Gig Work : भारत में आज आम घरों के युवा गिग वर्क पर निर्भर हो गए हैं. जहां न फाइनेंसियल स्टेबिलिटी है न सामाजिक सुरक्षा. सरकारों ने भी इन युवाओं से अपना पल्ला झाड़ा हुआ है.

भारत में किराने की दुकानें परंपरागत रूप से हर गलीमहल्ले की पहचान रही हैं. पहले तकरीबन हर महल्ले में छोटीबड़ी किराना दुकानें आसानी से मिल जाती थीं और लोग अपने रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इन्हीं पर निर्भर रहते थे. लेकिन बदलते समय के साथ अब इन में से कई दुकानें बंद हो चुकी हैं या बंद होने की कगार पर हैं.

देश की अर्थव्यवस्था में किराने की दुकानों का अहम योगदान रहा है, क्योंकि ये न केवल रोजमर्रा की चीजें उपलब्ध कराती थीं बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार का भी बड़ा स्रोत थीं. किराना दुकानों का नेटवर्क इतना मजबूत था कि देश के हर कोने में बनने वाले उत्पाद लोगों तक आसानी से पहुंच जाते थे. गलीमहल्ले में मौजूद ये दुकानें ग्राहकों को भरोसे, सुविधा और व्यक्तिगत संबंधों का अनुभव कराती थीं, जो औनलाइन डिलीवरी सेवाएं पूरी तरह नहीं दे पातीं.

किराने की दुकान का दूसरा फायदा यह भी था कि लोग अपने पास के दुकान से उधारी भी समान घर ले आते थे, जिस से लोग भूखे नहीं सोते थे. दुकानदार को भी यह विश्वास रहता था कि जो व्यक्ति उन की दुकान से उधारी ले कर गया है, वह अपनी तनख्वाह मिलते ही पहले मेरी उधारी चुकता कर देगा और ऐसा ही हुआ करता था.

आज जब ई-काउमर्स तेजी से बढ़ रही है, तो पारंपरिक किराना दुकानों का अस्तित्व संकट में है. अगर इन दुकानों को आधुनिक तकनीक और नई कारोबारी रणनीतियों से जोड़ा जाए तो ये फिर से अर्थव्यवस्था में मजबूत भूमिका निभा सकती हैं और उपभोक्ताओं को सस्ता, भरोसेमंद और सुविधाजनक विकल्प दे सकती हैं. लेकिन आज जमाना जैसे ही डिजिटल हुआ लोग 20 से 25 रुपए के कैश बैक औफर के लिए समान औनलाइन मंगवाने लगें. मगर इस कैशबैक ने देश की लाखों छोटे किराने की दुकानों पर ताला लगवा दिया. यह वे दुकानें थीं जहां पहले दुकान दादा ने शुरू की और फिर उस दुकान को बाप और चाचा ने आगे बढ़ाया. लेकिन अब इस औनलाइन कैशबैक और होम डिलीवरी ने दुकान बंद करवा दी और बेटों को उन्हीं समानों की डिलीवरी में लगवा दिया जो कभी बाप और दादा बेचा करते थे.
अब देश में लाखों युवा जोमेटो, स्विगी, उबर, ओला और जेप्टो से जैसे प्लेटफार्म के लिए काम कर रहे हैं. इसे ‘गिग वर्क’ कहा जाता है. गिग वर्क का मतलब ऐसे जाऊब से है जो अस्थाई, फ्लेक्सिबल जौब होते हैं. इस के साथ ही इन नौकरियों में सुरक्षा बिल्कुल भी नहीं होती है. ये नौकरियां बाहर से लचीलापन और सुरक्षा का वादा करती हैं, लेकिन हकीकत कुछ और है. यह नौकरियां युवाओं को ऐसी स्थिति में डाल देती है जहां स्थायित्व, भविष्य की योजना, प्रमोशन और स्वास्थ्य की कोई सुविधा नहीं होती है. ऐसे में यह सवाल जरुर उठता है कि क्या यह रोजगार डिजिटल तकनीकी गुलामी का नया रूप है?

