Hindi Family Story : विनीता ने अक्कू के लिए बनाए स्वेटर के हर फंदे के ऊन में अपना स्नेहदुलार बुना था. उस के जन्मदिन तक बुन कर तैयार स्वेटर पहन कर अक्कू दोस्तों के पास चला गया तो पीछे से घर में विनीता, दादी, पापा सब इंतजार में थे कि अक्कू स्वेटर की कितनी तारीफ बटोर कर लाएगा लेकिन उस ग्रे स्वेटर ने उस दिन सब बदल डाला.

वर्षों पहले गलीमहल्लों में बंदर के तमाशेवाला आया करता था. उस के पास एक बंदर और एक बंदरिया होते थे. वह बंदरिया से पूछता था : ‘सास का चरखा कैसे चलाएगी?’ इस के जवाब में बंदरिया धीरेधीरे अपना हाथ गोलगोल घुमाती; और जब तमाशेवाला बंदरिया से पूछता कि ‘अपना चरखा कैसे चलाएगी?’ अब की बार बंदरिया जल्दीजल्दी अपना हाथ गोलगोल घुमाती. तो, यों समझिए कि आजकल विनीता भी सास का चरखा ही चला रही थी. बल्कि सास तो अब रही नहीं थीं तो कह सकते हैं कि नियति का चरखा चला रही थी धीरेधीरे.

विनीता का सब काम अब धीरेधीरे ही होता था- सुबह आलस के साथ उठना, फिर? फिर मानो दिनभर कुछ नहीं करना क्योंकि हर काम के लिए नौकरचाकर थे. बस, एक काम जो वह बहुत उत्साह से करती थी वह था रात को आकाश के फोन का इंतजार.

आकाश- विनीता और शेखर का बेटा. पिछले कई वर्षों से अमेरिका में रह रहा है. वहां अच्छी नौकरी है और खूब पैसे भी घर भेजता था. दरअसल, विनीता और शेखर के घर के ये ठाटबाट, ये नौकरचाकर आदि सब आकाश के भेजे हुए पैसों से ही संभव हुआ वरना पहले तो ये ठाटबाट तो दूर, घर का खर्च भी मुश्किल से ही चल पाता था.

जब विनीता शादी हो कर आई थी तो घर में थे कुल 3 प्राणी- शेखर, जानकीजी- यानी शेखर की माताजी और विनीता. एक साल बाद ही आकाश आ गया था. इन सब का भरणपोषण करने के लिए थी शेखर की छोटी सी सरकारी नौकरी यानी उस की छोटी सी पगार. उसी छोटी सी पगार में घर का सारा खर्च चलाना होता था- आकाश की स्कूल की फीस, सास की दवाएं, घर का सौदा, तीजत्योहार पर ननदों को बुलानाचलाना और आम घरों के आम खर्चे.

शेखर की छोटी पगार को बढ़ाने के लिए विनीता सारा दिन खटती रहती. घर में तरहतरह के अचार, मुरब्बे, चटनियां बनाती; चाय के साथ नाश्ते के लिए तरहतरह की नमकीन बनाती; घर में परदे, तकिए, कुशन के कवर सिलती, सास के और अपने कपड़े भी सिलती. यानी, घर में मेड का तो सवाल ही नहीं. आम घरों में जो काम बाहर होते हैं वे सब भी घर में ही करती थी विनीता. पैसे बचाने के लिए इस के अलावा भी विनीता काफी मेहनत करती, जैसे वीकली बाजार घर से पैदल जाती और आती और वहां से हफ्तेभर के लिए सस्ती सब्जियां ले आती, सर्दी में सस्ती मेथी तोड़ कर सुखा लेती. जब आलू सस्ता होता तो घर पर ही आलू के चिप्स काट कर सुखा लेती, चावल की कचरी बनाती, तरहतरह की मिठाइयां भी घर पर ही बनाती. घर के लिए विनीता का यह समर्पण देख कर जानकीजी कहते न थकती थीं : ‘अरे, हमारी बहू तो सोना है सोना. इस के पैर में तो जैसे स्प्रिंग लगे हैं. उफ, कितना उत्साह है इस में. किसी की नजर न लगे.’ विनीता मुसकरा कर कह देती, ‘मांजी, आप भी तो सारा दिन मेरे साथ लगी रहती हैं. स्प्रिंग तो जैसे आप के पैरों में भी लगे हैं.’

देखते ही देखते समय बीतता गया और आकाश 15 साल का हो गया. इन 15 सालों के उस के दिन किसी आम बच्चे की तरह ही गुजरे-  बाकी हमउम्र बच्चों की तरह ही स्कूल जाता, पढ़ाई करता और शाम को दोस्तों के साथ खेलने जाता था. घर में सब का कहना मानता था. घर में दादी, मम्मी और पापा का बहुत दुलारा था जोकि अपनी हैसियत के अनुसार उस की हर इच्छा पूरी करते.

