होली यों तो मौजमस्ती और रंगों का उत्सव है लेकिन कैमिकल और मिलावटी रंगों के प्रयोग से होली का रंग बदरंग हो जाता है. नतीजतन कई तरह की हैल्थ प्रौब्लम त्योहार को कड़वा अनुभव बना डालती है. इस होली आप के रंग में भंग न पड़े, इस के लिए किन जरूरी बातों का ध्यान रखें, जानिए इस लेख में.
फागुन का महीना यानी मस्ती का आलम और होली के दिन तो क्या बच्चे क्या बूढ़े और क्या जवान, सभी मस्ती में डूब जाते हैं. मस्तानों की टोली एकदूसरे को रंग और गुलाल से सराबोर कर देती है. चुहलबाजी और छेड़छाड़ इस दिन जम कर होती है. इस रंगीले त्योहार में लोग गम को भूल कर खुशियों के रंग में डूब जाते हैं.
वक्त बदलने के साथसाथ लोग भी बदल गए हैं. उन के पास रंगों के चुनाव के लिए समय नहीं है. बदले जमाने में लोगों के पास अब बुरांस या टेसू के फूलों का रंग बनाने का समय नहीं है, इसलिए बिना वक्त गंवाए लोग बाजार से रंग खरीद लेते हैं क्योंकि तरहतरह के रंगों से बाजार अटा पड़ा होता है. इस दौरान वे यह भी नहीं देखते कि वे जो रंग खरीद रहे हैं वे असली हैं या नकली. यह जरूर देखते हैं कि वे चटख व असरदार हैं पर इन रंगों में तरहतरह के कैमिकल व शीशाचूर्ण इतना होता है कि उन का सीधासीधा असर आप के शरीर पर
पड़ता है.
हर्बल रंगों का करें इस्तेमाल
सीनियर फिजीशियन डा. कृष्ण कुमार अग्रवाल का कहना है कि जो रंग या गुलाल ज्यादा चमकदार होगा, समझिए कि उस में ज्यादा मात्रा में कैमिकल मौजूद हैं. असली रंगों की मात्रा को कम करने के लिए ऐसा किया जाता है. एक समय सिंघाड़े के आटे से गुलाल बनाया जाता था. पर महंगाई इतनी है कि अब यह दूर की कौड़ी है. अब तो घटिया अरारोट के अलावा अबरक पीस कर मिला दिया जाता है, ताकि वह चमकीला लगे. इस के अलावा कई तरह के कैमिकल मिला कर गुलाल बनाए जाते हैं.
आप की होली खुशनुमा हो इस के लिए होली की मस्ती में यथासंभव हर्बल रंगों का इस्तेमाल करें. हर्बल रंग से आप की त्वचा खराब नहीं होगी. लेकिन ज्यादातर लोग नौनहर्बल रंगों का इस्तेमाल करते हैं. नौनहर्बल रंगों में कैमिकल के अलावा पेंट व शीशा मिला हुआ होता है, इस से शरीर की चमड़ी पर बुरा असर पड़ता है.
ग्रीन कलर यानी हरा रंग आंखों के लिए खतरनाक है, क्योंकि हरे रंग में शीशा मिलाया जाता है. वहीं लाल रंगों में लेड मिलाया जाता है जो सेहत के लिए खतरनाक है क्योंकि अगर यह रंग पेट के अंदर चला जाए तो चिड़चिड़ापन होने लगता है.
होली पर बाजार में बेचे जाने वाले ज्यादातर रंग औक्सीडाइज्ड मैटल होते हैं या इंजन औयल के साथ इंडस्ट्रियल ड्राई को मिक्स कर के तैयार किए जाते हैं. हरा रंग कौपर सल्फेट से, बैगनी क्रोमियम आयोडाइज्ड से, सिल्वर एल्युमिनियम ब्रोमाइड और काला रंग लेड औक्साइड से तैयार किया जाता है. रंग को चमकदार बनाने के लिए अकसर रंग में कांच का बुरादा मिलाया जाता है. ये सभी रंग विषैले होते हैं. इन से त्वचा में एलर्जी, आंखों में जलन और यहां तक कि अंधेपन जैसी परेशानी भी हो सकती है. धोने पर जब वे पानी या मिट्टी में मिल जाते हैं तो प्रदूषण का कारण बनते हैं. इसीलिए सभी को सुरक्षित रंगों से ही होली खेलनी चाहिए.
लेड औक्साइड (काला) से गुरदे खराब हो सकते हैं. यह व्यक्ति की सीखने की क्षमता को भी समाप्त कर सकता है. कौपर सल्फेट (हरा) आंखों में एलर्जी और अस्थायी अंधेपन का कारण बन सकता है. क्रोमियम आयोडाइड (परपल) ब्रोंकियल अस्थमा और एलर्जी पैदा कर सकता है. एल्युमिनियम ब्रोमाइड (सिल्वर) से कैंसर तक की बीमारी हो सकती है. बेहतर यही होगा कि आप प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करें. इन रंगों को प्राकृतिक पदार्थों से बनाया जाता है.
