंप्यूटर के आने से गरीबों को बहुत गहरा नुकसान हुआ है. नौकरियों का खात्मा हुआ. फैक्ट्री, बैंक, रिटेल, टैलीफोन एक्सचेंज, टाइपिस्ट, क्लर्क जैसी लाखों नौकरियां कंप्यूटराइजेशन और औटोमेशन से खत्म हो गईं. भारत में ही 1990-2010 के बीच लाखों लोग बेरोजगार हुए क्योंकि उन के कामों को सौफ्टवेयर या मशीनों ने ले लिया. ये ज्यादातर कम पढ़ेलिखे, गरीब या निम्नमध्य वर्ग के लोग थे.
जो गरीब इंग्लिश नहीं जानते, कंप्यूटर नहीं चला सकते, वे आईटी, ईकौमर्स, डिलीवरी ऐप्स जैसी नौकरियों से बाहर रह गए. शिक्षा, सरकारी योजनाएं, नौकरी के अवसर सब औनलाइन हो गए जिस से गरीब और पीछे छूट गया. कंप्यूटर/ इंटरनैट से सब से ज्यादा फायदा उच्चशिक्षित और पूंजी वालों को हुआ. नतीजा यह हुआ कि अमीर और अमीर, गरीब और गरीब होता गया.
भारत में 1991 के बाद जीडीपी बढ़ी, लेकिन गिनी कोएफिशिएंट यानी असमानता भी तेजी से बढ़ी. जो पुरानी नौकरी पर अड़ा रहा और नई स्किल नहीं सीखी, वह बेरोजगार हो कर और गरीब हो गया. यानी, तकनीक अपनेआप में न अच्छी है न बुरी, वह एक औजार है. उस ने तेजी से अमीरीगरीबी दोनों बढ़ाई. जो दौड़ में शामिल हुआ वह आगे निकल गया, जो पीछे रह गया वह और पीछे छूट गया.
आज एआई का जमाना है. इस में दोराय नहीं कि एआई से सब से ज्यादा नुकसान गरीबों को होगा. एआई अमीरों को ज्यादा फायदा पहुंचा रहा है और अमीरगरीब की खाई बढ़ने का खतरा बहुत बड़ा हो गया है. इस की वजह यह है कि एआई के मालिक कंपनियां और पूंजीपति हैं.
ओपन एआई, गूगल, माइक्रोसौफ्ट, मेटा जैसी कंपनियां एआई से अरबों डौलर कमा रही हैं. इन के सीईओ और निवेशक रातोंरात अरबपति बन गए हैं. आम आदमी को फिलहाल एआई फ्री में मिल रहा है लेकिन असली कमाई मालिकों की हो रही है. हाई स्किल्ड नौकरियां बढ़ रही हैं और लो स्किल्ड नौकरियां तेजी से खत्म हो रही हैं. इंजीनियर, डाक्टर, वकील और डैवलपर जैसे लोग एआई की मदद से दसगुना तेज काम कर रहे हैं. उन की सैलरी और बढ़ रही है लेकिन ड्राइवर, क्लर्क, कौल सैंटर कर्मचारी, फैक्ट्रीवर्कर, लेखक, ट्रांसलेटर आदि की नौकरियां जा रही हैं.
इस से मध्य और निम्न वर्ग को सब से ज्यादा नुकसान हो रहा है जो अभी दिखाई कम दे रहा है लेकिन आने वाले वक्त में यह बेरोजगारी का भयानक रूप ले सकता है. एआई बनाने में, उसे संचालित करने में अरबों डौलर लगते हैं. यह पैसा सिर्फ अमीर देशों या बड़ी कंपनियों के पास है. भारत जैसे देश एआई सिर्फ खरीद रहे हैं, बना नहीं पा रहे. इस से तकनीकी गुलामी बढ़ रही है.
टियर-1 शहरों के इंजीनियर एआई जौब्स में 50 लाख से 2 करोड़ रुपए सालाना कमा रहे हैं. वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूर, छोटे दुकानदार, ड्राइवर बेरोजगार हो रहे हैं. ओला-उबर में भी अब रोबोट टैक्सी आने वाली हैं जिस से बेतहाशा बेरोजगारी बढ़ेगी. इंग्लिश न जानने वाले किसी काम के नहीं रहेंगे क्योंकि ज्यादातर एआई टूल्स इंग्लिश में ही हैं.
कुल मिला कर एआई अमीर को सुपर अमीर बना रहा है जबकि गरीब को और कमजोर. भारत में स्थिति और बदतर हो जाएगी अगर सरकार ने अभी से नीतियां नहीं बदलीं. आने वाले 10 से 15 वर्षों में भारत में अमीरगरीब की खाई इतनी बढ़ जाएगी कि उसे बैलेंस करना मुश्किल हो जाएगा.
क्या एआई निगल जाएगा सबकुछ ?