गिग इकोनमी का विस्तार और उस की परिभाषा

गिग इकोनमी एक ऐसी अर्थव्यवस्था को कहा जाता है जहां लघु अवधि और अस्थायी काम होते हैं. यह तकनीकी यानी मौजूदा समय में ज्यादातर डिजिटल प्लेटफौर्म्स के माध्यम से संचालित किए जाते हैं. भारत में फिलहाल ओला, उबर, स्विगी, ब्लिंकिट, जेप्टो जैसे सैकड़ों प्लेटफौर्म हैं. ये लाखों युवाओं को रोजगार देते हैं. इस के साथ ही इन कम्पनियों के साथ जुड़ना भी आसान होता है. इन कामों को करने के लिए कोई इंटरव्यू नहीं होते हैं, बस ऐप डाउनलोड कर के अपना काम शुरू करना होता है. लेकिन इस आसनी से मिलने वाले काम के लिए भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है.

ऐसे जौब्स को मार्केट में बढ़ावा देने के लिए कम्पनियां इन वर्कर्स को ‘पार्टनर’ कहती है. मगर इन पार्टनर्स के पास न कोई मैडिकल सुविधा होती है, न ही कोई प्रोविडैंट फंड और न ही पेंशन. इन लोगों की न अपनी कोई यूनियन होती है और न ही कोई न्याय का कोई मंच. इस के साथ ही कम्पनियां किसी भी वक्त ऐप से इन का अकाउंट ब्लौक कर देती है और अगले दिन से इन की आमदनी बंद हो जाती है. कंपनियां इन के साथ सिर्फ एकतरफा रिश्ता रखती है और इस रिश्ते में पूरा नियंत्रण कंपनियों के पास ही होता है.

शुरूशुरू में जब कोई युवा डिलीवरी या कैब ड्राइविंग का काम करता है, तो उसे यह लगता है कि यह नौकरी बहुत अच्छी नौकरी है और यह कमाई और लचीलेपन से भरपूर है. लेकिन इस दुनिया में कदम रखने के कुछ ही दिनों के बाद उसे यह अहसास होता है कि इस आजादी के पीछे एक अदृश्य गुलामी छुपी हुई है. हर डिलीवरी बौय को समान समय पर डिलीवरी करने का दवाब होता है, इस के साथ ही कैब ड्राइवर्स पर भी राइड समय पर पूरा करने का दवाब होता है. दवाब से जूझ रहे ड्राइवर्स और डिलीवरी बौय अपने कस्टमर्स से गुजारिश करते हैं कि कृपया वे उन्हें अच्छी रेटिंग्स दें ताकि उन की नौकरी जारी रह सकें.

कई बार सामान देर से मिलने पर कस्टमर्स नाराज हो जाते हैं और डिलीवरी बौय काफी कुछ कह देते हैं. सोशल मीडिया पर वायरल कई वीडियो में यह देखा गया कि कस्टमर्स डिलीवरी बौय से मारपीट और गाली गलोज तक करते हैं. वहीं ड्राइवर्स को ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ता है. कम पैसे में ऐसी राइड मिलती है कि जहां से जा कर वापस आना घाटे का सौदा उन के लिए साबित होता है. वहीं लोकेशन पर समय पर न पहुंचने पर पेसेंजेर्स के द्वारा कई बार बुरा भला कहा जाता है. ये लोग दवाब, ग्राहक की बदतमीजी, ट्रैफिक, मौसम की मार झेलते हुए अपना काम करते हैं.

अगर कभी दुर्घटना हो जाए तो कम्पनियां बीमा के नाम पर अपना पल्ला झाड़ लेती हैं. इन गिग वर्कर्स को इंसान तक नहीं समझा जाता है तो सोशल सिक्योरिटी तो बहुत दूर की बात है. इस के साथ ही परिवार और समाज का नजरिया भी इन के प्रति दोयम दर्जे का होता है. बेरोजगारी के युग में युवाओं को लगता है कम से कम कुछ तो कर रहे हैं लेकिन समाज उन्हें सम्मान नहीं देता है.