हैसियत, यह शब्द उस घर में किसी ने अभी तक कहा नहीं था क्योंकि अभी तक शायद किसी को इस बात का एहसास ही नहीं था कि उन की हैसियत बाकी लोगों से कम है. हैसियत के बारे में कोई क्यों सोचता जब उन के दिलों में पैसों की तंगी नहीं बल्कि त्याग की भावना रहती थी.

लेकिन उस दिन शाम को जब आकाश खेल कर घर वापस आया तो जैसे उस का पूरा व्यक्तित्व, उस की बोलचाल, उस के हावभाव आदि सबकुछ दर्शा रहे थे कि आज उसे अपनी हैसियत का एहसास हो चुका था.

जब वह शाम को खेल कर वापस घर आया, विनीता, शेखर और जानकीजी सभी उत्सुक थे यह जानने के लिए कि उस का ग्रे स्वेटर उस के दोस्तों को कैसा लगा. आखिर होते भी क्यों न उत्सुक क्योंकि उस के पीछे भी उन सब के एक और त्याग की एक छोटी सी कहानी थी.

असल में हुआ यह था कि एक दिन आकाश की फरमाइश हुई कि उसे एक नया स्वेटर चाहिए अपने जन्मदिन पर. नया स्वेटर. विनीता सोचने लगी, ‘आज महीने की 20 तारीख हो गई है, यानी महीना खत्म होने को है. पगार का दिन दूर है. तो ऐसे में इस फरमाइश को पूरी करने के लिए पैसे कहां से आएंगे? लेकिन बेटे के जन्मदिन के उपहार की बात थी, मना भी करें तो कैसे?’

शेखर जो घरखर्च के लिए पैसे देते थे, पिछले कई महीनों से उस में से थोड़ाथोड़ा बचा कर विनीता ऊन खरीद कर लाई थी ग्रे रंग का सास के स्वेटर के लिए क्योंकि उन के पास बाहर पहनने के लिए कोई अच्छा स्वेटर न था. सब पुराने हो गए थे और फट से भी गए थे और उस ऊन का तो सास के लिए स्वेटर बना भी दिया था. यानी, अब तो जमा पैसे भी खत्म हो गए थे. तो कहां से करें पैसों का जुगाड़ और किस से कहे यह सब?

लेकिन जिस घर में बिना कहे लोग एकदूसरे के मन की बात जान लेते हैं वहां किसी चीज की तंगी कैसे हो सकती है? जानकीजी ने मांबेटे के बीच की बात सुन ली थी. वे संदूक से अपना नया ग्रे रंग का स्वेटर ले आईं और विनीता के हाथ में थमाते हुए, नम आंखों लेकिन रोबीली आवाज में बोलीं, ‘अरी, मैं ने तो पहले ही कहा था, मेरे पास बहुतेरे स्वेटर हैं. थोड़े फट गए हैं तो क्या, उन्हें सिल लूंगी. और वैसे भी, मुझे कहां बाहर जाना होता है. ये ले, इसे उधेड़ कर ऊन धो लेना और अक्कू के लिए बना दे स्वेटर.’

अब आंखों में आंसुओं की बारी विनीता की थी, बोली, ‘मगर मांजी,’ उसे बीच में ही रोक कर जानकीजी बोलीं, ‘न, न. अगरमगर का समय नहीं है यह. मेरे पोते को पहनना है अपने जन्मदिन पर. समय थोड़ा रह गया है जन्मदिन तक का. ऐसा कर, जल्दी से ऊन धो डाल, फिर दोनों सासबहू मिल कर झटपट तैयार कर लेंगी स्वेटर.’’

उसी रात को विनीता ने ऊन उधेड़ा, उस की लच्छी बनाई और सुबहसुबह उसे धो कर सूखने को डाल दिया. शाम तक ऊन सूख गई और सासबहू जुट गईं स्वेटर बनाने में. शाम को जब शेखर औफिस से घर आते और देखते कि स्वेटर बनाने के चक्कर में रसोई अधूरी पड़ी है तो वे रसोई में हाथ बंटाते. इस तरह तीनों ने मिलजुल कर 4-5 दिनों में, यानी जन्मदिन तक, अपने अक्कू के लिए स्वेटर तैयार कर दिया.

जब आकाश ने अपने जन्मदिन पर वह ग्रे स्वेटर पहना तो जानकीजी, विनीता और शेखर के चेहरों पर बहुत ही प्यारभरी मुसकान थी. किसी के भी चेहरे को देख कर कोई यह नहीं कह सकता कि इन तीनों ने रातरातभर जाग कर काम किया है. थकान की जगह, तीनों के चेहरों पर प्रसन्नता की ऐसी चमक थी जैसे सैलून से फेशियल करवा कर आए हों.

सो, इसीलिए वे सब बेसब्री से इंतजार कर रहे थे कि कब अक्कू दोस्तों के साथ खेल कर आए और कब यह बताए कि दोस्तों ने कितनी प्रशंसा की उस के नए स्वेटर की. बस, दोस्तों की प्रशंसा ही इनाम बन जाता उन के पिछले दिनों के दिनरात के त्याग और परिश्रम का.