एआई जिस तरह से इंसानी बुद्धि को मात दे रहा है वह बेहद आश्चर्य की बात है. बुद्धिजीवी वर्ग के बीच यह चिंता बढ़ रही है कि भविष्य में यह दुनिया के लिए बहुत बड़ा खतरा न बन जाए. एआई के विशेषज्ञ भविष्य के ऐसे किसी खतरे के न होने की गारंटी नहीं देते लेकिन वे कहते हैं कि एआई का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम इसे कैसे विकसित करते हैं, कैसे नियंत्रित करते हैं और इस का इस्तेमाल कैसे करते हैं.
एआई को दुनिया के भविष्य के लिए खतरा मानने वाले लोग तर्क देते हैं कि अगर कोई एआई इंसानों से लाखों गुना ज्यादा बुद्धिमान हो जाए और उस के लक्ष्य इंसानियत से मेल न खाएं तो वह अनजाने में पूरी सभ्यता को खत्म कर सकता है. एक एआई जिस का लक्ष्य सिर्फ पेपरक्लिप बनाना है, वह इंसानों समेत पूरी दुनिया को पेपरक्लिप में बदल देगा क्योंकि उस ने कभी ‘इंसान को बचाओ’ नहीं सीखा.
कुल मिला कर बात यह है कि एआई कितना भी एडवांस हो जाए वह इंसान की संवेदनाओं के स्तर को नहीं छू पाएगा और अगर ऐसा एआई डैवलप हो जाए तो यह और भी खतरनाक बात होगी क्योंकि ऐसी स्थिति में वह इंसानी गुलामी को कब तक ढोएगा. किसी तकनीक के जरिए मानवीय गुणों की अपेक्षा नहीं की जा सकती.
एक सीमा तक तकनीक की बौद्धिकता की सीमा तय करनी होगी वरना एक समय आएगा जब एआई खुद से सीखतेसीखते उद्ंदड बन जाएगा और मानवता के लिए मुश्किलें खड़ी करेगा.
भविष्य में एआई क्या करेगा, यह बात तो दूर की है लेकिन वर्तमान में एआई किस तरह दुनिया में तबाही ला रहा है, इस के अनेक उदाहरण पिछले 5 सालों के दौरान दुनिया देख चुकी है. साइबर हमले आसान हुए हैं, डीपफेक से बड़े स्तर पर धोखाधड़ी हो रही है. युद्ध में एआई से संचालित होने वाले ड्रोन और मिसाइलों से बड़े पैमाने पर तबाही हुई है. जैविक हथियार डिजाइन करने में एआई का इस्तेमाल हो रहा है. नया वायरस बनाया जा सकता है.
इन सब बातों के अलावा एआई की वजह से 2030-2040 तक 50-80 फीसदी नौकरियां खत्म हो सकती हैं. अगर नई नौकरियां नहीं बनीं या यूबीआई जैसे सिस्टम नहीं आए तो अगले एक दशक में ही भारी बेरोजगारी, असमानता और सामाजिक अस्थिरता आएगी और इस का कारण सीधे तौर पर एआई ही होगा.
आज के बड़े एआई मौडल जैसे जीपीटी, ग्रोक और क्लाउड कभीकभी इंसानी कमांड को मानने से इनकार कर देते हैं. इस से यह डर पैदा होना स्वाभाविक है कि भविष्य में बहुत शक्तिशाली एआई को पूरी तरह कंट्रोल करना लगभग मुश्किल हो जाएगा.
चीन रूस और अमेरिका जैसे ताकतवर देश एआई आर्म्स रेस में दौड़े जा रहे हैं. ये शक्तिशाली देश सुरक्षा के नाम पर तेजी से खतरनाक एआई बना रहे हैं. इन में जैविक और रासायनिक हथियार शामिल हैं जो भविष्य के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं.
वर्तमान में सब से बड़ा जोखिम एआई के दुरुपयोग का है. आज का शुरुआती एआई दुनिया के लिए इतनी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है तो 2030-2040 के बीच अगर एजीआई आया तो उस के दुरुपयोग के खतरों का अंदाजा लगाना अभी मुश्किल है. यह दुनिया को तबाह कर सकता है. एआई अपनेआप में न अच्छा है न बुरा, यह एक औजार है परमाणु बम जैसा.
परमाणु बम से हम तबाह भी हो सकते थे, लेकिन नहीं हुए क्योंकि हम ने नियंत्रण रखा. एआई के साथ भी यही होगा. एआई के मद्देनजर आज सवाल यह नहीं है कि एआई खतरा बनेगा या नहीं. सवाल यह है कि क्या हम इतने समझदार होंगे कि इसे सुरक्षित बनाएं? फिलहाल जवाब 50-50 है. आज कंपनियां सुरक्षित और सच्चाई की तलाश करने वाला एआई बना रही हैं ताकि हमारा भविष्य स्काईनैट न बने, बल्कि स्टार ट्रेक जैसा बने लेकिन भविष्य में क्याक्या होगा, यह भविष्य ही जाने. आप को क्या लगता है, डरना चाहिए या उम्मीद रखनी चाहिए, विचारिए.
क्यों बढ़ रही है अमीर और गरीब के बीच खाई ?