डाटा एंट्री जौब भी बर्बाद कर रहा युवाओं को

देश में बेरोजगारी चरम पर होने की वजह से डेटा एंट्री की नौकरियां अकसर पढ़ेलिखे युवाओं के लिए एक राहत के विकल्प के रूप में नजर आती है. ये भी डिलीवरी बौय की नौकरी और कैब ड्राइवर्स की नौकरियों की तरह दिखने में आसान होती हैं. कंप्यूटर, इंटरनेट और थोड़ी टाइपिंग स्किल के साथ शुरू की जा सकती हैं. मगर इस का कड़वा सच यह है कि यह क्षेत्र सब से तेजी से औटोमेट हो रहा है, जिस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. इस वजह से बड़े शहरों में अब ऐसी जौब्स खत्म होने के कगार पर है. क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग तकनीकें डाटा को खुद प्रोसेस करती है, जिस से इंसानों की जरुरत घटती जा रही है. इस के साथ ही इन नौकरियों में फिक्स सैलरी नहीं होती है और काम के आधार पर पैसा मिलता है. इस वजह से अधिकतर युवा कुछ महीनों में ही मानसिक और शारीरिक थकावट का शिकार हो जाते हैं. ऐसा अनुमान है कि 1 से 2 वर्षों में यह नौकरियां गायब हो जाएंगी या इस की मांग बहुत ही घट जाएगी.

अधिकतर लोग जो गिग इकोनमी में काम करते हैं उन की उम्र 18 से 25 साल के बीच होती हैं. इन की स्पीड, उर्जा और काम करने की ललक शुरूआती दौर में कंपनियों को आकर्षित करती है. मगर जैसे ही ये 30 के आसपास आते हैं उन की स्पीड घटती है लेकिन जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं. इस के साथ ही कंपनी नए और सस्ते तेज वर्कर्स की तलाश करने लगती है, क्योंकि भारत एक युवा देश है इसलिए कंपनियों को काम के लिए युवाओं की कमी नहीं है. लेकिन आगे चल कर ये युवा भी बेकार हो जाते हैं.

ऐसे कंपनियों में प्रमोशन ज्यादा नहीं मिलता है, गिग इकोनमी में काम करने वाले अधिकतर लोग अपनी जिंदगी से हताश निराश होते हैं. और जिल्लत की जिंदगी जीते हैं. गिग इकोनमी में काम करने वाले अधिकतर युवाओं को लगता है कि वे सुपरवाइजर बनेंगे या किसी स्थिर स्थिति में पहुंचेंगे, लेकिन सच्चाई यह है कि 90 फीसदी से अधिक लोगों को कोई प्रमोशन नहीं मिलता है. इस के साथ ही इन लोगों के पास कोई अपग्रेडेड स्किल्स पाने का समय भी नहीं होता और न ही पैसा होता है. ये लोग उम्र के मोड़ में नौकरी के लायक नहीं रह जाते, और इन के पास कोई विकल्प नहीं बचता.

बाजार में स्किल्स की मांग करता है, लेकिन गिग वर्क में स्किल्स का कोई महत्त्व नहीं है. कंपनियों में तेज काम करने वाले, नियम को मानने वाले और ज्यादा सवाल न करने वाले लोगों को नौकरी पर रखा जाता है. भारत में स्किल इंडिया जैसे कई सरकारी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, मगर ये गिग वर्कर की पहुंच से बाहर हैं यानी प्रभावशीलता असंगठित क्षेत्र तक नहीं पहुंच पा रही है. सुदूर देहात से आने वाले युवा जिन तकनीकों को सीखते हैं, वे अकसर बाजार की जरूरतों के अनुसार नहीं होती है. वे जोमेटो, स्विगी और उबर जैसे ऐप्स की दया पर निर्भर हो कर अपना काम करते हैं. क्योंकि ऐसे युवाओं पर परिवार की जिम्मेदारियां होती हैं और ये कम पढ़े लिखे होते हैं. इन्हें किसी भी हाल में अपने घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना होता है.

गिग वर्कर्स की बढ़ती संख्या

नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत में गिग वर्कफोर्स 2029-30 तक बढ़ कर 2.35 करोड़ तक पहुंच सकती है, जबकि 2020-21 में यह संख्या मात्र 77 लाख थी. इस का मतलब है कि आने वाले समय में देश की एक बड़ी आबादी गिग वर्क पर निर्भर होगी. रिपोर्ट के अनुसार, तब तक गिग वर्कर्स गैर-कृषि कार्यबल का 6.7 प्रतिशत और कुल आजीविका साधनों का 4.1 प्रतिशत हिस्सा होंगे. यानी, लाखों लोग ऐसे कामों में लगे होंगे, जिन में न तो स्थिरता है और न ही सामाजिक सुरक्षा.

कानूनी सुधार की सख्त जरूरत

आज तक सरकार ने गिग वर्कर्स के लिए कोई ठोस कानूनी ढांचा नहीं बनाया. श्रम संहिताएं सालों से कागजों पर अटकी हुई हैं. अगर इन्हें ईमानदारी से लागू किया जाए तो गिग वर्कर्स को स्पष्ट अधिकार, कल्याण बोर्ड और सामाजिक सुरक्षा मिल सकती है.

