चुनावों में मुसलमानों को सिर्फ वोटबैंक के नजरिए से देखने वाले राजनीतिक दलों को एहसास ही नहीं है कि मुसलिम मतदाता मजहब और जाति की दीवारों से परे विकास, शिक्षा, रोजगार जैसे मुद्दों के आधार पर वोट देते हैं. इन्हें अभी भी लगता है कि मजहबी टोपी पहन कर, मुसलिम चेहरा बनने का दावा कर या आरक्षण का लौलीपौप दे कर मुसलिम वोटरों को बरगलाया जा सकता है. जबकि हकीकत कुछ और है. पढि़ए बुशरा खान का लेख.

सत्ता और धर्म के लिए दुनियाभर में कितनी कत्लोगारत मची. बड़ीबड़ी लड़ाइयां लड़ी गईं. तलवार के दम पर देशों और लोगों को गुलाम बनाया गया. खून बहा, लूटमार हुई. यह वह दौर था जब हुकूमतें तलवार के दम पर चलती और बदलती थीं और धर्म का नाम भी लिया जाता था. लोकतांत्रिक प्रणालियों में तलवार का स्थान वोट ने ले लिया और शासन करने वाले जनता के सेवक बन गए.

इस प्रणाली में सत्ता तक पहुंचने के लिए राजनीतिक दलों को चुनावी प्रक्रिया से हो कर गुजरना पड़ता है इसलिए इस ने आम आदमी का कद बढ़ा दिया. अब जनता की रजामंदी, विश्वास और समर्थन पाने की होड़ में सभी राजनीतिक दल चुनावी मैदान में एकदूसरे को पछाड़ने के लिए जोरआजमाइश करते दिखते हैं.

हालांकि चुनाव जीतने के लिए नेता व दल ‘साम, दाम, दंड, भेद’ की नीति व तरहतरह के हथकंडे अपनाते हैं लेकिन आखिरकार जीतता वही है जिसे देश की आम जनता का पूरा समर्थन मिलता है. यही कारण है कि खुद को उदारवादी बताने और साबित करने वाले राजनीतिक दल हर धर्म, जाति, वर्ग, संप्रदाय को खुश करने का प्रयास करते हैं. हिंदू वोटरों को खुश करने के लिए वे टीका लगाते हैं, तो मुसलिम मतदाताओं की रजामंदी के लिए टोपी पहनते हैं.

पिछड़ों व दलितों को अपने साथ लाने के लिए उन की झोपड़ी में रात गुजारते हैं तो गरीब मजदूरों के साथ सिर पर बोझा ढो कर भी दिखाते हैं. चुनावों के समय हर राजनीतिक दल के रडार पर विशेषकर देश के लगभग 18-19 करोड़ मुसलमानों के वोट रहते हैं. हालांकि जाति की राजनीति करने वाले दल विशेष जातियों को लुभाने में मशगूल रहते हैं. साथ ही मुसलमान अल्पसंख्यकों के वोटों पर भी उन की पैनी नजर रहती है.

2014 में होने वाले आम चुनावों को देखते हुए हर राजनीतिक दल मुसलिम वोटों को ले कर अभी से चिंतित और सक्रिय दिखाई दे रहा है. सभी खुद को मुसलमानों का सब से बड़ा हितैषी साबित करने की फिराक में लगे हैं. तरहतरह  के लालच व लच्छेदार भाषण दे कर मुसलमानों को लुभाया जा रहा है. इस का कारण है देश के लगभग हर लोकसभा व विधानसभा क्षेत्र में मुसलिम मतदाताओं का खासी संख्या में होना. मुसलमान देश का दूसरा सब से बड़ा बहुसंख्यक वर्ग है. चुनावों में मुसलमानों ने भी हमेशा से वैसी ही रुचि व भागीदारी निभाई है जैसी बाकी धर्मों व समुदायों के लोगों ने.

विशेष बात यह है कि चुनावी बिगुल बजते ही मुसलमान चर्चा का मुख्य विषय बन जाते हैं जबकि अन्य समुदायों की अधिक बात नहीं होती क्योंकि संख्या में वे नगण्य हैं. इस नाते यह स्वाभाविक है कि उन के वोटों पर सभी राजनीतिक दलों की नजर होती है. वे मुसलमानों को आम वोटर की नजर से देखने की जगह उन्हें वोटबैंक समझ कर लुभाते हैं.

