कल तक जिन की बिहार के एजुकेशन सिस्टम में तूती बोलती थी, जिन के इशारे पर मैट्रिक और इंटर के इम्तिहान में गलत को सही और सही को गलत करार दे दिया जाता था, जिन के आगे हर स्कूल के प्रिंसिपल से ले कर चपरासी तक नतमस्तक रहते थे, आज वही दोनों चेहरे अपने मुंह छिपाने को मजबूर हैं. पुलिस ने जब दोनों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया तो घोटालेबाज मियांबीवी की जोड़ी हर किसी से अपना चेहरा छिपाए चल रही थी.

बिहार के टौपर्स घोटाले के मास्टरमाइंड बंटी और बबली ने राज्य के स्टूडैंट्स के भविष्य के साथ घिनौना खेल तो खेला ही, पूरे एजुकेशन सिस्टम पर कालिख भी पोत डाली है. देश के दूसरे राज्यों में बिहार की डिगरी की पहले ही कोई खास कद्र नहीं थी, टौपर्स घोटाले ने तो बिहार के एजुकेशन सिस्टम को जीरो पर ला कर खड़ा कर दिया है.

टौपर्स घोटाले के किंगपिन लालकेश्वर प्रसाद और उस की बीवी ऊषा सिन्हा आखिर 13 दिनों की लुकाछिपी के बाद 20 जून को पुलिस के हत्थे चढ़ गए. टौपर्स घोटाले का मास्टरमाइंड बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड का पूर्व अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद और उस की बीवी का रुपयों के बल पर जाहिलों को टौपर बनाने का खेल खत्म हो गया. 7 जून से फरार घोटालेबाज मियां बीवी को पुलिस ने 20 जून को बनारस की रवींद्रपुरी कालोनी के एक आश्रम के पास दबोच लिया. दोनों बनारस के शराब के बड़े कारोबारी प्रभात जायसवाल के घर में चोरों की तरह छिपे हुए थे. पुलिस की स्पैशल इन्वैस्टिगेशन टीम यानी एसआईटी को गिरफ्तारी के 5 दिनों पहले ही दोनों के बनारस में होने की खबर मिली थी और उन का मोबाइल लोकेशन भी बनारस दिखा रहा था.

पुलिस ने बताया कि लालकेश्वर का अपने बेटे पिक्कू से मोबाइल फोन पर बात करना उस की गिरफ्तारी का माध्यम बना. लंदन में रहने वाला लालकेश्वर का इंजीनियर बेटा पटना पहुंच कर अपने मातापिता की जमानत की कोशिशों में लगा हुआ था और वह बारबार अपने पिता व मां से बातचीत कर रहा था. कोर्ट से अग्रिम जमानत लेने की कोशिश नाकाम रही और दोनों पुलिस के फंदे में फंस गए. लालकेश्वर और ऊषा समेत सारे आरोपियों पर जालसाजी, धोखाधड़ी, ठगी, आपराधिक षड्यंत्र और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामले दर्ज किए गए हैं.

पटना विश्वविद्यालय से एमए (भूगोल) में टौपर रहा लालकेश्वर पैसे के बूते टौपर बनाने के खेल खेलने में लगा हुआ था और उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि उस के खेल का भंडाफोड़ हो जाएगा. साल 1971-73 बैच का वह टौपर था. 7 जनवरी, 1976 को पटना विश्वविद्यालय में ही उसे लैक्चरर की नौकरी भी मिल गई. टौपर होने की वजह से कुलपति ने उस की सीधी नियुक्ति की थी. 1 जून, 2009 को वह पटना कालेज का प्रिंसिपल बना. उस की पत्नी ऊषा सिन्हा साल 1977 में मगध विश्वविद्यालय के गया कालेज में लैक्चरर बनी थी. साल 1981 में उस का तबादला पटना के कौमर्स कालेज में हुआ और साल 2009 में वह गंगा देवी महिला कालेज की प्रिंसिपल बनी थी.