लेकिन जब जन्मदिन वाली शाम को अक्कू दोस्तों के साथ खेल कर घर वापस आया तो बोला, ‘मां, दादी, पापा, आप सब बहुत काम करते हो, इतनी मेहनत करते हो, देखना, मैं जल्दी ही खूब सारे पैसे कमाऊंगा ताकि आप सब को इतनी मेहनत न करनी पड़े. हम भी बाजार से ब्रैंडेड कपड़े खरीदेंगे, बाजार से खाना मंगवाएंगे. बस, मैं थोड़ा बड़ा हो जाऊं.’ और यह कह कर वह पढ़ने को बैठ गया.

अक्कू की ये बातें सुन कर विनीता, शेखर और दादी जैसे सन्न रह गए. तीनों एकदूसरे के चेहरे देखते रहे. तीनों के मन में एक ही सवाल कौंध रहा था- क्यों कह रहा था अक्कू ये सब? हम ने तो कभी भी एहसान नहीं जताया कि हम उस के लिए इतना करते हैं; जताते भी क्यों- यह तो हमारा कर्तव्य है. हमें प्यार है उस से, इसलिए करते हैं, इस में जताने या कहने की क्या बात है.

अक्कू अपनी दादी के बहुत करीब था. सो, रात में उसे अकेला देख कर दादी उस के पास गईं उस का मन टटोलने के लिए. बातोंबातों में पता चला कि जिस नए स्वेटर के लिए अक्कू समेत घर के सब लोग बड़े उत्साहित थे, उसे देख कर अक्कू के दोस्तों ने तारीफ करना तो दूर बल्कि यह कहा, ‘अरे, जन्मदिन पर भी ब्रैंडेड कपड़े नहीं मिले?’

और बस, दोस्तों के इसी तंज ने आकाश को यह एहसास दिलाया कि दुनिया में प्यार नहीं पैसे की कीमत है, पैसे की ही अहमियत है और पैसे से ही हैसियत है.

अब पैसे कोई पेड़ पर तो उगते नहीं, कि जाएं और तोड़ लाएं. अगर पेड़ पर भी उगते होते तो भी पहले पेड़ तो लगाना ही पड़ता और फिर फल का इंतजार करना पड़ता. तो बस, यही किया आकाश ने भी- इंतजार.

धीरेधीरे समय बीता और कुशाग्र बुद्धि वाले आकाश को इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिल गया. अब उस ने अपनी पढ़ाई के साथसाथ ट्यूशन का काम भी शुरू कर दिया. ट्यूशन से जो पैसे मिलते वह उन्हें घर में न देता बल्कि उस ने अपना डीमैट अकाउंट खोल लिया. उस में इन्वैस्ट करता. इस तरह अपना खर्च तो निकाल ही लेता और साथ ही, घर में भी कुछ पैसे भेज पाता.

वक्त न जाने कौन से घोड़े पर सवार रहता है, देखते ही देखते आकाश की इंजीनियरिंग की पढ़ाई खत्म हो गई और उसे एक बहुत अच्छी कंपनी में प्लेसमैंट मिल गया लेकिन आकाश को चैन कहां. उसे तो अमेरिका, कनाडा या यूरोप जाना था. कुछ और कोशिश के बाद उसे एक ऐसी कंपनी में नौकरी मिल भी गई जो उसे अमेरिका भेजना चाहती थी.

अमेरिका में नौकरी, यानी, आकाश का बरसों का सपना पूरा हो गया.

आकाश घर वालों से कहता, ‘मां, देखना मुझे इतनी ढेर सारी सैलरी मिलेगी कि आप को दिनभर काम नहीं करना पड़ेगा, खाना बनाने के लिए घर में कुक होगा, घर में और काम करने के लिए नौकरचाकर होंगे. और दादी, आप तो बस उन पर रोब चलाना. और पापा, आप तो नौकरी ही छोड़ देना, आनेजाने में आप को काफी दिक्कत होती है. तब हम नया मकान खरीदेंगे किसी नई सोसाइटी में. यह छोटा सा, टूटाफूटा घर बेच देंगे. बड़ी सी गाड़ी भी होगी और भी न जाने क्याक्या होगा हमारे पास. आप सब देखना, ढेर सारी सैलरी, बढ़ियाबढ़िया सामान, हम सब बहुत खुश होंगे.’

आकाश के उत्साह के सामने कोई कुछ न कह सका. हालांकि, मां यह पूछना चाहती थी कि क्या मेरे हाथ का खाना पसंद नहीं? दादी यह पूछना चाहती थी कि तेरे दादाजी के बनाए हुए इस मकान में क्या खराबी है? और पापा यह पूछना चाहते थे कि अगर मैं अभी से ही नौकरी छोड़ दूंगा तो घर पर बैठ कर करूंगा क्या? तू अमेरिका में होगा तो शाम को तेरा दफ्तर से आने का इंतजार भी तो नहीं कर सकूंगा.

