जब आपसी रिश्ते राजनीति पर भारी पड़ते हैं तो राजनीति और समाज दोनों प्रभावित होते है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.

दलित और पिछड़ों की अगुवाई करने वाले जिन दलों को आपस में मिलकर अगड़ो से लड़ना चाहिये था वह अब आपस में लड़ रहे हैं. जिसके चलते भाजपा के खिलाफ उत्तर प्रदेश में बिहार जैसे महागठबंधन की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

एक समय था जब सपा-बसपा ने मिलकर सरकार बनाई थी और नारा दिया था मिले मुलायम कांशीराम हवा मे उड़ गये जय श्रीराम’. सपा बसपा के अलग होने के बाद इनके आपसी गंठबंधन की कल्पना तक संभव नहीं दिखती.

यह बात सच है कि अगर उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा का गठबंधन हो जाये तो भाजपा ही नहीं किसी भी दल की हार तय है. बड़े से बड़े राजनीतिक पंडित भी इन दलों के अपसी समीकरण की कल्पना नहीं कर सकते. जिस भाजपा को मनुवादी कह कर बसपा आलोचना करती थी उसके साथ तीन बार मिलकर सरकार बना ली. पर सपा के साथ समझौता टूटा तो फिर लोग आपसी तालमेल का बस सपना ही देखते रह गये. दोनों दलों के बीच बनी दूरी का कोई राजनीतिक या सामाजिक आधार नहीं है. केवल दोनों दलों के मुखिया के आपसी संबंध बिगड़ने से ही यह दूरी बढ़ गई है.

यह दूरी और दुश्मनी भरे संबंध एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जा रहे हैं. मायावती को यह पंसद नहीं है कि सपा नेता अखिलेश यादव उनको बुआकहे. मायावती का मानना है कि अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव ने ही गेस्ट हाउस कांड में उनपर जानलेवा हमला कराया था. ऐसे में वह उनको बुआन कहें. इसके बाद अखिलेश यादव ने उनको बुआ कहने से परहेज किया. अखिलेश उनको पत्थरों वाली सरकार कह कर संबोधित करने लगे. बाद में अखिलेश ने उनको बीबीसी यानि बुआ ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन कहना शुरू किया. खुद मायावती ने अखिलेश को सपा मुखिया का बबुआकहा.

बबुआएक तरह का खिलौना होता है जिससे गांव में बच्चे खेलते है. असल में मायावती ने बुआशब्द से चिढ़ कर अखिलेश के लिये बबुआशब्द का प्रयोग शुरू किया है. यह केवल अखिलेश और मायावती के बीच की बात नहीं है. राहुल गांधी को पप्पूतो केजरीवाल को कई नाम से पुकारा जाता है.

एक तरह से यह राजनीति के गिरते स्तर को दिखाता है. जहां पर विचारों क मतभेद की जगह आपसी मतभेद को तबज्जो दी जाती है. इस वजह से समाज और राजनीति दोनों का नुकसान हो रहा है. अब नेताओं के गठबंधन जनता के नहीं अपने हित से लिये होते है.