समाज में पुलिस की आलोचना करने से पहले लोग पीछे हटते थें. उनको लगता था कि पुलिस का विरोध करना उनको नाराज करने जैसा होता है. अब पुलिस की आलोचना होने लगी है. उसकी अपराध में भूमिका पर खुलकर चर्चा की जा रही है. इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि खुद पुलिस के रिटायर अफसर चाहते हैं कि ऐसी परिचर्चा हो जिससे पुलिस में सुधार आ सके.

लखनऊ में आभा जगत ट्रस्ट ने महिला अपराध और पुलिसकी भूमिका पर परिचर्चा का आयोजन किया तो समाज के हर वर्ग ने अपनी व्यथा सुनाई. इस परिचर्चा से सुधार के बिन्दू भी सामने आये. रिटायर पुलिस ऑफिसर सुव्रत त्रिपाठी ने अपने सुझाव में कहा कि अगर पुलिस अपनी जनरल डायरी जीडी मुकदमें की केस डायरी यानि सीडी और पीड़ित का धारा 164 का बयान समय पर सही से लिखें तो आधी परेशानी का अंत हो जायेगा.

परिचर्चा में कई समाजिक संगठनों से जुड़े वक्ताओं ने पुलिस के साथ अपने अनुभव शेयर किये जिससे यह पता चला कि पुलिस में जनता को लेकर कोई बदलाव सोच में नहीं हुआ है सत्ता के बदलने से किसी भी तरह का बदलाव नहीं होता है. यह बात भी सामने आई कि पुलिस तमाम मामलों में पीड़ित को ही फंसा देती है.

गांव में महिलाओं की क्या हालत है और वह पुलिस को कैसे देखती है. इस विषय पर मोहनलाल गल तहसील की ब्लॉक प्रमुख विजय लक्ष्मी ने अपनी बात रखी और कहा कि गांवो में अभी भी महिलाएं पुलिस के पास शिकायत लेकर जाने में डरती हैं. अधिवक्ता पवन उपाध्याय और अभिषेक चौहान ने कहा कि पुलिस मुकदमें की पैरवी सही से नहीं करती जिससे आरोपी छूट जाता हैं.

पावर विंग की सुमन रावत ने पुलिस के साथ अपने अनुभव बताते हुए कहा कि पुलिस को बहुत संवेदनशील होने की जरूरत है. मनोविज्ञानी डॉक्टर मधु पाठक ने अपनी बात में कहा कि पुलिस का भय शिकायत करने वालों में हट जाये. जिससे वह अपनी बात को सही तरह से कह सकें. आभा जगत ट्रस्ट की शिवा पांडये ने कहा कि ऐसे सेमिनार से लोगों में आपनी बात को बिना किसी डर के कहने की हिम्मत आती है. इस से पुलिस में भी सुधार होता दिखता है.