कोई आकाश को यह न बता सका कि मोटी सैलरी से खरीदी गई चीजें पलभर के लिए भले चेहरे पर मुसकान ले आएं लेकिन प्यार और त्याग से बनाई गई चीजें आंखों में वे आंसू ले आती हैं जिन से दिल तक भीग जाता है. लेकिन, आकाश के उत्साह के सामने किसी ने कुछ न कहा क्योंकि इस बारे में बात पहले भी हो चुकी थी और आकाश को अपनी धुन के सामने किसी का तर्क समझ में नहीं आता था. आखिरकार, आकाश चला गया अमेरिका.

देखते ही देखते 4 साल बीत गए.

जैसाजैसा आकाश ने चाहा था वैसा ही वैसा होता भी चला गया. विनीता और शेखर ने आलीशान सोसाइटी में एक महंगा बंगला खरीद लिया. घर में कामकाज, खाना पकाने के लिए नौकरचाकर रख लिए, एक बड़ी गाड़ी ले ली व ड्राइवर भी रख लिया, ब्रैंडेड कपड़े, ब्रैंडेड फर्नीचर आदि सब भी हो गया.

साथ ही, जोजो आकाश ने नहीं भी चाहा था वह भी होता चला गया.

आकाश के जाने के कुछ हफ्तों बाद ही जानकीजी परलोक सिधार गईं और आकाश उन की तेरहवीं तक में भी न आ पाया क्योंकि अभी तो गया था अमेरिका. वहां छुट्टी लेने का मतलब है काम से हमेशा के लिए छुट्टी. और हां, वहां ये सब बातें मायने नहीं रखतीं कि आप की दादीजी थीं, उन की क्रिया में तो जरूर जाना चाहिए, बल्कि वहां तो यह है कि ‘लाइफ मस्ट गो औन’ जाने वाला चला गया, उस के साथ हमारी लाइफ थोड़े ही रुकनी चहिए. जा कर उन्हें जिंदा कर लोगे क्या? लेकिन हां, अगर खुद अभी गए तो समझ कि मर ही गए. यानी, यहां की नौकरी का द एंड.

और हां, आकाश ने यह भी कहां चाहा था कि उस की मां और पापा, आजकल बेहद प्रचलित बीमारी से ग्रसित हो जाएं. वह बीमारी थी अकेलेपन की, अवसाद की. दरअसल, आकाश के अमेरिका जाने के कुछ दिनों बाद से ही विनीता के पैरों और कमर में दर्द शुरू हो गया था. होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक इलाज से भी जब रत्तीभर फर्क भी न पड़ा तो ऐलोपैथिक में दिखाया. उन की दवाओं से भी जब बिलकुल फर्क न पड़ा तो डाक्टर ने कई टैस्ट करवाए. टैस्ट, एक्सरे सब ठीक आए तो डाक्टर ने मनोवैज्ञानिक के पास भेज दिया.

सरकारी अस्पताल के मनोवैज्ञानिक ने पहले विनीता से बात की, फिर शेखर को भी बुलाया और सामने यह आया कि दोनों ही अकेलेपन और अवसाद से जूझ रहे हैं.

जिस दिन आकाश को यह पता चला था कि दोनों अकेलेपन और अवसाद के शिकार हैं, उस दिन उस ने उन दोनों को बहुत डांटा. यह डिप्रैशन क्या होता है, यह अकेलापन क्या होता है? आज आप लोगों के पास सबकुछ है- गाड़ी है, बंगला है, पैसा है, किसी से उधार मांगने की जरूरत नहीं है कि आज मेरे बेटे की स्कूल की फीस भरनी है तो उधार दे दो, अगले महीने पगार मिलते ही वापस कर दूंगा. किसी चीज की कमी नहीं है. इतना कुछ है, अब अपने पास तो आप लोग डिप्रैशन ले कर बैठ गए हो. अरे एंजौय करो लाइफ. जरा सोचो न, डिप्रैशन तो तब होना चाहिए था जब हम लोगों के पास कम पैसे थे. खैर, मैं बैस्ट मनोवैज्ञानिक का पता करता हूं, अब उसे ही दिखाना.

और आकाश के बताने पर विनीता और शेखर एक और यानी शहर के द बैस्ट मनोवैज्ञानिक डाक्टर राधिका के पास गए.

काउंसलिंग सैशन के दौरान डाक्टर राधिका ने उन से पूछा, ‘‘तो घर के सारे काम के लिए नौकर हैं तो क्या हमेशा से ही ऐसा ही था?’’

विनीता झट से बोली, ‘‘नहीं डाक्टर साहब. पहले तो मैं घर के सारे काम करती थी- शायद एक आम हाउसवाइफ से भी कहीं ज्यादा- घर में खाना पकाना, घर की साफसफाई, अचार, बढ़िया, पापड़ बनाना, कपड़े सिलना, स्वटेर बुनना वगैरह.’’

मनोवैज्ञानिक ने पूछा, ‘‘तो अब? अब क्यों नहीं करतीं आप ये सब?’’