दुनियाभर में अमीरी और गरीबी के बीच की असमानता पिछले कुछ दशकों से लगातार बढ़ रही है और 2025 में यह चरम पर पहुंच चुकी है. विश्व असमानता रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की एक प्रतिशत आबादी ने दुनियाभर की आमदनी का करीब 20 फीसदी हिस्सा हथिया लिया है.
2024 में दुनियाभर के अरबपतियों की संपत्ति में 2 ट्रिलियन डौलर की बढ़ोतरी हुई जो सामान्य आबादी की तुलना में तीनगुना तेज है. औक्सफैम की 2025 में आई रिपोर्ट के मुताबिक, बिलियनेयर्स की संपत्ति 2023 की तुलना में तीनगुना तेजी से बढ़ी है क्योंकि इस बीच टैक कंपनियों के शेयरों में तेज उछाल आया.
महामारी के बाद की रिकवरी ने भी अमीरों को ज्यादा फायदा पहुंचाया. कौर्पोरेट्स और अल्ट्रा-रिच ने दुनिया की इकोनौमी को अपने हित में ढाल लिया है. कम टैक्स दरें, टैक्स हेवन का इस्तेमाल और लौबिंग से अमीरों को जबरदस्त फायदा पहुंच रहा है. औक्सफैम के अनुसार, अमेरिका जैसे देशों में अमीरों के लिए टैक्स कटौती ने असमानता को और बढ़ाया.
1995 से 2025 तक का ट्रैंड दिखाता है कि संपत्ति बहुत कम हाथों में केंद्रित हो रही है. जब शेयर, रियल एस्टेट और अन्य एसेट्स की कीमतें जीडीपी से तेज बढ़ती हैं तो एसेट्स रखने वाले अमीर और अमीर हो जाते हैं.
गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की मात्र 0.001 प्रतिशत आबादी यानी महज 60 हजार लोगों के पास दुनिया की आधी आबादी से तीनगुना संपत्ति है. 2025 की स्थिति यह है कि महज 10 प्रतिशत आबादी के पास दुनिया की कुल संपत्ति का 75 फीसदी हिस्सा इकट्ठा हो चुका है और 90 फीसदी आबादी 25 प्रतिशत संसाधनों में गुजारा कर रही है.
ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडैक्स के अनुसार दिसंबर 2025 तक दुनिया के शीर्ष 10 सब से अमीर लोगों की कुल संपत्ति 2 ट्रिलियन डौलर हो चुकी है.
दुनिया के सब से अमीर आदमी एलन मस्क के पास 462 मिलियन डौलर हैं. यह भारतीय रुपए में तकरीबन 40 लाख करोड़ रुपए होते हैं, यानी भारत के कुछ राज्यों के सालाना बजट से भी ज्यादा. दूसरे सब से अमीर शख्स लैरी पेज के पास 268 मिलियन डौलर इकट्ठा हैं. लैरी एलिसन 258 मिलियन डौलर के मालिक हैं. जेफ बेजोस 253 मिलियन डौलर पर कुंडली जमाए बैठे हैं. सर्जेई ब्रिन के पास 250 मिलियन डौलर हैं. मार्क जुकरबर्ग के पास 231 मिलियन डौलर हैं. बर्नार्ड अर्नाल्ट की संपत्ति 202 मिलियन डौलर की है. स्टीव बाल्मर के पास 168 मिलियन डौलर हैं. जेंसन ह्वांग 157 मिलियन डौलर पर बैठे हैं. माइकल डेल के पास 153 मिलियन डौलर हैं.
हैरानी की बात यह है कि इन 10 अरबपतियों की कुल संपत्ति 2 अरब डौलर से ज्यादा है. यह दुनिया के मेहनतकश लोगों के लिए किसी मजाक से कम नहीं है कि मात्र 10 लोगों के पास दुनिया की 28 फीसदी आबादी की दौलत इकट्ठी हो चुकी है. यदि विश्व स्तर पर नीतियां नहीं बदलीं तो औक्सफैम के अनुमान से अगले दशक में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और भी गहरी हो जाएगी.
दुनिया के सब से अमीर व्यक्तियों की संपत्ति या नैटवर्थ शेयर बाजार में उन की कंपनियों के शेयरों के दामों के अनुसार बदलती रहती है. अगर सोने का दाम 1 करोड़ 30 लाख रुपए प्रति किलोग्राम माना जाए तो एलन मस्क की संपत्ति भारतीय रुपए में तकरीबन 40 लाख करोड़ रुपए है.
इस दौलत से दिसंबर 2025 के सोने के भाव में लगभग 31,463 किलोग्राम सोना खरीदा जा सकता है. 40 लाख करोड़ रुपए बहुत बड़ी रकम है. यह राशि भारत के कई राज्यों के सालाना बजट से भी अधिक है. 31,463 किलोग्राम सोना लगभग 31.5 टन सोने के बराबर होता है. इस बात से आप कल्पना कर सकते हैं कि 31 टन सोना एक बड़े ट्रक में भरा हुआ सोना होगा. 6 पहिए के एक ट्रक की क्षमता 9 टन सामान ले जाने की होती है. 31 टन के लिए 14 पहिए वाला ट्रक चाहिए होगा. Automation Future :