नीदरलैंड, यूके और कैलिफोर्निया जैसे देशों ने गिग वर्कर्स को कर्मचारियों का दर्जा दिया है, लेकिन भारत अब भी प्लेटफौर्म कंपनियों के दबाव में चुप बैठा है. सवाल यह है कि जब लाखों लोग इस सेक्टर में काम कर रहे हैं तो सरकार आखिर किस के लिए श्रम कानून बना रही है?

भारत में गिग वर्कर्स एक ही समय में कई प्लेटफौर्म्स पर काम करते हैं. ऐसे में पोर्टेबल बेनेफिट्स सिस्टम बेहद जरूरी है, जिस में स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और बेरोजगारी भत्ता एक जगह से मिल सके.

सरकार ने ई-श्रम पोर्टल शुरू तो किया, लेकिन उस का असर जमीनी स्तर पर न के बराबर है. लाखों गिग वर्कर्स को अब भी डिजिटल पहचान, कल्याण योजनाओं और रोजगार अवसरों से नहीं जोड़ा गया है. औपचारिकीकरण सिर्फ घोषणा पत्रों में है, जबकि असल में गिग वर्कर्स आज भी ‘न दिखने वाला वर्कफोर्स’ बने हुए हैं.

गिग वर्कर का अनुभव

अपनी पहचान न उजागर करने की शर्त पर एक गिग वर्कर ने बताया कि गिग वर्क में आने से पहले उन्होंने छोटेमोटे काम किए थे, जिन से बहुत स्थिर आय नहीं हो पाती थी. रोजगार की तलाश में उन्हें लगा कि गिग वर्क यानी डिलीवरी, कैब सर्विस या डेटा एंट्री जैसे काम अपेक्षाकृत आसान और तुरंत मिलने वाले विकल्प हैं. यही कारण था कि उन्होंने इस क्षेत्र में कदम रखा. यह उन का पहला रोजगार नहीं था, लेकिन पहले जो काम कर रहे थे वह टिकाऊ नहीं था, इसलिए उन्हें लगा कि यह नया विकल्प थोड़ा स्थायी और सम्मानजनक हो सकता है.

उन्होंने शुरुआत एक लोकप्रिय प्लेटफौर्म के साथ की, क्योंकि उस समय वही आसानी से काम दिला रहा था और ज्यादा लोगों को रोजगार दे रहा था. कंपनी ने काम शुरू करने से पहले कुछ जरूरी डौक्यूमेंट्स मांगे और औपचारिकताएं पूरी करवाईं. किसी तरह की औपचारिक ट्रेनिंग नहीं दी गई, बल्कि सीधे काम पर लगा दिया गया. शुरुआती दिनों में उन की कमाई बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन काम के घंटे लंबे होते थे. अकसर 10 से 12 घंटे तक काम करना पड़ता था.

कंपनी उन्हें “पार्टनर” कहती थी, लेकिन वास्तविकता में उन्हें कभी यह नहीं लगा कि वे सचमुच पार्टनर हैं. शुरुआती दिनों का अनुभव मिलाजुला रहा, कभी काम का बोझ ज़्यादा होता, तो कभी ग्राहकों का व्यवहार अच्छाबुरा दोनों तरह का मिलता. कई बार समय पर डिलीवरी या राइड पूरी करने का दबाव इतना बढ़ जाता कि मानसिक तनाव महसूस होता.

खराब रेटिंग मिलने पर कंपनी का रवैया सामान्य रहता था, लेकिन इस से मनोबल पर असर पड़ता था. ट्रैफिक, मौसम या दुर्घटना जैसी मुश्किलों में कंपनी ने कभीकभी मदद की, लेकिन नियमित या पर्याप्त नहीं. मैडिकल, बीमा या छुट्टी जैसी सुविधाएं उन्हें नहीं मिलीं. लंबे काम के घंटे और असुरक्षित हालातों के चलते उन्हें शारीरिक और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ा. कमाई इतनी नहीं होती थी कि घर का खर्च आराम से चल सके, कई बार उन्हें उधार लेना पड़ता. बचत करना लगभग असंभव था.