इंटर की परीक्षा के टौपर्स घोटाले को ले कर बिहार को एक बार फिर कलंकित करने में बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड के अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद और एक प्राइवेट स्कूल के संचालक बच्चा राय के हाथ रहे हैं. इन दोनों ने रुपयों के लालच में ऐसे छात्रों को स्टेट टौपर बना दिया जिन्हें इतना भी पता नहीं था कि किस सब्जैक्ट में किस चीज की पढ़ाई होती है. इंटर आर्ट्स टौपर रूबी राय से पूछा गया कि पौलिटिकल साइंस में किस चीज की पढ़ाई होती है तो उस ने कुछ देर सोचने के बाद जवाब दिया कि पौलिटिकल साइंस में खाना बनाने की पढ़ाई होती है. रूबी को कुल 500 में 444 नंबर मिले थे. जैसेजैसे मामले की जांच आगे बढ़ रही है, वैसेवैसे लालकेश्वर और बच्चा की कलई खुलती जा रही है.

जब टौपर्स को ले कर सरकार और बोर्ड की छीछालेदर होने लगी तो बोर्ड के अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद ने खुद ही सारे टौपर्स का टैस्ट लिया और उस के बाद ऐलान कर डाला कि सभी टौपर्स ने सारे सवालों के सही जवाब दिए. सभी बच्चे टेलैंटेड और अप टू मार्क हैं. अध्यक्ष के दावे के उलट इंटर साइंस टौपर सौरभ श्रेष्ठ और थर्ड टौपर राहुल कुमार को नौलेज टैस्ट में जीरो नंबर मिले. सौरभ के गणित में 85 नंबर आए थे. पर कमेटी के टैस्ट में उसे 25 में से 3 नंबर मिले. अंगरेजी के पर्चों में उस के 87 नंबर आए थे, जबकि टैस्ट में उसे जीरो नंबर मिले. भौतिक विज्ञान में 83 नंबर लाने वाले सौरभ को कमेटी के टैस्ट में महज 5 नंबर मिले. थर्ड टौपर राहुल को अंगरेजी में 87 नंबर मिले थे पर टैस्ट में उसे जीरो मिला. 25-25 नंबर के टैस्ट में राहुल को भौतिकी में 2, रसायन विज्ञान में 3, गणित में 2 नंबर मिले.

जांच का खेल

टैस्ट के बाद दोनों का रिजल्ट रद्द कर दिया गया. बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड के इतिहास में यह पहला मौका है जब टौपर्स के रिजल्ट रद्द कर दूसरे को टौपर घोषित किया गया हो. दोनों ही टौपर विशुन राय कालेज के स्टूडैंट हैं.

बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के पूर्व अध्यक्ष राजमणि प्रसाद का कहना है कि बिहार बोर्ड के रिजल्ट में शिक्षा माफियाओं की जम कर चलती रही है. साल 2014 में जब वे बोर्ड के अध्यक्ष थे तो रिजल्ट आने के पहले ही सभी टौपर्स की कौपियों की दोबारा जांच की गई थी. 40 टौपर्स को पत्र भेज कर बोर्ड के दफ्तर बुलाया गया था पर केवल 5 छात्र ही पहुंच सके थे. साल 2013 में भी ऐसे मामलों का खुलासा हुआ था. शिक्षा माफिया मूल्यांकन केंद्र पर ही अपना सारा खेल खेलते हैं. इस खेल में ज्यादातर एफिलिएटेड कालेजों से जुड़े लोग शामिल होते हैं. कौपी की जांच के दौरान मनमाफिक नंबर तय कर लिए जाते हैं.

वैशाली जिले का विशुन राय कालेज पहले भी विवादों में रह चुका है. इस साल आर्ट्स की टौपर रूबी राय, इंटर साइंस का टौपर सौरभ श्रेष्ठ और तीसरे नंबर पर रहे राहुल राज इसी कालेज के छात्र हैं. साइंस टौपर्स में 7वें नंबर पर रही शिवानी भी इसी कालेज की है. साल 2005 में इस कालेज के 374 छात्रों ने परीक्षा दी थी जिन में सभी छात्र प्रथम श्रेणी से पास हो गए थे. एक ही कालेज से इतने फर्स्ट डिवीजन देख कर तब के बोर्ड अध्यक्ष नागेश्वर शर्मा ने रिजल्ट रोक दिया था. दोबारा उन की कौपियों की जांच की गई तो केवल 4 छात्र ही फर्स्ट डिवीजन से पास हो सके.