यह बेहद दुखद है कि मुसलमानों के वोटों को ले कर जनता व राजनीतिक पार्टियों में अनेक भ्रामक धारणाएं प्रचलित हैं. आमतौर पर राजनीतिक दल सोचते हैं कि मुसलमान धार्मिक, भावनात्मक और काल्पनिक मुद्दों से प्रभावित या भ्रमित हो कर वोट देते हैं या यह कि धर्म और जाति के नाम पर बरगला कर उन के वोट पाए जा सकते हैं. मुसलमानों को ले कर कुछ दल व लोग एक गलत धारणा यह भी पाले रहते हैं कि मुसलमानों के लिए राष्ट्रवाद जैसा मुद्दा कोई माने नहीं रखता. वे शरीयत आधारित कानून व्यवस्था में यकीन रखते हैं. ऐसी व्यवस्था जिस में उन्हें दर्जनों बच्चे पैदा करने और इसलाम आधारित शासन प्रणाली मिलने का पूर्ण भरोसा मिल सके. अधिकांश लोगों का सोचना है कि मुसलमान इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर मतदान करते हैं. यही भ्रमजाल सभी राजनीतिक पार्टियां पाले रहती हैं जो सत्य से पूरी तरह परे है.

भारत के मुसलमान न तो मुसलिम राजनीतिक दलों के वोटबैंक हैं और न ही अन्य दलों के. उत्तर प्रदेश, जहां मुसलमानों की आबादी सब से अधिक मानी जाती है, में चुनावों में उन के पास कई खालिस मुसलिम दल विकल्प के रूप में मौजूद रहते हैं. उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की अगुआई करने का दावा करने वाली 12 पार्टियां चुनाव आयोग से रजिस्टर्ड हैं. मुसलिम मोरचा बनाने के मकसद से कुछ पार्टियां साथ आईं भी लेकिन उन्हें मुसलमानों का समर्थन प्राप्त नहीं हुआ.

इस के पीछे कारण है कि मुसलमानों ने कभी भी स्वयं को मुख्यधारा की राजनीति से अलग नहीं रखा. 2006 में जामा मसजिद के इमाम अहमद बुखारी की इस राय से भी मुसलमानों ने इत्तफाक नहीं रखा कि मुसलमानों की अलग राजनीतिक पार्टी हो. इमाम बुखारी उत्तर प्रदेश में भाजपा के सहयोग से एक अलग राजनीतिक पार्टी बनाना चाहते थे.

वर्ष 2006 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मुसलमानों की अगुआई करने के मकसद से 2 मुसलिम फ्रंट बने. पहला मिल्ली नेता कल्बे जव्वाद की अगुआई में पीपुल्स डैमोके्रटिक फं्रट और दूसरा इमाम बुखारी की अगुआई में उत्तर प्रदेश यूनाइटेड डैमोक्रेटिक फ्रंट. लेकिन जल्द ही दोनों फं्रट बिखर गए.

इन फ्रंटों के नेताओं पर आरोप लगा कि इन का मकसद मुसलिम मतों का विभाजन था. यदि पिछले उत्तर प्रदेश लोकसभा चुनावों पर नजर डालें तो पता चलता है कि उस बार भी राज्य में मुसलमानों के पास कई विकल्प मौजूद थे.उत्तर प्रदेश में 2012 विधानसभा चुनावों में मुसलमानों ने मुसलिम लीग व अन्य क्षेत्रीय मुसलिम राजनीतिक दलों को दरकिनार करते हुए इस बात का सुबूत दिया कि वे धर्म आधारित वोटिंग नहीं करते बल्कि वे भी एक आम उदारवादी हिंदू वोटर की तरह वोट देते हैं.

यह धारणा भी कई बार ध्वस्त हो चुकी है कि वे हिंदू कट्टरवादी पार्टियों को हराने की मंशा से मतदान करते हैं. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आज तक एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता जब मुसलमानों ने धर्म, जाति या वर्ग को ध्यान में रख कर किसी पार्टी का समर्थन किया हो.

वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव और उस के बाद हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में मुसलमानों ने आमतौर पर जनता पार्टी के उम्मीदवारों को वोट दिया जिन में कई जनसंघ के कट्टरवादी हिंदूवादी उम्मीदवार थे. 1988-2004 तक देश में भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार सत्ता में रही है. भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी को लखनऊ में मुसलमानों का बड़ा समर्थन मिला. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान में वसुंधरा राजे को मुसलमानों का सहयोग मिल रहा है. इसलिए यह बात भी झूठ साबित होती है कि भाजपा का हौवा दिखा कर मुसलमानों को बरगलाया जा सकता है. यह सच है कि जो भी सरकारें सांप्रदायिक रवैया अपनाती हैं, उन्हें अल्पसंख्यकों का समर्थन नहीं मिलता. उदाहरण के लिए मुसलमान यह बात अच्छी तरह जानता है कि भाजपा एक  कट्टरवादी और हिंदू हितैषी पार्टी है. उसे चिंता तब होती है जब वह मुसलमानों के विरुद्ध खड़ी दिखाई देती है. मंदिर बनाने के नाम पर हिंदुओं को एकजुट कर के हिंदू राष्ट्र बनाने का प्रयास करती है, मुसलिम विरोधी सोच वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इशारे पर कार्य करती है या हिंदू राष्ट्र का यानी देश से अन्य धर्मों के लोगों का सफाया या उन को तीसरे दरजे का नागरिक बना कर रखने की कवायद की जाती है.

ऐसी सोच वाला यदि चुनावी मौसम आने पर खुद को उदारवादी बताने के लिए मुसलमानों के पक्ष में कुछ भाषण दे कर यह सोचे कि उसे मुसलमानों के वोट मिल जाएंगे तो ऐसा संभव होना कठिन है.  इसलिए जब ऐसी कट्टरवादी पार्टियां हारती हैं तो कहा जाता है कि मुसलमानों ने यदि अपने मत का उपयोग किया है तो केवल उन्हें हराने के लिए. जबकि ऐसी पार्टियों को सत्ता से बाहर रखने में देश के उदारवादी सोच वाले हिंदुओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है.

देश में या किसी प्रदेश में तो छोडि़ए, मुसलमान एक नगर निगम के निर्वाचन क्षेत्र में भी एक वर्ग की तरह वोट नहीं देता. सड़क, बिजली, पानी, बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य जैसे मुद्दे उसे भी उसी तरह प्रभावित करते जैसे अन्य वर्गों को. जो भी सरकार सांप्रदायिकता पर कड़ा रवैया अपनाती है, उसे अल्पसंख्यकों का पूरा समर्थन मिलता है, लेकिन कई बार कुछ राजनीतिक दल अल्पसंख्यकों के असुरक्षा बोध को भुनाने की कोशिश भी करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि देश का मुसलमान अपनी सुरक्षा को ले कर चिंतित रहता है.

मुसलमान अब सुरक्षा, उर्दू और मदरसों के मुद्दे तक नहीं सिमटा है बल्कि वह बुनियादी बातों को भी ध्यान में रखता है. इस की वजह विकास, बढ़ती शिक्षा और देश के आम आदमियों की सोच में आ रहा सकारात्मक बदलाव है जिस ने धार्मिक दीवारों को कम कर दिया है. यही कारण है कि कभी डंके की चोट पर केवल हिंदुओं की बात करने वाली भाजपा नरेंद्र मोदी को दिल्ली लाने से कतराती है. वह जानती है कि आज के वोटर को धर्म के नाम पर बरगलाना कठिन काम है. मसजिदमंदिर के नाम पर वोट पाना अब पुरानी बातें हो गई हैं. कोई भी राजनीतिक दल किसी एक धर्म, संप्रदाय, वर्ग के हितों की बात कर के सत्ता तक नहीं पहुंच सकता.