उन्हें कभी प्रमोशन या स्किल अपग्रेड का मौका नहीं दिया गया और न ही यह अहसास हुआ कि इस काम से कोई लंबा कैरियर बन सकता है. अकाउंट ब्लॉक होने की समस्या उन के साथ नहीं हुई, लेकिन कंपनी ने काम कम होने पर कोई वैकल्पिक अवसर भी नहीं दिया. पेमेंट रोकने की स्थिति भी उन के साथ नहीं बनी.

ज्यादा शारीरिक थकान और मानसिक रूप से दबाव महसूस करने के कारण आखिरकार उन्होंने यह काम खुद ही छोड़ दिया. थोड़े दिनों के बाद जब कहीं दुबारा नया काम नहीं मिला तो उन्हें दूसरे गिग प्लेटफौर्म पर काम मिला.

उन्होंने आगे ये भी कहा कि “इस काम ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है, अलगअलग जगहों को पहचानना, लोगों से कैसे व्यवहार करना चाहिए और रोजमर्रा के कामकाज का असली स्वरूप. लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि गिग वर्क से स्थायी सुरक्षा, बचत या लंबा कैरियर नहीं बन सकता. हमें रोज कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन बदले में न तो कोई गारंटी मिलती है और न ही भविष्य की सुरक्षा. मेरी राय में सरकार और कंपनियों को गिग वर्कर्स के लिए कम से कम कुछ बुनियादी सुविधाएं ज़रूर देनी चाहिए, जैसे मैडिकल सुविधा, बीमा और न्यूनतम आय की गारंटी. इस से हमारी ज़िंदगी थोड़ी सुरक्षित और स्थिर हो सकेगी.”

वहीं फिलहाल वे नहीं कह सकते कि यह काम वे कब तक करेंगे. इस के साथ ही उन का ये कहना था कि आज के युवाओं को गिग वर्क में नहीं आना चाहिए, क्योंकि वे यहां लंबी पारी नहीं खेल सकते और साथ ही इस से घर भी ठीक से नहीं चलाया सकता है. अगर कोई युवा कम पढ़ालिखा है तो उसे नए स्किल्स सिखने पर जोर देना चाहिए. ऐसे स्किल्स को सीखना चाहिए, जिस से उन का भविष्य सुरक्षित रहे और पैसा भी अच्छा कम सकें.

यह साफ है कि गिग वर्कर्स की मेहनत पर कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं और सरकार उन की पीठ थपथपाने के बजाय आंखे मूंद कर बैठी है. अगर यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में गिग वर्कर्स देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बिना किसी सुरक्षा कवच के बनेंगे और इस से सीधे सीधे कोरपोरेट्स को फायदा पहुंचेगा.

औटोमेशन और एआई : भविष्य का सब से बड़ा खतरा

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई अब केवल कल्पना नहीं हकीकत है. एआई अब धीरेधीरे आसान और दोहराव वाले कामों को अपने कब्जे में ले रहा है. जोमेटो और स्विगी जैसे प्लेटफौर्म अब ड्रोन से डिलीवरी की योजना पर काम कर रहे हैं. इस के साथ ही इन्होने कई जगहों पर इस का सफल परीक्षण भी कर लिया है. वहीं गूगल और टेस्ला जैसी कंपनियां सेल्फ ड्राइविंग टैक्सियों पर काम कर रही हैं. धीरेधीरे ये कंपनियां भारत में एआई के जरिए अपना पैर पसार रही हैं और कई गिग वर्कर की नौकरियों को खाने जा रही हैं. एआई जितना अडवांस होगा वह गिग इकोनमी में उतना ही मुनाफा कमाकर देगा. इ-कौमर्स कंपनियों के एआई एक वरदान साबित होगी, लेकिन उन के यहां काम करने वालों के लिए यह किसी श्राप से कम नहीं है. कस्टमर सपोर्ट, डेटा इंट्री वौइस प्रोसेसिंग जैसी नौकरियां में अब मशीनें इंसान की जगह ले रही है. इस में सब से पहले उन गिग वर्कर्स को नुकसान होगा जिन के पास कोई स्किल या बैकअप नहीं है और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा है.