त्वचा की एलर्जी
नई दिल्ली स्थित सर गंगाराम अस्पताल के सीनियर त्वचा विशेषज्ञ डा. रोहित बत्रा ने पाउडर एवं तरल रंगों से होने वाली परेशानियों के बारे में बताया कि इन रंगों को अत्यधिक सक्रिय रासायनिक पदार्थों से बनाया जाता है जो त्वचा की गंभीर बीमारियों को जन्म देती है. जैसे :
एक्जिमा : यह कृत्रिम रंगों के कारण होने वाली त्वचा की आम बीमारियों में से एक है. इस एलर्जिक अवस्था में त्वचा की परतें उतरने लगती हैं, परतें उतरने के कारण बहुत ज्यादा खुजली होती है. त्वचा पर सूजन आ जाती है. इस के अलावा त्वचा पर फफोले पड़ जाते हैं.
डर्मेटाइटिस : एटोपिक डर्मेटाइटिस रंगों की रासायनिक प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप होने वाली एक अन्य प्रकार की एलर्जी है. इस में रोगी को बहुत तेज खुजली व दर्द होता है और त्वचा पर फफोले पड़ जाते हैं.
रासायनिक रंगों से नाक की झिल्ली में सूजन आ जाती है. नाक में कंजेशन, डिस्चार्ज, खुजली और बारबार छींक जैसी समस्या अकसर हो जाती है.
अस्थमा : कृत्रिम रंगों के इस्तेमाल से वायु मार्गों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है. यह अस्थमा का कारण बन सकता है. एलर्जिक स्थिति में व्यक्ति को सांस लेने में परेशानी होने लगती है.
न्यूमोनाइटिस यानी न्यूमोनिया : रासायनिक रंगों के इस्तेमाल से व्यक्ति न्यूमोनिया का शिकार भी हो सकता है, इस में रोगी को बुखार, छाती में अकड़न, थकान और सांस लेने में परेशानी होती है.
त्वचा की देखभाल
रंग खेलने जाने से कम से कम 10 मिनट पहले चेहरे पर सनस्क्रीन और मौश्चराइजर लगाएं. होंठों को हानिकारक रंगों से बचाने के लिए होंठों पर लिप बाम की मोटी परत लगाएं. नाखूनों पर ट्रांसपैरेंट नेलपौलिश लगाएं. त्वचा पर नारियल, बादाम, औलिव या सरसों का तेल लगाएं. कानों के पीछे तेल लगाना न भूलें.
इस दौरान किसी भी तरह के फेशियल ट्रीटमैंट से बचें. अगर आप को किसी तरह की एलर्जी की समस्या है तो किसी त्वचा रोग विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें और विशेषज्ञों की सलाह लिए बिना किसी प्रकार की दवाई न लें.
बालों को हानिकारक रंगों से बचाने के लिए बालों में खूब सारा तेल लगा लें ताकि डाई और रंगों में मौजूद हानिकारक पदार्थ आप के बालों और सिर की त्वचा से न चिपकें. होली खेलने के दौरान पूरी आस्तीन के कपड़े पहनें. शौट्स के बजाय पूरी लंबाई की पैंट पहनें जिस से आप की त्वचा ढकी रहे.
अपने नाखूनों से रगड़ कर रंग निकालने की कोशिश न करें. शरीर और चेहरे की त्वचा के लिए गे्रन्यूलर स्क्रब का इस्तेमाल करें. रंग निकालने के लिए बालों को2-3 बार शैंपू से अच्छी तरह धोएं. बालों को रूखा होने से बचाने के लिए कंडीशनर लगाना न भूलें. नहाने के बाद शरीर और चेहरे पर बहुत सारा मौश्चराइजर भी लगा लें.
अगर आंखों में रंग चला जाए तो उन्हें रगड़ने के बजाय साफ पानी से छींटे मार कर धोएं.
कैमिकल रंगों से करें परहेज
होली के रंग की मस्ती में भंग न हो जाए इसलिए फल, सब्जी व अनाज से बनने वाले पीला, केसरिया व बैगनी रंगों का इस्तेमाल करें. आंवला से बनने वाले केसरिया रंग व बुरांस के पेड़ से बनने वाले लाल रंग के अलावा चंदन से बनने वाले गुलाल से ही होली खेलें.  कैमिकल से बने रंगों के इस्तेमाल से परहेज करें. शराब पी कर हुल्लड़बाजी
से बचें. बेहूदा हरकत न करें और न ही दूसरे को यह हरकत करने दें. नहीं तो कहीं रंग में भंग न पड़ जाए और रंग शरीर को कहीं बदरंग न कर दे. भई, होली खेलिए, मौजमस्ती कीजिए, पर सलीके से. तभी आप होली का सही माने में मजा ले पाएंगे.
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