यही वजह है कि कट्टरवादी भाजपा और खुद को हिंदू राष्ट्रवादी बताने वाले नरेंद्र्र दामोदर मोदी भी अब अपने हर मंच से मुसलमानों की बात करते दिखाई देते हैं. जिन के दामन पर 2002 के गुजरात दंगों के दाग लगे हैं वे खुद को मुसलिम चेहरा साबित करने में लगे हैं. मोदी ने चाहे गुजरात में मुसलिम टोपी न पहनी हो मगर, विजन डौक्यूमैंट के जरिए वे देश के मुसलमानों को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि आजादी से अब तक देश में जितने भी हिंदूमुसलिम दंगे हुए उन के लिए सत्ताधारी सरकार दोषी है. दूसरे मुसलिम समुदाय के पिछडे़पन और गरीबी के लिए कांग्रेसी राजनीति के तौरतरीकों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

भाजपा यह भी बताने से पीछे नहीं हटती कि गुजरात में 8 प्रतिशत मुसलिम आबादी होने के बावजूद वहां पुलिस में 11 प्रतिशत जवान इसी बिरादरी के हैं. मोदी कांग्रेस की कमियों को तो गिना रहे हैं लेकिन जब उन की भाजपा नेतृत्व वाली सरकार केंद्र में रही तो उन्होंने मुसलमानों के लिए क्या किया, इस का कोई हिसाब मोदी के पास नहीं है.

अल्पसंख्यकों को ध्यान में रख कर तैयार किए गए इस विजन डौक्यूमैंट के जरिए मुसलिम वोटों को बांटने की कोशिश की जा रही है क्योंकि भाजपा जानती है कि उसे मुसलमानों के वोट नहीं मिलेंगे लेकिन वह यह भी नहीं चाहती कि उसे हराने के लिए मुसलिम एकजुट हों. साफ है कि चुनावों से ठीक पहले भाजपा एक बार फिर अयोध्या, कौमन सिविल कोड और धारा 370 को भुनाने में लगी है मगर कहीं न कहीं उस के मन में इन सब के बावजूद मुसलमानों के समर्थन की आशा भी जाग रही है.

वैसे, चुनावों में मुसलिम कार्ड खेलने में कोई पार्टी पीछे नहीं है. समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव तो इस के महारथी माने जाते हैं. इसीलिए वे मुल्ला मुलायम सिंह के नाम से जाने जाते हैं. इस बार इस कार्ड को खेलने की बागडोर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथ में है.

अखिलेश सरकार ने यह तर्क देते हुए कि सरकार की मंशा है कि थानों में अल्पसंख्यकों की पूरी सुनवाई हो, इस के लिए सूबे के हर थाने में 2 मुसलमान पुलिस वालों की नियुक्ति अनिवार्य है, इस के लिए नई भरतियां भी की जाएंगी. इस के अलावा वे मुसलिम महिलाओं को वजीफा और मुसलिम दलितों को बारबार आरक्षण देने की बात भी करते हैं.

सपा ने हमेशा खुद को मुसलमानों का सब से बड़ा हितैषी बताया है. लेकिन सूबे के मुसलमानों ने समयसमय पर सपा और बसपा दोनों दलों को राज करने का मौका दिया. इसलिए जब मायावती भारी बहुमत से सरकार बनाती हैं तो खुल कर स्वीकार करती हैं कि उन्हें प्रदेश के मुसलमानों का भरपूर समर्थन मिला पर जब वे 2011 में विधानसभा चुनाव हारती हैं तब यह मानती हैं कि उन्हें मुसलमानों का सहयोग नहीं मिला.

2007 के विधानसभा चुनावों में मायावती ने मुसलिम समाज के भीतर के अंतर्विरोध को समझा और उत्तर प्रदेश मुसलिम आबादी में क्योंकि पिछड़ों का प्रतिशत अधिक है, इसलिए उन्होंने पिछड़े मुसलमानों को खूब टिकट बांटे. यहीं से मुलायम सिंह की हार हुई थी और अगड़े मुसलमान कांग्रेस के साथ हो लिए थे जिस से कांग्रेस को लाभ हुआ था. राहुल गांधी ने मायावती के साथ मिले पिछड़े और अतिपिछड़े मुसलमानों को अपनी तरफ खींचने के लिए मुसलिम आरक्षण का कार्ड खेला था जो सफल नहीं हुआ.

मायावती की सरकार हो या मुलायम सिंह यादव की, उत्तर प्रदेश के गरीबों की हालत में कोई सुधार नहीं आया है. वहां के बुनकर बुरी दशा में जीवन बसर करने और भुखमरी के चलते पलायन करने को मजबूर हैं. उन की दशा सुधारने में किसी दल की कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई देती.