विनीता थोड़ा शान दिखाती हुई बोली, ‘‘असल में बेटा अमेरिका में है न, बहुत अच्छी पगार मिलती है उसे. तो वह ही हिदायत करता रहता कि जिंदगीभर बहुत काम किया, अब आराम करो. हम दोनों का, यहां के घर का सारा खर्च उठाता है हमारा बेटा.’’ यह कहतेकहते विनीता का गला भर आया, वह चुप हो गई.

डाक्टर राधिका ने आगे कहा, ‘‘और? शायद आप कुछ और भी कहना चाहतीं हैं. बेझिझक कहिए. यहां कोई आप को सही या गलत नहीं ठहरा रहा. कोई आप को कमजोर या साहसी होने की उपाधि नहीं दे रहा. जो मन में है वह कह दीजिए.’’

यह सुन कर तो जैसे विनीता की आंखों से आंसू छलक पड़े. कुछ कहना चाहा पर जुबान ने साथ न दिया.

डाक्टर राधिका ने एक गिलास पानी दिया. पानी पी कर, कुछ हिम्मत जुटा कर तो जैसे विनीता ने अपना मन ही खोल कर रख दिया, ‘‘किस के लिए बनाऊं सब? बेटे के विदेश जाने के साथ जैसे सबकुछ खत्म सा हो गया. सबकुछ खालीखाली सा, बेमानी सा लगने लगा है. लगता है जैसे अभी अक्कू कहीं से आएगा और मेरी साड़ी का पल्ला खींचते हुए बोलेगा, ‘मां, आज तो तेरे हाथों की कढ़ी खाने का मन है या फिर मेरा जन्मदिन आने वाला है, मुझे एक नया स्वेटर  बना देना?’ और पता है, एक बार उस की फरमाइश पर हम सब ने मिल कर 4-5 दिनों में उस के जन्मदिन पर उस के लिए एक स्वेटर  बनाया भी था.’’ विनीता की आंखें जैसे उन बीते दिनों को सजीव देख रही थीं. हवा में देखती हुईं वे बोलीं, ‘‘उफ्फ, कितने खुश थे उस दिन हम सब जब अक्कू ने मेरा बनाया वह स्वेटर  पहना था. अभी तक संभाल कर रखा है मैं ने वह स्वेटर.’’

डाक्टर राधिका बड़े ही गौर से विनीता को देख रही थीं. विनीता की बातें सुन कर, उन के चेहरे के भाव देख कर डाक्टर राधिका विनीता को समझने की कोशिश कर रही थीं. ये सब देखतेसमझते हुए ही डाक्टर राधिका बोलीं, ‘‘विनीताजी, आज की कंसल्टेशन का एक घंटा तो खत्म होने को आया लेकिन आप की खुशियां हम खत्म नहीं होने देंगे. आप की अगली कंसल्टेशन अगले हफ्ते है. बस, उस से पहले आप को करना यह है कि अपने बटे से कहिए कि एक बार मुझे फोन कर ले.’’

डाक्टर राधिका के क्लिनिक से बाहर निकलने के बाद विनीता और शेखर दोनों को ही यह लगा कि अन्य मनोवैज्ञानिकों की तरह इस ने न तो यह कहा कि दोस्तों से मिलो, न यह कहा कि लाफ्टर क्लब जौइन कर लो वगैरहवगैरह. विनीता शेखर से बोली, ‘‘इन की तो अजीब ही फरमाइश निकली, बेटे से फोन करवा दो. अरे, हमारा अक्कू कोई खाली बैठा है क्या?’’ इस पर शेखर बोले, ‘‘ओहो, तो इस में हर्ज भी क्या है?’’

रात को जब अक्कू का फोन आया तो उस ने भी शेखर की बात को ही जैसे आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अरे, इधर रात थी तो क्या, आप लोग मुझे तभी बता देते तो मैं उसी वक्त बात कर लेता. कोई बात नहीं, आज रात को कर लूंगा बात.’’

डाक्टर राधिका के क्लिनिक में अगले दिन सुबह पहला फोन आकाश का था. रिसैपशनिस्ट ने आकाश को होल्ड पर डाल कर डाक्टर राधिका को बताया कि किसी मिस्टर आकाश का फोन है, अमेरिका से. डाक्टर राधिका ने फोन ले लिया.

जैसे ही डाक्टर राधिका लाइन पर आईं, आकाश ने अपना परिचय देने के बाद, घबराए हुए स्वर में पूछा, ‘‘डाक्टर, आप को मुझ से क्या बात करनी है. इज देयर समथिंग सीरियस? प्लीज टेल मी, व्हाट इज रौंग विद माई पेरैंट्स?’’

डाक्टर राधिका तो हलका सा हंस ही दीं और कहने लगीं, ‘‘अरेअरे, आप इतने चिंतित क्यों हो रहे हैं. ऐसा लग रहा है जैसे काउंसलिंग की जरूरत तो आप को है. डोंट वरी, देयर इज नथिंग रौंग विद योर पेरैंट्स. बल्कि मुझे तो यह कहना है कि यू आर सो लक्की कि आप को ऐसे पेरैंट्स मिले हैं जो इतना प्यार करने वाले और केयरिंग हैं. बस, कमी थोड़ी आप में है.’’

