मेंथा यानि पिपरमिंट की खेती बड़े पैमाने पर किसान कर रहे हैं. यह कैश क्राप है. उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से शुरू हुई मेंथा की खेती अब आसपास के किसानों को बड़ी तेजी से पसंद आती जा रही है. जैसे जैसे किसान मेंथा की तरफ बढ़ रहे हैं मेंथा की कीमत भी घटती जा रही है. मेंथा की खेती में पानी और मेहनत की बड़ी जरूरत होती है. पिछली कुछ फसलों से मेंथा की कीमत अपनी जगह स्थिर हो गई है. ऐसे में अब मेंथा के किसान भी परेशान है. बाराबंकी की सांसद प्रियंका सिंह रावत अब इन किसानों के मुद्दों को पूरे तथ्यों के साथ संसद में उठाने की तैयारी में है. जिससे मेंथा किसानों को उनकी मेहनत का लाभ मिल सके.

मेंथा किसानों की मांग है कि मेंथा को भी खेती की परिधि में शामिल करके उसका समर्थन मूल्य तय हो. गेहूं और धान जैसी फसलों की तरह इसकी भी सरकारी खरीद हो. इससे मेंथा की खेती फिर से लाभकारी हो सकेगी. बाराबंकी में पहले अफीम की खेती होती थी. पिछले एक दशक से अब यहां के किसान अफीम की खेती छोड़कर मेंथा, आलू, केला और टमाटर की खेती करने लगे हैं. किसानों को सबसे अधिक लाभ मेंथा की खेती से हुआ. एक को देखकर दूसरे किसान ने भी मेंथा की खेती को अपना जरीया बना लिया.

एक समय मेंथा की कीमत 3 हजार रूपये लीटर तक पहुंच गई. मेंथा की कीमत का अंदाजा इस बात से लग सकता है कि इसकी लूट और चोरी की घटनायें होने लगी. परेशानी का विषय यह है कि मेंथा की कीमत घटकर 8 सौ से 9 सौ रुपये लीटर तक आकर पहुंच गई है. जिससे किसान को मुनाफा नहीं हो पा रहा है. बाराबंकी सांसद को किसानों का यह दर्द समझ आया. वह अपने क्षेत्र के किसानों की परेशानियों, उनकी जरूरतों को लेकर एक रोडमैप तैयार कर रही हैं. जिसके बाद वह प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार के दूसरे मंत्रियों से बात कर ठोस कदम उठाने की मांग करेंगी.

वह कहती है कि हमारा प्रयास होगा कि हम खेती को लाभ का जरीया बना सके. जिससे प्रधानमंत्री का वह सपना पूरा हो सके कि किसान की आय दोगुनी हो जाये. किसानों की फसल की सही कीमत मिले. इसके लिये फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगे और किसान उसका लाभ लें. खेती के साथ ही साथ बागवानी को भी बढ़ावा देने का काम हो, जिससे किसानों का और भला हो सकता है. सरकार के साथ ही साथ किसानों को भी जागरूक करने का काम करेंगे.