दरअसल, राजनीतिक दल मुसलमानों को एक ब्लौक के रूप में मानते हैं. लेकिन मुसलिम नेतृत्व में मौलानाओं का प्रभाव कम होने के साथ मुसलमान वोट ब्लौक के बजाय दलित, पिछड़े और अतिपिछड़े में बंटने को तैयार हुआ.

हालांकि सपा यादवों की राजनीति करती है और मायावती दलितों की, लेकिन हैरानी वाली बात यह  है कि जाति की राजनीति करने वाले इन नेताओं की नजर मुसलमान वोटों पर हमेशा बनी रहती है क्योंकि उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की जनसंख्या 18 से 20 प्रतिशत बताई जाती है. यह सच है कि कई ऐसे राज्य हैं जहां सत्ता बनाने में मुसलमान अहम भूमिका में होते हैं लेकिन यह भी सच है कि केंद्र की सत्ता बनाने में अहम भूमिका अकेले मुसलमानों की नहीं होती.

इधर, एनडीए गठबंधन से अलग हुई जेडीयू के नेता व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार धर्मनिरपेक्षता की दुहाई दे कर ही भाजपा से अलग हुए थे. उन की अल्पसंख्यकों को खुश करने की कवायद जारी है. नीतीश के मुताबिक, मोदी हर तबके को साथ ले कर नहीं चल सकते इसलिए वे देश के प्रधानमंत्री पद के लायक नहीं. दरअसल, नीतीश जब नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हैं तो वे अपने अल्पसंख्यकों के वोटों को ध्यान में रखते हैं.

फर्जी एनकाउंटर में मारी गई इशरत जहां को वे बिहार की बेटी बता कर मुसलमानों को संदेश देना चाहते हैं कि वे उन के साथ खड़े हैं. राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव भी अल्पसंख्यक वोटबैंक पर पकड़ बनाने की मुहिम में लगे हैं.

यही नहीं नीतीश से मुसलिम वोटों को छिटकने के लिए वे यह कह कर मुसलमानों की भावनाओं को भड़काने से भी परहेज नहीं करते कि नीतीश सरकार में मुसलिम समुदाय के युवकों की पुलिस हिरासत में मौत हो रही है, मुसलिम युवकों को आतंकवादी बता कर पकड़ा जा रहा है. वे अपनी सभाओं में बिहार में मुसलिम व यादव वर्गपर अत्याचारों का उल्लेख भी करना नहीं भूलते.

तृणमूल कांगे्रस भी मुसलिमों पर नजर रखे हुए है. लोकसभा चुनाव 2014 के लिए उत्तर प्रदेश में तृणमूल के प्रदेश प्रभारी वहीद सिद्दीकी को पार्टी का प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष घोषित कर दिया गया. राजनीतिक हलकों में इस घोषणा से चर्चा शुरू हो गई कि सपा के मुसलिम वोटबैंक पर ममता बनर्जी ने हमला बोल दिया. ममता ने उत्तर प्रदेश की सभी लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है.

जनता पार्टी के नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी (हालांकि अब वे भाजपा में शामिल हो गए हैं) कहते हैं कि  आम चुनाव 2014 में एनडीए को जीतने के लिए मुसलमानों के वोटों का विभाजन करना होगा. एनडीए की जीत के लिए यह बेहद जरूरी है कि मुसलमानों के वोटों को कई जगह बांटा जाए और हिंदू वोटबैंक को इकट्ठा किया जाए. वे कहते हैं कि देश के शिया मुसलमान उन के साथ हैं लेकिन उन की संख्या इतनी ज्यादा नहीं है. इसलिए सुन्नी मुसलमानों को बांटने की जरूरत है.

कांग्रेस ने भी मुसलिमों को लुभाने के लिए उत्तर प्रदेश में आरक्षण का कार्ड खेला मगर कामयाबी नहीं मिली. कांग्रेस पर यह इल्जाम लगता है कि पिछले 65 वर्षों में उस ने मुसलमानों का महज राजनीतिक फायदा उठाया है. आरक्षण का झुनझुना थमा कर उसे पिछड़ा बनाए रखा. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट बताती है कि तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा के अभाव में मुसलिम पिछड़ा हुआ है.