आकाश हैरान हो कर बोला, ‘‘मुझ में कैसी कमी, डाक्टर? मैं तो उन दोनों का इतना खयाल रखता हूं. बस, साथ ही नहीं रहता. लेकिन रोज फोन करता हूं. उन की हर जरूरत का ध्यान रखता हूं. हर महीने खूब पैसे भी भेजता हूं.’’

‘‘पता है, पता है, मिस्टर आकाश कि आप खूब पैसे भेजते हैं लेकिन आप को शायद नहीं पता कि कुछ लोग ले कर नहीं, बल्कि दे कर खुश रहते हैं. आप जानते होंगे कि मनोविज्ञान के अनुसार, लोगों की अलगअलग पर्सनैलिटी होती हैं, यानी हर व्यक्ति का अपना अलग व्यक्तित्व. अब जैसे आप ने देखा ही होगा कि कुछ लोग घूमना पसंद करते हैं तो कुछ लोग घर में ही रहना. इसी तरह, कुछ लोगों को यह पसंद होता है कि लोग हमारे लिए कुछ करते रहें जबकि कुछ लोग इस बात से खुश रहते हैं कि वे खुद दूसरों कि लिए कुछ करें और आप के मम्मीपापा इस दूसरी वाली श्रेणी में आते हैं.’’

आकाश अभी भी असमंजस में ही था. उसे डाक्टर राधिका की बातें पूरी तरह समझ नहीं आ रही थीं. स्पष्टता हासिल करने के लिए उस ने पूछा, ‘‘पर डाक्टर, अगर मम्मीपापा दूसरी वाली श्रेणी में आते हैं तो इस में मुझ में कहां कमी है?’’

‘‘आप में कमी यह है कि आप अपने मम्मीपापा को सिर्फ देते हैं, उन से मांगते कुछ नहीं.’’ अपनी बात को आगे समझने के लिए डाक्टर राधिका बोलीं, ‘‘मुझे पता है कि अब आप पूछेंगे कि आप क्या मांगेंगे, आप के पास तो सबकुछ है. तो भई, आप वह मांगिए उन से जो उन के पास है और जो वह आप को देना चाहते हैं. और वह है, उन का ढेर सारा प्यार.’’

‘ढेर सारा प्यार’ फोन रखने के बाद भी आकाश के कानों में डाक्टर राधिका के ये शब्द गूंज रहे थे. उस का मन तो यह कर रहा था कि एकदम मम्मीपापा को फोन लगाए और कहे, ‘मम्मी, पापा, मैं आप का वही छोटा सा अक्कू तो हूं, मुझे आज भी आप के प्यार की जरूरत है.’

लेकिन डाक्टर राधिका से बात करने के बाद अक्कू अब समझ गया था कि हर बात लफ्जों में कही या बताई नहीं जा सकती. दरअसल, जब आकाश ने डाक्टर राधिका से पूछा कि आप को कैसे पता कि मेरे मम्मीपापा को लेने से फायदा देने में ज्यादा खुशी मिलती है तो उन्होंने बताया था कि ‘एक मनोवैज्ञानिक अपने पास आने वाले मरीजों के शब्दों से ज्यादा उन के चेहरे, उन की बौडी लैंग्वेज यानी हावभाव पर ध्यान देता है. जब विनीताजी यह बता रही थीं कि उन का बेटा उन्हें खूब सारे पैसे भेजता है तो उन के चेहरे पर गर्व था लेकिन जब वे यह कह रही थीं कि ‘उफ्फ, कितने खुश थे उस दिन हम सब जब अक्कू ने वह मेरा बनाया स्वेटर  पहना था. अभी तक संभाल कर रखा है मैं ने वह स्वेटर  तो उस समय तो जैसे उन के  रोमरोम से खुशी टपक रही थी. उन दोनों की आंखें भर आई थीं वे पल याद कर के जब उन दोनों ने तुम्हारे लिए वह स्वेटर  बनाया था. बस, यही सब देख कर मैं समझ गई कि उन दोनों का व्यक्तित्व ऐसा है कि जिन्हें दूसरों कि लिए कुछ करने में खुशी मिलती है.’’

और अब आकाश भी समझ गया था कि उसे क्या करना है.

आकाश ने तुरंत घर फोन लगाया. फोन विनीता ने उठाया. उन के स्वर में हैरानी, चिंता और खुशी, जैसे तीनों भाव सम्मिलित थे. फोन उठाते ही बोलीं, ‘‘अरे अक्कू, इस वक्त कैसे फोन किया? सब ठीक है न? वहां तो रात होगी अभी, तेरे सोने का टाइम होगा, कल औफिस भी तो जाना है. रातभर जागेगा तो कल टाइम से उठेगा कैसे? और क्या ही औफिस में काम कर पाएगा?’’