इस साल राज्य में साइंस का रिजल्ट 67.07 फीसदी रहा. वहीं, विशुन राय कालेज के इंटर साइंस का रिजल्ट 97.52 फीसदी रहा. परीक्षा में शामिल 646 छात्रों में से 630 पास हुए. 534 छात्रों ने फर्स्ट डिवीजन से पास किया. 96 छात्रों ने सैकंड क्लास से पास किया और 14 छात्र फेल हुए.

मैरिट घोटाले को ले कर सरकार और बोर्ड की फजीहत होने के बाद बोर्ड के चेयरमैन ने 8 जून को इस्तीफा दे दिया और गिरफ्तारी के डर से फरार हो गए थे.

पुलिस की जांच में पता चला है कि पटना का राजेंद्रनगर बौयज हाईस्कूल ही घोटालेबाजों का केंद्र है. इस स्कूल में केवल वैसे ही कालेजों की कौपियां जांच के लिए आती थीं जिन में घोटाले को अंजाम दिया जाता था. फिलहाल, यह स्कूल सैदपुर नहर के पास के गर्ल्स हाईस्कूल कैंपस में चल रहा है. पहले इस स्कूल में मूल्यांकन का काम नहीं होता था पर लालकेश्वर प्रसाद के बोर्ड के अध्यक्ष बनने के बाद ही इसे मूल्यांकन केंद्र बनाया गया था. बोर्ड के अफसर उस केंद्र पर अपने पसंदीदा शिक्षकों को डैप्यूटेशन पर भेज कर कौपियों का मूल्यांकन करवाते थे.

इस साल के इंटर टौपर्स के जाहिलपन के खुलासे के बाद लालकेश्वर अपने ही बुने जाल में फंस गया. उस ने भले ही अपने इस्तीफे में लिखा कि वह नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे रहा है पर जैसेजैसे मैरिट घोटाला परतदरपरत खुल रहा है तो यह पता चल रहा है कि बोर्ड अध्यक्ष रहते हुए उस ने नैतिकता को ताक पर रख दिया था. उस ने पूरे देश और विदेशों में बिहार की शिक्षा व्यवस्था की किरकिरी करवा डाली. लालकेश्वर प्रसाद ने अपने कार्यकाल में रुपयों के लालच में स्कूलों को खूब ‘प्रसाद’ बांटा. उस ने 2 सालों में सारे नियमकायदों को ताक पर रख कर करीब 200 इंटर कालेजों को मान्यता दे दी. मान्यता देने से पहले यह देखा ही नहीं गया कि कालेज का कैंपस कितने क्षेत्रफल में है? भवन कैसा है? लैबोरेटरी है या नहीं? लाइबे्ररी बनी है या नहीं? टीचर कैसे हैं?

26 जून, 2014 को बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अध्यक्ष बनने वाले लालकेश्वर ने पद संभालने के बाद से ही मनमानी चलानी शुरू कर दी थी.

शातिर खिलाड़ी

लालकेश्वर ने अपने घोटाले तंत्र को चलाने के लिए एक नहीं, बल्कि 3 सचिवों को बहाल कर रखा था और सभी को सरकारी खजाने से ही वेतन दिया जाता था. तीनों सचिवों को उस ने बोर्ड का काम करने के बजाय अपना दलाल बना कर रखा था. बोर्ड के सूत्र ने बताया कि लालकेश्वर ने 3 नहीं, बल्कि 4 सचिवों को बहाल कर रखा था. इस लिहाज से भी उस ने बोर्ड को लाखों रुपए का चूना लगाया. सचिवों से बोर्ड का काम कराने के बदले फर्स्ट डिवीजन से पास कराने और टौपर बनाने की दलाली करवाई. पहला सचिव अनिल कुमार 2-2 जगहों से वेतन लेता था.

हिलसा का प्रखंड प्रमुख रह चुका अनिल मुंगेर के तारापुर में नियोजित टीचर है. पुलिस ने उसे 15 जून को हिलसा से गिरफ्तार किया. दूसरा सचिव विकास चंद्र उर्फ डब्लू था, जो लालकेश्वर के साले का बेटा है. वह पटना के सरिस्ताबाद महल्ले में रहता है और फिलहाल फरार है. तीसरा सचिव देवेंद्र कुमार उर्फ चुन्नू है. वह पटना के लोहानीपुर महल्ले का रहने वाला है और वह भी पुलिस की पकड़ से दूर है.