दरअसल, जब 1990 के दशक में हिस्सेदारी की राजनीति में मुसलमानों का आगमन हो रहा था और मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हो रही थीं तब इस देश का मुसलमान धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद को बचाने के लिए उदारवादी राजनीतिक पार्टी व उन दलों के साथ हो लिया जो सांप्रदायिक राजनीति को परास्त करने का राजनीतिक समीकरण रखते थे.

मंडल आयोग की सिफारिशों में पिछड़े मुसलिमों को भी आरक्षण मिला था लेकिन मुसलमान आरक्षण की चिंता छोड़ कर धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई में अन्य सामाजिक तबकों के साथ सहयोग कर रहा था. यही कारण है कि भाजपा आज नरेंद्र मोदी को दिल्ली में ले जाने से डरती है और नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़ने का ऐलान किया. इस दौरान मुसलमान चुनावों में अपनी भागीदारी तो निभाता रहा लेकिन सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ता गया, यहां तक कि उस की हालत देश के दलित वर्ग से भी बदतर हो गई.

लंबे समय तक मुसलमानों को मजहबी नेताओं ने जज्बाती सवालों में उलझा कर उन्हें आर्थिक और मानसिक तौर पर पिछड़ा बनाए रखा. मुसलिम धर्मगुरुओं द्वारा उन्हें चुनावों के समय किसी एक विशेष पार्टी के पक्ष में वोट देने की अपील कर के उन्हें जेहनी तौर पर अपना गुलाम बनाए रखने की कोशिश की लेकिन धीरेधीरे मुसलमानों को यह बात समझ में आती गई.

सब से बड़ा फर्क युवा वर्ग की सोच में आया है. मुसलिम समाज का उच्च और मध्य वर्ग तो पहले से शिक्षा के महत्त्व को जानता था मगर अब गरीब और कमजोर वर्ग भी तालीम की जरूरत को समझ रहा है. वह भी अपने आने वाली पीढ़ी को उर्दू के साथसाथ साइंस और अंगरेजी पढ़ा कर उस की जिंदगी बेहतर बनाना चाहता है.

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि अलगअलग दलों को वोट देने के बाद भी उसे एक खास साजिश के तहत मुसलिम वोटबैंक के रूप में पहचान दे दी गई. ऐसा इसलिए क्योंकि कभी भी मुसलिम मतदाता को सांप्रदायिक बताने की राजनीतिक सुविधा उपलब्ध रहती है. बाबरी मसजिद विध्वंस और गुजरात दंगों जैसी घटनाओं ने मुसलमानों को राजनीतिक रूप से बहुमुखी और अंतर्मुखी बनाया. इसलिए मुसलमान अपनी प्रगति के बारे में सोचने लगा. वह जानता है कि  हिंदू उदारवादियों के साथ मिल कर धर्मनिरपेक्षता की राजनीति उस के कंधों पर है.

मुसलमान इस समय भाजपा से ले कर सभी दलों के रडार पर है. लेकिन सवाल यह है कि खुद को मुसलमानों का खैरख्वाह बताने वाली इन पार्टियों ने मुसलमानों को समाज के अन्य वर्गों के समान लाने के लिए कौन से ठोस कदम उठाए हैं. कोई भी राजनीतिक दल मुसलमानों की बुनियादी आवश्यकताओं व उस के विकास की बात नहीं करता. उसे आरक्षण का लौलीपौप थमा कर खुश करने की कोशिश होती है. मुसलमानों में पिछड़ों व दलितों को आरक्षण नहीं चाहिए, उन्हें तरक्की क?रने के रास्ते मुहैया करवाए जाने चाहिए. वह स्वस्थ व शिक्षित होगा तभी आरक्षण का भी लाभ उठा पाएगा.

यह ठीक है कि 20 या 22 प्रतिशत मुसलमान कट्टवादी सोच रखने वाले दलों को हरा या जिता नहीं सकते लेकिन, स्वाभाविक रूप से धर्मनिरपेक्षता में यकीन रखने वाले बहुसंख्यक हिंदुओं की उन्हें हरानेजिताने में अहम भूमिका रहती है. यही चीज भारत के अल्पसंख्यकों में हमेशा विश्वास जगाए रखती है.