उधर से आकाश बोला, ‘‘अरे मां, कल आप ने ठीक ही कहा था. ये मनोवैज्ञानिक न, बेकार की ही बातें करते हैं. मैं ने डाक्टर राधिका से बात तो कर ली लेकिन बिलकुल बेकार ही रहा उन से बात करना. अच्छा यह बताओ कि आप की और पापा की तबीयत कैसी है?’’

तब तक शेखर भी कमरे में आ गए और विनीता ने फोन को स्पीकर पर करते हुए फोन मेज पर रख दिया. अब शेखर भी अक्कू से वही सब सवाल पूछने लगे जो विनीता ने पूछे थे.

तो अक्कू बताने लगा, ‘‘मां, इस वक्त फोन मैं ने इसलिए किया है क्योंकि हमारे यहां न इंडियन लोगों का एक ग्रुप है और यहां इस महीने के अंत में एक कम्पीटिशन रखा है हम लोगों ने. उस में हर व्यक्ति को घर की बनी एक चीज लानी है. अब आप को तो कितने अच्छे स्वेटर  बनाने आते हैं. याद है न, आप ने, दादी ने और पापा ने मिल कर कैसे सिर्फ 4-5 दिनों में ही मेरे जन्मदिन के लिए एक स्वेटर  तैयार कर दिया था तो बस इसीलिए मैं ने इस वक्त फोन किया क्योंकि अभी तो दिन होगा वहां तो आज का दिन भी यूटिलाइज हो जाएगा क्योंकि टाइम कम है न.’’

आकाश की यह बात सुन कर विनीता और शेखर एकदम चुप से रह गए. वे दोनों बस एकदूसरे को देखते ही रह गए. दोनों के मन में शायद एक ही बात आई- हमारे बेटे को हम से कुछ चाहिए. वाह, क्या हम अभी भी इस काबिल हैं कि अपने बेटे के लिए कुछ कर सकें. अपने मातापिता की चुप्पी सुन कर आकाश समझ गया कि जो डाक्टर राधिका ने कहा था वह ठीक था. अपने बेटे के लिए कुछ कर पाने की बात सुन कर दोनों भावुक हो गए होंगे और उन की आवाज को आंसुओं के सैलाब ने रोक दिया होगा. अपने खुद के रुंधे गले से किसी तरह आवाज निकाल कर आकाश ने पूछा, ‘‘मां, बना दोगी न मेरे लिए स्वेटर ?’’

शेखर की आवाज आई, ‘‘बेटा, किस रंग का चाहिए?’’

रंग बताने के बाद अक्कू ने ‘गुड नाइट’ कह कर फोन रख दिया और सोचने लगा, सोने जाने से पहले डाक्टर राधिका से पूछ तो लूं कि उन्हें मेरी भेजी हुई फीस मिल गई और उन का धन्यवाद भी कर दूं कि उन की बताई तरकीब शायद कामयाब साबित हो रही है.

इधर, विनीता और शेखर, जल्दी से तैयार हो कर बाजार गए, ग्रे रंग की बढ़िया ऊन ले कर आए. विनीता ने जल्दी से फंदे डाले और विनीता बौर्डर बुनने में लग गई और शेखर नैट पर कोई अच्छी सी डिजाइन ढूंढने में लग गए.

जब रात को आकाश का फोन आया तो विनीता ने बड़ी उत्साहभरी आवाज में कहा, ‘‘वीडियो कौल करो न.’’ और वीडियो पर विनीता और शेखर ने अपने अक्कू को दिखाया, ‘‘देख, एक दिन में तेरा स्वेटर  कितना सारा बन गया. आगे और पीछे के पल्लों के पूरे बौर्डर, बस, बनने ही वाले हैं.’’

आकाश को अपने लैपटौप पर अपने मम्मीपापा दिख रहे थे- बेहद खुश, बेहद उत्साहित, इतना खुश उस ने अपने मम्मीपापा को बरसों से नहीं देखा था. मम्मी हाथ में थोड़ा बुना स्वेटर लिए हुए थीं और पापा ऊन का गोला पकड़े हुए थे- वह तसवीर आकाश ने अपने फोन से क्लिक कर ली.

अगली रात को जब आकाश ने फोन किया तो आज उस की आवाज में बेहद उत्साह था. फोन लगाते ही बोला, ‘‘पता है, जो कल मैं ने आप लोगों की तसवीर खींची थी स्वेटर  बुनते हुए, वह मैं ने सोशल मीडिया पर डाल दी थी और उस के नीचे लिख दिया था- ‘मांपापा का दुलार है, सात समंदर पार से’. आप जानते हैं, वह बहुत ही वायरल हो गई और सब लोगों ने बहुत ही इमोशनल कमैंट्स भेजे हैं. कोई लिखता है- ‘वाओ, मम्मीपापा हों तो ऐसे.’ और किसी ने लिखा है- ‘किलोमीटरों की दूरियां कुछ भी नहीं हैं अगर दिल से किसी के नजदीक हों तो.’