इंटर टौपर घोटाले के मामले में मुख्य आरोपी विशुन राय कालेज का संचालक बच्चा राय की बेटी शालिनी राय को इंटर में साइंस टौपर बनाने की पूरी तैयारी कर ली गई थी. स्कू्रटनी के बाद बाकायदा इस का ऐलान करने की तैयारी की गई थी. घोटाले के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने 3 टौपर रूबी राय, सौरभ श्रेष्ठ और राहुल कुमार के साथ शालिनी को भी एफआईआर में अभियुक्त बनाया है. शालिनी साल 2014 में मैट्रिक की टौपर रही है.

शालिनी ने अपने पिता के ही विशुन राय कालेज से इंटर साइंस का परीक्षाफौर्म भरा और उसे ऐडमिट कार्ड भी जारी हुआ था. इस के बाद भी वह परीक्षा में शामिल नहीं हुई. अटेंडैंस शीट में उसे गैरहाजिर दिखाया गया है जबकि बोर्ड के रिजल्ट में उस के नंबर दिखाए गए हैं. बोर्ड ने शालिनी की उत्तरपुस्तिका को तैयार कर रखा था जिस का रोल नंबर — 10106 और रोल कोड — 33014 है. स्क्रूटनी के बाद बोर्ड हर साल रिजल्ट को रिवाइज करता है. रिवाइज रिजल्ट में शालिनी को टौपर घोषित करने की योजना थी. गौरतलब है कि पिछले 3 सालों के दौरान कई बार इंटर टौपर बदले गए हैं. इस खुलासे के बाद अब शालिनी का मैट्रिक का रिजल्ट भी शक के घेरे में आ गया है. उस के रिजल्ट की जांच की जा रही है. उस के मैट्रिक के रिजल्ट को कैंसिल किया जा सकता है.

कई रैकेट हैं शामिल

आमतौर पर हर परीक्षा में हर छात्र का एक रोल नंबर और एक रोल कोड होता है और वही परीक्षा पास करने वालों की पहचान होती है. ऐडमिट कार्ड में वही नंबर दर्ज होता है. पर विशुन राय कालेज के 16 छात्रों के 2-2 रोल नंबर हैं. इस खेल के जरिए छात्र को एक परीक्षा सैंटर पर गैरहाजिर दिखाया जाता था और दूसरे में उसे पास दिखा दिया जाता था. बोर्ड के पास विशुन राय कालेज के 2 रिजल्ट होते थे. पहले रिजल्ट में छात्रों को गैरहाजिर दिखाया जाता और उस के बाद स्कू्रटनी के बाद अपडेट रिजल्ट में उसे पास दिखाया जाता था. इस साल इस कालेज से कुल 650 छात्रों ने इंटर की परीक्षा दी थी.

विशुन राय कालेज समेत कई स्कूल और कालेज जांच के घेरे में आ गए हैं. गड़बड़ी पाए जाने पर इन के साल 2005 से ले कर 2016 तक के रिजल्ट कैंसिल किए जा सकते हैं. विशुन राय कालेज का पूरा इतिहास खंगाला जा रहा है. विशुन राय कालेज के कैंपस में राजदेव राय डिगरी कालेज, राजदेव राय बीएड कालेज और एक स्कूल भी चल रहा है. पुलिस के मुताबिक, बिहार बोर्ड और विशुन राय कालेज के बीच अच्छे रिजल्ट के लिए भारी डील हुई थी. सबकुछ बंद कमरे में हुआ था. एक छात्र को पास कराने के लिए 50 हजार रुपए से ले कर 5 लाख रुपए तक की डील हुई. बोर्ड अध्यक्ष के अलावा कई लोग इस रैकेट में शामिल हैं, जिन के खुलासे हो रहे हैं.

बच्चा के कालेज और घर से कई कागजात समेत मोटी रकम जब्त की गई. उस के घर से बोरों में ठूंस कर रखे गए रुपए बरामद हुए हैं. बच्चा के कालेज के ऊपरी तल्ले पर फाइवस्टार होटल की तरह कमरे बने हुए हैं. जिन में सारी लग्जरी सुविधाएं मौजूद हैं. छापेमारी के दौरान बच्चा राय के घर से 20 लाख रुपए की नकदी, करोड़ों के जेवरात, कीमती घडि़यां और 24 बैंक खाते मिले हैं. इस के अलावा 50 करोड़ रुपए से ज्यादा की जमीन होने का भी खुलासा हुआ है. बच्चा, उस की बीवी और पिता राजदेव राय के नाम से जमीन के कई कागजात भी मिले हैं.

