सरिता विशेष

राजनीति में ‘मतभेद‘ और ‘मनभेद’ दोनो का ही कोई बहुत मतलब नहीं रह गया. अपने लाभ के हिसाब से ‘दोस्ती‘ और ‘दुश्मनी‘ के नयेनये जुमले बनते और बिगडते रहते है. जनता भी नेताओं के इस चमत्कार को कभी ‘नमस्कार‘ करती है तो कभी ‘नकार’ देती है.राजनीतिक दल और विचारधारा को समय के हिसाब से तय होने लगे है.9 साल बाद समाजवादी पार्टी में शमिल हुये बेनी प्रसाद वर्मा ने 2012 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के खिलाफ एक से एक श्रंगारयुक्त शब्दों का प्रयोग किया.कई बार तो बात इतनी बढ गई कि कांग्रेस के हाईकमान से सपा नेताओ ने शिकायत तक की.2009 में बेनी प्रसाद वर्मा कांग्रेस के टिकट पर गोंडा से लोकसभा का चुनाव जीता और कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए-2 सरकार में केन्द्रीय मंत्रीं थे.मुलायम सिंह यादव की पार्टी यूपीए-2 को समर्थन कर रही थी.ऐसे में कांग्रेस के लिये बेनी को चुप रखना मुश्किल था.मुलायम की पार्टी की भी जरूरत कांग्रेस को थी.बेनी प्रसाद वर्मा ने मुलायम के लिये जिन श्रंगारयुक्त शब्दों का प्रयोग करते वो कांग्रेस के गले में हडडी की तरह फंस जाते थे.

9 साल बाद बेनी प्रसाद वर्मा को समझ आया कि वह कांग्रेस के योग्य ही नहीं थे. कांग्रेसी कल्चर में रचबस नहीं पा रहे थे.2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद बेनी प्रसाद वर्मा ने चुप्पी साध ली.इसके बाद बेनी प्रसाद वर्मा ने 13 मई को अपनी चुप्पी तोडी और कहा कि 2017 के विधानसभा चुनाव में वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का विरोध करने का नैतिक साहस नहीं जुटा पा रहे से इस कारण वापस सपा में शामिल हो गये.सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने उनको खुलेमन से पार्टी में शामिल किया.बेनी प्रसाद वर्मा और मुलायम सिंह यादव सोशलिस्ट पार्टी के जमाने से एक साथ है.लोकदल और जनता पार्टी के समय एक साथ रहे.समाजवादी पार्टी की नींव रखने में भी दोनो साथ थे.उस समय समाजवादी पार्टी को यादव कुर्मी दोनो ही जातियों के वोट चाहिये थे.समय के साथ बेनी प्रसाद वर्मा और मुलायम के बीच दूरी आई. बेनी की नम्बर 2 की कुर्सी छिन गई.

2012 में बहुमत की सरकार बनाने के बाद सपा में यादव मुसिलम समीेकरण की तूती बोलने लगी.यादवों में अब सपा का एकाधिकार खत्म हो गया है.वहां भी छोटेछोटे नेता उभर आये है.जो पार्टी के परिवारवाद से परेशान है.2014 के लोकसभा चुनाव में ‘यादव -मुसलिम’ समीकरण का भ्रम टूटा तो विधानसभा चुनाव के पहले सपा में दूसरी जातियों को शामिल करने की पहल शुरू हो गई.सपा यह भूल गई कि बेनी प्रसाद वर्मा कुर्मियों के नेता नहीं रह गये है.वह अपने जिले बाराबंकी में अपने बेटे का चुनाव नहीं जितवा पाये.कांग्रेस में बाराबंकी से बेनी प्रसाद वर्मा का मुकाबला पीएल पुनिया से था तो सपा में बेनी प्रसाद वर्मा का मुकाबला अरविंद सिंह ‘गोप’ से है.

ऐसे में पुराने जैसे सुखद भविष्य की कल्पना मुश्किल है.सपा को बेनी प्रसाद वर्मा कुर्मी वोट और किरण पाल सिंह से जाट वोट हासिल होता दिख रहा है.सपा की मुश्किल यह है कि जदयू नेता नीतीश कुमार ने शराब बंदी और मंडल कमीशन का सहारा लेकर उत्तर प्रदेश में नये समीकरण गढने को काम शुरू किया है.जिससे सपा की बेचैनी बढ गई है.अब वह अपने पुराने ‘यादव-मुसलिम‘ समीकरण के बूते जीत होती नहीं दिख रही है.ऐसे में एक बार फिर से ‘मतभेद‘ और ‘मनभेद’ भुलाकर नये समीकरण तलाशने का काम तेज होता दिख रहा है.