यह सुन कर शेखर बोले, ‘‘तू रहेगा एकदम शरारती का शरारती ही.’’ और विनीता बोलीं, ‘‘अरे, पहले बता देता तो मैं बढ़िया साड़ी पहन लेती.’’

वैसे, आकाश खुद भी हैरान था कि सोशल मीडिया पर उस तसवीर को इतने लाइक्स मिले. इसी तरह दिन बीतते गए, आकाश सोशल मीडिया पर रोज नए कपड़ों में विनीता और शेखर की और बड़े स्वेटर  के साथ तसवीर डालता, रोज और लाइक्स मिलते और रोज विनीता, शेखर और आकाश की बातों में एक नया रंग आने लगा- उल्लास का रंग, उमंग का रंग.

इन सब से भी एक बड़ी बात- एक चीज कम होने लगी- और वह था विनीता का कमर और पैरों का दर्द, बिना दवा के, बिना मसाज के और बिना काउंसलिंग के. अब विनीता के दर्द काफी कम हो गए थे. आकाश जब पूछता दर्द के बारे में तो विनीता कहती, अरे, लगता है मौसम की वजह से हो गए थे, अब तो न के बराबर ही हैं.

और आखिरकार वह दिन आ ही गया जब विनीता और शेखर की मेहनतों से चंद ही दिनों में तैयार किया गया स्वेटर  सात समंदर पार आकाश के पास पहुंच गया.

जैसे ही आकाश ने पार्सल खोला, उस में से निकला एक ग्रे स्वेटर . उस के मम्मीपापा के प्यार और दुलार की जीतीजागती निशानी.

कंपीटिशन से एक दिन पहले ही मिल गया था उसे घर की बनाई चीज, यानी, वह ग्रे स्वेटर .

दरअसल, औफिस के कामों में इतना व्यस्त रहता है आकाश कि उस ने उस कंपटीशन में जाने के बारे में सोचा ही न था लेकिन जब डाक्टर राधिका ने बताया कि उस के मम्मीपापा अपने बेटे के लिए कुछ कर के खुश होंगे तो उसे यह बढ़िया आइडिया लगा कि वह उस कंपटीशन में अपने मम्मी के हाथ का बना स्वेटर पहन कर जाए. और अब मम्मी के हाथ का बना स्वेटर  भी आ गया था और कंपटीशन का दिन भी.

उधर, विनीता और शेखर को ऐसा लग रहा था जैसे गुजरा हुआ वक्त एक बार फिर लौट कर वापस आ गया है क्योंकि आज वे दोनों एक बार फिर इंतजार कर रहे थे कि कब अक्कू दोस्तों से मिल कर आए और कब यह बताए कि दोस्तों ने कितनी प्रशंसा की उस के नए स्वेटर की. लेकिन, बस, दिल धड़कता था यह सोच कर कि कहीं पिछली बार जैसा न हो जाए.

लेकिन जब उन के अक्कू का फोन आया तो उस ने बताया कि वहां के दोस्तों ने उस के घर के बने स्वेटर  की प्रशंसा ही नहीं की बल्कि उस के दीवाने हो गए.

अक्कू खुशी के मारे जैसे उछलता हुआ बोल रहा था, ‘‘मां, पापा, इंडियन कम्युनिटी तो छोड़िए, अरे वहां के लोगों को भी बेहद पसंद आया आप का बनाया हुआ स्वेटर . और पता है, कितने ही लोगों ने तो यह पूछा- तुम्हारी मम्मी हमारे लिए भी बना देंगी ऐसे ही स्वेटर?’’

अब विनीता और शेखर भी थोड़ाथोड़ा अक्कू की तरह बोलना सीख गए थे, सो, उन के मुंह से भी निकला, वाओ.’’

अक्कू ने पूछा, ‘‘मां, क्या यहां के मेरे सारे दोस्तों के लिए बना पाओगी स्वेटर ?’’

और इस से पहले कि विनीता कुछ कहती, शेखर बोल पड़े, ‘‘अरे क्यों नहीं.

तुझे पता है, मैं भी थोड़ाथोड़ा सीख रहा हूं बुनना. तो हम दोनों मिल कर बना ही लेंगे.’’

विनीता हंसते हुए बोली, ‘‘अरे, ये तो नौसिखिया हैं. इन्हें कुछ नहीं मालूम. पहले तू उन लोगों की नाप तो भेज जिन के लिए बनाना है स्वेटर.’’ अक्कू  ने कहा, ‘‘ओह, यह तो मैं भी भूल गया था. हांहां जरूर, पहले नाप भेजता हूं. मेरे ग्रे स्वेटर  जैसा ही बना देना.’’ और अक्कू ने गुड नाइट कह कर फोन रख दिया.

आकाश सोच रहा था कि एक ग्रे स्वेटर  की वजह से पहले वह सात समंदर पार चला गया, मातापिता से इतनी दूर, और आज, दूसरे ग्रे स्वेटर  की वजह से आज वह दूर रह कर भी अपने मातापिता के और करीब आ गया. Hindi Family Story :

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