इतना ही नहीं, राजनेताओं से अपनी करीबी और रुपयों की ताकत के बल पर बच्चा ने भगवापुर-मुजफ्फरपुर रोड पर करीब 60 एकड़ खेतिहर जमीन पर गैरकानूनी तरीके से कब्जा जमा रखा है. कोई जमीन मालिक बच्चा की इस हरकत के खिलाफ आवाज उठाता था तो बच्चा उसे बाजार दर से काफी कम कीमत दे कर जमीन को अपने नाम लिखवा लेता था.

अफसरों की मिलीभगत

पटना से उत्तर बिहार की ओर जाने वाले हर दल के कई नेता बच्चा राय के मेहमान बनते थे और बच्चा उन की खातिरदारी में कोई कोरकसर नहीं छोड़ता था. बच्चा के करीबी बताते हैं कि हाजीपुर-मुजफ्फरपुर हाईवे के फोर लेन के बदलने के लिए जब जमीन का अधिग्रहण शुरू हुआ तो बच्चा ने जबरन कब्जा की गई जमीनों के टुकड़ों को सरकारी अफसरों की मिलीभगत से अपने पिता के नाम करवा लिया था और मुआवजे के रूप में 2 करोड़ रुपया भी ऐंठ लिया था.

अब तक की पुलिसिया जांच से पता चला है कि बच्चा राय टौपर घोटाले के 3 मुख्य सूत्रधारों में एक है. लालकेश्वर की बीवी ऊषा सिन्हा ने ही लालकेश्वर से बच्चा राय की जानपहचान कराई थी. बच्चा के मोबाइल फोन और कंप्यूटर की जांच के बाद ही पुलिस इस नतीजे पर पहुंची है. राजेंद्रनगर बौयज हाईस्कूल के प्रिंसिपल विशेश्वर प्रसाद यादव और शैल कुमारी के संपर्क में वह लगातार रहता

था. विशेश्वर पर आरोप है कि उस ने मूल्यांकन के दौरान टौपरों की उत्तरपुस्तिका का मूल्यांकन बिना किसी आदेश के कराया था. इतना ही नहीं, उस ने मार्क्स फाइल में छेड़छाड़ की. मार्क्स फाइल पर व्हाइटनर लगा कर नंबर बदले गए. मूल्यांकन के लिए कौपियां कहांकहां भेजी गई हैं, इस का जिक्र फाइलों में नहीं है. कौपियों की क्रम संख्या को भी व्हाइटनर लगा कर बदला गया.

बोर्ड के चेयरमैन लालकेश्वर प्रसाद की सरकारी गाड़ी से ही टौपर्स घोटाले की कौपियां इधरउधर भेजी गई थीं. वैशाली के बच्चा राय के कालेज से कौपियां लालेश्वर की कार से ही बोर्ड के औफिस में लाई गई थीं. उस के बाद सारी कौपियों को उस की गाड़ी से ही राजेंद्रनगर बौयज हाईस्कूल पहुंचाया गया. इस से ही पता चल जाता है कि घोटाले की सैटिंग कितने टौप लेवल पर और कितनी तगड़ी थी. इस बात की जानकारी इंटर काउंसिल और बोर्ड के कुछ खास मुलाजिमों को ही थी. अब जब टौपर घोटाला सामने आया है और पुलिस ने मुलाजिमों से पूछताछ शुरू की है तो मुलाजिमों ने मुंह खोलना शुरू कर दिया.

पटना के एसएसपी मनु महाराज ने बताया कि लालकेश्वर के खिलाफ तगड़े सुबूत मिले हैं. बच्चा राय अकसर लालकेश्वर के दफ्तर में आ कर मिलता रहता था. लालकेश्वर ने घोटाले में बड़ी चालाकी बरती. इस के बाद भी वह फंस गया. वह हर मुलाजिम को मौखिक आदेश ही देता था. किसी भी गलत काम को करवाने के लिए उस ने कभी कोई लिखित आदेश नहीं दिया. तमाम सावधानियों के बाद भी उस ने सब से बड़ी गलती यह कर दी कि अपनी गाड़ी से घोटाले की कौपियों को ढोने का काम किया और यही उस के गले की फांस बन गई है.

