Durlabh Prasad Ki Dusri Shaadi Movie Review : यह एक रोमांटिक कौमेडी फिल्म है. इस में एक अधेड़ युवक की दूसरी शादी एक खूबसूरत युवती से कराते दिखाया गया है. चूंकि यह जोड़ी बेमेल है इसलिए दिलचस्पी जगाए रखती है. यह बेमेल जोड़ी है कौमेडियन संजय मिश्रा और 1997 में आई रोमांटिक ड्रामा फिल्म ‘परदेस’ से डैब्यू करने वाली खूबसूरत युवती महिमा चौधरी की. वह ‘मिस दार्जिलिंग’ भी रह चुकी है. ‘दाग’, ‘धडक़न’, ‘दिल क्या करे’ और ‘दोबारा’ जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुकी इस अभिनेत्री को फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया.
संजय मिश्रा तो कौमेडी का हरफनमौला है. जिस फिल्म में भी वह अभिनय करता है, कौमेडी से उस में जान डाल देता है. महिमा चौधरी ने काफी अरसे बाद परदे पर कमबैक किया है. उस ने ‘दुर्लम प्रसाद की दूसरी शादी’ में एक विधुर से शादी करने की भूमिका निभाई है. यह एक पारिवारिक फिल्म है, जिस में कोई शोरशराबा नहीं है, भारीभरकम ड्रामा नहीं है, मगर आम लोगों की जिंदगी की छोटीछोटी उलझनों को दिखाया गया है, जिसे देखते हुए दर्शक आसपास के किरदारों को, पड़ोसियों को, रिश्तेदारों को पहचान सकते हैं. फिल्म बिना भाषण दिए समाज के बनाए नियमों पर सवाल उठाने की बाट करती है, रिश्तों को नए नजरिए से देखने की बात करती है.
निर्देशक ने महिलाओं को उन के बाहरी रहनसहन के आधार पर जज किए जाने वाले मुद्दों को छुआ है. अगर कोई महिला अकेली रहती है तो इस का मतलब यह नहीं कि उस का चरित्र खराब है. अगर वह अपने हिसाब से अपनी जिंदगी जीती है तो समाज को उस पर ताने मारने का हक नहीं मिल जाता. इस मुद्दे को निर्देशक ने प्रभावशाली ढंग से उठाया है.
बनारस की पृष्ठभूमि में बुनी गई कहानी मुरली प्रसाद (व्योम यादव) के इर्दगिर्द घूमती है. मुरली प्रसाद सैलून चलाने वाले अपने विधुर मित्र दुर्लभ (संजय मिश्रा) और अविवाहित मामा (श्रीकांत वर्मा) के साथ रहता है. वह महक (पलक लालवानी) से प्यार करता है. मगर महक के परिवार वाले बेटी की शादी ऐसे घर में करने से इनकार कर देते हैं जहां कोई महिला न हो. अब मुरली अपने पिता की शादी कराने का फैसला करता है मगर उसे अपने पिता का व समाज का विरोध सहन करना पड़ता है.
दुलहन की खोज में वह ज्योतिषियों की शरण में जाता है. कभी देसी टिंडर जैसे प्लेटफौर्म पर जाता है, कभी परचे छपवाता है तो कभी वरवधू मेले में जाता है. इस प्रयास में उस का सामना एक दबंग महिला से भी होता है. ये हलकेफुलके पल हास्य की रचना तो करते हैं मगर रोमांचक नहीं बन पाते.
इसी दौरान दुर्लभ की मुलाकात अपनी पूर्व प्रेमिका बबीता (महिमा चौधरी) से होती है. बरसों पहले दुर्लभ के पिता के विरोध के कारण दोनों की शादी नहीं हुई थी. बबीता के आते ही दुर्लभ की दूसरी शादी का प्लान बनाया जाता है ताकि मुरली की शादी का रास्ता साफ हो सके. हालांकि उन दोनों की शादी की राह उतनी आसान भी नहीं. फिर भी किसी तरह उन की शादी की रुकावटें दूर होती हैं और दोनों एकदूसरे के हो जाते हैं. मुरली की शादी का रास्ता भी साफ हो जाता है.
यह फिल्म सिर्फ शादी की बात नहीं करती, यह अकेलेपन, उम्र, समाज और दूसरी जिंदगी की कहानी है. नायक की जिंदगी में खालीपन है, उम्र निकल चुकी है, आंखों में निराशा है, मुसकान में दर्द है, बिना बोले सब बयां कर देता है. फिल्म दूसरी शादी को मजाक नहीं बनाती, न कोई तमाशा दिखाती है. फिल्म बताती है कि असफलता के बाद क्या इंसान को दोबारा खुश होने का हक नहीं?
पटकथा स्लो है लेकिन बोर नहीं करती. हर सीन किसी न किसी सच्चाई से जुड़ा है. गाने कम हैं मगर बैकग्राउंड म्यूजिक सपोर्ट करता है. संजय मिश्रा और महिमा चौधरी के अभिनय की तारीफ हुई है. फिल्म पुनर्विवाह के लिए सकरात्मक संदेश देती है.
फिल्म का पहला भाग थोड़ा सुस्त है. कहानी मुख्य मुद्दे पर पहुंचने में समय लगाती है. बनारसी माहौल में कुछ दिलचस्प किरदार पिरोए गए जो मनोरंजक दृश्य रचते हैं. क्लाइमैक्स को और दमदार बनाया जा सकता था. सिनेमेटोग्राफी एक बार फिर बनारस की खूबसूरती को दिखाती है. नए कलाकारों में व्योम यादव प्रभावशाली है. पलक लालवानी का किरदार भी अच्छा है. यह एक साफसुथरी पारिवारिक फिल्म है. इसे परिवार के साथ देखा जा सकता है. Durlabh Prasad Ki Dusri Shaadi Movie Review :