सामाजिक प्रभाव : सम्मान और अस्थिरता

अकसर गिग इकोनमी में काम करने वाले युवा समाजिक स्तर पर संघर्ष करते नजर आते हैं. एक डिलीवरी बौय, कैब ड्राइवर की नौकरी का मतलब होता है कि आप की नौकरी अस्थायी, कम वेतन वाली है. इस वजह से लोग इन्हें सम्मानहिन नजर से देखते है. विवाह के प्रस्तावों में इन्हें नाकारा जाता है. वहीं परिवार उन की नौकरी को कामचलाऊ मानते हैं. इस के साथ ही समाज इन्हें स्थायी पेशों की तुलना में नीचा समझता है. समाजिक दबाव और उपेक्षा इन युवाओं के आत्मविश्वास को बुरी तरह प्रभावित करती है. वे खुद को कमतर आंकने लगते हैं और कई बार रिश्तों और पारिवारिक जीवन में खटास भी आ जाती है.

जब कोई युवा में गिग वर्क में आता है और काम करना शुरू करता है तब उसे लगता है कि वह स्वतंत्र है और अपने पैरों पर खड़ा हो गया है. मगर कुछ ही वर्षों में वे मानसिक और शारीरिक रूप से थक जाता है. इस के साथ ही इस में फिक्स इनकम और पेशेवर विकास नहीं होने पर भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगता है. मोबाइल, सोशल मिडिया और लगातार तुलना की भावना मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती है, इस से कई गिग वर्कर को बारबार पैनिक अटैक का भी सामना करना पड़ता है. इस के साथ कई ऐसे भी मामले देखे गए हैं जिस में युवाओं की मुलाकात लड़कियों से होती है, जो या तो संबंध में बदलती है या शोषण व धोखे में. यह अस्थिरता युवाओं को और अधिक असुरक्षित बना देती है.

कौर्पोरेट स्ट्रक्चर : नए बनाम पुराने

हर साल कई स्टार्टअप्स शुरू होते हैं, जो गिग वर्कर्स को नौकरियां देते हैं. इस के साथ ही कई पुराने प्लेटफौर्म्स खत्म भी हो जाते हैं. हाल ही में दिल्ली में ब्लुस्मार्ट कैब सर्विस बंद हो गई. इस कंपनी के बंद होने हजारों ड्राइवर्स की नौकरी चली गई. वहीं जेप्टो, ब्लिंकिट और स्विगी इन्सटामार्ट के बीच जल्दी और्डर पूरा करने और बेस्ट सर्विस देने की जंग छिड़ी हुई है और इस में गिग वर्कर खूब पिस रहे हैं. वर्कर्स को न स्थायित्व मिलता है और न कोई अधिकार. वे बस इस सिस्टम का एक पुर्जा बन जाते हैं जिसे कभी भी बदल दिया जाता है.

जब हर सेक्टर में एआई और औटोमेशन के साथ बदलाव आएगा, तो इस की चपेट में सब से पहले गिग वर्कर्स आएंगे. गिग वर्कर्स जो पैसे कमाते हैं वह दैनिक जीवन में खर्च हो जाते हैं, सेविंग्स की कोई गुंजाइश नहीं बचती है. इस के साथ ही जब इन की क्षमता घटेगी तो उन के पास कोई सामाजिक सहारा नहीं होगा. एक पूरी पीढ़ी गरीबी, अपमान और अकेलेपन में डूब जाएगी.

विकल्प और रास्ता

इस समस्या से निकलने के लिए गहराई से सोचने और योजनाबद्ध कार्य की आवश्यकता है.
• पहला, स्किल अपग्रेडेशन की दिशा में काम किया जाए. एआई, इलैक्ट्रिक वाहन तकनीक, कोडिंग, रिपेयरिंग जैसे आधुनिक कौशल सिखाए जाएं.
• दूसरा, सरकार को स्थायी रोजगार निर्माण पर ध्यान देना होगा. मैन्युफैक्चरिंग, शिक्षा, हैल्थ और स्थानीय उद्योगों में रोज़गार के अवसर बढ़ाने होंगे.
• तीसरा, गिग वर्कर्स के लिए यूनियन बनाई जाए जो उन के अधिकारों की रक्षा करे, उन की आवाज सरकार तक पहुंचाए.
• चौथा, नीति और सुरक्षा के स्तर पर बदलाव हो. बीमा, पीएफ, मेडिकल सुविधा, और छुट्टियां इन्हें भी मिलनी चाहिए.

गिग इकोनमी आज की हकीकत है, लेकिन इसे मानवतावादी और न्यायपूर्ण बनाना समय की मांग है. यदि हम ने इस चुपचाप पल रहे संकट को नहीं रोका, तो एक पूरी पीढ़ी तकनीकी चमक के पीछे अंधकार में गुम हो जाएगी.  Gig Work

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