बेपरदा होंगे राज

पुलिस की जांच में साफ हो चुका है कि लालकेश्वर, ऊषा और बच्चा ने मिल कर पास और फेल करने का सिंडिकेट चला रखा था. बच्चों को टौपर बनाने और फर्स्ट डिवीजन में पास कराने के खेल में दोनों ने करोड़ों रुपयों को वारेन्यारे किया है. लालकेश्वर का रिश्तेदार और डीलिंग एजेंट विकास चंद्र पुलिस के जाल में फंस चुका है और पुलिस उस से लालकेश्वर का सारा राज उगलवाने में लगी है.

बच्चा राय ने अपने पास स्कौलरों की टीम बना रखी थी, जिस के भरोसे वह कौपी लिखवाने का पूरा ठेका लेता था. इस के लिए खासी रकम भी खर्च की जाती थी. उस की टीम के अलगअलग सदस्यों को कौपियां सौंप दी जाती थीं और वे अपनेअपने घर ले जा कर आराम से कौपियों पर जवाब लिखते थे. जांच टीम ने जब कौपियों की जांच की तो पता चला कि घोटाले में शामिल सारी कौपियों में सारे सवालों के जवाब बड़े ही सलीके से लिखे गए थे और सारे जवाब सही थे. जांच टीम इस की पड़ताल कर रही है कि लिखावटें किसकिस की थीं.

विशुन राय कालेज का मालिक व सह प्रिंसिपल अमित राय उर्फ बच्चा राय को पुलिस ने 11 जून को बड़े ही फिल्मी अंदाज में दबोचा था. बच्चा राय मीडिया में अपने गुनाहों की सफाई देने के लिए वैशाली के भगवानपुर इलाके में अपने विशुन राय कालेज पहुंचा था कि पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. बच्चा राय विशुन राय एजुकेशनल ट्रस्ट चलाता है. ट्रस्ट में उस ने अपनी बीवी, बेटा, बेटी समेत कई रिश्तेदारों को शामिल कर रखा है. उसी ट्रस्ट के तहत उस का विशुन राय कालेज भी चलता है. इतना ही नहीं, इस ट्रस्ट के तहत 12 स्कूल और कालेज चलाए जा रहे हैं. पुलिस की दबिश से उसे अपने को सरैंडर करने को मजबूर होना पड़ा.

बिचौलियों की कारस्तानी

एसएसपी मनु महाराज ने बताया कि पूरे घोटाले में ऊषा सिन्हा भी शामिल थी और वह हर तरह से अपने पति लालकेश्वर की मदद कर रही थी. पुलिस को लालकेश्वर के 2 दलालों को दबोचने में भी कामयाबी मिली है. अजीत कुमार उर्फ शक्तिमान और संजीव झा पुलिस के हत्थे चढ़ गए. अजीत पटना कालेज में एडहौक बेसिस पर टीचर है और संजीव संस्कृत बोर्ड का मुलाजिम है. लालकेश्वर के पास ये दोनों ही ‘क्लाइंट’ ले कर आते थे और काम होने के बाद दोनों को मोटा कमीशन मिलता था. अजीत और संजीव के बैंक अकाउंट में लाखों रुपए मिले हैं, जिस का हिसाब वे पुलिस को नहीं दे सके हैं. ये दोनों पिछले 10 सालों से बोर्ड में सैटिंग करने के काम में लगे हुए थे.

2 बार बाईपास सर्जरी करा चुके लालकेश्वर के अध्यक्ष बनते ही बच्चा उस का खासमखास बन गया था. दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना होने लगा था. दोनों के बीच पैसे के लेनदेन का खेल जम कर होता था. बच्चा ने पुलिस को बताया कि जब भी लालकेश्वर रुपयों की डिमांड करता था तो वह उस के घर रुपयों की थैली पहुंचा देता था.

नियमों से खिलवाड़

लालकेश्वर ने पिछले 6 महीनों के दौरान 200 स्कूल और कालेजों को मान्यता दी. मान्यता देने से पहले न तो स्कूलोंकालेजों की जांच की गई और न ही स्पौट विजिट की गई. बोर्ड से मान्यता पाने के लिए स्कूलकालेज को आवेदन देना होता है और उस के बाद पूरी जांच के बाद ही मान्यता दी जाती है. इस प्रक्रिया में कम से कम 6 महीने लगते हैं.  लेकिन लालकेश्वर ने 26 जुलाई, 2014 को अध्यक्ष का पद संभाला और जुलाई से ले कर अक्तूबर 2015 तक 10 स्कूलकालेज को मान्यता दे दी. उस के बाद तो उस ने खैरात की तरह मान्यता बांटनी चालू कर दी. अक्तूबर 2015 से ले कर मार्च 2016 के बीच 200 स्कूलकालेजों को मान्यता दे दी गई. कुल 200 स्कूल और कालेजों ने मान्यता पाने के लिए आवेदन दिया था और लालकेश्वर ने किसी भी आवेदक का दिल नहीं तोड़ा.

बोर्ड के सूत्रों की मानें तो राज्य के हरेक जिले में लालकेश्वर के एजेंट हैं. इंटर की परीक्षा में फौर्म भरने से ले कर, सैंटर तय करने, कौपियां लिखवाने, मनमानी जगहों पर कौपियों की जांच कराने, मनमाने नंबर दिलाने, टौपर लिस्ट बनाने तक में लालकेश्वर का खेल चलता था. लालकेश्वर नालंदा जिले का है, और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का काफी करीबी माना जाता है.

सब गोलमाल है

लालकेश्वर की बीवी और गंगा देवी महिला कालेज की प्रिंसिपल ऊषा सिन्हा ने 12 साल की उम्र में ही बीए पास कर लिया था. 2010 को चुनावी हलफनामे से यह खुलासा हुआ है. घूस ले कर दूसरों को मनचाहा नंबर और डिगरी दिलाने वाले लालकेश्वर की बीवी की ही डिगरी संदेह के घेरे में आ गई है. साल 2010 के विधानसभा चुनाव में नामांकन के दौरान ऊषा ने जो हलफनामा जमा किया, वह सनसनी फैला चुका है. हलफनामे के भाग-3 में ऊषा सिन्हा ने खुद को 49 साल की आयु का बताया है. इस हिसाब से उस के जन्म का साल 1961 होता है.

हलफनामे के कौलम बी में अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में उस ने लिखा है कि उस ने साल 1969 से 1971 के बीच उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड से मैट्रिक पास किया. साल 1973-74 में गोरखपुर से बीएड और साल 1976 में अवध विश्वविद्यालय से एमए की डिगरी ली. साल 1984 में उस ने मगध विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिगरी हासिल की. साल 1961 में जन्मी ऊषा ने 10 साल की उम्र में मैट्रिक, 12 साल की उम्र में बीए और 14 साल की उम्र में एमए पास कर लिया था. टौपर्स घोटाले के साथ ऊषा पर चुनाव आयोग को गलत हलफनामा देने का भी केस दायर किया गया है. जांच के बाद अगर हलफनामा गलत साबित होगा तो उसे पूर्व विधायक के तौर पर मिलने वाली सुविधा और पैंशन से वंचित कर दिया जाएगा.

लालकेश्वर की बीवी ऊषा सिन्हा ने विधायक बनने के बाद भी गंगा देवी कालेज के पिं्रसिपल का पद नहीं छोड़ा था. जदयू के टिकट पर हिलसा विधानसभा चुनाव क्षेत्र से विधायक बनने के बाद कानूनन ऊषा को पद छोड़ देना चाहिए था. 27 जनवरी, 2010 से 15 जून, 2015 तक वह विधायक रही और उस दौरान पिं्रसिपल  भी बनी रही. 2015 में दोबारा चुनाव लड़ने के पहले उस ने छुट्टी ले ली थी. पर टिकट नहीं मिलने के बाद उस ने दोबारा फरवरी 2016 में प्रिंसिपल की कुरसी पर कब्जा जमा लिया. विश्वविद्यालय के नियमों के मुताबिक, कोई व्यक्ति एक वक्त में एक ही पद पर बना रह सकता है. कालेज प्रिंसिपल को विधायक से अधिक वेतन मिलता है. इसलिए ऊषा विधायक का वेतन छोड़ प्रिंसिपल का वेतन उठाती रही. वहीं, विधायक को कालेज प्रिंसिपल से ज्यादा भत्ता मिलता है, इसलिए ऊषा प्रिंसिपल को मिलने वाला भत्ता छोड़ विधायक को मिलने वाला भत्ता लेती रही.

समधी समधन का घोटाला

चोर चोर मौसेरे भाई की कहावत काफी पुरानी है, अब टौपर घोटालेबाजों ने नई कहावत गढ़ी है. यह है ‘चोर चोर समधी भाई’. टौपर घोटाले का किंगपिन लालकेश्वर और मगध विश्वविद्यालय के कुलपति रहे अरुण कुमार रिश्ते में समधी हैं. पुलिस को फिलहाल इस घोटाले में अरुण कुमार के शामिल होने का कोई सुराग नहीं मिला है, पर उन के कुलपति रहते हुए साल 2012 में 22 प्रिंसिपल और साल 2013 में 12 प्रिंसिपलों की बहाली का घोटाला सामने आया था.

अरुण कुमार ने कुलपति रहते हुए अपनी मरजी से प्रिंसिपलों की बहाली की थी और मोटी रकम ले कर शिक्षकों को मनमाने कालेज में प्रिंसिपल बना दिया था. इस मामले को ले कर जब बवाल मचा तो अगस्त 2013 में वी बी लाल कमेटी को जांच का जिम्मा सौंपा गया और कमेटी ने अरुण कुमार को पूरी तरह से दोषी करार दिया था. इस घोटाले में अरुण कुमार  जेल की हवा खा चुके हैं. निगरानी विभाग ने उन्हें साल 2015 में गिरफ्तार किया था और 15 दिनों तक जेल में रहने के बाद जमानत मिली थी.

अरुण कुमार ने अपनी समधन ऊषा सिन्हा को गलत तरीके से गंगा देवी महिला कालेज का प्रिंसिपल बना दिया था. ऊषा का तबादला कौमर्स कालेज से गंगा देवी कालेज में इसलिए कर दिया गया क्योंकि वहां ऊषा से सीनियर कोई नहीं था. इस का फायदा उठाते हुए ऊषा सिन्हा को प्रिंसिपल बना दिया गया.

अब शुरू हुआ औपरेशन क्लीन

सबकुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया…टौपर्स घोटाले में काफी थूथू होने के बाद बिहार सरकार की आंखें खुली हैं और उस ने शिक्षा विभाग में औपरेशन क्लीन शुरू किया है. शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी ने बताया कि राज्य के सभी प्राइवेट बीएड कालेजों की जांच होगी. इस के लिए सभी जिलों के डीएम और एसपी को निर्देश दिए गए हैं. औपरेशन क्लीन के तहत बीएड कालेजों, वित्त रहित इंटर और डिगरी कालेजों समेत कोचिंग संस्थानों की जांच की जाएगी. जो भी संस्थान सरकार के द्वारा तय किए गए मानकों पर खरे नहीं उतरेंगे उन के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी और उन की मान्यता रद्द कर दी जाएगी.

औपरेशन क्लीन के तहत इस बात की जांच की जाएगी कि कालेज की इमारत की हालत कैसी है? रैगुलर क्लास होते हैं या नहीं? कालेज के सभी शिक्षक आधार कार्ड से जुड़े हैं या नहीं? हर साल कालेज में ऐडमिशन के लिए कितने बच्चे आते हैं और कितने का ऐडमिशन लिया जाता है? क्लासरूम क्षमतावान हैं या नहीं? कालेज में लाइब्रेरी और लैब की हालत कैसी है आदि. 

माता पिता भी कम दोषी नहीं

यह माता पिता की बच्चों को ले कर अधिक अपेक्षाओं का ही परिणाम है कि आएदिन ऐसे घोटालों की खबरें पढ़ने को मिलती रहती हैं. बच्चों के माध्यम से अपने सपनों को पूरा करने की चाहत रखते ये मातापिता यह क्यों नहीं सोचते कि गलत तरीके से अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने के उन के इस नकारात्मक कदम का परिणाम बच्चों को ही भुगतना पड़ता है. गलत तरीके से डिगरी हासिल करते, परीक्षा में टौप कराने का मातापिता का यह कदम बच्चों को कहीं का नहीं रहने देता. ऐसा करने से बच्चे न तो सही शिक्षा हासिल कर पाते हैं, न उन्हें अपने विषय की समझ हो पाती है. इस के चलते वे जीवन में कुछ भी हासिल करने के लिए बिना मेहनत वाला गलत तरीका अपनाने लगते हैं. नतीजतन, वे अपनी राह से भटक कर अपराध की दुनिया की ओर अग्रसर हो जाते हैं.